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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 65

From जैनकोष



स्थितेति जीवस्य निरंतराया, स्वभावभूता परिणाम शक्ति: ।

तस्यां स्थितायां स करोति भावं यं स्वस्य तस्यैव भवेत्सकर्ता ।।65।।

628―जीव का परिणमन स्वभावत्व―इससे ऊपर के छंद में कहा गया था कि पुद्गल द्रव्य स्वयं परिणमन स्वभाव वाला है और वे कार्मण वर्गणायें याने जो परमाणु पुन कर्मरूप बनता है उस स्कंध में स्वयं कर्मरूप परिणमने की शक्ति है, तब ही तो जीव के रागद्वेष भाव का निमित्त पाकर वे कार्मण वर्गणायें कर्मरूप बन जाती हैं । सो देखो निमित्तमात्रपना तो है जीव में कर्म के होने में, मगर जीव कर्म को, कार्मण स्कंध को कर्मरूप नहा बनाता । एक पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ रूप नहीं बन सकता । हाँ, निमित्तमात्र हैं जीव के विभाव, सो कर्मरूप परिणमने की शक्ति है तब ये कर्म उस निमित्त को पाकर कर्मरूप बन जाते हैं, वे खुद परिणम रहे हैं कर्मरूप । उसे जीव क्या करेगा? जीव के भाव तो एक सन्निधान मात्र हैं सो कल के छंद में यह बात स्पष्ट की गई थी कि जीव पुद्गल कर्म को नहीं करता । अब आज वह बतला रहे हैं कि जीव में जो रागद्वेष भाव जगते हैं उनको कर्म कर देता होगा? क्योंकि जीव तो स्वयं चैतन्यस्वरूप है, वह तो कुछ परिणमता नहीं है, ब्रह्माद्वैतवादी पुरुषाद्वैतवादी ऐसा मंतव्य रखते हैं कि जीव अथवा कहो आत्मा या ब्रह्माद्वैत ये परिणमा नहीं करते । यह तो केवल चैतन्यस्वरूप मात्र है, तो ऐसी जिज्ञासा रखने वाला हो तो समझ लो कि उसकी शंका का समाधान है कर्म जीव को रागद्वेषरूप नहीं परिणमा सकता किंतु जीव में स्वयं रागद्वेषादिक रूप से परिणमने का सामर्थ्य है । देखो जितने भी पदार्थ हैं सभी पदार्थ परिणमने का स्वभाव रखते हैं । अगर परिणमे नहीं कोई तो वह सत् ही नहीं है, जो सत् है वह नियम से निरंतर परिणमता ही रहेगा । जीव सत् है या असत् । यदि असत् है तो उसके विषय में कुछ कहना ही व्यर्थ है, असत् में कुछ बात होती ही नहीं । सत् में कुछ अटका ही नहीं । जीव सत् है और सत् है तो नियम से उत्पादव्ययधौव्य युक्त है ।

629―उदाहरणपूर्वक जीव के परिणामित्व का समर्थन―जैसे दर्पण है, उसके सामने रख दिया मानो तिरंगा तो अब दर्पण में भी वह तिरंगा प्रतिबिंब बन रहा । अब यह बतलावो कि उस तिरंगा के प्रतिबिंब को क्या उस तिरंगे झंडे ने रख दिया, निमित्तनैमित्तिक भाव के तथ्य से लोग बढ़कर कह तो देते हैं ऐसा कि इस दर्पण के प्रतिबिंब को, इस तिरंगे ने कर दिया, मगर तिरंगा झंडा जहां रखा है वह वहाँ ही है, उसका रूप, रस, गंध, स्पर्श, आकार, सब कुछ वहाँ ही रहेगा, वहाँ से बाहर नहीं जा सकता । तो जब