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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शीलपाहुड - गाथा 34

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सम्मत्तणाणदंसणतववीरियपंचयार मप्पाणं ।

जलणो वि पवणसहिदो डहंति पोरायणं कम्मं ।।34।।

(72) शीलपवन से प्रेरित पंचाचाररूप अग्नि से पूर्वसंचित कर्मेंधनों का दहन―आत्मा के उद्धार के लिए जो आचरण बताये गए हैं वे 5 प्रकार के होते हैं―(1) सम्यक्त्वाचार, (2) ज्ञानाचार, (3) दर्शनाचार, (4) तपाचार, (5) वीर्याचार । सम्यग्दर्शन का आचरण होना सम्यक्त्वाचरण है, सबसे निराला है, ज्ञानमात्र है, अमूर्त है, ऐसा अपने स्वरूप में अपने को आत्मारूप अनुभव करना कि यह मैं हूँ यह सम्यग्दर्शन कहलाता है । ज्ञानाचार―आठ अंगसहित ज्ञान का आचरण करना ज्ञानाचार है । दर्शनाचार―ज्ञान से पहले छद्मस्थों को दर्शन हुआ करता है । इसमें पदार्थ का सिर्फ प्रतिभास होता है, इस प्रकार का आचरण करना दर्शनाचरण है और तपश्चरण में आचरण बने यह तपाचार कहलाता है और वीर्यशक्तिरूप आचरण करना वीर्याचार है । ये 5 प्रकार के आचार आत्माओं के होते हैं । तो जैसे अग्नि जलती है और उसमें हवा लग रही तो उससे ईधन जल जाता तो ऐसे ही ये आचरण करते हुए अंतस्तत्त्व का आश्रय बनावे, तो इन आचरणों में पुरातन कर्म भी सब दग्ध हो जाते हैं । आत्मा का उद्धार आत्मस्वरूप के अनुसार आचरण होने में है । तो इन्हीं आचारों को 5 विभागों में बांटा है । सम्यक्त्वाचार तो विपरीत अभिप्रायरहित अपने की स्वच्छ अनुभवन कहलाता है, ज्ञानाचार ज्ञान का केवल जाननस्वरूप है सो मात्र जाननस्वरूप के लिए ही उपयोग रहना यह ज्ञानाचार कहलाता है । दर्शनाचार―समस्त वस्तुविषयक जो सामान्य प्रतिभास है, जिसमें यह अमुक है, यह भी भेद नहीं पड़ता, जो कि अपने केवल आत्मा के दर्शनरूप है, ऐसा जो आत्मा का परिणाम है वह दर्शनाचार कहलाता है । तपश्चरण तो वास्तव में इच्छा निरोध है । अपने आपमें अपने चैतन्यस्वरूप को तपाना, वही दृष्टि में रहना, ऐसा जो एक भीतर तपन है वह है निश्चयनय से तपाचार और इस ही की पुष्टि के लिए जो वातावरण बनाया जाता है अनेक प्रकार के बाह्य तपों का आचरण या अंतरंग तप का आचरण वह सब तपस्या है, ऐसे ही वीर्याचार में आत्मा के समस्त बल प्रयोग से आत्मस्वरूप में ही उपयोग को रमाना ऐसा जो पौरुष है वह वीर्याचार है । सो इन 5 आचारों के द्वारा पूर्वबद्ध कर्मों को जला दिया जाता है । जैसे कि अग्नि से ईधन जला दिया जाता है और जैसे अग्नि को हवा प्रेरित करती है, बढ़ाती है, उकसाती है ताकि अग्नि पूरा काम कर सके, तो ऐसे ही आत्मा में शीलस्वभाव की दृष्टि, आत्मस्वभाव, उन पंचाचारों को उकसाता है, बढ़ाता है जिसके द्वारा पूर्वबद्ध कर्म नष्ट किए जाते हैं, सो यहाँ यह, समझना कि शील के बिना निर्वाण नहीं हो सकता । शील का अर्थ है आत्मा के स्वभावरूप अपने आपको मनन करना ।


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