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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 23

From जैनकोष



अयि कथमपि मृत्वा तत्त्वकौतूहलीसन्, अनुभव भव मूर्त्ते: पार्श्ववर्त्ती मुहूर्तम् ।

पृथगथ विलसंतं स्वं समालोक्य येन, त्यजसि झगिति मूर्त्या साकमेकत्वमोहम् ॥23॥

241―निज अंतस्तत्त्व के अनुभवने का संदेश―शाश्वत शांति चाहने वाले भव्य जीवों को संबोध कर कह रहे हैं आचार्य संत कि हे भव्य पुरुषो ! किसी भी प्रकार मरकर भी तत्त्वकौतूहली बनकर एक मुहूर्त तो अपना पड़ोसी बनकर निज अंतस्तत्त्व का अनुभव तो कर । किसी भी प्रकार मरण करके भी इतना बड़ा शब्द देने का अर्थ यह है कि तन, मन, धन, वचन सब कुछ भी न्योछावर हो जाये और यदि एक आत्मानुभव की बात प्राप्त होती है तो उससे बढ़कर जगत में न कुछ मंगल है, न लोकोत्तम है, न शरण हैं । अच्छा, इस अंतस्तत्त्व का तो अनुभव कर । किसका? जो सबसे पृथक् नित्य अंत: प्रकाशमान है । ऐसे निज आत्मतत्त्व में जुड़कर उस निर्विकल्पता का, निराकुलता का अनुभव करे, जिससे कि इस भवमूर्ति के साथ, इस देह के साथ जो एकत्व का व्यामोह है वह जड़ से निकल जाये । देखिये―कहने वाले लोग अनेक हैं कि देह भिन्न हैं, जीव भिन्न है । छोटे लोगों से पूछो, सब कहेंगे कि देह निराला, जीव निराला । पर ठीक तरह से पहचाना किसने कि देह निराला, जीव निराला ।