उसका रंग, रूप, आकार कुछ भी उससे बाहर नहीं गया तो कैसे कहा जा सकेगा कि इस तिरंगे ने दर्पण में प्रतिबिंब कर दिया । उस तिरंगे झंडे का कोई भी अंश दर्पण में आया नहीं, तब तो क्या गया? उस दर्पण में खुद इस प्रकार से परिणमने की शक्ति है, क्योंकि वह स्वच्छ है, स्वच्छ पदार्थ स्वच्छरूप परिणम सकता है और स्वच्छता के विकाररूप परिणम सकता है, तो सामने उस तिरंगे का निमित्त पाकर यह दर्पण स्वयं अपनी कला से, अपनी परिणति से उस तिरंगे प्रतिबिंबरूप परिणम गया । तो उस दर्पण में परिणमने का सामर्थ्य है तब ही तो परिणम गया, निमित्त अवश्य है वह, पर वह वस्त्र मात्र निमित्त है, उसने आकर दर्पण में कुछ किया हो सो बात नहीं और साथ ही यह भी है कि अगर उस तिरंगे का सन्निधान न होता तो कभी यह प्रतिबिंब बन नहीं सकता । निमित्त सन्निधान बिना विकार कभी हो ही नहीं सकता । यह त्रिकाल तथ्य बात है मगर निमित्त सन्निधान होने, निमित्त सापेक्षता होने से विकार बनने लगे तो विकार स्वभाव कहलाने लगेगा, क्योंकि वह तो निरपेक्ष बन गया, तो जो निरपेक्ष बनता वह स्वभाव है और जो स्वभाव है वह मिटे कैसे? फिर तो बड़ा कठिन है । उसका निमित्तनैमित्तिक योग तो, इसका परिचय तो इस भव्य जीव को बड़ा मददगार बनाता है, किस बात के लिए? विभावों से हटने के लिए, ये हेय हैं, नैमित्तिक हैं, मेरे स्वभाव की वस्तु नहीं हैं, ऐसा हटने के लिए नैमित्तिक को समझ लेना बहुत सहायक है । देखो उस निमित्त ने किया नहीं कुछ और निमित्त के बिना हो न सके विभाव, सो हुआ किस तरह कि जैसे उस तिरंगे झंडे का निमित्त पाकर यह दर्पण उस अनुकूल प्रतिबिंबित हो गया, ऐसे ही कर्म विपाक का सन्निधान पाकर यह उपयोग भी क्रोधादिरूप, विकल्परूप परिणम गया । तो परिणमने की शक्ति तो पदार्थ में स्वयं है, अब मिल गया यह विपरीत संयोग और उस प्रकार की योग्यता रख रहा यह जीव तो यह जीव उस कर्मविपाक का प्रतिफलन पाकर यह क्रोधादिकरूप से विकल्परूप से परिणम गया । तो बात यहाँ यह कही जा रही है कि जीव में स्वयं परिणमने का सामर्थ है ।

630―जीव को कूटस्थ अपरिणामी मानने में अनिष्ट प्रसंग―जो दार्शनिक जीव को अपरिणामी कूटस्थ नित्य कहते हैं उनके यहाँ तो संसार का अभाव हो जायेगा । है एक सिद्धांत ऐसा जिनका मंतव्य है कि ब्रह्म है, आत्मा है, मगर वह विशुद्ध चैतन्यमात्र है उसमें परिणमन कुछ नहीं होता तो परिणमन किसमें हो रहा? परिणमन कौन कर रहा? तो उनके मंतव्य से उत्तर है प्रकृति, जिसे कहते हैं कर्म । यहाँ शासन में और शंकाकार के मंतव्य में है उसका नाम प्रकृति । कर्म प्रकृति कह लो । देखो किसी भी दार्शनिक का मंतव्य मूढ़तापूर्ण नहीं होता, बात किसी भी तथ्य की होती है, यह तथ्य तो प्रभु ने भी बताया है कि जो कर्म