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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 48

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इत्येवं विरचय्य संप्रति पर द्रव्यान्निवृत्तिं परां ।

स्वं विज्ञानघन-स्वभावमभयादास्ति घ्नुवान: परं ।

अज्ञानोत्थित कर्तकर्मकलनात् क्लेशान्निवृत्त: स्वयं ।

ज्ञानीभूत इतश्चकास्ति जगत: साक्षी पुराण: पुमान् ।।48 ।।

473―परविविक्त अंतस्तत्त्व का लक्ष्य किये बिना धर्म मार्ग गमन की अशक्यता―अपने आप पर दृष्टि देकर विचारिये, यह जीव वर्तमान में, ज्ञान में नाना विकल्प उठाकर, नाना तरंगे उत्पन्न कर, बाहरी पदार्थों की बहुत याद रखकर विकल हो रहा है । क्या जरूरत पड़ी इसे कि इन बाहरी पदार्थों को यह अपने में उनके लिए घर बनाये उनका ध्यान रखे और फिर मरण होने पर तो स्पष्ट है कि कुछ भी साथ नहीं जाता । जब उत्पन्न हुए थे तब सपाट है कि कुछ साथ नहीं लाये और जिस समय ये बाहरी पदार्थ संग में गये उस समय में भी ये आत्मा के कुछ नहीं होते । ये परपदार्थ है, इनमें जो विकल्प हैं, फसाव है बस यह इस परमात्म स्वरूप को प्रकट नहीं होने देता । आत्मा का अंत: स्वरूप पवित्र और उत्कृष्ट है, उसकी ओर तो जीव का ध्यान नहीं, क्योंकि मोह मदिरा का यह ही असर है और बाहर में जो कुछ बन रहा, हो रहा और उसकी ओर ध्यान है तो जब तक परद्रव्यों से निवृत्ति नहीं हुई है तब तक जीव की दयनीय दशा है और जब परद्रव्यों से निवृत्ति हो लेगी तब यह जीव प्रभु की तरह बहुत ही जल्दी इस विश्व का साक्षी बन जायेगा । देखो कोई निर्णय करके चले थोड़ा थोड़ा भी चले तो इष्ट स्थान पर पहुंच सकता, पर कोई निर्णय ही न रखे और चाहे कितना ही तेज यहाँ वहाँ चले फिरे तो भी उस स्थान पर नहीं पहुंच सकता, कितना ही चलने वाला हो । शिखर जी पर बड़े बूढ़े, बुढ़िया सभी जाते हैं, पर उनका संकल्प है कि हमें शिखर जी की वंदना करना है तो वे धीरे-धीरे चल पाते हैं रात्रि के 12 बजे चलते हैं तो 14 घंटे में तो आ ही जाते हैं और लोग तो 8 घंटे में ही आ जाते हैं, मगर ये 14 घंटे में तो आ ही जाते हैं क्योंकि लक्ष्य अपना सही बनाया । और अगर कोई अपना सही लक्ष्य न बनाये वह कितना ही दौड़ मचाये, कभी इधर जाये कभी उधर तो वह वहाँ कभी नहीं पहुंच सकता । ऐसे ही अपने आत्मा में एक लक्ष्य तो बना लो । बात जब बने तब सही, मगर सच्ची बात समझने में क्यों कृपणता करते हो ? यथार्थ बात तो समझ लो ।