242―देह के मात्र पड़ोसी बनकर अंतस्तत्त्व के दर्शन की शक्यता―देखो जीव न्यारा है, देह न्यारा है, यह बात उसी को तो समझ में आयेगी कि जिसको देह भी दिख रहा है और जीव भी दिख रहा है । अब कहने वालों को देह तो दिख रहा और जीव का कुछ-कुछ अपने-अपने ढंग से अनुमान किया जा रहा, अंदाज किया जा रहा, समझा जा रहा तो ऐसी स्थिति में देह जुदा, जीव जुदा यह बात भली प्रकार चित्त में नहीं बैठ पाती । सम्यग्दृष्टि तो वही है जिसे यह मौलिक ज्ञान हो जाये कि देह जुदा, आत्मा जुदा, क्योंकि देह का घनिष्ठ संबंध चल रहा और वहाँ भी मौलिक भेद बन जाये, यह मोह गले बिना नहीं होता । ऊपर से मान लिया देह जुदा तो ऐसा कहने वाले तो बहुत हैं मगर क्या ऐसा कहने वाले सब सम्यग्दृष्टि हो गए? और जैसे आँखों से देह दिख रहा ऐसे ही ज्ञान से यथार्थ जीव स्वरूप जानने में आये ऐसी दो बातें जिसकी समझ में आये उसी को अधिकार है ढंग से बताने का कि देह जुदा है, जीव जुदा है, अन्यथा क्या-क्या परिस्थितियाँ हैं, क्या-क्या आशय है, क्या मूड है, क्या ढंग है जिससे कहा जा रहा कि देह जुदा जीव जुदा । हाँ तो यह बात समझ में आयेगी तब जब कि इस सहज आत्मस्वरूप में, इस देह के पड़ोसी बनकर इस अंतस्तत्त्व में स्व का अनुभव कर सकें व तभी जानेंगे कि देह जुदा, मैं जुदा, और ये पड़ोसी है दोनों । देह भी एक पड़ोसी है और मैं भी पड़ोसी । ये बहुत निकट के मानो एक ही घर में रहने वाले, एक ही क्षेत्र में रहने वाले पड़ोसी हैं । मगर जीव के धाम में देह का कब्जा नहीं और देह के धाम में जीव का कब्जा नहीं । स्वरूप न्यारा-न्यारा है, निमित्त नैमित्तिक भाव है और बंधन है, मगर एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य पर अधिकार नहीं है सिर्फ, पड़ोसी बने हैं । क्योंजी, एक पड़ोसी को अपने पड़ोसी की कुछ चिंता रहती है कि नहीं? रहती है । तो कोई अधिक चिंता रहती क्या? कुछ उसका ख्याल रहता तो है, मगर पूरा ख्याल नहीं । अगर पड़ोसी के घर में आग लग जाये तो यह ख्याल करेगा कि इस आग को बुझा दें? क्यों ख्याल करता कि कहीं यह आग बढ़-बढ़कर मेरे घर में न आ जाये, इस ख्याल से पड़ोसी का ख्याल करता है । वैसे ख्याल तो औरों का भी किया जाता मगर ख्याल-ख्याल में फर्क है । अच्छा, और पड़ोसी के कुटुंब में कोई गुजर गया तो जैसे वे अपने घरवाले हाय-हाय करके रोते हैं वैसे क्या वे पड़ोसी भी रोते? नहीं रोते । इसका ख्याल नहीं है? तो कितना ख्याल है? इतना ही ख्याल है कि जिस गड़बड़ी की वजह से इसके घर में भी गड़बड़ी हो सके, इससे यह है दुःखी । ऐसे ही शरीर और जीव में इस ज्ञानी जीव को इतना ख्याल है कि इस शरीर पड़ोसी की ऐसी बरबादी अगर होती हो कि जिससे हमारे इस जीव के संयम पर, व्रत पर, समाधि पर, ध्यान पर कोई दुष्प्रभाव पड़े तो कुछ सम्हाल करना है इस पड़ोसी की और, जब यह ज्ञानी जीव जान लेता है कि अब यह शरीर नष्ट होने वाला है तो इसकी क्या चिंता लावें, अपने आत्मा को सम्हाल लें, जैसे घर में आग लगी तो थोड़ी आग लगी तब तक तो यह प्रयत्न करता है, कि इसे बुझावें, यह करें । और जब देखता है कि अब वश न चलेगा और कोई आग बुझाने वाला बहुत दूर है, यहाँ फोन भी नहीं है तो तुरंत वह क्या करता है? जो खास-खास चीजें हैं, धन है, उसको उठा उठाकर बाहर यह सुरक्षित स्थान में रखता है तो ऐसे ही अगर यह शरीर जा रहा है तो संयमी ज्ञानी विवेकीजन क्या करते हैं कि यह शरीर जाता है तो जाने दो, यह तो चलेगा, यह तो जायेगा पर अपना संयम, अपना व्रत, अपना ध्यान सब कुछ अपना सही बना लें और इस तरह से तुम यहाँ से जाओ । तो ज्ञानी जीव हर स्थिति में इस देह को पड़ोसी समझ रहा, खुद को देह का कुछ नहीं समझ रहा ।

