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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 33

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जीवाजीवविवेकपुष्कलदृशा प्रत्याययत्पार्षदानासंसारनिबद्धबंधनविधिध्वंसाद्विशुद्धं स्फुटत् ।

आत्माराममनंतधाममहसाध्यक्षेण नित्योदितं धीरोदात्तमनाकुलं विलसति ज्ञानं मनोऽऽह्लादयत् ।।33।।

316―जीव के नाटक के रहस्य―यह संसार नाटक है । नाटक उसे कहते हैं जहाँ कोई पात्र भेष बदलकर आवे, लीला, कीड़ा होती हो, खेल, विलास होता हो उसे कहते हैं नाटक । तो देखो हो रहा है ना नाटक । जैसे एक चेतन पदार्थ कैसा भेष बदल बदलकर आ रहा है । चार गतियाँ, पाँच इंद्रियजातियाँ आदि सब भेषों को मार्गणाओं द्वारा समझिये, गुणस्थानों द्वारा समझिये । ये जीव किन-किन भेषों को लेकर उपस्थित हो रहे हैं संसार में । यह है नाटक । अच्छा, और थियेटर, सिनेमा वगैरह ये हैं नाटक की नकल । नाटक तो असली यह है, फिर उसकी नकल की गई है सिनेमा । लेकिन देस लो इस नाटक को देखने में लोग दिलचस्पी नहीं रखते और नाटक की नकल देखने के लिए टिकट भी लेते हैं, पैसा खर्च करते हैं अपना सारा समय लगाते हैं । अरे नाटकों की नकल देखने की बजाय असली नाटक देख लो । तो यों यह जगत में सब नाटक देख लो, इनमें बड़ी भीड़ है । अब इस भीड़ में कुछ लोग तो ऐसे हैं कि जिनके सही ज्ञान प्रकट है वे जानते हैं कि यह जीव है, यह कर्म है, इन दोनों का संबंध है, कर्म की छाया है, जीव में उदित हुई है । जीव उन्हें अपनाता है । यह सारी बात जिन्हें मालूम ऐसे लोग भी है संसार में, पर कितने है? बिरले । और, बहुतायत किन लोगों की है । जिनको इसका कुछ पता नहीं । बस नाटक देख रहे । यह ठीक है यही सर्वस्व है, इस तरह के देखने वालों की संख्या कितनी है? अनंत । जैसे नाटक हो रहा शहर में हजारों की भीड़ जुड़ गई उनमें से कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो ऐसा जान रहे हैं कि यह मेरा लड़का है अब यह भेष बदल रहा है और ऐसा है । और बाकी लोग ऐसे हैं कि जिनको यह ख्याल में नहीं है कि यह अमुक का लड़ का भेष बदल कर आया । अब नाटक तो हो रहा है मगर उन दर्शकों में प्रभाव दो रूप में बट गया । जिनको यह मालूम है कि यह मेरा लड़ का है, सब यह भेष बदलकर आया तो उस पर उस नाटकीय लीला का प्रभाव नहीं पड़ता । अगर कोई पात्र रोने जैसा पार्ट अदा कर रहा तो उसे देखकर बाकी दर्शक रो पड़ते हैं,, और जिनको मालूम है कि मेरा लड़का है, इस तरह का पार्ट अदा कर रहा है तो वह नहीं रो पड़ता । वह तो समझता है कि वाह हमारा लड़ का कितनी कला से पार्ट अदा कर रहा है । ऐसे दर्शकों को? करुणाजनक दृश्य को देखकर कुछ कष्ट नहीं होता । जैसे मान लो श्रीपाल को धवल सेठ ने सागर में गिरा दिया, कोई लहर वाला समुद्र का चित्र बना हुआ कपड़ा रख दिया । एक ने उसमें धक्का दे दिया, श्रीमान् गिर गया, ऐसा दृश्य देखकर सभी दर्शकों को बड़ा दुःख हुआ―हाय हाय श्रीपाल को समुद्र में गिरा दिया गया, कितना बड़ा अन्याय किया गया । और जिन्हें पता है कि यह तो मेरा लड़का है, इस तरह से पार्ट अदा कर रहा है तो वे उस दृश्य को देखकर दुःख नहीं मानते बल्कि खुश होते और कह उठते हैं कि वाह मेरा लड़का तो बड़े सुंदर ढंग से पार्ट अदा कर रहा है तो इसी तरह से इस दुनियाँ में दो तरह के जीव है, एक तो वे जिन्हें जीव और अजीव का विवेक है याने खूब भेदाभ्यास है, जानते हैं और दूसरे वे जो लीला को ही सर्वस्व समझते हैं ।

