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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 122

From जैनकोष



इदमेवात्र तात्पर्यं हेय: शुद्धनयो न हि ।

नास्ति बंधस्तदत्यागात्तत्त्यागाद्बंध एव हि ॥122॥

    यहाँ तात्पर्य यह है कि शुद्धनय कभी छोड़ना न चाहिए, यह हेय नहीं है, अपने आत्मा में निरपेक्ष विशुद्ध स्वरूप की दृष्टि त्यागने योग्य नहीं है। अपने स्वरूप की दृष्टि न त्यागे। मैं ज्ञानप्रकाश मात्र हूँ, ऐसा अपना अनुभव बनेगा तो बंध न होगा और यदि उस शुद्धनय का त्याग कर देंगे तो नियम से बंध होता है, बस इस संसार में रुले बँधे फंसे उसका कारण है अपने को अपने स्वभावरूप न मान पाना। अन्य रूप से माना जाना बस यही आपकी बड़ी दुर्गतियों का कारण है। कुछ लोग तो सुनकर अचरज कर सकते हैं कि इस जीव ने ऐसा क्या अपराध किया। अगर मान लिया किसी पदार्थ में कि यह मेरा है तो इतनी ही बात तो उसके अंदर आयी, मगर इतना कठोर दंड क्यों मिल रहा कि यह जीव मरकर पशु बन जाय, कीड़ा बन जाय, वृक्ष बन जाय। इतना कठोर दंड इतने से परिणाम का मिल गया कि परपदार्थ को मान लिया कि यह मेरा है ! हाँ मिल गया। यह परमात्मप्रभु भगवान आत्मा बहुत पवित्र अंतस्तत्त्व है। इसमें किसी प्रकार का विकार तरंग नहीं, यह इस पर बहुत बड़ा भारी अन्याय है जो अपने स्वरूप से चिगकर  किसी बाहरी पदार्थ में कोई बुद्धि ममता रखे, तो उसमें इतना विचित्र कर्मबंध होता कि उसके उदय में यह जीव एकेंद्रिय दोइंद्रिय आदिक अनेक तरह की दुर्गतियों को प्राप्त करता है। अब अपने अपने उपयोग को सम्हालें कि हम अपने स्वरूप से कितना बिछुड़े हुए रहते हैं और चिग करके हम अपना कितना विनाश कर रहे हैं। साथ कोई दूसरा तो नहीं होने का, जो बाह्य पदार्थों में तृष्णा करे, ममता करे, उसे ही सब कुछ माने, दूसरे को कुछ न समझे, ऐसी जो वृत्ति है वह बहुत बड़ी खोटी वृत्ति है। उससे कभी भी अपना उद्धार नहीं है। इसलिए एक बार तो सबसे निराला अपने को निर्भार अनुभव कर लें- मैं समस्त भार से रहित केवल अपने स्वरूपमात्र हूँ, तो स्वरूपदृष्टि रहेगी, शुद्धनय का त्याग न रहेगा तो उसका बंधन नहीं, यदि स्वदृष्टि त्याग दी केवल बाहरी-बाहरी साधन ये भोग  ये उपभोग जहाँ बाहर चित्त गया तो जैसे मछली पानी से निकलकर बाहर रेतीली जमीन पर पड जाय तो जैसे उसका भला जीवन नहीं, तड़फ-तड़फ करके मरेगी ऐसे ही हम आप सभी जीव अपने स्वरूप से चिगकर, अपने ज्ञानस्वभाव का आश्रय तजकर बाहरी पदार्थों में उपयोग लगाये रहें तो उस मछली की तरह बुरी तरह तड़फेंगे और अपना जीवन यों ही बेकार करेंगे एवं संसार परंपरा बढ़ायेंगे।

