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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 84

From जैनकोष



एकस्य वाच्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ ।

यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।।84।।

773―वाच्यता व अवाच्यता को जानकर विकल्प से अतिक्रांत होने में परम विश्राम―व्यवहारनय की दृष्टि में यह आत्मा वाच्य है अर्थात् वचन गोचर है । वचनों द्वारा इस आत्मतत्त्व की चर्चा हुआ करती है, और उन चर्चाओं से यह दूसरों को संबोधन करता है तो निश्चयनय की दृष्टि में आत्मा वाच्य नहीं है क्योंकि निश्चयनय अथवा शुद्धनय एक अनादि अनंत अहेतुक अखंड चैतन्य स्वभाव को विषय करता है और उसको उसी रूप में बता सकने वाला कोई भी शब्द नहीं है । अत; आत्मा अवाच्य है, इस तरह चेतन में दो नयों की दृष्टि में दोनों ही पक्षपात हैं । जो तत्त्ववेदी पुरुष है वह समस्त पक्षपातों से हटता हुआ है इसी कारण उसके ज्ञान में तो यह चेतन नित्य मात्र चैतन्यमात्र ही है । जितने शब्द होते हैं वे पदार्थों की विशेषता बताया करते हैं क्योंकि शब्द धातुओं से बनता है और धातुओं का अपना-अपना एक अर्थ है तो शब्द कोई एक विशेषता को कहता है । वह समग्र वस्तु को नहीं कहता तो भले ही कोई शब्द एक विशेषता को कहता है मगर जानने परखने वाला उस शब्द के द्वारा पदार्थ का ज्ञान कर लेता है । फिर व्यवहारनय से ये शब्द वस्तु के स्वरूप का प्रतिपादन करने वाले हुए । भले ही वहाँ एक ही विशेषता से जाने किंतु वे शब्द जितने हैं वे सब विशेषण रूप होते हैं । किसी पदार्थ का शुद्ध नाम रूप कोई शब्द नहीं हो सकता । जैसे एक आत्मा के बारे में किसी शब्द से बोलें तो उन शब्दों से पूर्ण अखंड आत्मा वाच्य न बनेगा । जैसे आत्मा ही कहा तो आत्मा का अर्थ है अतति सततं गच्छति इति आत्मा, जो निरंतर जाने उसे आत्मा कहते हैं । तो आत्मा की एक निरंतर जाननपन की विशेषता ही तो कही गई आत्मा शब्द में । इसके अतिरिक्त और भी विशेषतायें हैं वे शब्द में नहीं आयीं । जीव कहा तो जो प्राणों से जीवे सो जीव । एक विशेषता ही तो बतायी गई । इसी तरह जितने भी शब्द हैं वे पदार्थ की कोई न कोई विशेषता बताते हैं, व्यवहार नय उन विशेषताओं को कथन से वस्तु को दिखाता है किंतु निश्चयनय के मत में अखंड तत्त्व शब्दों द्वारा न आने के कारण वस्तु अवाच्य है । अब वस्तु वाच्य है इस ढंग से भी समझना चाहिये । वस्तु अवाच्य है इस ढंग से भी समझना चाहिये और सर्व कुछ समझकर उन सब पक्षों को छोड़ देना चाहिये, क्योंकि समझने का फल है परम विश्राम ।

774―मुक्ति का मार्ग आत्मपरमविश्राम―किसलिए जानन चेष्टा होती है? परम विश्राम के लिए । तो परम विश्राम पक्षपातों के त्याग में है । तो जो तत्त्ववेदी है वह समस्त पक्षपातों को छोड़ देता है । अब उसके चित्त में जब कुछ विकल्प ही न रहा, न व्यवहारनय का विकल्प न निश्चयनय का विकल्प । तो ऐसी अविकल्प भूमि में सहज परमात्मतत्त्व का अनुभव जग जायेगा । इस अनुभव के जगे बाद जब यह जीव विकल्पों में आता है तो वह सोचता है और दूसरों को बताता है कि चेतन तो निश्चय से चैतन्यमात्र ही है । इस प्रकार वाच्य अवाच्य के विकल्पों से छूटकर यह तत्त्ववेदी निज सहज ज्ञानमात्र निज अंतस्तत्त्व के अनुभव में आ रहा है । इस अनुभव में परम आनंद अमृत का पान होता है, जिसके कारण भव-भव में बाँधे हुए कर्म कटते हैं और मोक्षमार्ग में बढ़ता है, जिससे निकट काल में ही संसार के समस्त संकटों से मुक्ति पा लेगा ।


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