243―परभावों से निवृत्ति पाने का साधक परिचय―आत्मन् ! एक बार इस देह के पड़ोसी बनकर अपने आपमें अपना अनुभव तो करें, जो ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व है, जैसे कि ज्ञान में केवल ज्ञानस्वरूप आये । कैसे? जैसे ज्ञान में यह चीज आ रही है―खंभा जाना, भींट जाना, अमुक जाना तो ये चीजें न आकर ज्ञान में ज्ञान ही का स्वरूप आ जाये । ज्ञान किसे कहते हैं? ज्ञान का स्वरूप क्या है । ज्ञान मायने क्या है? यह बहुत गंभीरता से बहुत अंत: प्रवेश करते हुए स्थिति बनाकर बाहर का सब कुछ ख्याल छोड़कर कुछ अंतर में इस ज्ञान का सहयोग देंगे अपने आपको जानने में, तो समझ में आयेगा । अच्छा, हो क्या रहा है इस जीव पर? गुजर क्या रहा है? जिससे इतनी विवशता आयी कि यह जीव अपने आत्मा के अनुभव का पात्र न रहा । देखो केवल यही-यही बात कहना हर जगह कि भाई जीव की योग्यता है इसलिए जीव ने अपने को नहीं समझ पाया, योग्यता की बात तो सही है, मगर वह योग्यता जीव की ऐसी योग्यता क्यों चली, उसका भी तो कारण कहिये । अगर कहेंगे कि जीव की ऐसी योग्यता है कि ऐसी योग्यता रहे, तो वह योग्यता क्यों बनी? जीव की ऐसी योग्यता है जिससे ऐसी योग्यता बनी? यों योग्यताओं की अवस्था के ख्याल में आत्मानुभव नहीं होता । सो योग्यता-योग्यता का जाल बना लिया, समझ में न आयेगा किये परभाव है और क्योंकि ऐसी योग्यता है तो निवृत्ति को उमंग कौन देगा? देखो द्रव्य का यह स्वरूप अकाट्य है । एक द्रव्य दूसरे द्रव्य रूप परिणमता नहीं । इसमें कोई संदेह की बात नहीं । अगर एक द्रव्य दूसरे द्रव्य रूप परिणमता होता तो आज जगत शून्य हो जाता । वह उस रूप परिणम गया, वह मिट गया, यों अव्यवस्था रहेगी । और, जितने विकार होते हैं वे विकार निमित्तभूत पर के सन्निधान बिना नहीं हो सकते । अगर उपाधि भूत पर के सन्निधान बिना विकार बन जायें तो वे स्वभाव बन जायेंगे । हालांकि दर्पण के सामने एक रंग बिरंगा कपड़ा डाल दिया, तो दर्पण में रंग बिरंगा प्रतिबिंब हो गया । निश्चय से तो यह बोलेंगे कि दर्पण में जो रंग बिरंगा परिणमन हुआ है वह दर्पण की योग्यता से हुआ, उस समय की दर्पण की परिस्थिति ऐसी हुई, मगर जो युक्ति से समझ में आ रहा, और जिस बल पर सारे जगत की यह व्यवस्था चल रही, क्या इसे मना कर दें? यह कहा जाये तो क्या अनुचित कि पर द्रव्य का, उस रंगबिरंगे कपड़े का सन्निधान पाकर यह दर्पण अपने आपकी योग्यता से ऐसा परिणम गया । इसमें स्वतंत्रता भी आ गई ।