474―धर्म मार्ग पर पहुंचने के लिये अपने एकाकित्व का आद्य निर्णय―मैं आत्मा अकेला हूँ और बाकी समस्त पदार्थ मुझ से अत्यंत भिन्न हैं । इतनी बात समझ तो लेना चाहिए । कैसा हूँ मैं अकेला? सबसे निराला चैतन्यमात्र । एक ज्योति स्वरूप वे जो अनादि से अनंत काल तक नित्य अंत: प्रकाशमान है, विज्ञानघन है, केवल ज्ञानमात्र स्वभाव वाला, मैं एक हूँ, अकेला हूँ, मैं ऐसा अकेला हूँ कि जो देह से भी न्यारा, कर्म से भी न्यारा अन्य सब होने वाली परिस्थितियों से भी न्यारा केवल सहज ज्ञान स्वभावमय हूँ, ऐसा अपने में अकेलेपन का निर्णय तो हो पहले । धर्म नाम तो प्यारा लग रहा है और धर्म के जो बाहरी काम है, मंदिर है, पूजा है, विधान है, उत्सव समारोह, ये सब अच्छे लग रहे हैं और इनमें आगे-आगे भी रहना चाहते हैं सो यह सब एक साधन तो है, मगर वास्तविकता तो समझो । पहले मैं अकेला हूँ यह ही विश्वास बना लीजिए । जब तक यह विश्वास न बन पायेगा कि मैं अकेला हूँ तब तक धर्म के पंथ में जरा भी गमन नहीं हो सकता । तो अपने से पूछो तो सही कि हे आत्मन ! तूने यह समझ पाया है या नहीं कि मैं अकेला हूँ, कह तो बैठता है हर कोई कि मैं अकेला हूँ, मगर जिस तरह का अकेला समझा उस तरह के अकेले की समझ से बात न निभेगी । यों समझ लेना कि यह मैं मनुष्य, यह मैं पुरुष सबसे अलग अकेला हूँ, ऐसे अकेलेपन की बात नहीं कह रहे, मैं वह अकेला हूँ जो केवलज्ञान ज्योतिस्वरूप है । केवल ज्ञान ज्ञान, ज्योति ज्योति, सर्व का जाननहार जिसका नहीं है यहाँ कोई पहिचाननहार, ऐसा यह मैं केवल चैतन्यस्वभाव मात्र एक ज्योति हूँ, ऐसा निर्णय तो करें अपने बारे में । इस निर्णय के बिना मंद कषाय तक से भी धर्म की बात रंच न होगी । हाँ पुण्य की बात होती रहेगी । पुण्य से कुछ आगे लाभ की आशा तो है कि अच्छी बात मिलेगी, धर्म का प्रसंग मिलेगा, फिर धर्म की बात आ जायेगी, मगर पुण्य का विश्वास भी तो नहीं । पुण्य के फल में संपदा मिलें, सब कुछ अच्छा मिले, मगर ज्ञान कुज्ञान मिले, व्यसनों की प्रीति रहे, विषयों में रुचि रहे तो उस पुण्य का फल बुरा हो जायेगा, फिर तो पाप बंधेगा, नरक गति में जायेगा । वर्तमान में पुण्य की आशा मत रखो, पुण्य की रुचि न रखो, पुण्य होगा तो सब कुछ स्वयमेव होता रहेगा मगर रुचि बनाओ धर्म की, मैं ज्ञानमात्र अंतस्तत्व हूँ, ऐसी एक अंदर भावना करें, यह अकेलापन देखिये ।

475―अपने परमार्थ एकाकित्व के परिचय में सहज विशुद्धता का परिचय―जब अकेलापन सही समझ में आयेगा तो परद्रव्यों से मैं न्यारा हूँ, परद्रव्यों से मुझे अलग रहना है, यह बात भी बन जायेगी । तो पहले अपनी बात समझो मैं एक हूँ और असल में मेरा स्वरूप बस एक रूप शुद्ध है । यह कौन करता है, किसके लिए करता है, किसमें करता है, ऐसी भी यहाँ कोई दृष्टि नहीं थमती । यह तो केवल ज्ञान ज्योति मात्र है । यह मैं आत्मा शुद्ध हूँ, कैसा शुद्ध हूँ कि जो मुझ पर बीत रही है उससे भी मैं न्यारा हूँ, जैसे दर्पण में जो प्रतिबिंब गुजर रहा है बाहरी चीजें सामने होने से, तो उस गुजर रही बात में दर्पण का स्वरूप न्यारा है यह बात ध्यान में आती कि नहीं? इसी प्रकार जो मुझमें गुजर रहा है विकल्प, कल्पना, इष्ट, अनिष्ट बुद्धि, इससे भी मैं निराला हूँ । केवल शाश्वत ज्ञानस्वरूप हूँ यहाँ दृष्टि नहीं गई कभी जीव की और बाहर में कहीं भी दृष्टि गई हो, फिर भी यह सारा मेरा कार्य नहीं है । वह तो एक मोह की बेहोशी में जैसा कर्म ने बकवास किया वैसा यह भी बकवास कर रहा है । तो पहले पहचाने उस आत्मस्वरूप को तब धर्म की बात बनेगी ।

