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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 62

From जैनकोष



आत्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानादन्यत्करोति किम् ।

परभावस्य कर्तात्मा मोहोऽयं व्यवहारिणाम् ।।62।।

595―सकल संकटों से छूटने का उपाय धर्मपालन―संसार के संकटों से छूटने का उपाय मात्र धर्मपालन है, धर्म भी क्या है वह, जिसका कि पालन करना संकटमुक्ति का उपाय है? वह धर्म है आत्मस्वभाव याने आत्मा का स्वयं सहज निरपेक्ष अपने आपके सत्त्व के कारण स्वयं का प्राणभूत जो चैतन्य स्वभाव है वह धर्म है और अंतस्तत्त्व की दृष्टि होना धर्मपालन है । अनेक लोग ऐसी शंका करते हैं कि अमुक भाई को धर्म करते हुए बहुत वर्ष हो गए और इनको क्रोध उतना ही है, तृष्णा दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, तो यह धर्म केवल कहने-कहने का ही धर्म है, ऐसी शंका उनको होती है जिन्होंने धर्मपालन की वास्तविक बात नहीं समझी । धर्म है केवल चैतन्य प्रकाशस्वरूप, जिस वस्तु का जो स्वभाव होता है वह उस वस्तु का धर्म है, मेरा स्वभाव है केवल चैतन्य, ज्ञानस्वरूप, बस उसमें यह मैं हूँ ऐसा निर्णय होता है, मैं यह ज्ञान प्रकाश मात्र हूँ, ऐसी आस्था होना, मेरा हित इस ज्ञान प्रकाशरूप में रहने पर ही है, ऐसी श्रद्धा होना और अपने उपयोग को यहाँ ही रमाना मैं केवल ज्ञाता ही रहूं, अन्य मेरे में विकल्प न जगे । मैं इस सहज ज्ञानस्वभाव को ही निहारता रहूं, ऐसा यत्न होना यह है धर्मपालन । क्या उसे यह धर्मपालन कहेंगे जहाँ आत्मस्वभाव तो दृष्टि में नहीं, मात्र बाह्य क्रिया विकल्प है, बाहर के पदार्थों में यह मेरा पूज्य है, यह मेरा आराध्य है, इसकी इस तरह पूजा करना चाहिये ऐसा करने से पुण्य बँधता है, ऐसा करने से स्वर्ग अपवर्ग होता है, यों मन, वचन, काय की बाहरी चेष्टाओं को ही धर्म मानना, क्या इन विकल्प और क्रियाओं को धर्म कहेंगे । धर्म बाहरी पदार्थों में नहीं है, धर्म है अपने आपके अंतःस्वरूप में, बस ज्ञानमात्र अपने आपको निरखना, धर्म कोई रीति रिवाज मनाने के लिए नहीं होता । धर्म कहीं जीवन की इन बाहरी बातों के लिए, श्रृंगार के लिए नहीं है किंतु धर्म होता है आत्मा को सर्व संकटों से सदा के लिए छुटकारा पाने के लिए । जिस जीव का सदा के लिए संसार छूट जाये उसका है धर्मपालन ।