244―निमित्तनैमित्तिकभाव के परिचय का लाभ―निमित्तनैमित्तिक भाव भी ज्ञात होने से, निमित्त नैमित्तिक भाव के परिचय से हमें यह मदद मिली कि हम यह जान जायें कि यह प्रतिबिंब दर्पण का स्वभाव नहीं, क्योंकि उस ही प्रकार के रंग का सामना, निमित्त पाकर यह परिणमन हुआ । यह परभाव है, यह दर्पण का स्वभाव नहीं, इस परिचय से दर्पण में ही दर्पण की शुद्ध चीज को निरखने जैसी विधि से द्रव्य के सहज स्वभाव को निरखते हैं तो हमें द्रव्य के स्वभाव को सुगमतया पहचान की मदद मिलती है । आचार्य संतों का कहा हुआ एक भी वचन असत्य नहीं है । परंतु अपने आपके हित के लिए शिक्षा लेने की एक विधि चाहिये । हाँ होता क्या है? देखिये सिद्धांत की बात । पहले जो पाप कर्म बांधे थे, कर्म तो हैं ना, कार्माण वर्गणायें हैं ना, एक प्रकार का सूक्ष्म मैटर, कार्माण जाति का पुद्गल । जीव जब कषाय भाव करता है तो वे कार्माण पुद्गल कर्म रूप परिणम जाते हैं याने प्रकृति, स्थिति, प्रदेश, अनुभाग चार प्रकार के, वहाँ बंधन बन जाते हैं, कर्म बन जाते हैं । अच्छा बन गये कर्म, सो ज्यों के त्यों सत्ता में है । जब तक सत्त्व तब तक उन कर्मों में सौम्य काम चल रहा है । अब जिस काल में, कर्म उदय में आता है जिसे कहते हैं अनुभागविस्फोट जब कर्म में कर्म का अनुभाग खिलता अर्थात् कर्म में जो चारों अवगुण बँधे थे, उस कर्म में जो प्रकृतिबंध, प्रदेश बंध, स्थितिबंध और अनुभाग बंध बना था अनुभाग मायने फलदान शक्ति, उसमें उसी प्रकार का विकार है सो जब उदय आया तब कर्म में कर्म का अनुभाग खिला, स्फुटन हुआ, फूट हुई, क्षोभ हुआ, वहाँ ही सब कुछ हलचल हुई कर्म की कर्म में, मगर यह जीव भी इस योग्य है क्योंकि ऐसा बंधन में, सो उस हलचल का, उस कर्म के उस अनुभाग का प्रतिबिंब आया जो कि विकारस्वरूप तो है ही । यह अबुद्धिपूर्वक प्रतिफलन है, कर्मविपाक होने पर प्रतिफलन न हो सके, यह बात कभी न बनेगी ।

245―निमित्तनैमित्तिक योग की उपादान और निमित्त में परस्पर अत्यंताभाव की परिचायकता―निमित्तनैमित्तिक भाव है उससे शिक्षा यह लेना कि विभाव परभाव है, हेय है । अबुद्धिपूर्वक प्रतिफलन में जुटाव नहीं है । यह तो अजीब की भाँति, जैसे अजीव-अजीव का निमित्तनैमित्तिक संबंध है तो वह चल रहा ईमानदारी से, ऐसे ही कर्मानुभाग उदय में आया तो उसका प्रतिफलन हुआ इतनी तो अनिवारित बात है । अब इसके बाद ज्ञानी और अज्ञानी की प्रक्रिया से बड़ा भेद बन जाता है । अज्ञानी व ज्ञानी की प्रक्रिया में क्या भेद बन जाता है ? अज्ञानी तो उस प्रतिफलन से दबकर, तिरस्कृत हो जाता । क्यों तिरस्कृत हुआ? खुद में अज्ञान है इसलिए वह अधिक दब गया । जैसे कचहरी में सभी लोग जाते हें ना? अब जिसको कचहरी की और बातों का सब विधि विधान ज्ञात है, सब समझ है, रोज का आना जाना है वह भी कचहरी में जाता है मगर उस पर कोई दबाव तो नहीं पड़ता, उसे कोई भय तो नहीं रहता । और एक देहाती पुरुष जो कभी कचहरी में गया नहीं, किसी मामले में फँस गया, वह कचेहरी में जाता है तो उस पर सिपाही, जज, वकील आदि हरएक का बड़ा दबाव पड़ता है, प्रभाव पड़ता है । वह डर जाता है, घबड़ाता है । उसके हाथ पैर कापते हैं? अरे भाई क्या बात हो गई? आखिर आदमी ही तो है वह, उसमें डर की क्या बात? पर वह देहाती पुरुष अज्ञानी है, उसे कुछ सूझ-बूझ नहीं, इससे वह अपने को दुःखी बना लेता । दुःख तो बनाये जाते हैं अज्ञानता से । ऐसे ही अज्ञानी पुरुष कर्मविपाक के प्रतिफलन से आच्छादित हो जाता है तब उसी समय क्षुब्ध हो अज्ञानता से इन पंचेंद्रिय के विषयभूत पदार्थों का सहारा लेता है, उनमें अपना उपयोग लुटाता है, तो होता क्या कि उस पर और भी अधिक

