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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 52

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अज्जवसप्पिणि भरहे धम्मज्झाणं पमादरहिदोत्ति।

होदित्ति जिणुद्दिट्ंठ णहु मण्णइ सो हु कुदिट्ठी।।52।।

   कठिन पंचमकाल में भी निष्प्रसाद धर्म्यध्यान की संभवता―यद्यपि आज का समय कलिकाल है, दुःख का काल है। खोटे भावों की ओर बह जाने की आज की रीति है। तिस पर भी यहीं इस काल में प्रमादरहित धर्मध्यान भी हुआ करता है। क्या चतुर्थकाल में अज्ञानी जन न थे, दुराचारी न थे? पुराणों में भी अनेक जगह वर्णन आता है। तो अच्छे बुरे लोग सब कालों में होते आये मगर अच्छे बहुत होना, बुरे कम होना यह तो है अच्छे काल की निशानी और बुरे बहुत होना और अच्छे बिरले मिलना यह है इस कलिकाल 
   कठिन पंचमकाल में भी निष्प्रमाद धर्म्यध्यान की संभवता―यद्यपि आज का समय कलिकाल है, दुःख का काल है। खोटे भावों की ओर बह जाने की आज की रीति है। तिस पर भी यहीं इस काल में प्रमादरहित धर्मध्यान भी हुआ करता है। क्या चतुर्थकाल में अज्ञानी जन न थे, दुराचारी न थे? पुराणों में भी अनेक जगह वर्णन आता है। तो अच्छे बुरे लोग सब कालों में होते आये मगर अच्छे बहुत होना, बुरे कम होना यह तो है अच्छे काल की निशानी और बुरे बहुत होना और अच्छे बिरले मिलना यह है इस कलिकाल की निशानी। आज कलिकाल है फिर भी प्रमादरहित धर्मध्यान होता है, ऐसा निर्ग्रंथ देव ने बताया है। जो अपने आत्मा को सम्हाले। आत्मा की दृष्टि करे, हित चाहे उसको धर्मध्यान सुलभ है और जिसको मोह से ही प्रेम है, परिजन ही जिन के लिए देवता बने हैं उनका सुधार तो कठिन है, लेकिन आज भी 7वें गुणस्थान तक हो सकते हैं। प्रमादरहित धर्मध्यान आज भी हो सकता है। श्रेणी तो नहीं है, आज, चारित्र मोह का उपशम अथवा क्षय तो नहीं किया जा सकता है किंतु उसका क्षयोपशम आज भी है, और जिसमें प्रमादरहित धर्मध्यान हो सकता है, क्योंकि आत्मा की बात है, आत्मा को करना है, आत्मा में करना है, कोई पराधीनता नहीं, धर्मपालन तो बहुत ही स्वाधीन और सुगम है, इस कारण जिनका भवितव्य अच्छा है वे अपने आप में अपने अविकार स्वभाव की रुचि करके अपने में संतुष्ट रहते हैं, धर्मध्यान में बढ़ते हैं। तो आज भी इस पंचमकाल में धर्मध्यान होता है। जो ऐसा नहीं मानता वह मिथ्यादृष्टि है।


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