596―जीव के वास्तविक संकटों का संक्षिप्त दिग्दर्शन―संकट क्या-क्या हैं इस जीव पर । पहला संकट तो यह है अज्ञान अंधकार, सबसे महान संकट तो यह है कि खुद का ही पता नहीं, परवस्तुओं के यथार्थ स्वरूप का ही पता नहीं, जहाँ रहते हैं उस दुनिया का पता नहीं, जिस समय में रह रहे उस समय का पता नहीं, चारों ओर से अज्ञान छाया है, यह सबसे बड़ा भारी इस जीव पर संकट है । क्या हूँ, मैं ज्ञानमात्र हूं, अंदर निहार लो, शरीर की दृष्टि न रख कर, इंद्रिय का व्यापार बंद कर भीतर इस श्रद्धा के साथ देखिये कि मैं अंत: हूँ कैसा ! क्या काला, पीला, नीला हूँ, या लंबा चौड़ा गोल हूं? क्या इसमें कोई पिंड है? अंत: जब विचार करेंगे तो यह मालूम होगा कि यह मैं तो केवल एक जानन प्रकाश भर हूँ, ज्ञानप्रकाश के अतिरिक्त मैं और कुछ नहीं । जब ज्ञानप्रकाश मात्र ही मैं हूँ, तो यह मैं ज्ञान को ही कुछ करूं ज्ञान से ही जैसा चाहे जानूं । इसके अलावा अन्य मैं काम करता ही क्या हूँ, मैं बाहर में कुछ काम नहीं करता । प्रत्येक स्थिति में गृहस्थ चाहे पहल हो, साधु हो या अन्य कोई जीव हो सभी जीव अपने ज्ञान के परिणमन के सिवाय कुछ करते नहीं । भले ही हमारे ज्ञान का विकाररूप में परिणमन चले, अपनी इच्छारूप परिणमन चले, वहाँ मेरा सारा आत्मा कप जाता है । उसी को कहते हैं योग, प्रदेशपरिस्पंद, उसका यत्न । तो इस यत्न का निमित्त पाकर देह में वात का हलन चलन होता है । आखिर जीव का और देह का बंधन तो है, स्पर्श तो है, संबंध तो है, सो जब यह उपयोग, यह जीव अपने में प्रदेशपरिस्पंद करता है, योग होता है तो उसके अनुकूल शरीर में वात का संचरण होता है । इस वायु के चलने से उसके अनुकूल हाथ पैर हिलते हैं । हाथ पैर के हिलने का संबंध पाकर यह जो हाथ पैर में चीज पड़ी हो उसमें क्रिया होती है, अब जो व्यामोही पुरुष है, परपदार्थों का लोभी पुरुष है और अपने आपकी यथार्थता का अजानकार हैं, वह ऐसा मानता है कि मैंने अमुक चीज बना दिया, अमुक को उत्पन्न कर दिया इस प्रकार बाहरी बातों में करने का भ्रम लगता है, पर वस्तुत: यह जीव अपने आप में ज्ञान परिणमन को ही करता है और कुछ नहीं करता । ऐसा ज्ञान यह है अमृतपान । जगत में सब चीजें सुलभ हैं धन कन कंचन राजसुख जिनके व्यामोह में जीव बड़ी आशा करते हैं मुझे राजपाट मिल जाये, अमुक मिल जाये, अरे ये सब बाहरी चीजें है, बाहर के पुद्गल हैं, उनकी सत्ता है वे रहते हैं, यहाँ न रहें तो क्या, और किसी जगह रहें तो क्या, अथवा यहाँ रहें यह भी तो उनकी ही बात है, मेरा कोई उनसे संबंध नहीं और इन चीजों के मिलने से मेरे आत्मा का कोई भला नहीं । आत्मा को अपने सही स्वरूप का परिचय हो जाये जिससे कि इसका उपयोग लग जाये और अपने आपके इस ज्ञानस्वरूप को ही ज्ञान में लेता रहे तो बस यह ही है मोक्षमार्ग, यह ही है संकटों से दूर होने का उपाय ।

597―ज्ञानमात्र परमार्थ अंतस्तत्त्व के निरखने का प्रभाव सकलव्यामोह की निवृत्ति―यहाँ यह बतला रहे हैं कि आत्मा ज्ञानमात्र है और वह स्वयं ज्ञानमात्र है । कहीं वैशेषिकों की तरह यह न समझना कि आत्मा मात्र चैतन्यस्वरूप है, जिसका कुछ काम नहीं, परिणमन नहीं, ज्ञान तो कोई अलग वस्तु है, उस ज्ञान का इस आत्मा में जुड़ाव हुआ तो आत्मा ज्ञानमय कहलाया ऐसी बात नहीं है । जैसे अग्नि का स्वरूप उष्णता है, कहीं यह बात नहीं कि अग्नि अलग रखी हो और यह उष्णता बाद में आकर बनी हो ऐसी बात नहीं है, ऐसे ही आत्मा में भी यह मैं आत्मा ज्ञानरहित हूँ, मात्र एक कहने सुनने को चैतन्य मात्र हूँ और पीछे इसमें ज्ञान का समवाय बना और ज्ञानी कहलाया, ऐसा नहीं है, किंतु आत्मा ज्ञानरूप है और स्वयं ज्ञानरूप है, यह ज्ञान से अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं करता । यह आत्मा तो सिर्फ भावों का करने वाला है । पर पदार्थों का कुछ नहीं करता । इस जीव ने दुकान की, रसोई बनाया, घर बनाया, कुटुंब बढ़ाया, यह सब कहना केवल मोह है, भ्रम की बात है, अज्ञान भरा विचार है, यों तो व्यवहार से सभी कहते हैं और उस कहने में भी कोई तथ्य जानने की बात है, मगर वैसा ही सत्य समझ लेना यह केवल अपने आप पर अन्याय है, भले ही कहते हैं कि कुम्हार ने यह घड़ा बनाया, बढ़ई ने रथ बनाया, जीव ने काम किया, शरीर रचा, जीव ने शरीर रचा, यह एक कहने की बात है, पर इसमें निमित्तनैमित्तिक योग के तथ्य के आधार पर लोग ऐसी कर्तृत्व भाषा बोलने लगते हैं, बोलें, हर्ज नहीं, वह तो व्यवहार की बात है, मगर यथार्थता समझ में रहनी चाहिए कि मैं इस जाल के रचे जानने के लिए निमित्त मात्र हूँ । मैं तो केवल अपने आपके भावों को करता हूँ । व्यवहारी जनों को ऐसा क्यों मालूम हो रहा है कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का करने वाला है । देखिये आत्मा ने तो अंत: केवल विकल्प किया, उस प्रकार का ज्ञान बनाया और व्यापार किया, याने प्रदेश की स्फूर्ति हुई, प्रयत्न हुआ, योग हुआ, अब उसका निमित्त पाकर जैसी इच्छा हुई, उसके अनुकूल शरीर में वायु चली उसके अनुकूल अंगक्रिया हुई । और वहाँ प्रसंग में पड़ी हुई चीज में भी उसके अनुकूल क्रिया हुई, तो इस तरह लोगों को यह मालूम होने लगता है कि यह जीव बाहर में कुछ काम करता है, किंतु वस्तुत: बाहर में कुछ भी नहीं करता, ऐसा जरा अपने आत्मा के और अंतर की बात समझियेगा ।