कठिनाइयां आ जाती और उस काल में इसके विशेष पाप का बंध होता । कोई ज्ञानी है, सम्यग्दृष्टि है तो वह जानता है, कि कर्मोदय जब होता है तब ऐसा प्रतिफलन, ऐसी छाया छा जाती है, यह होता रहता है, चल रहा है, पर इन आश्रयभूत पदार्थों में जुटना नहीं चाहता । वहाँ जुटना पड़ता है तो यह विभाव पर खौलता है अंदर में? यह कैसी बात है? जो आश्रयभूत पदार्थ हैं उनमें उपयोग को ऐसा अंतस्तत्त्व के ज्ञानी नहीं जुटाते और यत्न रखते हैं, क्योंकि ज्ञानबल हो गया । तो अपने आत्मस्वरूप को, आत्मस्वभाव को निरखने का उद्यम करता है तो इसके बंध कम होता है? यहाँ तो आ जाता है अंतर, मगर जो बात जिस विधि विधान में है वह बराबर चल रही ।

246―नैमित्तिक भाव के प्रधावन का अर्थ―एक साथ नाना प्रकार के बंधन की, उपाधियों का उदय हो तो यह अस्वभाव भाव करके क्रोध, मान, माया, लोभ एकदम दौड़ गए । जैसे कि दर्पण है । दर्पण के आगे कोई सन्निधान आये, रंग बिरंगे कागज का सन्निधान आये तो दर्पण में मानो एकदम दौड़कर उसी समय उस रूप प्रतिबिंबित हो गया, तभी तो पूज्य अमृतचंद्र सूरि ने कहा कि वह एकदम बहुत प्रकृष्ट भाव से दौड़ा, याने जिस काल में दर्पण के सामने चीज आयी तत्काल ही उसमें वह प्रतिबिंब आया । भला कोई वैज्ञानिक किसी यंत्र वगैरह से परखकर खोज तो करें कि दर्पण के सामने मानो 50 हाथ दूरी पर चीज है तो जिस काल में वह चीज सामने आयी उसी काल में वह प्रतिबिंब हुआ या बाद में? जैसे मानो यह दर्पण के सामने एक हाथ दूर ही कोई चीज है और एक दर्पण के सामने 50 हाथ की दूरी पर वह चीज है तो वे वैज्ञानिक यह बतावें कि दोनों के प्रतिबिंब पड़ने में समय बराबर लगेगा या कम ज्यादा? अरे वहाँ जब चीज दर्पण के सामने आयी तो कितनी ही दूर हो वह चीज, पर तत्काल ही वह प्रतिबिंब दर्पण में आता, कम ज्यादा समय नहीं लगता, ऐसे ही जब कर्मानुभाग का उदय हुआ, आत्मा में वैसा ही तुरंत प्रतिफलन हुआ । तो क्या इस प्रसंग में समझे कि अस्वभाव भाव क्रोध, मान, माया, लोभ ये मूल में कर्म के हैं जो अचेतन क्रोध, मान, माया, लोभ हैं, जैसे कि कपड़े का रंग दर्पण के सामने आया सो दर्पण में वह रंगे स्वच्छताविकार रूप है । रंग मूल में उस कपड़े का है, उसका सन्निधान पाकर दर्पण में प्रतिबिंब हुआ है । जैसे-जैसे जीव में कषाय आते, क्रोध, मान, माया, लोभ, विचार, विकल्प रंग, ये सबके सब कर्म के हैं । जीव के जीव में हैं, कर्म के कर्म में हैं, मगर कर्म में जो प्रकृतिबंध, स्थितिबंध, प्रदेशबंध, अनुभागबंध है, वह कर्म की, उनके गाँठ की चीज है, उनमें वह फूटा, इसका प्रतिफल हुआ कि उसके ही अनुरूप यह क्रोध, मान, माया, लोभादिक इस तरह का यह परिणाम हुआ । अब आश्रयभूत पदार्थों में हम जुट गए तो वह हो गया बुद्धिपूर्वक परिणमन । आश्रयभूत पदार्थों में हम उपयोग को नहीं जुटाते सो वह तो जाता है अबुद्धिपूर्वक परिणमन ।