317―जीव और अजीव तत्त्व में भेदाभ्यास करने का अनुरोध―देखो भेदाभ्यास करो उसकी यह ही तरकीब है कि अपने में यह पहिचानें कि मैं जीव हूँ, और कर्म द्रव्य भी साथ चल रहे । इन जीवों ने भावों से जो कर्मानुभाग बाँधा था वह अनुभाग पड़ा है कर्म में । जिस काल में उदय हुआ तो कषाय कर्म में उठी, उसका अनुभाग उसी में फूट निकला । उस अचेतन के उस अनुभाग की झांकी यहाँ हुई, तो अब दो जगह कषायें हैं―जीव कषाय अजीव कषाय । आप इससे पहिचान लो, समयसार में वर्णन है ना विशेष कि मिथ्यात्व दो तरह का, कषाय दो तरह के जीव कषाय, अजीव कषाय, जीव मिथ्यात्व अजीव मिथ्यात्व, इससे समझ लो कि पुद्गल कर्म में कर्मानुभाग प्रस्फुटित हुआ है वह तो है कर्म की कषाय का अनुभाग, और उसकी जो झलक यहाँ हुई है जिससे कि यह उपयोग मलिन बन गया, दर्पण में प्रतिबिंब पड़ते ही दर्पण मलिन हो गया, ऐसे ही आत्मा में भी अजीव कषाय का प्रति फलन पड़ते ही जीव मलिन हो गया तो यह जो झलक है, तद्विषयक उपयोग विकल्प है यह है जीव कषाय । भेदविज्ञान करता है ज्ञानी कि यह कषाय, कर्म का प्रतिफलन है, कर्म का निमित्त पाकर हुआ है यह मेरी चीज नहीं, यह हटने के लिए है । आप देखो कितना साफ भेदविज्ञान जगाता हे यह निमित्त नैमित्तिकभाव का परिचय । वहाँ यह बात तो है कि कर्म में जो कषाय अनुभाग फूटा वह कर्म का है । उस कर्मानुभाग का यहाँ प्रतिफलन हुआ है, सो जीव ऐसी योग्यता वाला है तब ही तो यह प्रतिफलन हुआ है । और अज्ञानी, जीव की ऐसी योग्यताएं है कि वह उस प्रतिफलन को अपना लेता है अब यहाँ की ओर से देखो, जीव की

ओर से देखो, दो पर दृष्टि न दो । निश्चयनय एक द्रव्य को दिखाकर बात करता है, यह जीव देखो अपनी परिणति से, अपनी योग्यता से ऐसी मलिन अवस्था को प्राप्त हुआ । अगर निमित्त नैमित्तिक भाव न मानो और केवल इस ही का एकांत करो तो निरपेक्षतया यही अर्थ बनेगा कि कर्म की क्या बात है, निमित्त की वहाँ क्या बात है? यह जीव है अपनी योग्यता से क्रोध रूप, विकार रूप, जब जैसी योग्यता परिणमता रहता है । तो अब यह योग्यता अटपट हुई ना, कदाचित् सिद्ध के क्यों नहीं बन बैठती? जब निरपेक्ष रहती है, यह बात, तो सिद्ध के भी योग्यता आ जायेगी । फिर तो मुक्ति का कोई महत्त्व न रहा । तो यह देखने की कला है । जैसे हम एक ही भींट को देख रहे तो उसे देखकर वर्णन कर रहे हैं तो एक भींट को देखते समय एक भींट की कुछ बात कह रहे हैं, पर यहाँ हम मना करके कहें कि दूसरी भींट तो है ही नहीं, एक भींट है तब तो फिर छत गिर जायेगी । फिर क्या हालत होगी? और बात ठिकाने से श्रद्धा में हो कि एक भींट और है, पर यहाँ तो एक भींट देखकर वर्णन कर रहे, इसी तरह वर्तमान में संयोग भी है और जहाँ संयोग है वहाँ वह भी है, आखिर संयोग हुआ है तो एक-एक है, उसी का संयोग है, संयोग शब्द ही बतलाता है कि अलग-अलग द्रव्य है । जब हम केवल एक द्रव्य को ही निरखकर बात करें तो एक की ही बात होगी । चूहा दूसरे की बात विधि रूप में न होनी चाहिए । और निषेध रूप में भी न होनी चाहिए । केवल एक बात विधि रूप से करते रहो । तो एक को देखो निश्चयनय से देखो, एक की बात कर लो, मगर जो संयोग को असत्य कहे, संयोग है ही नहीं, ऐसी बात रखकर कहे तो उसी को तो कहते हैं ब्रह्मद्वैत का एकांत । फिर तो यह प्रसंग हो जायेगा फिर तो अपरिणामी रहा । किंतु कोई सत् अपरिणामी नहीं होता । यहाँ तो विकार परिणाम भी है, संयोग है और संयोग के प्रभाव भी चल रहे । अभी चर्चा करो, किसीने अगर विरुद्ध बात कही तो वहीं झट तमतमा उठे, बताओ यह तमतमाना क्या है? वह कर्मों में हो रहा है मगर उसका प्रतिबिंब है यह वेग जिससे यह उपयोग भी ढका गया है, अब हमने उसे अपना लिया है । कर्तव्य यह है कि यह भेदविज्ञान बनायें कि ये रागद्वेष विकार विकल्प, ये सब क्लेश सुख दुःख, यह सब कर्मों की छाया है, मेरा स्वरूप तो एक विशुद्ध चैतन्य मात्र है ।