बाँधे थे उन कर्मों का अनुभाग खिला, उन कर्मों में क्रोध, मान, माया, लोभ उत्पन्न हुए क्योंकि वे अजीव हैं इस कारण कर्म उसका परिचय ज्ञान नहीं कर पाते अतएव उनका कोई विकल्प नहीं है, लेकिन हुआ तो वहीं है, अब यह यहाँ झलक गया । झलक लेकर यह जीव खुद परिणम गया क्रोधादिक रूप से । बस ब्रह्म द्वैतवाद में कूटस्थ अपरिणामी आपत्ति है यह कि यह ब्रह्म, यह आत्मा यह रंच मात्र भी नहीं परिणमता । अगर यह आत्मा क्रोधादिक विकल्प रूप से नहीं परिणमता तो फिर संसार किसका नाम रहा? प्रकृति का रहा । अगर यों कहा जाये तो बस झगड़ा खतम । प्रकृति से संसार है, प्रकृति से बंधन है तो प्रकृति को ही मोक्ष चाहिए सो प्रकृति करे या न करे, कहीं जावो । मैं तो जीव हूँ । मेरे तो संसार है ही नहीं, अब मुक्ति की हमें क्या आवश्यकता रही? तो जो ऐसा मानेंगे कि यह जीव खुद नहीं परिणमता है कषायरूप, विकल्परूप तब पे संसार का अभाव हो जायेगा । अच्छा संसार का अभाव हो गया तो अब धर्म की क्या जरूरत है खुद को? कोई अटकी हो तो धर्म करें । यह तो निःसंसार है, मुक्ति की तो उसको चाहना होती है कि जो बहुत फंसा हुआ हो, बंधन में हो । जो कारागार में हो उसको ही तो मुक्ति चाहिए । यह तो फँसा ही नहीं, शंकाकार के सिद्धांत से मुक्ति भी क्या, धर्म भी क्या, सब अजीव हो जायेंगे, फिर सब खतम हो जायेंगे ।

631―पुद्गलकर्म में जीव को परिणमा देने का असामर्थ्य―जीव को कूटस्थ अपरिणामी मानने में अनिष्ट प्रसंग आया, इतना सुनकर शंकाकार घबड़ा अवश्य जाता है कि अब तो बात कुछ भी न बनी, तो यह कहता है कि भाई जीव तो क्रोधादिक रूप से नहीं परिणमता, पर ये पुद्गल कर्म, ये क्रोधादिक कर्म इस जीव को क्रोधादिक रूप में परिणमा देते हैं । भला है कोई ऐसा कि खुद तो परिणमे नहीं और दूसरा परिणमा दे । कुम्हार ने घड़ा बनाया, मिट्टी तो घड़ा रूप परिणमे नहीं, मिट्टी तो इस हठ पर बनी रहे कि मैं तो बस ऐसी ही बिखरी हुई, ऐसी ही ढेले रूप रहूंगी और कुम्हार उस घड़े को बना दे, क्या यह संभव है? कुम्हार तो निमित्त मात्र है, परिणम रही तो वह मिट्टी ही ना? तो परिणमते हुए को ही तो परिणमाने में निमित्त हो सकता, न परिणमते हुए को कोई परिणमा नहीं सकता । भले ही दाहिने हाथ ने इस बाँये हाथ को मरोड़ दिया तो दिख रहा ऐसा, अब बाँया हाथ तो जरा मुड़े नहीं, वह तो वज्र को तरह एकदम कठोर बना रहे और बाँया हाथ मुड़ जाये यह तो नहीं हो सकता । बाँया हाथ मुड़ा तभी तो बायें को मरोड़ दिया, स्वयं न परिणमते हुए को कोई नहीं परिणमा सकता । और, जो स्वयं परिणम रहा है वहाँ पर को निमित्त भले ही कहो, मगर स्वयं में जो निज में परिणमन क्रिया है उसमें यह दूसरे की अपेक्षा नहीं करता कि मैं अकेले कैसे मुड़ जाऊँ, कोई दूसरा भी