598―कर्मरस और ज्ञानरस के आधारों का पार्थक्य―इस जीव के साथ कर्म का बंधन है, जो पहले कर्म बाँधे थे उनका जब उदय आता है याने उन कर्मों में क्रोध मान आदिक कषायों का विपाक अनुभाग जब फूटता है तब जीव में उनका वैसा प्रतिफलन छाया प्रतिबिंब आता है, क्योंकि यह जीव स्वच्छ है ना? दर्पण स्वच्छ है तो सामने पड़ी हुई चीज का प्रतिबिंब आ ही जाता है, तो चूंकि यह जीव स्वच्छ है और साथ ही यहाँ प्रदेशों में एक क्षेत्रावगाह रूप में बात घट रही है तो उस कषाय के अनुभाग का यहाँ प्रतिफलन हुआ । यह जीव अज्ञानी बना फिर रहा है, यह नहीं समझ सकता कि यह तो कर्म की लीला है । मेरा यहाँ कुछ कार्य नहीं । मेरा तो मात्र मेरे उपयोग का परिणमन होना बस यही चक्की चलती है । यह ज्ञान न होने से यह उपयोग में फलित कषायों को अपना लेता है और उस तरह से यह उपयोग चलता है, उस काल में नवीन कार्माण वर्गणाओं में कर्मत्व आ जाता है । तो निमित्तमात्र ही तो हुआ यह आत्मा, आत्मद्रव्य नहीं, किंतु आत्मा का विचार और व्यापार । और ये कर्म बंधने लगे तो लोग यों कहने लगते कि जीव ने कर्म किया, जीव ने कर्म बाँधा । वस्तुत: उपादानतया देखो तो जीव का अपने ज्ञान में अपना काम चल रहा । कर्तापन कहा जाता है निमित्त देखकर, मगर यह बात सही क्यों नहीं, अगर एक पदार्थ दूसरे पदार्थरूप परिणम जाये, दूसरे पदार्थ को कर दे, तो दो पदार्थ एक बन जावेंगे और यों दोनों का विच्छेद हो जायेगा, मगर दोनों एक कहाँ है जीव चेतन है, कर्म अचेतन । देखो यह बात कुछ कठिन भले ही लगे, भेदविज्ञान की बात समझना कठिन भी हो, लेकिन दूसरा उपाय है ही नहीं संसार के संकटों से छूटने का, इसलिए हर तरह से सभी लोगों को काम करने का यही है कि सही ज्ञान करें, भेदविज्ञान करें । देखो ये दो अंगुलियाँ रहें? तो आपने किस आधार से समझा कि ये दो अंगुलियाँ हैं? आधार वह यही है कि यह छोटी अंगुली जो कुछ कर पायेगी सो अपने में अपना परिणमन कर पायेगी ऐसे ही बड़ी अंगुली भी । यह कभी न हो पायेगा कि यह एक अंगुली दूसरी अंगुली की कोई अवस्था बना दे । अगर यह अंगुली जली तो यह दूसरी तो न जल जायेगी । अगर उस अंगुली में कोई अवस्था बने तो इसमें न बन जायेगी, तब ही तो आप कहते हैं कि ये दो अंगुलियाँ हैं । यहाँ इतने मनुष्य बैठे हैं तो यह आपने किस आधार से जाना कि इतने मनुष्य हैं? इस आधार से जाना कि प्रत्येक मनुष्य अपना ही काम कर पाता है । हाथ हिलायेगा, चलेगा, बोलेगा, कुछ करेगा तो वह खुद ही कुछ कर पायेगा, दूसरे का कुछ न कर पायेगा । भले ही यह निमित्त हो जाये और दूसरा भी करने लगे, मगर उपादानतया यह बात समझना है तो इतने मनुष्य हैं यह बात जानी । प्रत्येक की क्रिया उसकी उसमें ही होती है, उसकी परिणति उसमें ही चलती है, दूसरे मनुष्य की परिणति नहीं चलती, यह ध्यान में आने से आपने समझा कि इतने मनुष्य हैं । देखो सभी जानकार हैं और सभी समझते हैं, चाहे इस भाषा में बोलना न जाने तो भी वे जानते हैं इसी आधार पर कि इतने मनुष्य हैं । तो ऐसे ही कर्म और जीव, कर्म का कार्य और जीव का कार्य कर्म का प्रभाव जीव का प्रभाव, कर्म का परिणमन जीव का परिणमन, ये दो जब भिन्न-भिन्न जंच जायें तो समझिये कि सच्चा ज्ञान पाया और जब तक ये दो भिन्न न जचें सो कर्म में ही जीव तन्मय होता है और कर्ममय अपने को मानता है तब तक जीव अज्ञानी है, संसार में जन्म मरण करता रहता है ।