318―तत्त्वों के परिचय का प्रयोजन―तत्त्वों के परिचय का प्रयोजन क्या लेना है? विभावों से हटना, स्वभाव में लगना । अब निरखते जाती कि विभावों से हटने की जहाँ बात बना तो इस तरह के प्रयोग से, सोयों विभाव से हट लो । और, विभावों से जब हटते हैं तो इसमें उस समय यह बात बनती है कि यह स्वभाव को निरखता है । तो जिसने यह भेदविज्ञान किया कि यह कर्मरस मेरा स्वरूप नहीं, मेरा स्वभाव तो चिदेकज्ञायक भाव है, चैतन्य स्वरूप, एक चैतन्य महाप्रभु, मेरा स्वरूप तो यह है और यह सब कर्म जाल यह मैं नहीं हूँ, ऐसा ही सब जीवों में तक रहा ज्ञानी । तो तक रहा है तो एक यह विश्वास बना हुआ है और अधिकतर उस सहज स्वभाव की ओर देखता है । जो पुरुष किसी भी जीव को निरखकर पर्याय की मुख्यता से तो निरखे और स्वभाव की बात ही उसमें न सोचे तो क्या अंदाज लगाना चाहिए? ये दिखने वाले जीव भी स्वयं इस पर्याय बुद्धि से ही रहा करते हैं रात दिन तब तो अन्य जीवों में एक पर्याय निगाह में आयी । स्वभाव क्यों नहीं निगाह में आया? जैसे किसी मनुष्य के बैठने उठने के कमरे को देखकर उस मनुष्य की प्रकृति बतायी जा सकती है । कमरे में क्या देखा? फोटो देखा, उससे ही जान लेंगे कि इसमें रहने वाला जो मुख्य आदमी है वह किस नेचर का है । तो ऐसे ही समझिये कि जिस पुरुष के चित्त में किसी प्राणी के प्रति स्वभाव की दृष्टि तो होती नहीं और पर्याय में ही दृष्टि होती है तब ही तो यह बुरा है, यह तुच्छ है, यह दुर्भग है ऐसा जानते हैं । जिसमें अधिक गुण का विकास नहीं उसे घृणा की दृष्टि से देखे तो भी समझो कि उसने स्वयं का स्वभाव दर्शन पाया नहीं । जब स्वयं का स्वभाव दर्शन नहीं हुआ तो फिर दूसरे के स्वभाव को देखेगा कैसे? और, मानो जिन गुरुजनों में गुण भी कुछ हैं, दोष भी है, दोष तो रहेंगे साधु में अन्यथा उसका नाम साधु क्यों? जिसमें दोष नहीं रहे वह तो सिद्ध हो गया । तो वहाँ केवल एक अवगुण ही दीखे या घृणा करे, यह बात ठीक नहीं । अवगुण न दीखे तो भी इसने अपने आपके बीच एक ऐसा निर्णय बना लिया है । तो घृणा की दृष्टि से देखें तो क्या ऐसा कहा जा सकता है कि वह अपनी स्वभाव दृष्टि भी कर पाता है? प्रत्येक प्राणी को निरखकर पहले उसके स्वभाव की दृष्टि होनी चाहिए, फिर पर्याय भी समझ लो यह ऐसी पर्याय में है । साथ में स्वभाव दर्शन भी आये ।