476―स्वरूपागम की सुगमता का स्मरण―भैया ! अपना स्वरूप जाने बिना धर्म की बात न बनेगी । स्वरूप ही तो जानता है, उसका बड़ी आसानी से जानना होता है । भला बतलाओ बैल, घोड़ा, हाथी, शेर, नेवला, बंदर, सुअर, मेंढक आदिक जो-जो भी संज्ञी पंचेंद्रिय जीव हैं उनको कौन समझाने गया? कहाँ वे इतने उपदेश सुनते, कहाँ मंदिर जाते, कहाँ वे किसी की बात सुनते हैं मगर उनमें भी किसी-किसी को अपने आपमें ज्ञानज्योति के दर्शन हो जाते हैं और सम्यग्दृष्टि हो जाते हैं । तो यहाँ प्रत्येक मनुष्य चाहे संस्कृत न पढ़े, धर्म की परिभाषा शब्दों से कभी न सुने और आत्मा का कर्म का व्याख्यान भी समझ में नहीं आवे, मगर स्वयं की गांठ में भी तो कुछ धन है, आपके पास ज्ञान है स्वयं ही तो ज्ञानस्वरूप है । जरा बाहरी पदार्थों के विकल्प छोड़ें, सबको भिन्न जानकर असार जानकर एक विश्राम ले और अधिक समझ नहीं है तो कम से कम उन पशु पक्षियों की ही भाँति सही, अपने आप अपने में उस सहज ज्ञान ज्योति का उदय करें और फिर पशु पक्षियों की पर्याय से तो हम आप बहुत ठीक हैं, सही हैं, समझते हैं, तो अपने अकेलेपन का विचार बनायें और जो हमेशा रहने वाला एक स्वरूप है चेतन, उसकी दृष्टि बनायें ।

477―सहज विशुद्ध अंतस्तत्त्व के निर्णय से सहज विरक्ति का अभ्युदय―कैवल्य स्वरूप का निर्णय हो तो यह भी निर्णय बन जायेगा कि कर्म का उदय होने पर जो कुछ यहाँ गुजर रहा है यह गुजर मैं नहीं । यह मेरा नहीं, रागद्वेष कषाय ये कुछ भी मेरे नहीं है । अपने स्वरूप को जानने पर द्रव्यों से हटने की बात सहज आयेगी । यह मैं कैसा हूं? चैतन्यमात्र, जिसमें जानन देखन निरंतर चल रहा है । सो यह वास्तविक चीज हूं मैं, आकाश की तरह । आकाश में रूप नहीं, रस नहीं, गंध नहीं, स्पर्श नहीं, फिर भी आकाश कोई वस्तु है कि नहीं? आकाश एक पदार्थ है, अमूर्तिक है, अनंत प्रदेशी है, इसमें एक-एक पदार्थ है, अमूर्त हैं, असंख्यात प्रदेशी है, वास्तविक वस्तु है और चूँकि यह स्वयं खुद है इसलिए खुद की बात खुद में बड़ी आसानी से समझ में आती है । तब ऐसा जाने कि यह मैं वास्तविक पदार्थ हूँ तो अब मुझे समस्त परद्रव्यों की प्रवृति छोड़ देना चाहिए, पर द्रव्यों का आकर्षण, परद्रव्यों की ममकार की बुद्धि ये सब त्याग देना चाहिए तब एक निश्चल होकर ठहरा हुआ हो जाना सुगम है । मायने परद्रव्यों के निमित्त से जो मुझमें कल्लोल उठ रही है बस यह सब खतम हो जायेगी । कैवल्य की झांकी कठिन नहीं है, मगर जब चित्त दूसरी जगह है मोह के संस्कार में तब यह बात होती है कि बड़ा कठिन लग रहा है । समझ में न आये तो वहाँ अपना अपराध स्वयं ताकना चाहिए । मगर इस समय में कोई बात चित्त में न लाये हों और आत्मा की बात समझने के लिए ही यत्नशील हो रहे हों और फिर समझ में न आये तो सोचना चाहिए कि कठिन बात है, पर ऐसा कभी हो ही नहीं सकता । चाहे वक्ता भी न बोले और आपका ऐसा यत्न हो कि किसी बाहरी पदार्थ में ख्याल नहीं जा रहा है तो आपको अपने आपमें इस परमात्म प्रभु के दर्शन होगे । दर्शन क्या? एक अलौकिक आनंद का अनुभव वही है, सहज परमात्मा का रूप ।