991- दुर्लभ मानवजन्म के अवसर का सदुपयोग न करने का विषम फल- आज हम मनुष्य हैं तो कुछ बोध है, कुछ समझते हैं, हम आपको कुछ समझा सकते, आप ही कुछ समझा सकते हैं, ये सब बातें चल रही हैं और मनुष्यभव के बाद मानो कीट पतिंगा हो गए तो वहाँ सब बातें एकदम खतम हो गई। क्या दिखती नहीं हैं इन जीवों की दशायें? इन जीवों की दशा देखकर भी हम नहीं चेतते। एक बार एक पुरुष किसी शराब वाले की दूकान पर गया- दूकानदार से पूछा भाई विलायती शराब होगी क्या आपके पास?...हाँ है।...खूब अच्छी है ना? हाँ-हाँ खूब अच्छी है।...अजी हमको तो बहुत ही अच्छी चाहिए?...हाँ हाँ बहुत ही अच्छी होगी। और यदि आपको विश्वास न हो तो चलो इसका साक्षात् प्रमाण भी तुम्हें दिखा दें कि हमारे यहाँ कि शराब अच्छी है कि नहीं, चलो, देखो वे जो नाली में गंदगी में पड़े हुए जोग हैं, जिनके मुख में कुत्ते भी मूत रहे, जो बेहोशपड़े हैं उनको देखकर अनुमान कर लो कि हमारे यहाँ की शराब अच्छी है कि नहीं। तो ऐसे ही इस जगत के इन दुर्गतियों में पड़े हुए जीवों को देखकर कुछ विश्वास कर लें, इन पशु पक्षी एकेंद्रिय आदिक, गधा सूकर आदिक दु:खी जीवों को निरखकर ही ऐसा अंदाज बना लो कि मोहरूपी मदिरा का पान करके ऐसी-ऐसी दुर्गतियाँ जीवों की हो जाया करती हैं। वह क्यों है? यों ही तो है कि अपने शुद्धस्वरूप से च्युत हो गए और बाहरी पदार्थों में रागादिक बना डाला। उनका यह फल है कि ये नाना प्रकार के कर्मबंध होते हैं। 992- शुद्धनय के त्याग की दो स्थितियां-

    शुद्धनय के त्याग में दो अंतर हैं, एक तो ज्ञानी अपने स्वभाव से हट गया और कहीं बाहर लग गया तो वह तो थोड़ी-थोड़ी देर की स्थिति है। और, तब भी अपनी प्रतीति सही है, उसमें भी बंध तो होगा मगर थोड़ा बंध होगा। मिथ्यात्व और अनंतानुबंधी संबंधी न होगा। और कदाचित् कोई ज्ञान से बिल्कुल च्युत हो जाय याने सम्यग्दृष्टि से मिथ्यादृष्टि बन जाय तो अज्ञान हो गया। उसके रागादिक, ऐसा अधिक योग बनता है, वहाँ फिर यह जीव अपने स्वभाव से ऐसा चिग जाता कि मिथ्यात्व अनंतानुबंधीकृत उसके बंधन चलता है। तो हर प्रकार, हर एक पुरुषार्थ से अपने कोचाहिए कि चिग भीजाय तो भी उसी की ओर लगे। जैसे चींटी भींत पर चढ़ती है, गिरती है फिर भी चढ़ना नहीं छोड़ती, ऐसे ही हम अपने स्वभाव की ओर अभिमुख होने का प्रयत्न करें, गिर भी जायें, फिर भी प्रयत्न करते रहें, उसके लिए बाहरी बातों के प्रसंग त्यागे। कुछ करना पड़े अपने लिए तो करें, इसमें रखा क्या? जैसे कोई-कोई आदमी ऐसे होते कि उनको बतावो कि इसमें बड़ा दोष है जैसे गोभी का फूल, उसे अगर किसी को छोड़ने को कहा जाय तो कहते कि भाई हम तो इसे नहीं छोड़ सकते। तो वह सब बेकार बात है गोभी के फूल का तो त्याग करना ही चाहिए। ऐसे ही आत्महित की दृष्टि से इन बाहरी पदार्थों का त्याग, संयम प्रसंग ये करने ही चाहिये, चरणानुयोग की आज्ञा है तो वे साधारणरूप से भी कठिन क्यों लगते? यह भी कर सकते हैं क्योंकि धुन है कि मैं अपने शुद्धनय को न छोडूँ तो अपने आपके शुद्धनय से मायने आत्मा के सहजस्वरूप की दृष्टि से हम कहीं च्युत न हो पायें, प्रतीति से च्युत न हो पायें, ऐसी अपनी निरंतर भावना होनी चाहिए।


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