319―स्वभावदृष्टि करके प्राप्त विश्वास की हितरूपता―अंत: स्वभावदर्शन जिसको हुआ ऐसे ज्ञानी पुरुषों को बड़ा विश्वास है कि जीव और अजीव के भेद की जो दृष्टि बनती है उस दृष्टि से यह ज्ञान इन दार्शनिकों को एक विश्वास उत्पन्न कराता है, बस यह ही एक है । अनादि काल से बँधे आये हुए इन कर्मों का विध्वंस हो गया अन्यथा यह दृष्टि आती कैसे? यह काम एक विशुद्ध स्फुरायमान हुआ है । अब यह ज्ञान इस तरह विलास कर रहा है, ज्ञान में ज्ञान वर्त रहा है, इस जीव को कष्ट कब होता है, जब यह ज्ञान अपने ज्ञान ज्ञानरूप वर्तने की वृत्ति को तज देता है और कर्म के उदय से जो यह कर्मरस का प्रतिफलन हुआ है उसमें यह जुट जाता है, लग जाता है तद्रूप अपने को मानता है, बस कष्ट वहाँ से प्रारंभ होता है । यहाँ जिसने भेदविज्ञान किया, कदर में स्वभाव विभाव में उसका सब ओर से भेदविज्ञान सही है । जिसने स्वभाव विभाव का भेदविज्ञान नहीं पाया उसके बाहर में यह जुदा है, यह जुदा है ऐसा कह कहकर भी रच भी भेदविज्ञान का भाव नहीं उत्पन्न होता । तो एक प्रत्यक्षभूत तेज से उदित, धीर, उदार, अनाकुल, यह ज्ञान प्रकट होता है उन दार्शनिकों को जिन्होंने जीव और अजीव के भेद की दृष्टि दृढ़ कर ली है ।

320―भेदाभ्यास के प्रताप से प्रकट हुए ज्ञान की धीरता का दिग्दर्शन―कैसा प्रकट होता विवेकियों को ज्ञान? धीर, उदार, अनाकुल । यह नाटक ही तो है, मगर यह शांत रस का नाटक है जितने भी लोग नाटक की नकल कर रहे उसमें ऐसा प्रवाह है कि यह शांत रस का नाटक या लीला देखने का उनके उद्देश्य ही नहीं रहता । कहाँ से दिखाये? यहाँ जो ज्ञान प्रकट हो रहा है जो इस अनुभाग को सही रूप में निरख रहा है यह हो रहा है नाटक, उनका ज्ञान धीर है । धीर का अर्थ है-धी बुद्धि राति ददाति इति वीर:, वो बुद्धि को ई, विकसित करे बुद्धि को न बिगड़ने दे ऐसे पुरुष को कहते हैं धीर और धीर की वृत्ति को कहते हैं धैर्य । जब लोगों को समझाते हैं कि धैर्य रखो तो उसका अर्थ यह है कि तुम इस स्थिति में आवो कि तुम्हारी बुद्धि बिगड़े नहीं और बुद्धि सही काम करै और तुम्हारा दुःख छूटे । जिन जिनको दुःख होता है उनको बुद्धि में बिगाड़ होने से दुःख होता है । दुःख और किसी का नाम नहीं । बुद्धि के बिगड़ने का नाम दुःख है । अभी किसी कम दिमाग वाले पुरुष को देख कर, जिसका दिमाग चलता ही नहीं या सीधे पागल है, लोग बड़ा खेद करते हैं कि इसकी जिंदगी क्या जिंदगी है? बुद्धि बिगड़ गई, दिमाग खराब हो गया, इसका जीवन क्या जीवन है, अच्छा अब जो पागल नहीं हैं इस ढंग के और इस ढंग की बुद्धि नहीं बिगड़ी किंतु चतुर बन रहे, जो कुछ सोचा अपने आपमें उसमें कुशल बन गए, व्यापार में कुशल, परिवार के लिए, कुशल पार्टी के लिए कुशल, और अनेक बातो के लिए बड़ी चतुराई कर रहे और उसमें आकुलता पा रहे, जब कोई एक आत्मानुभूति का मार्ग नहीं मिलता और वह ज्ञायक स्वरूप जब अपने लक्ष्य में आ ही नहीं पाता तो वहाँ तो आकुलता मचेगी ही । ऐसी स्थिति वाले को आप क्या कहेंगे? अपनी और दृष्टि देकर क्यों नहीं कहते कि हाय मेरी बुद्धि बिगड़ गई; अगर बुद्धि न बिगड़ी होती तो आत्मा का जो एक विशुद्ध ज्ञान स्वरूप है, जो कि स्वयं है वह क्यों नहीं मान बैठते, उसमें रत क्यों नहीं होते उसमें क्यों मग्न नहीं होते? क्यों बाहर उचक रहे क्यों उपयोग गड़ा रहे, क्यों बाहर इष्ट अनिष्ट की बुद्धि कर रहे? कह दो कि बुद्धि बिगड़ गई । शायद कहने में यों हिचक होगी कि कुछ अपने आपको चतुर समझने वाले लोग स्वयं भी उस नंबर में आ जायेंगे, मगर नंबर में आयें या न आयें, किंतु कष्ट अगर हो रहा तो समझो कि बुद्धि बिगड़ गई । जहाँ धीरता हो, सत्य को सत्य मान रहा हो वहाँ कष्ट का क्या काम?