संग में मुड़ाये तो वह मुड़ जाये ऐसी अपेक्षा नहीं करता, वास्तविकता यह है कि जगत में जितने भी पदार्थ हैं वे सभी पदार्थ परिणमने की शक्ति रखते हैं और वे परिणमते रहते हैं, विकार रूप परिणमन तब होता है जब उपाधि का सन्निधान मिलता है, इस तरह से यह जगत की प्रक्रिया चल रही है । तो यहाँ यह सिद्ध हुआ कि यह जीव स्वयं परिणमन का स्वभाव रखता है । अब हुआ क्या? सो देख लो, कर्म ने तो अपने में क्रोधादिक विकार बनाया । वे क्रोधादिक विकार भाव जीव के विकार जैसे न तकना, वह कर्म के ढंग का ही विकार है, जैसे यहाँ अनुभव करते हैं गुस्सा आदिक का उस प्रकार के अनुभव वाला न समझना कर्म को । जैसे दर्पण में जिस प्रकार का रंग आता है जिस ढंग का, किस ढंग का? स्वच्छता के विकाररूप ढंग का । कहीं इस तरह का रंग नहीं पड़ा है दर्पण में जैसे कि तिरंगे झंडे में रंग पड़ा हुआ है । इस तरह का रंग नहीं है दर्पण में, पर उस रंग के अनुरूप दर्पण में स्वच्छता के विकार जैसे ढंग का वर्ण है, इसमें भी कितना अंतर आया । पुद्गल कर्म क्रोधादिक रूप परिणम गए और यहाँ झलक गए और यहाँ उपयोग में उस-उस प्रकार के ज्ञान विकल्प रूप से परिणम गए, पर अमुक जीव में जो क्रोधादिक आये वे आये कर्म के अनुभाग रूप के जैसे । दर्पण का दृष्टांत बहुत दूर तक एक समझाने का बढ़िया उदाहरण है । परिणमे दर्पण मगर उसका ढंग उसकी तरह है । तिरंगे झंडे का जो रूप है वह उस झंडे की तरह है, उसका यहाँ कुछ भी नहीं, पर ऐसा ही निमित्तनैमित्तिक योग है कि यहाँ भी दर्पण में वैसे रंग का आकार आ गया । भींट के आगे झंडा खड़ा किया, काठ के आगे झंडा खड़ा किया वहाँ तो नहीं बनता यह आकार । काठ में, भींट में ऐसी स्वच्छता ही नहीं है कि वहाँ विकार बन सके । ये कर्म जहाँ होते हैं वहाँ देह भी तो मौजूद है । इस देह में तो क्रोधादिक विकार नहीं आते । देह में नहीं है ऐसी स्वच्छता उपयोग की कि कर्म के अनुभाग की झलक देह में आये और देह क्रोधादिक रूप परिणम जाये, ऐसी स्वच्छता, ऐसी योग्यता तो इस जीव में है उस प्रकार का विकल्प बन गया, तो उस समय यह जीव जब कि यहाँ कर्मलीला झलकी तो इसने उसको मान लिया मैं । तब यहाँ जिस प्रकार के भावों को करता है, बस यह जीव इन भावों का करने वाला है, पुद्गल कर्म करने वाला नहीं ।

632―अपने आपकी आस्था के अनुकूल अपनी चेष्टायें―जैसे आपने यहाँ बैठे-बैठे कोई ध्यान किया, ख्याल आ गया, अजायबघर कहीं देखा था तो एक बहुत मोटे दो मुँह वाले सांप की याद आ गई, वहाँ देख आये थे, और उसका बहुत याद आया उसमें एकाग्र मन लगा लिया तो उस साँप के ध्यान में जो लग गया जीव तो ऐसा लग गया कि वह अपने को साँप रूप अनुभव कर रहा, मैं मनुष्य हूँ ऐसी सुध भूल गया, एक ही तरफ ऐसा चित्त रहा कि मैं मनुष्य