999―सकल संकटों से मुक्ति पाने का उपाय बना लेने में ही सच्ची बुद्धिमानी―आप सोचिये कि संसार के संकटों से सदा के लिए छूट जाना भला है या इस जिंदगी में थोड़े आराम के साधन जुट जायें, अच्छा मकान, कुर्सियाँ, रेडियो और आराम के साधन, गप्पें करनेवाले मित्र जन, और कुछ हंसता सा रहे, फिर कुछ चैन सा माने, यह काम बड़ा है, या संकटों की जड़ जन्ममरण, संसार का मिलना, ये सब छूट जायें यह बड़ी चीज है? इन दो बातों में महत्त्व की बात का निर्णय कर लेना ही बड़ी बुद्धिमानी है । जिसने इस भव के संग समागम, यश मौज, प्रतिष्ठा, विषयों का प्रेम इन बातों को महत्त्व दिया है, वे पुरुष तो दयनीय हैं, दयापात्र हैं, क्योंकि उन पर बड़ा संकट आने वाला है, उनके संकटों को कौन रोक देगा । जो खुद अपने मन को ज्ञान में सुवासित न करें जो अपने मन को नियंत्रित न करें, विषयों में ही प्रीति बनायें, जो खाने पीने की मौजों में ही अपने आपको बुद्धिमान मानते हैं, वे तो संसार में बड़ा संकट पाने वाले हैं और पाते ही रहते हैं । इसमें कुछ सार नहीं, किंतु अपने आपके स्वरूप में रमें, इसी में तृप्त हों, उसी में जम जायें, उपयोग लगायें यह वृत्ति बन सके, इसका उपाय बनायें, वह सारभूत बात है । अच्छा, लोग मंदिर आते हैं, देखो यहाँ मंदिर में कोई भगवान बैठे थोड़े ही हैं । प्रभु तो सिद्धालय में विराजमान हैं, लेकिन भगवान के नाम पर जो मूर्ति बनी है, यहाँ उसके सहारे भगवान तक उपयोग ले जाते हैं, और यहाँ उस मूर्ति को हमारा विनय है । और, स्थापना से हमने भगवान की समझ बनायी है । यह बड़प्पन किस बात से बढ़ रहा? बस इसी से ही कि जिन आत्माओं ने ज्ञान किया, निज और पर का निर्णय बना लिया और जो आनंदधाम है खुद, उस निजधाम में अपनी दृष्टि बना ली । ऐसा पुरुष निर्मल होता है, जन्म मरण से रहित होता हुआ अनंत आनंदमय है, ऐसा ही हमें होना है । तो आत्मज्ञान बड़ा है या थोड़े से इस धन वैभव को देख-देखकर खुश होने का काम बड़ा है? जरा सोचो तो सही, जो महत्त्व का काम है खुद के ज्ञानस्वरूप की आराधना का उस ओर अपना उपयोग लगायें, सीखें, पढ़ें, ध्यान बनाये, सत्संग बनाये । भैया, कुछ समय लगे अपने आत्मा की आराधना में तो जीवन सफल है । यह बात कैसे बने उसके लिए पहला उपाय है वस्तुओं को जुदा-जुदा समझ लेना । प्रत्येक पदार्थ स्वयं-स्वयं सत् है । और, जब सत् है तो उसका उत्पाद व्यय ध्रौव्य उस ही में है । जब प्रत्येक का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव उसका उस ही में है तो एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का क्या कर देगा? करना कहलाएगा तन्मय होकर परिणमन करना, मगर ऐसा दो द्रव्यों में हो तो एक द्रव्य मिट जायेगा, कौनसा मिट जायेगा? उसी-उसी का झगड़ा । मतलब यह है कि जगत शून्य हो जायेगा, तो जब एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में व्याप्य-व्यापक भाव नहीं तो एक दूसरे का कर्ता नहीं है ।

