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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 21

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अशासदंजांसि वचांसि शास्ता शिष्याश्च शिष्टा वचनैर्न ते तै: ।

अहो इदं दुर्गतमं तमोऽन्यत् त्वयाविना श्रायसमार्य ! किं तत् ।।21।।

(80) शास्ता के स्पष्ट वचनों से भी शिष्य शिक्षित न हो सकने के कथन की महांधकाररूपता―क्षणिकवादियों के शासन में कहा है कि उपदेष्टा बुद्धदेव ने निर्दोष वचन की शिक्षा दी । वे बुद्धदेव यथार्थ दर्शन आदिक गुणों से संपन्न थे, इसी कारण निर्दोष वचनों की शिक्षा दी, लेकिन उन वचनों के द्वारा उनके वे शिष्य शिक्षित न हुए, यह बात कही है क्षणिकवाद की महिमा को बताने के लिए, मगर यह उनका कथन कैसा दुस्पार महामोह है, अत्यंत कठिन अंधकार है । भला बतलाओ कि गुणवान तो उपदेष्टा हो और अच्छे शिष्य हों और फिर भी सत्त्व वचनों के द्वारा शिक्षा न मिले यह तो बड़े आश्चर्य की बात है क्योंकि न्याय यह ही है कि उपदेष्टा गुणवान है और सुनने वाले शिष्य समझदार हैं और गुणवान उपदेष्टा के वचन सत्य निकल रहे हैं तो वे जरूर ही तत्त्व की शिक्षा पायेंगे, लेकिन यहाँ जब ऊँचा उपदेष्टा शिक्षा बताये और उसके वचनों को शिष्य सत्य स्वीकार करे और प्रवचन सुनने के लिए बड़ा चित्त रखने वाले शिष्यों को बताये और फिर भी कहते हैं कि वे शिष्य गुरु

के वचन सुनकर भी शिक्षित न हो सके । तो यह कैसा हास्यास्पद कथन विदित होता है ।

(81) कल्पनाबुद्धि से शास्ता, शिष्य, शासन आदि व्यवस्था मानने पर संवेदनाद्वैत की निःश्रेयसरूपता की असिद्धि―यहां शंकाकार कहता है कि बात यह हुई है कि क्षणिकवादियों के शासन में कल्पना से ही उपदेष्टा, शिष्य, शासन और शासन के उपायभूत वचन इनका सद्भाव स्वीकार किया है और परमार्थ से तो केवल विज्ञानाद्वैत वह ही निर्वाणरूप है, इस कारण से क्षणिकवादियों का यह दर्शन हास्यास्पद नहीं है और यह बात बता देते कि उपदेष्टा ने उपदेश दिया और शिष्यों ने उसे समझ लिया तो उसमें क्षणिकवाद नहीं रहता और साथ ही विज्ञानवाद नहीं रहता । क्षणिकवाद तो यों नहीं रहता कि जब उपदेष्टा कितने ही समय तक स्थित माना जाये तब ही तो उपदेष्टा होगा । समझ भी शिष्यों को तब ही बनेगी जब बहुत समय तक एक चित्त याने जीव रहे, सो क्षणिकवाद में ऐसा है नहीं ।

(82) संवेदनाद्वैत की निःश्रेयसरूपता की प्रसिद्धि की दूसरी बात―दूसरी बात विज्ञानाद्वैतवाद में कहां उपदेष्टा, कहाँ शिष्य, कहाँ वचन ये तो बहुतसी बातें कहनी पड़ी, पर तत्त्व तो सिर्फ विज्ञानमात्र हैं, इस कारण परमार्थ से तो विज्ञानमात्र तत्त्व है और वही निर्वाण स्वरूप है और कल्पना में फिर कोई उपदेष्टा है, कोई शिष्य है, कुछ वचन हैं, हर यह व्यवहार चल रहा । उक्त शंका के समाधान में कहते कि यह सब विडंबना स्याद्वादशासन से बहिर्भूत हो जाने से उत्पन्न हुई है । हे आर्य ! हे वीर जिनेंद्र ! आपके बिना निश्रेयस बनेगा कहां से? याने स्याद्वाद के नायक प्रभु जिनेंद्र के उपदेश के अभाव में निर्वाण का उपाय नहीं बन सकता । सर्वथा एकांतवाद का सहारा लेने वाले उपदेष्टा के द्वारा कुछ भी संभव नहीं है ।

(83) कल्पनाबुद्धि की मान्यता से विज्ञानाद्वैत की सिद्धि की असंभवता―विज्ञानाद्वैत के विषय में बहुत बाधाओं से बताया गया था कि विज्ञानाद्वैत तत्त्व की सिद्धि ही नहीं होती, क्योंकि सब कुछ दिख रहा, वीत रहा । कैसे कहा जाये कि यह सब कुछ नहीं है? स्वप्न का दृष्टांत देकर जागृत दशा की बात को भी बहकाना, यह कहाँ तक उचित है? भले ही स्वप्न में कल्पना हो, कल्पना चलती है मनुष्य को, वहाँ पदार्थ कुछ नहीं, लेकिन पदार्थ कुछ होता ही न हो कभी भी तो स्वप्न में भी कल्पना कहां से आ जाये ? जैसे मानो स्वप्न में मनुष्य ने बड़ी यात्रा की, पहाड़ पर चला तो यात्रा के सिवाय नहीं है पहाड़, मगर पहाड़ कहीं हुआ ही तो करता है और उन सबका ज्ञान इसने जगत् में किया या देखा या काम किया उसकी कल्पना स्वप्न में हुई, मगर कोई पदार्थ ही नहीं है तो तद्विषयक कल्पना भी नहीं आ सकती है । भले ही कल्पना के समय में सामने पदार्थ नहीं है मगर कहीं है तो सही और फिर जागृत दशा में तो सामने पदार्थ है, उनका अध्ययन होकर ज्ञान बन रहा है, फिर कैसे ज्ञानमात्र तत्त्व को निरालंबन कहा जाता है । और फिर यहां जो शंकाकार ने कल्पना और परमार्थ ऐसे दो रूप बताये तो उन दो रूपों के कथन में ही यह सिद्ध हो जाता है कि सर्वथा एकांतवाद कुछ नहीं है । आखिर हेतु मानना ही पड़ा । इस प्रकार विज्ञानाद्वैतवाद में कोई तत्त्व की व्यवस्था नहीं बन सकती ꠰


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