हूँ यह भी भूल गया, ऐसे ही जब यह जीव उस कर्म विपाक की झलक लेता है, अज्ञानवश ऐसा लगता है कि बस यही मैं हूँ । मैं चेतन हूँ यह भी भूल जाता है, मैं सहज चैतन्यस्वभाव मात्र हूँ, यह सुध तो रहती नहीं और बस यह ही जैसा कि क्रोध, मान, माया, लोभ अनुभव किया वही बन जाता । तब ही तो जिस व्यक्ति को क्रोध होता है, मायने क्रोध का अनुभव चलता है उस समय कोई यह कहे कि भाई तुम बड़ी गल्ती पर हो तो वह कभी मानने को तैयार नहीं हो सकता । वह तो कहता कि सारा जहान गलत है, जो समझा रहे, मैं तो बिल्कुल ठीक कर रहा हूँ । क्यों ऐसी बुद्धि हुई कि उसने उस कर्मरस में आपा अनुभव किया । मैं तो यह हूँ और जब कि कर्मलीला हुई, कर्म रस हुआ तो कर्म रस की ही बात सही जंचेगी । चेतन की, कल्याण की, हित की, शांति की बात उसे सही नहीं जच सकती । और ऐसे जीव तो कभी-कभी भगवान को भी सोचते होंगे कि ये परिवार नहीं बसाये हैं, इनके पास धन नहीं है, ये कुछ नहीं हैं, ये तो बेचारे हैं, चतुर तो मैं हूँ, पर थोड़ी यह भी मन में बात बसी है कि भगवान के हाथ जोड़े मिल जाता है कुछ और मिल भी रहा ही है पुण्योदय से तो वहाँ वह भी मानता है यह जीव कि चतुर तो मैं हूँ जो भगवान से मैंने काम निकाल लिया । भगवान में क्या रखा? भगवान तो भोला है । वह कहाँ चतुर, चतुर तो मैं हूँ । क्यों ऐसी बुद्धि जगती कि जो कर्म रस की झलक है उसमें इसने आपा मान लिया । मैं तो यह हूँ तो उसके अनुकूल चेष्टा हुई । जैसे जब यह चित्त में समा जाता कि मैं इसका पिता हूँ तो जब यह श्रद्धा बनायी आस्था बन गई, तब उस आस्था के अनुरूप चेष्टा होने लगेगी । कैसी चेष्टा? जिम्मेदारी अनुभव करना, अपने आप बोझ महसूस करना आदिक और और भी विकल्प, बस इस चेष्टा में लग जायेगा और जब तक यह यह अनुभव कर रहा था कि मैं तो बेटा हूँ उस समय की चेष्टायें उस प्रकार के ज्ञान के अनुकूल थीं खेलकूद रहे, कुछ फिकर नहीं, जिम्मेदारी कुछ नहीं, उस तरह की चेष्टा है । जैसा रूप ज्ञान में आता वैसी चेष्टा होने लगती है । जैसे किसी लड़की की जब तक शादी नहीं होती तब तक उसका हर बात का ढंग देख लो अटपट चलना, अटपट बोलना, अटपट ढंग से रहना और एक भाँवर पड़ी नहीं कि बस उसका सारा रंग ढंग बदल जाता है । उसकी चाल, उसकी बोली वाणी, उसका व्यवहार एकदम बदल जाता है । भला बताओ यह सब कला उसे एकदम किसने सिखा दिया? अरे सिखाया किसी ने नहीं, जो जीव अपने स्वरूप में जिस प्रकार की आस्था बनाता है उस प्रकार का उसमें प्रभाव पड़ता है । तो जीव में परिणमन शक्ति है और वह परिणमन शक्ति जब है तो जिस-जिस विपाक का उदय हुआ, उस उदयक्षण में जो प्रतिफलन हुआ, बस उसके अनुरूप ज्ञान विकल्प को तो यह करता है मगर यह न कर्म के बंध को करता है, न कर्म के उदय को करता है, न कर्म के सत्त्व को करता है । कर्म की किसी भी हालत को यह जीव नहीं करता । इसी प्रकार जीव के कैसे भी अशुभ भाव हों शुभ भाव हों, किसी भी हालत को कर्म नहीं करता ।

