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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 14

From जैनकोष



कापथे पथि दुःखानां कापथस्थेऽप्यसंमति: ।

अंसपृक्तिरनुत्कीर्तिरमूढ़ा दृष्टिरुच्यते ।।14।।

ज्ञानी की कापथ और कापथस्थों में असम्मति―ज्ञानी पुरुष खोटे मार्ग में संपर्क नहीं बनाता । वह दुःखों का मार्ग है । और खोटे मार्ग में चलने वाले चाहे वे सन्यासी के रूप में भी हों उनकी संगति नहीं करता और इतना ही नहीं संबंध नहीं बनाता और उनकी प्रशंसा भी नहीं करता यह कहलाता है अमूढ़दृष्टि अंग। भीतर जान लिया कि यह मैं पवित्र ज्ञानमात्र आत्मा हूं, इसके सुख का मार्ग यही है कि अपने आत्मस्वरूप को निरखूं। इसी में ही संतोष है। जगत का कोई दूसरा पदार्थ मेरे संतोष के लायक नहीं । मुझ को सत्य संतोष मिलेगा तो मेरे आत्माराम में ही मिलेगा । सो मेरे दुःखों से छुटकारा का उपाय सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र है । जो लोग इस मार्ग से विरुद्ध चल रहे हैं वे खोटे मार्ग में है । मिथ्यात्व के उदय के कारण रागीद्वेषी जीवों को लोग देव मान लेते है उनकी पूजा प्रभावना करते हैं पर उसे देखकर चित्त में प्रशंसा का भाव न जगे किंतु यही ध्यान में रहे कि ये सब संसार में रुलने की ही करतूत हैं । देव शास्त्र गुरु जो सत्य है उसमें ही उनकी श्रद्धा रहे । अन्य रागीद्वेषी जीवों में देवरूप से श्रद्धा न रहे । कितने ही लोग मंत्रवादी अपने मंत्र का कोई प्रभाव डालते हैं लेकिन वे ख्याल बनाकर उसमें अपना बड़प्पन मानते हैं तो ऐसे लोगों को देखकर भी यह ही सब कुछ है यह ही आदर्श हैं ऐसा नहीं मानता । किंतु जो सम्यग्दृष्टि है ज्ञानी है संयमी है वह ही भले मार्ग पर चलने वाला है यही सुनिर्णय है ।

देखो भैया कितनी तरह की बातें दुनिया में चलती है मिथ्यात्व में । कुवां पूजते हैं बावड़ी पूजते हैं और उसमें धर्म मानते है । भले ही इन कुवां बावड़ी आदि से उपकार की कई बातें मिलती है पर संसार से छूटने का जो मार्ग है । सो इनमें नहीं है । लौकिक लोगों के उपकार की बात हैं । सो गृहस्थजन करते भी है ऐसा । मगर यह धर्म का काम है इसमें मेरा उद्धार हो जायगा यह श्रद्धा नहीं होती ज्ञानी की । वह तो जानता है कि मेरा सहज आत्मस्वरूप ज्ञानमय है । इसकी दृष्टि और इसकी अवस्था में ही हमारा कल्याण निहित है । तो जो अन्य प्रकार के देवी देवताओं को मानते हैं उनको देखकर मन में उनके प्रति प्रशंसा और उत्साह भाव न हो ।

