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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 111

From जैनकोष



कि जाणिऊण सयक्त तच्चं किच्चा तवं च किं वहुल।

सम्मविरोहि विहीण णांणतव जाण भववीयं।।111।।

   सम्यक्त्व बिना विपूल ज्ञान की भी भववी जरुपता―आत्मकल्याण के लिए सर्वधान ओर प्रथम परिणाम है सम्यक्त्व विशुद्धि सम्यग्दर्शन होना, जिस जीव के सम्यग्दर्शन नहीं है वह संपूर्ण तत्वों को भी जान जे तो भी उससे क्या लाभ? जीव अजीव, आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन 7 तत्त्वों के बारे में अर्द्वलोक मध्यलोक अधोलोक तीन लोक की रचना के बारे में (भूतकाल वर्तमान काल भविष्य काल) व्याकरण, वेद आदिक अनेक ग्रंथों में निपुण भी हो जायें तो भी सम्यक्त्वरहित जीव को इससे कुछ भी लाभ नहीं हैं वर्तमान में लौकिक राज्य पद आदिक विषयों में जो बड़े चढ़े हैं और जिनकी महिमा का प्रताप तुरंत खूब जाना जा रहा है वहाँ इस बड़प्पन से भी क्या लाभ हैं यदि आत्मतत्त्व का सम्यक अनुभव न बने इसका कारण यह है कि जीव तो नित्य हैं वह तो माता नहीं हैं किंतु एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर को ग्रहण करता है। जैसे यहाँ परिणाम किया। ओर मिथ्यात्व का परिणाम तो सबसे महान पाप परिणाम हैं। आत्मा की स्वतंत्रता का बोध नहीं वस्तुओं की स्वतंत्रता का बोध नहीं, वस्तुओं की स्वतंत्र सत्ता का बोध नहीं तो पहले बड़ा पाप है, अज्ञान में रहने वाले जीव पाप कर्म का ही बंध करने हैं तो मरण के बाद उनकी गति सही कैसे हो सकती? तो सम्यक्त्व अगर है तो उसका सारा भविष्य बढ़िया ओर सम्यग्दर्शन नहीं तो सारा अंधेरा ही अंधेरा हैं।
   सम्यक्त्वविहीन पुरुषों के तप की भी भवबीजरुपता―लोग अपनी शांति के लिए नाना तरह का यत्न करते हैं विषय साधन संचय करें नाना तपश्चरण करें सो कठिन परिधान यत्न तो कर डालते हैं पर जो सुगम स्वाधीन यत्न है उसके लिए उमंग ही नहीं रहती है। सम्यक्त्वहीन पुरुष का कायक्लेश भी परिधान चेष्टा है। इस ही तो कहते हैं मिथ्यात्व का उदय उल्टा रास्ता तो सही जय रहा है और सही रास्ते ही निगाह भी नहीं हैं तो जिसको आत्मा की भलाई का सही मार्ग नहीं विदित है और विषयों में यह पदार्थों में कल्पनायें लगाने का शरीर का धर्म के नाम पर कष्ट ही देते रहने का अशक्त होने का उपाय ही सही जय रहा है उन पुरुषों का लौकिक भी निष्फल है और नाना कायक्लेश भी निष्फल हैं। सम्यक्त्वविहीन जीवों का ज्ञान व तप भी लाभ दायक नहीं हैं रचना कहाँ है इस उपयोग को कहाँ फिट कहलाना हैं? लक्ष्य का तो पता नहीं है और लक्ष्यविहीन जैसे कभी एक कुत्ता चिल्लाये तो दूसरे भी चिल्लाने लगते। उन दूसरे कुत्तों को पता भी नहीं कि किस बात पर चिल्ला रहे, ऐसे ही अज्ञानी जन धर्म के नाम पर भी तप भी कर रहे कुछ भी कर डालते पर उनको यह पता नहीं कि हम यह कर किसलिये रहे हैं। बहिरंग तप का भी पता क्या है? ओर जब परिचय नहीं है अपने लक्ष्य का अपने सत्य स्वरूप का कि इस तरह के स्वरूप कि तरह के स्वयं में अपने उपयोग को फिट करना हैं। इसका जिसे मान ही नहीं है तो उपयोग तो उपयोग तो बाहर यंत्र तंत्र रमा करेगा। बाह्य तपश्चरण तो एक विशुद्ध वातावरण हैं जिसमें जीव शुद्ध तत्त्व की दृष्टि कर सकता है तो जो सम्यक्त्वरहित पुरुष हैं उनको बहुत-बहुत तप भी हो तो भी उसके लक्ष्य का परिचय न होने से उससे लाभ नहीं बल्कि यं सब संसार के बीज ही बनते हैं।


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