633―वस्तुस्वातंत्र्य और निमित्तनैमित्तिक योग के परिचय का प्रताप―यह निमित्त नैमित्तिक योग और वस्तुस्वातंत्र्य इन दोनों का सही परिचय कर लेने वाला ज्ञानी है, अन्यथा कभी कोई लोग इस डर के मारे कि कहीं यथा वस्तु का स्वातंत्र्य खतम न हो वस्तुस्वातंत्र्य मिट न जाये, इस भाव से निमित्तनैमित्तिक योग का विरोध करते, खंडन करते । यह है ही नहीं, इस हठ पर उतरते हैं तो यह है ज्ञान की कमजोरी । जो कोई पुरुष यह डर रखता है कि कहीं निमित्तनैमित्तिक योग ही न खतम हो जाये तो स्वातंत्र्य का खंडन करते हैं, विरोध करते हैं, यह भी उनकी कमजोरी है । ज्ञानी को तो इन विकार घटनाओं में स्पष्ट दिख रहा है कि निमित्तनैमित्तिक योग बिना ये विकार हो नहीं सकते, तिस पर भी निमित्त का करतब रंचमात्र भी नहीं है, इस उपादान में विकाररूप परिणमाने का । वस्तुस्वातंत्र्य और निमित्तनैमित्तिक योग इनका सही परिचय मोक्षमार्ग में प्रवेश कराता है, क्योंकि यह ही तो चाहिए कि इन विषय कषायों के भावों से तो हट जायें और चैतन्यस्वभाव में रम जायें । यह ही तो है ना आवश्यक ? तो भला यह बतलाओ कि इन विभावों से हट जाने के लिये कौनसा परिचय हमको प्रेरणा देता है । इतना तो हमने निश्चित कर लिया कि, ये रागद्वेष मोहादिक विभाव जीव के लिए अहितरूप हैं, इनसे हटना आवश्यक है, पर वह उपाय तो बताओ, वह परिचय तो कहो कि जिस परिचय द्वारा हम विभावों से हट जायें । वह परिचय यह निमित्तनैमित्तिक योग का परिचय है कि जिससे यह बोध होता यह विकार मैं नहीं । मैं तो ज्ञान के विकल्परूप ही परिणम रहा हूं । सो भी निमित्तनैमित्तिक योगवश मैं स्वयं क्रोध नहीं, मान नहीं, विषयकषाय नहीं, इच्छा नहीं । जितनी ये गड़बड़िया जीव की हो रही हैं, झलक रही हैं वे गड़बड़ी साक्षात् सीधे कर्म में पड़ी हैं । जैसे जितना रंग इस दर्पण में झलक रहा है उतना रंग साक्षात् सीधे सामने वाले कपड़े में पड़ा, ज्ञानी को यह बात स्पष्ट नजर आती है और इसी कारण वह अपने स्वभाव को अत्यंत विशुद्ध निरखता है, मैं शुद्ध हूं, विशुद्ध हूं । मेरे में विकार का क्या काम ? हो गया यह ज्ञान विकल्प, सो यह निमित्तनैमित्तिक योग का प्रभाव । मैं तो कष्टरहित, विकल्परहित, विकाररहित मात्र एक चैतन्यशक्ति हूँ । मैं जीव उतना ही हूँ जितना कि चैतन्यशक्ति से व्याप्त है, जिसका सार सर्वस्व चैतनय है, मात्र मैं उतना हूँ ।