478―ज्ञानी की परद्रव्य से निवृत्ति की विरचना―भैया ! इन परतत्वों से विरक्त होइये । जो बाहरी पदार्थ मिले हैं धन मकान पैसा आदिक ये तो प्रकट पराये हैं । सबसे बड़ा राग लगा है यह । इन जीवों के । तो क्या? जगत के अन्य संसारी जीवों को निरखकर उनकी स्थिति को उन्नति समझता है, खुद में भी क्या इसी प्रकार चाहता है कि मुझे भी ऐसा ही होना चाहिए । जैसा लोगों को देखा कि अमुक धनी है, अमुक परमेश्वर है, अमुक इस तरह की इज्जत में बस रहा है । अरे लोग इज्जत करते हैं सो तो ठीक, इसको तो लोग जानते हैं, किंतु करते कहाँ, जिनकी इज्जत चल रही है दुनिया में, अज्ञान में रहते हुए भी, वहाँ उनका दिल खुद जानता है कि वे अंदर में कितने दुःखी रहते हैं, और अभी ही सभी से अलग-अलग पूछ लो, जिसको बड़ा से बड़ा समझा जा रहा हो उससे भी अलग बात करलो वह अपना कितना कष्ट बतायेगा । तो फिर ऐसे मोह में क्या लाभ है कि कष्ट भी सहते जाते और उस कष्ट से विरक्त नहीं होना चाहते । तो परद्रव्यों से बहुत अधिक निवृत्ति होनी चाहिए । परद्रव्यों में क्या-क्या आया? धन वैभव कुटुंब मित्र परिवार और यह शरीर, यहाँ सब तो कुछ-कुछ पहले से ही लोग जानते हैं । मगर यह भी जल्दी समझ में आता है, किसी के कि यह देखो जीव निकल गया, शरीर रह गया, उससे यह बात समझ में बैठी हुई है कि शरीर न्यारा है, जीव न्यारा है, मगर पर द्रव्य क्या इतनी ही बात है । अंदर में चले, जो जीव के साथ सूक्ष्म कार्माण वर्गणाओं के स्कंध लगे हुए हैं, जो इसके भीतर पड़े हुए हैं, सूक्ष्म से सूक्ष्म जो साथ बंधे हैं, मरने पर साथ जाते हैं, ऐसा ही संबंध है, निमित्त, नैमित्तिक बंधन है, वे कर्म भी बिल्कुल परद्रव्य हैं, फर्क इतना है कि ये परद्रव्य तो बाहर में हैं और ये कर्म इस आत्मा के प्रदेशों में एक क्षेत्रावगाह हैं, मगर हैं वे न्यारी चीज कर्मों का स्वक्षेत्र कर्मों में हैं । यहाँ यह समझते जाइये कि कोई क्या मुझ से न्यारा है और किस किससे मुझे अलग होकर अपने में विश्राम करना है । कर्म परद्रव्य हैं और देखिये मैं जीव अपने चैतन्य स्वभाव के कारण चेतता रहूं, मात्र ज्ञाता दृष्टा रहूँ यह तो मेरी ईमानदारी का काम है मगर यहाँ कितना भब्बड़ मचाकर जो कर्मोदय है, जो कर्मविपाक है वह सब यहाँ छा गया प्रतिफलित हो गया, झलक गया और अंधेरा छा गया, सो यह अंधेरा भी मेरी चीज नहीं, यह तो परद्रव्य की झाँकी है । जैसे दर्पण में रंग बिरंगी चीज का प्रतिबिंब हो गया तो कहते हैं न कि प्रतिबिंब भी दर्पण की चीज नहीं है, वह तो बाह्यवस्तु का फोटो मात्र है, ऐसे ही मुझमें जितने विकल्प उठ रहे हैं, राग द्वेष कषाय जगा रहे वे सब विषय कषाय भी मेरी चीज नहीं है, कर्म में फल देने की जो शक्ति है वह कहलाता है अनुभाग । तो ये विकल्प भी मेरे में नहीं । तो मैं जो जानता रहता हूँ, कभी अमुक पदार्थ जाना गया, कभी अमुक जाना गया, राग द्वेष भी मानों नहीं कर रहे मगर जानने मैं तो आ रहे हैं भिन्न-भिन्न बातें, तो ये जानने में जो भिन्न-भिन्न बातें, आ रही हैं ये भी स्वभाव से न्यारी हैं याने इन परिणतियों से भी मैं न्यारा हूँ, मैं तो ज्ञानस्वभाव मात्र हूँ ।