321―धीर उदात्त अनाकुल ज्ञान की उपलब्धि का कर्तव्य―जो ज्ञान धीर होगा वही उदार होगा । मेरा कुछ नहीं, मैं केवल एक शायक स्वरूप हूँ, और कदाचित् पुण्यवश कोई बड़ी सामग्री मिले तो उसमें भी उसे ममता होती ही नहीं है, मिले तो क्या करता परोपकार के लिए खर्च करता । सबका भला हो । खुद का भी जीवन चले । जहाँ ऐसा धैर्य होता वहाँ उदात्तपना है, जहाँ धैर्य और उदात्तपना है वहाँ अनाकुलता है, ऐसा शान यहाँ प्रकट होता है । तो मुख्य बात क्या? जीव और अजीव में भेदविज्ञान करे । इस बाहर के अजीव से तो जो चाहे शब्दों में भेदविज्ञान की बात कर लेता । कोई और कुशल हो तो शरीर से भी भेदविज्ञान की बात कर लेता है । मगर अपनी कषायों में, इच्छा में विकल्प में और अपने स्वरूप में स्वरूप और विभाव इनमें भेदविज्ञान करने वाला ही कहलाता है कि सूक्ष्म अंत: संधि पर इसने प्रज्ञा की कुल्हाड़ी मार दी । भिन्न हो गए दोनों । अजीव अजीव में जावो, जीव जीव में रहो, ऐसा यहाँ एक ही भीतर दृढ़ रहना और उसके प्रताप से फिर अपने आपके स्वभाव में, स्वरूप में अपने आपको लगाना । बस यह अंत: कार्य करने को है, इसका मुख्य ध्यान रहना चाहिए, जीवन में अपनी घटना में? और बाहरी घटना में योग्य व्यवहार करना । क्योंकि रह रहे हैं गृहस्थी में तो उचित व्यवहार रहे, जिससे कि अपने मार्ग में कोई बाधा न आये । ऐसा निर्णय किये हुए यह ज्ञानी निरख रहा है जीव और अजीव के इस नाटक में, इस भेष में कि जीव तो यह है और अजीव यह है । जैसे जिसको पता है कि यह मेरा लड़का है तो वह उस पार्ट अदा करते हुए लड़के को उस भेष के रुप में देखता है ऐसे ही जिसको जीव तत्त्व की पहिचान है वह सर्वजीवों में, खुद में भी सर्वत्र समझ रहा है कि परमार्थ तो यह है और बाकी यह कर्म का लगार है! । ऐसा समझने वाले दर्शकों को वह ज्ञान: मन को प्रसन्न करता हुआ उदित होता है ।



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