634―जीव के सर्व भावों की ज्ञानपरिणामरूपता―सब जगह देख लो मेरा सर्वत्र ज्ञान ही सब कुछ है । यह जीव बड़ा सुखी है, इसका अर्थ क्या है? कहीं किसी ने सुख देखा है क्या? यदि देखा हो तो जरा मुझे भी कोई एक पाव सुख लाकर दे देवे? (हँसी) कहीं सुख नाम की कोई वस्तु है क्या ? क्या है वह सुख? सुख नाम उसका है कि जीव ने जो ऐसा विचार बनाया ज्ञान का ऐसा परिणमन किया कि यह बड़ा इष्ट है, मेरे को बड़ा हितकारी है, मेरा बड़ा महत्त्व बढ़ाने वाला है इत्यादि इस प्रकार का जो विचार बनाता और उस पर के कारण जिस तरह ज्ञान परिणमाया, उसमें जो अनुभव हुआ उसका नाम है सुख । सुख नाम की चीज कहीं अलग नहीं रखी है । दुःख भी क्या है? जीव ने जो विचार बनाया कि यह बड़ा अनिष्ट है, अहितकारी है, इससे तो मेरी बरबादी है, यह कब हट जाये, मुझको बड़ा कष्ट है या मेरे पास यह इष्ट न रह सका आदिक जो ज्ञान में विकल्प किया उस ज्ञान विकल्प को ही दुःख समझा । सब कुछ लीला ज्ञान की ही है, जिसको हम सुख कहते, दुःख कहते, पुण्य कहते, पाप कहते, मुक्त कहते, संसार कहते सब कुछ यह ज्ञान की ही लीला है, जब यह ज्ञान उल्टी लीला में चलता है, तब इस जीव को संसार में रुलना पड़ता है और जब यह ज्ञान सही सीधी चाल में चलता है तब यह जीव शुद्ध आनंद प्राप्त करता है, शुद्ध मार्ग को प्राप्त करता है । बस ज्ञान में ही तो कुछ करना है हमें । ज्ञान को हम किस तरह बनायें कि सुखी हो जायें और ज्ञान हम किस तरह का बनायें कि दुखी हो जायें? यह निर्णय करें । अगर तुम दुःखी हों तो अपराध आपका यह है कि आपने ज्ञान को बेढंगे रूप से परिणमा दिया और दूसरा कोई अपराध नहीं । न किसी पर द्रव्य का कुछ है, और जब कभी आप सुखी हैं तो उसका अर्थ है कि ज्ञान ने कल्पित मौज के माने जाने के ढंग से परिणमा दिया । अच्छा यह जीव मोक्षमार्ग में लगे इसका अर्थ क्या है कि इस जीव ने अपने ज्ञान को एकदम सबसे अलग होकर उपयोग में अपने आपके स्वरूप में मग्न होकर ज्ञान को बनाया । इसके मायने है कि यह मोक्षमार्ग में चल रहा । यह जीव संसार में घूम रहा, इसका अर्थ क्या? नाना विश्व को पर द्रव्य को यह मेरा है, भला है, यह ही सर्वस्व है ऐसा मार्ग बना डाला और अपने ज्ञान की सुध छोड़ दी और बाह्य पदार्थों में ही उपयोग को फंसा डाला, उसे ही मान डाला कि मैं यह हूँ, इस तरह उस बाह्य तत्त्व को मैं के रूप में जाना, ज्ञान का जो ऐसा परिणमन चलाया इसी के मायने है संसार में रुल रहा, संसार में कष्ट पा रहा । कष्ट और आराम ये दो ज्ञान को छोड़कर अन्य कोई चीज नहीं है, अगर कष्ट है, दुःख है तो बाहर में उपयोग छोड़ें, बाहर में किसी पर क्रोध न रखें, बाहर में किसी की तृष्णा न करें, एक अपने ज्ञान की दिशा मोड़ लें, बाह्य से विरक्त होकर अपने स्वरूप के उन्मुख हो जायें बस अशांति समाप्त और शांति से भेंट मिल जायेगी ।


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