247―अबुद्धिपूर्वक व बुद्धिपूर्वक कषाय में अंतर―अबुद्धिपूर्वक व बुद्धिपूर्वक विभाव की बात इस तरह भी अंदाज कर लो । जैसे कोई ऐसा समझ ले कि सम्यग्दृष्टि में कषाय नहीं होते, विकल्प नहीं होते, कोई खराबी नहीं होती, विभाव नहीं होते, तो वह यों समझ लेता कि देखो याद है ना, 9 वें गुणस्थान में जो एक श्रेणी में चढ़ा हुआ है मुनि उसके भी ये चारों कषाय बताये गए हैं । संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ । अच्छा तो 9वें गुणस्थान में ही क्या, 8वें 7वें गुणस्थान में भी आश्रयभूत पदार्थ के आश्रय वाला जरा भी विकार नहीं । पंचेंद्रिय व मन के विषयों में । उसके तो पृथक्त्व विचार शुक्लध्यान है । उसकी तो एक केवल ज्ञातादृष्टा परिणति चल रही है तो आश्रयभूत पदार्थों में उपयोग न जुटने पर भी अबुद्धिपूर्वक कषाय है ना, 8वें गुणस्थान में भी, 7वें में भी । छठवें में तो संज्वलन कषाय का तीव्र उदय होता है । 5वें में भी प्रत्याख्यानावरण कषाय का उदय है । वहाँ तो ऐसा भी नहीं कि जिस काल में ज्ञानी स्वानुभाव में लीन हैं उतने समय को ये कषायें अपना प्रभाव छोड़ दें । जितनी कषाय हैं अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण, उसका उदय है, सन्निधान है, लेकिन उपयोग चूँकि इस ज्ञानी ने इस अंतस्तत्त्व में लगाया है इस कारण बुद्धिपूर्वक कषाय न रही, अबुद्धिपूर्वक तो 9वें गुणस्थान तक भी चलती, 10वें गुणस्थान में भी चलती । यहाँ यह समझना कि जब आश्रयभूत इन साधनों में उपयोग जुटाते हैं तो यहाँ बहुत बड़ा दुष्परिणाम होता है और उसका निमित्त पाकर फिर विशेष कर्मबंध होता है ।

