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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शीलपाहुड - गाथा 6

From जैनकोष



णाणं चरित्तसुद्धं लिंगग्गहणं च दंसण विशुद्धं ।

संजमसहिदो य तवो धोओ वि महाफवो होइ ।।6।।

(11) चारित्रशुद्ध ज्ञान की महाफलदायकता―चारित्र से शुद्ध तो ज्ञान हो और सम्यक्त्वसहित जिन मुद्रा का ग्रहण हो और संयमसहित तप हो, ऐसे ये थोड़े भी ही तो भी ये महाफल वाले होते हैं, ज्ञान चाहे थोड़ा हो, मगर चारित्र से शुद्ध हो अर्थात् आचरण योग्यव्रतरूप हो तब थोड़ा भी ज्ञान हो तो भी वह महाफल देगा । इससे पहली गाथा में बताया था कि चारित्रहीन ज्ञान निरर्थक हैं । वहाँ निषेधरूप से बताया था, यहाँ विधिरूप से बतला रहे हैं कि ज्ञान कितना ही हो, उसके साथ चारित्र हो तो वह बड़ा फल प्रदान करता है, क्योंकि कर्मों का बंध रोकना, कर्मों की निर्जरा होना यह चारित्र के आधीन बात है । रागद्वेषरहित परिणाम हो, समता की ओर झुका हुआ हो, ज्ञान ही जिसके ज्ञान में समा रहा हो वही वृत्ति तो चारित्र है । तो चारित्र से शुद्ध ज्ञान महान् फल प्रदान करता है । जैसे कोई रोगी दवाई आदिक का ज्ञान तो खूब करे किंतु उसका प्रयोग न करे, खाये नहीं तो वह ज्ञान कुछ फल देने वाला तो न रहा । औषधियों का बोध तो रहा, पर जब उनका प्रयोग ही कुछ नहीं किया जा रहा तो निरोगता कैसे हो? ऐसे ही कोई आत्मा अपने संसार रोग के बारे में और संसार रोग दूर होने के बारे में कुछ ज्ञान भी कर ले, पर अपने ज्ञान को उपयोग को आत्मस्वरूप के अनुरूप न बनाये तो उस ज्ञान से फायदा नहीं और दृष्टि सही रखे, यथाशक्ति आत्मस्वभाव की ओर दृष्टि बनाये तो थोड़ा भी ज्ञान हो तो वह भी महान फल प्रदान करता है ।

(12) सम्यक्त्वशुद्ध जिनमुद्राग्रहण की महाफलदायकता―सम्यग्दर्शन से विशुद्ध जिनमुद्रा का ग्रहण महान फल प्रदान करता है । कार्य क्या करना है ? जब यह बात प्रयोजन से सही उतर जाती है तब क्रिया पुरुषार्थ उस उद्देश्य के पूरक हो जाते हैं । जिनमुद्रा ग्रहण करना तपश्चरण है, संयम है, ये किसलिए किए जाते हैं? इसका जिनको परिचय है कि आत्मा ज्ञानस्वरूप है और उस सहज ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व को ही निरखना है, उसही में रमना है, वहाँ ही निस्तरंग होना है, इस कार्य का जब परिचय हो और फिर वह जिनमुद्रा धारण कर यथासंभव इसही ज्ञानस्वभाव में मग्न होने का पुरुषार्थ बनायें, तो उनका यह जिनमुद्रा ग्रहण महान फल का देने वाला है । किस कारण कि आरंभ और परिग्रह का त्याग किया जाता है । इसका ठीक परिचय विरक्त साधु को होता है । नग्नपना समस्त शल्यों के दूर करने का सूचक है, वह अपने को निर्भार समझता है, स्वयमेव सारे आरंभ छूट जाया करते हैं और आरंभ परिग्रह को छोड़ने का व्रत भी लिया है तो ऐसे श्रद्धान सहित जिनमुद्रा का ग्रहण करना फलदायक होता है ।

(13) संयमसहित तपश्चरण की महाफलदायकता―संयम से सहित तपश्चरण हो तो वह तपश्चरण चाहे थोड़ा ही हो तो भी वह महान् फल देता है । संयम दो प्रकार के होते हैं―(1) इंद्रियसंयम, (2) प्राणसंयम । पंचेंद्रिय के विषयों से राग न होना इंद्रियसंयम है । जिसने आत्मा के स्वभाव के आनंद का परिचय पाया है और जिसका यह दृढ़ निर्णय है कि आत्मा स्वयं आनंदस्वरूप है, जब ज्ञानस्वरूप आत्मा का अनुभव रहे, वही ज्ञान में रहे, किसी परपदार्थ पर उपयोग न जाये तो उस समय उत्पन्न हुआ आनंद जिसने चख लिया है उसे विषयों में प्रीति कभी हो ही नहीं सकती । तो जिसके इंद्रियसंयम है उसके वास्तविक तपश्चरण है । प्राणसंयम में 6 काय के जीवों की दया पाली जाती है । वास्तव में अपने जीव के समान, अपने स्वरूप के समान स्वरूप वाला समझा हो और सामान्यदृष्टि से देखा जाये तो सभी आत्मायें समान हैं, ऐसा जिसका निर्णय हो वह प्राणरक्षा का पौरुष कर सकता है । तो ऐसे इंद्रियसंयम और प्राणसंयम से सहित जो तपश्चरण है वह थोड़ा भी तपश्चरण हो तो विशाल फल को प्रदान करता है ।


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