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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शीलपाहुड - गाथा 31

From जैनकोष



जइ णाणेण विसोहो सीलेण विणा वुहेहिं णिद्दिट्ठो ।

दसपुव्वियस्स भावो यणु किं पुणु णिम्मलो जादो ।।31।।

(62) शील के बिना ज्ञान से सिद्धि की असंभवता―शील बिना सब बेकार है । अब व्यवहारशील को देखो―व्यवहारशील मायने ब्रह्मचर्य । ब्रह्मचर्य का पालन हो तो मन ठिकाने रहता है, वचन ठिकाने रहते हैं, शरीर में बल भी रहता है, उसके धैर्य रहता है, विवेक और ज्ञान भी रहता है । शीलरहित हो तो मन का बल भी खत्म, वचनबल भी नहीं रहता, देहबल भी नहीं रहता, आयु भी बहुत पहले नष्ट हो जाती है, लोक में इज्जत भी नहीं मिलती । तो जब व्यवहारशील का ही इतना प्रताप है तो फिर निश्चयशील अर्थात् आत्मा का सहजस्वभाव, उसकी दृष्टि हो, उसका आवलंबन हो, उसरूप अपने को अनुभवें तो उसका प्रताप है मोक्ष होना? मोक्ष में यह आत्मा किस ढंग से रहती है कि न तो वहाँं शरीर है, न उसके साथ कर्म हैं, न उसमें विकल्प विचार तरंग उठती हैं, केवलज्ञानमूर्ति आत्मा है । ज्ञान के द्वारा तीन लोक तीन काल के सर्व पदार्थ ज्ञान में रहते हैं, पर जरा भी क्षोभ नहीं है, जरा भी वांछा नहीं है और न उस ज्ञान द्वारा जानकारी में उनका कोई लगाव है, शुद्ध ज्ञानस्वरूप है । ऐसा शुद्ध होना किस बात पर संभव होता है कि इस संसार में यह आत्मा अब भी सबसे निराली है, इसका स्वरूप अलग है, यों ज्ञानमय स्वरूप रूप से अपना अनुभव बनायें कि मैं तो ज्ञानमात्र हूँ तो उसको मोक्षमार्ग मिलेगा । धन्य हैं वे क्षण कि जिस क्षण इस जीव को यह अनुभव बने कि मैं ज्ञानमात्र हूँ । ज्ञानमात्र अनुभव बनने के बाद उत्कृष्ट शांति मिलती है । जरा अपना उपयोग भी कुछ अंदर ऐसा ले जाकर निरखिये तो जरा कि मैं ज्ञानमात्र हूँ केवल ज्ञानस्वरूप हूँ तो अपने को स्वयं यह भान हो जायेगा कि इस ज्ञानमात्र मुझ आत्मा का दूसरा कुछ है ही नहीं । सर्व पदार्थ अत्यंत भिन्न हैं । परिवार, धन-वैभव, इज्जत, प्रतिष्ठा ये सब उसे माया जचेंगे और इन वृत्तियों पर उसे हंसी आयेगी कि कैसा तो यह अनंत आनंद का निधान परमात्मस्वरूप है और कहाँ यह संसार की बातों में फंस रहा है ।

(63) आत्मशील का परिचय होने पर शीलरुचि होने से बाह्य तत्त्वों के परिहार में अप्रमाद―जब तक यह जीव इन विषयों का लालची है, इनमें आसक्त है तब तक इसे ज्ञान भी हो तो भी उससे शुद्धि नहीं हो सकती । शील के बिना निर्मलता नहीं जगती । बड़े-बड़े ज्ञानी हुए, मगर संयम में जब तक नहीं आये, अपने स्वभाव में मग्न जब तक नहीं हुए तब तक उनको शांति का रास्ता नहीं मिला । तो इस तत्त्व को पाने के लिए जरूरत है ज्ञान की । हमें अपना ज्ञान ही न हो तो हम अपने स्वभाव में कैसे टिक सकते? तो जिस-जिस पर प्रेम होता हे उसके लिए आप अपना सर्वस्व समर्पण कर सकते हैं । जैसे आपका कोई बच्चा बीमार हो जाये तो आप उसके पीछे अपना सारा धन खर्च करने को तैयार हो जायेंगे । यहाँ तक कि कर्ज लेकर भी उसका उपचार करायेंगे, क्योंकि आपकी दृष्टि में आपका बच्चा ही सब कुछ है, पर तथ्य नहीं है ऐसा । तथ्य यह है कि इस आत्मा के लिए आत्मा का सही ज्ञान होना यही सब कुछ है । तो जिसने इस ज्ञान का अनुभव करके आनंद पाया उसका दृढ़ निर्णय है कि मेरा शरण यह ज्ञानस्वरूप आत्मा स्वयं है । उसका प्रकाश मिले, उसका ज्ञान मिले, चाहे उसके लिए ही अपना तन, मन, धन, वचन सर्व कुर्बान हो जाये, पर मेरी आत्मा का वास्तविक स्वरूप मेरे ज्ञान में आ जाये तो समझो कि मैंने सर्वस्व प्राप्त कर लिया । आखिर मरने के बाद यह झमेला एक सूतमात्र भी नहीं जाता । थोड़े दिनों का जीवन है और अनंतकाल की यात्रा पड़ी है । समय तो अमर्याद है, किसी दिन समय खत्म होगा क्या? कभी खत्म न होगा । इस लोक को तो कहीं हद मिल जायेगी कि इसके बाद दुनिया नहीं है, मगर समय की हद नहीं है कि इसके बाद अब समय नहीं है । इतने समय तक हमें रहना है आगे भविष्य में अनंतकाल के लिए और यह जो 10-20-50 वर्षों का जीवन मिला इसमें ही यहाँ के मिले हुए समागमों को हम अपना सर्वस्व समझ लेते हैं, राग करते हैं, इसी में उलझ जाते हैं तो उसके फल में हमारे भविष्य का अनंतकाल सारा दुर्गतियों में जायेगा । तो आज क्यों नहीं चेतते, एक दृढ़ संकल्प बना लें कि मेरे लिए मेरे आत्मा के सिवाय सब-कुछ तुच्छ है । धन-वैभव कुछ चीज नहीं है । गुजारे के लिए गृहस्थी में रहने के कारण उसका उपाय बनाया जाता, उसका इतना ही प्रयोजन है कि ये प्राण इस शरीर में टिके रहें तो मैं संयम की, ज्ञान की, चारित्र की, धर्मध्यान की साधना बनाये रहूंगा, केवल इस ध्येय से थोड़ा बहुत प्रयत्न है गृहस्थ का, पर ज्ञानी गृहस्थ केवल एक निज ज्ञानस्वरूप से ही रुचि रखता है, संसार के किसी भी झमेले में वह अपनी रुचि नहीं रखता । तो शील ही आत्मा का शरण है । उस आत्मस्वभाव का ज्ञान करें और उसकी रुचि बनायें, उसके लिए सत्संग और स्वाध्याय बहुत ऊंचे तप हैं ।


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