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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 82

From जैनकोष



एकस्य सांतो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ ।

यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।।82।।

770―सांतत्व व सांतत्व के निषेध के विकल्प से अतीत चित्त्व का वर्णन―एक की दृष्टि में तो जीव सांत है, अंत सहित है और एक की दृष्टि में सांत है ऐसा नहीं है । ये दोनों पक्षपात हैं, किंतु तत्त्ववेदी दोनों से रहित होकर रहता है तो उसके लिए तो चित् चित् ही है । जीव अंतसहित है । यह व्यवहारनय ने दिखाया । असत्य बात नहीं कही जा रही । पर्यायार्थिक दृष्टि में पर्याय प्रति समय है । जीव जिस पर्याय में है उसी पर्यायमय ही तो है “परिणमदि जेण दव्वं तक्कालं तम्मयं ति पण्णतं” । धर्म से परिणति हुई तो धर्ममय है, राग से परिणत हुआ तो रागमय है, अशुभोपयोग से परिणत हुआ तो अशुभोपयोगमय है । जिस काल में जिस पर्याय से परिणमा, उससे द्रव्य तन्मय है, तो बिल्कुल भिन्न प्रदेश हों, पर्याय सहित नहीं हों, वे अपनी स्वतंत्र सत्ता रख रहे हों, द्रव्य अपनी स्वतंत्र सत्ता रख रहा हो ऐसा नही है । द्रव्य है उसकी ही एक ऐसी हालत है । तो पर्यायार्थिकनय से देखा कि जीव यह है । अब दूसरी पर्याय दिख रही तो कहा कि वह जीव मिट गया । ऐसी एक दृष्टि है इसी से क्षणिक एकांतवाद बना है । और कहते भी हैं कि आज हमारा कोई बड़ा मित्र है और कल के दिन कोई ऐसा योग बने कि वह विकट शत्रु बन जाए तो उसे कहते हैं कि देखो अब वह नहीं रहा । अरे कोई मरा थोड़े ही है मगर कहते हैं कि अब वह नहीं रहा । पहले कोई अगर बड़ा सदाचारी हो और पीछे वह हो जाए व्यसनी, दुराचारी, तो लोग कहते हैं कि अब तो उसकी चर्चा ही छोड़ दो, अब वह रहा ही नहीं । अरे रहा कैसे नहीं । अभी वह मरा तो नहीं, मगर उसकी परिणति को देख कर ऐसा कहा जाता । तो पर्याय को देखकर अगर कहा जाए तो कहेंगे कि वह अंतसहित है । मोक्षमार्ग में चलते-चलते जब वह मुक्त हो गया तो अब वह संसारी जीव न रहा । संसार अवस्था को देखकर नामी जीव माना जा रहा था अब वह नहीं रहा । कोई पहले बहुत बड़ा दोस्त हो और अब वह त्योरी बदल दे तो उसे कहते हैं कि अब वह कुछ नहीं रहा । अब तो वह और हो गया । एक दृष्टि ऐसी है जिसमें कहा जाता कि जीव सांत है, स्वभाव दृष्टि से देखें, अवस्था की दृष्टि से देखें, जीव सदा रहने वाला है । ऐसे दो नयों की दृष्टि में दो पक्ष हैं । मगर जो तत्त्ववेदी है याने जो स्वानुभव में आये उसे कहते हैं वेदी, समझदार । जैसे यहाँ बोलते ना कि जो आदमी बहुत बड़ी उमर का हो गया, जो सुख दुख बाल बच्चों का प्रबंध आदिक सब भुगत चुका तो उसे लोग कहते हैं कि समझदार तो यह है । भुगत चुका मायने अनुभव कर चुका ऐसे ही जो स्वानुभव भुगत चुका, बुद्धिमान तो वह है । भुगत चुका मायने अनुभव कर चुका । भुगत चुका यह शब्द तो लोग बुरा समझते हैं तत्त्ववेदी वह है जो स्वानुभूति पा सका । वह स्वभाव केवल बातों-बातों में नहीं जाना जाता है । तो यहाँ उस लक्षण को देखकर कह रहे कि यह जीव सांत है शुद्धनय से देखा तो सांत नहीं है । ऐसा एक चेतन में दो नयों के पक्ष हैं । जो तत्त्ववेदी है वह दोनों पक्षपात से रहित है । अत: वह पूर्ण समाधान रूप है । निश्चय से चित् चित् ही है । चिदस्मि कहते हैं ना? इस चिदस्मि शब्द में दो शब्द हैं चिद् और अस्मि । जिसका अर्थ है चित् मायने चेतन और अस्मि मायने हूँ याने मैं चेतन हूँ । देखिये मुझे मैं बोलना कम पसंद है और हूँ, ऐसा बोलने की आदत है । तो देखो इस हूँ में ही सब आ गया । इस हूँ के साथ मैं स्वयं आ गया । मैं के बिना हूँ नहीं आता । जैसे अंतस्तत्त्व देख-देखकर बोलते हो ॐ शुद्धं चिदस्मि याने मैं हूँ शुद्ध, चैतन्यरूप हूँ । तो तत्त्ववेदी की दृष्टि में चित् चित् ही है, अन्यरूप नहीं ।


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