479―एकत्वविभक्त विज्ञानघन स्वभाव अंतस्तत्त्व की आस्था में अज्ञान भाव कर्तृ कर्मत्व बुद्धि के क्लेश से निवृत्ति―एकत्वविभक्त ज्ञान स्वभाव को जो ग्रहण करता है, मैं यह हूँ, ऐसे जीव के अज्ञान तो न रहा, मैं अपने लिए स्वरूप में आ गया । जब अज्ञान न रहा तो कर्ताकर्म बुद्धि जो अज्ञान से ही उठ रही थी । वह भी समाप्त हो जाती है । कैसे मैं करने वाला हूं? इस काम को किया, मैं क्रोध को करता हूँ? अरे बाहरी पदार्थ में करने की बात तो बहुत दूर की है, वह तो अत्यंत अनुचित है, ठीक है ही नहीं, मिथ्या है लेकिन आत्मा में जो क्रोधादिक कषायें जगती हैं उसका भी करने वाला मैं नहीं, क्योंकि मैं तो सहज ज्ञानस्वरूप हूँ । यह तो नैमित्तिक भाव हैं, ये तो पुद्गल कर्म की झाँकियाँ हैं, मैं ये नहीं हूँ, मैं तो केवल ज्ञान को ही करता हूँ, जानना चलता रहे बस यही मेरा भोग हैं, बाकी विकारों का भी मैं करने वाला नहीं हूँ । तो अज्ञान से जो कर्ताकर्म बुद्धि जग रही थी, उससे क्लेश हो रहा था, उस क्लेश से यह ज्ञानी दूर हो जाता है । जब तक मोह है तब तक क्लेश है और ऐसा डबल क्लेश है कि फिर भी क्लेश को भोगते जाते और उसी क्लेश को पुकारते जाते कि मुझे मिलो । भला राग जब करते हैं प्रीति जब की जाती है किसी विषय साधन में तो इस जीव को कष्ट होता है कि नहीं? विह्वल हो गया, अपने में अपना महत्त्व सब भूल गया । बाहरी पदार्थों में आसक्त हो गया । बड़ा कष्ट भोग रहा मगर यह चाहता उस ही कष्ट को है कि यह ही मिले, ये सब बातें अज्ञान से होती थी । अब अज्ञान रहा नहीं । मैंने अपने आपके सही स्वरूप को पहिचान लिया कि मैं यह हूँ, अन्य कुछ नहीं हूँ । वह क्लेश से दूर हो जाता है ।