248―उपादान, निमित्त व आश्रयभूत कारणों के परिचय का लाभ―यहाँ तीन बातें समझिये-निमित्त, उपादान और आश्रयभूत । उपादान है जीव स्वयं, निमित्त है कर्मोदय और आश्रयभूत हैं, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द, इच्छा, प्रतिष्ठा आदि 5 इंद्रिय और मन के विषय, ये सब हैं आश्रयभूत कारण । आश्रयभूत कारण का कार्य के साथ, विकार के अन्वय व्यतिरेक संबंध नहीं है । आश्रयभूत कारण अगर उपस्थित हो तो जीव में कषाय जगे, ऐसा कोई संबंध नहीं, इसलिए इसको उपचरित कारण कहा जाता है, पर निमित्तभूत कर्म को उपचरित कारण नहीं कहा जाता, क्योंकि इसका विकार के साथ अन्वय व्यतिरेक संबंध है । तो यह स्थिति हुई विकार की निष्पत्ति में ऐसा जब हम जानते हैं तो कितना उत्साह जगता है कि ये परभाव हैं, इनसे हटें, ये मेरे कुछ नहीं, इनसे हटकर अंतरंग में निज सहज चैतन्यस्वरूप का अनुभव करें । हाँ तो एक साथ नाना प्रकार के बंधन उपाधि का सन्निधान होने से यह तुरंत हुआ जो अस्वभावभाव है, कुछ संयोग है ना इसलिए उपाश्रयों में उपयुक्त हो गया । अब देखो जैसे स्फटिक में, दर्पण में सन्निधान की चीज सामने आने से प्रतिबिंब हो गया और उसकी स्वच्छता ढक गई, इसी प्रकार आत्मा का स्वभाव तो ज्ञायक स्वरूप है, सहज ज्ञायकस्वरूप है, मगर वह प्रतिफलन हुआ, अनुभाग आया, उससे वह स्वच्छभाव तिरोहित हो गया, उससे विवेक ज्योति समाप्त हुई, अज्ञानी जीव अब देह में जीव में भेद नहीं कर सकता, कषाय में जीव में भेद नहीं कर सकता । विकल्प में और अंतस्तत्त्व में भेद नहीं बता सकता । जब भेद न रहा तो वह उन्हीं विभावों को, जो पौद्गलिक कर्म के प्रतिफलनरूप थे उन ही विभावों को जो कि पौद्गलिक कर्म का प्रतिफलन रूप थे उनको ही यह अपनाने लगा है । ये परभाव हैं, ये अन्य भाव हैं, लेकिन इनको यह अपनाने लगा । ये मेरे हैं, ये मेरे हैं, यह मैं हूँ, इस प्रकार की इसकी विकल्प वृत्ति चलती है उसको ही तो तोड़ना है ।

249―परपदार्थ से आपत्ति का प्रभाव―भैया आपत्ति यह नहीं कि धन कम हो गया, घर गिर गया या परिवार का कोई गुजर गया, आपत्ति तो यह है कि उन परिस्थितियों में यह जीव जो मानता है कि हाय मेरा था, वह मेरे से निकल गया, उससे मुझे बड़ा आराम था, बड़ा सुख था, ऐसा जो उसके संबंध में मान रखा, एक कल्पना कर रखा बस उससे वह दुःखी है । दुःख होता है तो अज्ञान से, भ्रम से, मिथ्या कल्पनाओं से । धन से, मकान से अथवा परिजनों से किसी को दुःख नहीं मिलता । तो यहाँ आचार्य संत समझाते हैं कि अरे भाई तुम क्यों अपने आत्मप्रभु का घात कर रहे हो? उन दुःखों में, उन आश्रयभूत स्थितियों में जुटकर क्यों आत्मा का घात करते हो, उनको छोड़ो और इन ज्ञेयों को ज्ञान में मिलाकर मिश्रित स्वाद क्यों ले रहे हो? ये तो बाह्य पदार्थ हैं, कोई अज्ञानी हो, मिथ्यादृष्टि हो तो भी स्वाद नहीं ले सकता, पर का, क्योंकि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ नहीं करता । मगर, अज्ञानी क्यों कहलाता कि उस ज्ञेय को, ज्ञान में बसाकर स्वाद तो ले रहा ज्ञान का और मान रहा ज्ञेय का स्वाद तो ज्ञेय ज्ञान का मिश्रण कर स्वाद ले रहा, इसलिए भाई वह अज्ञानी है सो इस मिश्रण का स्वाद न लें । उसमें ज्ञेय को हटाकर एक ज्ञानमात्र का स्वाद लें । तो बन जाओ एक साक्षी इस शरीर के पड़ोसी और अपने आपमें ज्ञानमात्र एक निज अंतस्तत्त्व का अनुभव करो, मिलेगा अनुभव, होगा विशुद्ध आनंद का अनुभव । बस इसको सिद्धि हो गई तो उस आनंद के अनुभव से इसे यह सब विदित हो जायेगा कि ये बाहरी पदार्थ बेकार है, असार हैं, इनमें क्यों उपयोग फसाना । इनको क्यों अपना मानना? मैं अब तक भ्रम से अपना मानता था ।