600―द्रव्य द्रव्य में परस्पर निमित्तनैमित्तिक भाव का अभाव―जीव कर्म का कर्ता नहीं है, कर्म जीव को दुःख देने वाला नहीं, पर निमित्तनैमित्तिक भाव अवश्य है, अन्यथा संसार में जो रुलना है यह स्वभाव बन बैठे । कर्म है, उसका उदयकाल आता है और उसका निमित्त पाकर यह उपयोग नाना प्रकार के विकल्प करता है, बस उन विकल्पों से हमारी बरबादी है, देखो अब और गहरे चलकर देखो उन दो पदार्थों में जिन में परस्पर निमित्तनैमित्तिक भाव है, जब द्रव्यस्वरूप को देखते हैं तो उनमें निमित्तनैमित्तिक भाव नहीं है । पहला उपाय अनेक द्रव्यों का उन उनके स्वरूप में परिचय होना है, तो जब हम द्रव्यदृष्टि से देखते हैं तो इसमें द्रव्य तो है ज्ञायकस्वरूप, वह किसी बात का निमित्त नहीं । जब हम कार्माण वर्गणा को द्रव्य में देखते हैं तो उनका द्रव्यस्वरूप है अनादि अनंत अकारण निजस्वरूपमय, वह भी किसी का निमित्त नहीं है, मगर कर्म में होने वाली अवस्था इस जीव के विकल्प का निमित्त है और जीव में होने वाला विकार कर्मपना होने का निमित्त है, द्रव्य-द्रव्य का निमित्त कभी न होगा, न कभी हो सकता है, पर द्रव्य की ही विषम अवस्था दूसरे के विकार का निमित्त होती है । तब क्या रहा? मेरा विकल्पकर्म कर्मबंध का निमित्त है, भावकर्म व्यापार कर्मबंध का निमित्त है, मैं खुद नहीं । मैं अगर अपने स्वरूप में अपने को देखूं और यह विकल्प व्यापार कदाचित् न हो सके तो वहाँ बंध का कोई काम नहीं, तो अवस्था-अवस्था का निमित्त है, अवस्था चूंकि द्रव्य से रहित नहीं है इसलिए कहो कि उस अवस्था में प्राप्त द्रव्य दूसरे द्रव्य की अवस्था का निमित्त होता है । तब यहाँ भी समझो, क्या, कि मैं अपने परिणाम का ही कर्ता बनता, दूसरे का कर्ता नहीं बनता, और जो समझदार हैं, ज्ञानी हैं वे तो स्पष्ट जानते कि लो यह मैं इस ज्ञानभाव का ही कर्ता हूँ, अन्य का नहीं ।