480―ज्ञानी की साक्षिता―जो ज्ञानी हो जाता है वह पुराण पुरुष, अनादि अनंत अंतस्तत्त्व जगत का साक्षी हो जाता है मायने गवाह । क्योंजी गवाह का दर्जा बड़ा है या वादी प्रतिवादी का ? यहाँ तो गवाह का दर्जा कुछ भी बड़ा नहीं मानते । अगर कोई वादी न्यायालय में पहुंच गया और जज पूछे कि तुम्हारा कोई गवाह है क्या ? तो वह कहता है कि साहब 10 मिनट की छुट्टी दीजिए, में गवाह अभी पेश करता हूं, वह शहर गया, किसी पुरुष से कह दिया भाई हम तुम्हें 10 रु. इनाम के देंगे, हमारी यह बात इस तरह से कह दो वह उसी प्रकार हो जाता । इस तरह के गवाह की कीमत कुछ न रही । साक्षी की आजकल तो कुछ कीमत न रही मगर साक्षी का बड़ा महत्त्व है । जो वास्तव में उत्कृष्ट साक्षी हो उसे कहते हैं भगवान । अरहंत सिद्ध भगवान ये जगत् के साक्षी हैं । साक्षी में राग नहीं, द्वेष नहीं, पक्ष नहीं । साक्षी को किसका कहना और फिर लोग ही उल्टा बोलते―तुम्हारा गवाह कौन ? इसका अर्थ क्या कि तुम्हारी जैसी बात कहे, ऐसा कौन ? यह शब्द ही गलत हो गया । कहना यह चाहिए था कि इस घटना का गवाह कौन ? अब तो न्यायाधीश या सिरताज भी ऐसे ही गलत शब्दों का प्रयोग करते―तुम अपना गवाह लाओ, तो उसने तो खुद ही समझा दिया कि जो तुम्हारी जैसी बात कहे ऐसा आदमी बुलाकर लाओ । और अगर ऐसा प्रयोग होवे कि इस घटना का गवाह लाओ तो यह बात सही है । गवाह तो गवाह है, वह तो प्रभुवत् निष्पक्ष है, घटना का गवाह होता है, न कोई हमारा गवाह न तुम्हारा गवाह । तो जगत् का साक्षी प्रभु है उस ही तरह यह जीव साक्षी हो जाता है जिसके उपयोग में रागद्वेष नहीं रहता । जगता साक्षी प्रभु । एक सेठ ने किसी आदमी को 100 रु. उधार दिए, और कहां दिए ? उस गांव के बाहर किसी एक वट के पेड़ के नीचे, जो करीब गाँव से एक मील दूर था । खैर वहाँ उसने उधार तो दे दिए 100 रु. पर वह पुरुष रुपये वापिस करने में नट गया, बोला कि हमने रुपये लिए ही नहीं । तो उसने दावा कर दिया । पहुंचे दोनों जज के पास । जज बड़ा बुद्धिमान था । दोनों की बात सुनी । अच्छा तो सेठ कहता है कि साहब हम गवाह क्या बतायें हम और ये अकेले थे और उस बरगद के पेड़ के नीचे दिए थे हमने । तो जज सेठ से कहता है कि अच्छा तुम जाओ और जल्दी उस बरगद के पेड़ को हमारे पास ले आओ । उससे कह देना कि चलो जज साहब ने गवाही देने को बुलाया है । तो वह सेठ बोला―साहब वह पेड़ यहाँ कैसे आ सकता? तो जज बोला―अजी वह आवे या न आवे, पर फौरन जाओ और उससे कहो कि चलो तुम्हें जज साहब ने बुलाया है । तुम्हें उससे यह बात कहने जाना जरूर पड़ेगा । खैर जब सेठ चला गया उस वट के पेड़ के नीचे तो काफी देर हो गई । 10-15 मिनट बीतने पर जज बहुत झुंझलाया उस सेठ के ऊपर । अजी वह सेठ अब तक न आया । वह तो बड़ा झूठा निकला, उसकी बात हमें ठीक नहीं मालूम होती, वह सब बातें बनाता है । उस बरगद को लिवाकर वह अभी तक क्यों नहीं आया? लो वह पुरुष बोल उठा―साहब वह इतना जल्दी कैसे आयेगा? वह पेड़ तो यही से कोई मील भर दूर है । तो बस बताओ फैसला हो गया कि नहीं? यह एक साक्षी की बात कह रहे है । वह पेड़ साक्षी हो गया । एकेंद्रिय भी साक्षी हो गया तो गवाह का दर्जा बहुत उत्कृष्ट होता है, वह निष्पक्ष होता है ।

