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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शीलपाहुड - गाथा 37

From जैनकोष



णाणं झाणं जोगो दसणसुद्धीय वीरियायत्तं ।

सम्मत्तदंसणेण य लहंति जिणसासणे बोहिं ।।37।।

(76) ज्ञान ध्यान योग व दर्शनशुद्धि की आत्मकीय तंत्रता होने से शीलमहिमा की प्रकटता―ज्ञान, ध्यान, योग और दर्शनशुद्धि ये वीर्य के आधीन हैं । जैसा आत्मबल है वैसा ही इस ज्ञान, ध्यान आदिक को करने में समर्थता है । आत्मबल शीलस्वभाव के आश्रय से ही बनता है । इंद्रियपोषण शरीरपोषण आदिक प्रयत्नों से तो आत्मा का बल हीन होता है, सो आत्मबल बड़े उसमें भी महिमा शील की है, आत्मशील के आलंबन के प्रताप से वह सामर्थ्य बढ़ती है जिससे यह जीव ज्ञान में प्रकृष्ट बनता है । जैसे लोग सोचा करते हैं निरंतर कि ऐसा काम करो जिसमें वैभव का संचय हो, धन बढ़े, कोई न कोई व्यापार की, व्यवसाय की बात सोचा करते हैं, पर यथार्थतया सोचा जाये तो आत्मा का व्यापार, व्यवसाय, कमाई, केवल यही है कि वह आत्मा के शील का आलंबन करे, स्वभाव को ही दृष्टि में ले । ध्यान की सिद्धि भी आत्मवीर्य के आधीन है । ध्यान कहते हैं एक विषय पर ज्ञान का ज्यादह देर टिकाये रहना, सो ज्ञान में जैसे, आत्मबल का आश्रय है तो ध्यान में भी आत्मबल का ही आश्रय है । जो पुरुष रागद्वेष से रहित होगा वह ध्यान में सफल होगा । ध्यान से चलित करने वाला है रागद्वेषभाव, और रागद्वेष भाव उस ही के मिटता है जिसने रागद्वेषरहित आत्मा के चैतन्यस्वभाव में रुचि की है कि मैं यह हूँ । बाहर में जिसका जो कुछ भी होता हो उससे मेरे आत्मा में परिणमन नहीं होता । मैं क्यों परपदार्थों के विषय में विचार बढ़ाकर अपने आपको बलहीन करूं? रागद्वेष दूर करके आत्मा का वीर्य बढ़ायें और फिर वीर्य के पूरे प्रयत्न से ध्यान की सिद्धि जरूर कुछ देर तक बनायें, तो ऐसे ध्यान की सिद्धि आत्मवीर्य के आधीन है । योग का अर्थ समाधि लेना है, समता परिणाम में रहना है, यह साधन भी आत्मवीर्य के आधीन है । जो पुरुष जितना अपने को ज्ञानमात्र ही अनुभव करके धीर रहता है उसके ही यह सब योग बनता है । तो योग के बनने में भी एक शील का ही आलंबन रहा । यहाँ भी शील की ही महिमा प्रकट हो रही है । सम्यग्दर्शन का शुद्ध परिणमन 8 अंगसहित 25 दोषरहित सम्यक्त्व परिणाम का होना यह आत्मवीर्य पर निर्भर है । अपने आपके ज्ञानस्वभाव की लीनता में निश्चयत: आगे सम्यक्त्व के अंग आ जाते हैं । इसी प्रकार 25 दोषों का टलना वह वहाँ अपने आप हो रहा है । तो ऐसा सम्यक्त्वरूप पौरुष आत्मवीर्य के आधीन है । सो यह सब अपनी शक्ति को न छिपाकर बड़ी लगनपूर्वक ज्ञान, ध्यान, योग और दर्शनशुद्धि को करना, इससे रत्नत्रय की प्राप्ति होती है ।

(77) ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व की भावना में आत्मशील का विकास―आत्मा में आत्मा को ज्ञानमात्र स्वच्छ स्वरूप में निहारने से रत्नत्रय की प्राप्ति होती है और इसी से ही ध्यानादिक भी यथाबल होते ही रहते हैं । तो समस्त शक्तियों के बढ़ाने में आत्मा का शील मूल कारण है । सो इस प्रताप को सुनकर शील की महिमा का अंदाज कीजिए । जो भी पुरुष भगवान बने हैं वे आत्मा के इस शील का आलंबन लेकर बने हैं, सो रत्नत्रय आत्मा का स्वरूप है, अभेददृष्टि से आत्मा का शील आत्मा का स्वरूप है, अपने द्वारा अपने में सुगमतया प्राप्त होता है, यह दृष्टि जिसने पायी वह जीव अलौकिक है । आत्मशील पर ध्यान रखने वाले, ज्ञान रखने वाले पुरुष निरंतर निर्मल प्रसन्न रहा करते हैं । तो यह सब आत्मा के स्वभाव का आलंबन है । इसके लिए अपने आपमें ऐसा मनन कीजिए कि मैं अमूर्त हूँ आकाशवत् निलेंप हूँ ज्ञाताद्रष्टा स्वरूपमात्र हूँ । मेरे स्वरूप में विकार नहीं है । वह तो केवल अपने स्वरूपास्तित्वमय है, सो विशुद्ध चैतन्यस्वभावमात्र मैं आत्मा परिपूर्ण हूँ । ऐसा मनन करना, इस ही ओर ध्यान रखना यह है आत्मा के शील को प्रकट करने का काम । तो हम सबको ऐसी भावनाओं में रहना चाहिए अर्थात् शीलस्वभाव की निरंतर उपासना करनी चाहिए, इस सुकुमार चिकित्सा द्वारा संसार के विकट जन्ममरण संकट समाप्त हो जायेंगे । सो इस शीलपाहुड के प्रकरण में यह आचार्यों का उपदेश है कि हे भव्य जीवों । तुम अपने इस परमार्थशील का आश्रय करो, इस ही में उपयोग डुबोकर, मग्न कर अपने आपको कृतार्थ अनुभव करो


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