601―विविध विषम घटनाओं में भी जीव के परकर्तृत्व का अभाव―देखो यहाँ लोग दूध का दही बनाते तो कैसे बनाते? उस दूध में नींबू निचोड़ कर बना लेते, बस इतना ही तो कर्तव्य लोग करते हैं या खट्टे बर्तन में दूध को रख दिया, और क्या कर्तव्य बनाते? तो इतना कर्तव्य करने को क्या यह कहा जा सकेगा कि इस मनुष्य ने दही का परिणमन बना लिया । दही का परिणमन दूध में दूध के विकार से बना, इस मनुष्य ने नहीं बनाया, तो मनुष्य ने क्या किया? बस इसका ज्ञान किया, योग किया, अपने आप में ज्ञान बनाया और उस तरह का योग किया, बाद में फिर और बात निमित्त योग से हुई और वहाँ दूध का दहीरूप परिणमन हुआ । यह जीव तो उस परिणमन का जाननहार है, न कि उस परिणमन का करने वाला । उस समय में देखो जैसे मानो दूध निकाला जा रहा है, एक ग्वाला दूध निकाल रहा है तो ग्वाला दूध को निकाल लेता क्या? अरे ग्वाला तो उस दूध का जानने ग्वाला है, वाला तो अपने हाथ से अपनी क्रिया करता है और दूध बर्तन में आ जाता है । चूंकि उस ग्वाले को दूध निकालने विषयक इच्छा लगी है इसलिए वैसा ही योग हुआ, वैसा ही प्रयत्न हुआ और उस योग से यह दूध निकलता है, पर वह ग्वाला तो उसका जाननहार है करने वाला नहीं, क्योंकि उस ग्वाला का उस दूध में व्याप्य-व्यापक भाव है नहीं, वह तो ज्ञान में ही घुसा है और दूध दूध में ही व्याप्य व्यापकभाव से रह रहा है तो ऐसे ही यह जीव और कर्म जो अति निकट बंधन में हैं, यह जीव हर समय ज्ञान का ही करने वाला हो सकता है और यह विकल्प हर समय अपने आपके अनुभाग का ही भोगने वाला हो सकता है मगर इस भेद को न समझने के कारण जो कर्म में हलन चलन हो रही उसे यह मानता है कि मुझमें यह हलन चलन हो रही, बस यह व्यामोह जीव को दुःख देता है ।

602―कर्मानुभागप्रतिफलन से विविक्त अंतस्तत्त्व के दर्शन में कल्याण―देखो दर्पण के आगे रंग बिरंगा कोई कपड़ा रखा है और दर्पण में प्रतिबिंबित हो रहा है तो उसे देखकर तो कोई यह नहीं कहता कि यह दर्पण रंग बिरंगा हो गया, वहाँ रंग बिरंगे की झाँकी आ गई, यह ही तो समझता है हर एक कोई । तो ऐसे ही आत्मा में रागद्वेष कषाय की झाँकी आ रही जो यह कर्म का अनुभाग है, ऐसे ही समझें तो उसे आपत्ति नहीं, मगर कोई अज्ञानी ऐसा ही समझ बैठे जैसे कि याने दर्पण में यह रंग आ गया, तो वहाँ आपत्ति है । तो ऐसे ही अज्ञानी जीव कोई यह समझ बैठे कि आत्मा में कषाय आ गई, तो यहाँ विडंबना बन जाती है, अरे आत्मा तो ज्ञान परिणमन कर रहा, कषाय तो कर्म परिणति है उसको यह जीव अपनाता है इसलिए यह जीव दुःखी है, नवीन कर्म का बंधन है, संसार में रुलने वाला है । यह भीतर का भेद विज्ञान की बात समझें और साथ ही बाहर के भेदविज्ञान की भी बात समझें, देह क्या सदा मेरे साथ तन्मय है, यह भिन्न चीज है, यह वैभव क्या मेरे साथ सदा है? अत्यंत भिन्न है, तो सबसे निराला ज्ञान प्रकाश मात्र अपने आपकी श्रद्धा बने और अपने आपके पौरुष से इस जगजाल से छूट जाने का यत्न कर लें । यहाँ जो आँखों दिखता है उसमें लुभावें नहीं । ये जो इंद्रिय विषय बन रहे हैं उन पदार्थों में लुभायें नहीं । इनमें रंच भी सार नहीं, बाहर में रंच भी अपना प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । बाह्य का उपयोग छोड़कर अपने आप में अपने स्वरूप का निर्णय करें और इस ही ज्ञानप्रकाश में तृप्त रहें, यह बात अगर इस जीवन में बना सके तो यह जीवन सफल है और उसके लिए उपाय करना होगा । स्वाध्याय, ज्ञानलाभ पाने का यह सुगम उपाय है । इसी उपाय से सब रास्ता मिलेगा कि मैं कैसे अपने में प्रसन्न रहूं और कैसे इन कर्म बंधनों से मुक्त होऊँ ।


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