481―विश्वसाक्षिता के उद्यम में अलौकिक पौरुष की आवश्यकता―सकल परमात्मा मायने अरहंत, शरीर सहित परमात्मा और सिद्ध निकल परमात्मा, जिनके शरीर नहीं है, ये दोनों सारे विश्व के साक्षी हैं, मायने समस्त विश्व तीनों लोक, तीनों काल के सब पदार्थ उनके ज्ञान में झलक रहे हैं, लेकिन राग द्वेष रंच मात्र भी नहीं हैं और अपने उस विशुद्ध ज्ञान के कारण अनंत आनंदरस में मग्न हो रहे हैं । बताओ आप यह स्थिति चाहते कि नहीं? अगर चाहते हो तो अपना मूड़ बिल्कुल बदलना होगा, अपनी श्रद्धा बिल्कुल सही करनी होगी कि बाहरी पदार्थ मेरा कहीं कुछ नहीं है । मेरा मात्र यह मैं ज्ञान स्वरूप तत्त्व हूँ । अरे भव-भव में कुटुंब मिला, भव-भव में संपदा मिली वह कुछ भी तो नहीं रही, आज जो कुछ संपदा मिली उससे लाखों गुना संपदा अनेक बार मिली होगी पर वह कुछ भी तो न रही । यही हालत यहाँ की है, तो ऐसा जानकर यहाँ भीतर से ममता त्याग दें, धन त्यागने की बात नहीं कह रहे, गृहस्थावस्था में सारा धन कुए में फेंक दो, मगर भीतर में यह प्रकाश लाकर कि धन संपदा वैभव ये सब मेरे रंच मात्र कुछ भी नहीं लगते । मैं तो सबसे निराला विज्ञानघन सहज आनंदमय एक चैतन्य मात्र तत्त्व हूँ । उसकी दृष्टि जगे, उसकी उपासना बने तो ये सारे संकट, कर्मजाल, आकुलतायें ये सब दूर हो जायेंगी । कहाँ दृष्टि देना कि सारे काम बनेंगे? अपने अंदर में, अपने उस विशुद्ध चैतन्य स्वभाव में दृष्टि देना और यह मानना कि मैं तो यह हूँ, मुझे अन्य कुछ जो मिला है यह सब कर्मों का ठाटबाट है, ये सब पौद्गलिक बातें है, इनसे मेरा रच मात्र भी संबंध नहीं, उसकी उपासना तो करें । मिनट दो मिनट अथवा आधा मिनट, उनमें एक झलक तो आ जाये, क्या हर्ज है, आपका कल्पित घर आपके घर की जगह है, परिवार-परिवार की जगह है, कहीं कुछ भाग नहीं रहा । एक अपने इस चित्त को विशुद्ध बनाकर कुछ ऐसा अनुभव करें कि मैं सबसे निराला केवल ज्ञान ज्योति मात्र अंतस्तत्त्व हूं, मेरा अन्य किसी से कोई संबंध नहीं ऐसा एकाकी का ध्यान जगे तो धर्ममार्ग में प्रवेश होता है ।


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