250―भ्रम समाप्त होने पर आपत्ति का हटाव―सामने पड़ी थी रस्सी और भ्रम यह हो गया कि यह साँप है, तो इस भ्रम के कारण वह बड़ा आकुलित हो रहा, घबड़ा रहा, हाय मेरे कमरे में साँप है । यह रहेगा तो काट लेगा, यों वह घबड़ाता है, चिल्लाता है । पर कुछ थोड़ी धीरज रखकर सोचता है कि जरा देखें तो सही कि कौन सा साँप है । जब वह कुछ आगे बढ़ा तो समझ में आया कि अरे यह तो कुछ हिलता डुलता भी नहीं, फिर कुछ और आगे बढ़ा तो देखा कि अरे यह तो रस्सी सी मालूम होती । फिर कुछ आगे और बढ़ा, उठाकर देखा तो वह कोरी रस्सी थी । लो उसको सही ज्ञान हो गया कि अरे यह तो रस्सी है मैं व्यर्थ ही इसमें साँप का भ्रम किए था । अब वह पहले जैसा नाटक दिखा तो दे, नहीं दिखा सकता । वैसी घबड़ाहट अब वह नहीं कर सकता । पसीने का आना, भीतर में बड़ा क्षुब्ध हो जाना, बड़ी घबड़ाहट हो जाना, ऐसा नाटक अब वह न खेल सकेगा, क्योंकि उसका भ्रम दूर हो गया, सही ज्ञान जग गया । ऐसे ही जब तक बाहरी पदार्थों में भ्रम है, यह मेरा है, यह मैं ही तो हूँ, जैसे पुत्र को देखकर ऐसा लगता कि बस तीन लोक में सार यह ही है । तीन भुवन में सार वीतराग विज्ञानता न कहकर उसको तो बच्चा, नाती, पोता आदि कह दो । क्योंकि इस मोही जीव के लिए तीन भुवन में सार चीज वही लड़के नाती पोते बन रहे हैं जहाँ ऐसा अज्ञान छाया है वहाँ का शांति हो सकती है? सब केवल गप्प बात है । कोई कहे कि हमें तो आत्मा को शुद्ध-शुद्ध बताने-बताने की गप्प में ही शांति हो जायेगी, तो शांति नहीं हो सकती । भैया यह निर्णय में आ जाये कि ये सब बाह्य पदार्थ हैं, पर तत्त्व हैं, इनका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव जुदा है, इसके किसी भी परिणमन से मेरा क्या बनना है? मेरे किसी परिणमन से इसका क्या बनता है? कदाचित् अनुकूल निमित्त मिल जाये तो वह तो एक योग हो गया, मगर परद्रव्य की अन्य द्रव्य में कोई अधिकारपूर्वक बात नहीं हुई । मुझे कौन सुखी करेगा, कौन मेरी रक्षा करेगा? है क्या जगत में कोई, परमाणु जो मेरे ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व की रक्षा कर दे? क्या है कोई दूसरा जीव जो मेरे आत्मा को शांत परिणमन में ला दे, कुछ नहीं है । एक भी नहीं है । मेरे आत्मतत्त्व के सिवाय एक भी ऐसा द्रव्य नहीं कि जो मेरे को शांत कर दे । शांति की भिक्षा भी क्यों, शांत तो यह खुद है । स्वभाव इसका शांत है । अपने शांत स्वभाव में, निज धाम में उपयोग को बसायें, ज्ञान को बसायें, ज्ञान में ज्ञानस्वरूप को बसावें तो निज में अनुभव जगेगा जिससे बाहरी पदार्थों के साथ एक तत्त्व का भाव मूल से दूर हो जायेगा । तो क्या करना? इसके लिए? एक तत्वाभ्यास द्वारा सब भेद जान करके अभेद अभिन्न एक इस अंतस्तत्त्व में अपने उपयोग को रमाना ।


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