देहोपकारक वस्तुवों में देवत्व की श्रद्धा से लोकमूढ़ता का विस्तार―भैया कितनी ही बातें लोकमूढ़ता की होती है―जैसे बड़ के पेड़ में धर्मबुद्धि से थोड़ा कलसा से पानी सींचना । और उस पेड़ के चारों तरफ धागा बांधना, इसे लोग कहते हैं कि धर्म कर रहे है । बड़ पेड़ क्या है? एकेंद्रिय जीव और जो पूजने वाला कौन है? पंचेंद्रिय जीव । कैसा मिथ्याभाव छाया है कि जिसमें कोई देवतापन की बात नहीं फिर भी लोग उसे बढ़ा-चढ़ाकर देवता कहते है । ये देवता कैसे कहलाने लगे, इसकी बात सुनो―कोई पहले ऐसा जमाना था कि इन मनुष्यों के काम में जो चीज अधिक आये उसको देवतारूप मान लेते थे । जैसे―अग्नि देवता, अब आग बिना तो सब काम बंद रहेगा । न रसोई का काम बन सकेगा, न अन्य कोई जलाने पकाने आदि के काम । तो बड़ा उपकार हो रहा है अग्नि से जिससे अपना जीवन अच्छी तरह चले उसको लोगों ने देवता मान लिया, पर देव तो वास्तव में वह आत्मा है जिसमें रागद्वेष रंच नहीं ज्ञान और आनंद अनंत प्रकट हुआ है और उसे छोड़कर अन्य कैसे-कैसे देव माने जाते हैं । गाय, देवता, गाय बड़ा उपकारी जानवर है, उसके दूध से बच्चे पुष्ट होते है, बैल बनते है, खेती की जाती है जिससे लोगों का पोषण होता हैं । तो जिससे अपने प्राणों को पोषण मिलता उसे देव मान लेने की बात मन में थी, क्योंकि आत्मा परमात्मा के बोध वाला जमाना न था । अब बड़ के पेड़ को देवता क्यों मानते सो सुनो―बड़ का पेड़ इतना बड़ा छायादार होता कि उसके नीचे बारात पड जाय, सेना ठहर जाय, मुसाफिरों को ग्रीष्मकाल में शीतल छाया मिले, वर्षाकाल में भीगने से बचे, यों बड़ा उपकार मिलता है बड़ के पेड़ से इसी से लोगों ने उसे देवता रूप में माना । अब पीपल के पेड़ को देवता क्यों मानते सो सुनो―आयुर्वेद के अनुसार बताया है कि पीपल के पत्तों से स्पर्श की हुई हवा प्रकृत्या ही निरोगताबर्द्धक है इसी कारण बहुत उपकारी होने से उसे देवता माना जाने लगा । अब यहाँ मन में एक ख्याल आता है कि लोगों ने नीम के पेड़ को क्यों छोड़ दिया देवता मानने से? नीम का पेड़ तो बड़ा ही उपकारी होता है, कितने ही रोग उसके द्वारा दूर किये जाते है । तो शायद नीम के कड़वा होने का अवगुण होने के कारण उसे छोड़ दिया होगा । खैर कुछ भी बात हो । पर बात यहाँ यह समझना कि जिसे लोगों ने अपना माना उसमें देवतापने की मान्यता बनाया । सूर्य देवता―सूर्य को भी लोग देवता मानते । अगर सूर्य न निकले दो चार दिन तो लोगों को पता पड़ जाय कि बिना सूर्य के निकले कितना कष्ट होता है, मगर सूर्य को बड़ा उपकारी मानकर लोग सूर्य देवता कहने लगे । पर वहाँ वास्तविकता यह हैं कि सूर्य तो, एक पृथ्वीकायिक विमान है, उसमें रहने वाला इंद्र है वह भी देवगति का जीव है । उसमें पूज्यता की क्या बात? ऐसी ही बात चंद्र देवता के विषय में समझना । इनमें पूज्यता की कोई बात नहीं, पर उपकारी जानकर लोगों ने इन्हें देवता मानकर पूजा । लोग तो चक्की उखली को भी देवता मानकर पूजते अनेक चिथड़ों के पुतले बनाकर देवता मानकर पूजते, पर ये सब मिथ्यात्व भरी बातें हैं।

सम्यग्दृष्टि की समीचीन देव शास्त्र गुरु में आस्था―वास्तव में देव वह है जिसको ज्ञान परिपूर्ण हो गया हो और रागद्वेषादि विकार जिनके रंच भी न हो । वही स्वरूप तो मेरा भी है । तो अपने स्वरूप की याद के लिए प्रभु की भक्ति बहुत काम देती है । तो ऐसे किसी भी प्रकार के लोगों द्वारा माने हुए गुरु हो, देव हो, शास्त्र हो, जिनमें वीतरागता की बात नहीं है उनकी प्रशंसा न करना, उसका प्रभाव न होना यह कहलाता है अमूढ़दृष्टि अंग, अर्थात अन्य तत्त्व में मुग्ध न हो ऐसी दृष्टि मिली है । सच्चा मार्ग तो एक दिगंबर मार्ग है, मायने जिसको कुछ न चाहिए मुक्ति ही चाहिए वह किसी भी अन्य वस्तु का संपर्क न रखेगा । तो जो आडंबर रखता है, मूल्यवान वस्त्र पहिनता है, नाना प्रकार के भेष धारण करता है उसके प्रति श्रद्धा से सिर झुका देना मिथ्यात्व है । तो जो वीतराग सर्वज्ञ है वह तो हमारा देव और जिसमें तत्त्वस्वरूप की बात कही गई है, वीतरागता की बात बतायी गई है वह है शास्त्र और जो उस मार्ग में चल रहे वे कहलाते हैं गुरु । इन्हें छोड़कर अन्य प्रकार के देव, शास्त्र, गुरु में मोक्षमार्ग की श्रद्धा न होना अमूढ़दृष्टि अंग कहलाता है ।


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