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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 153

From जैनकोष



वदणियमाणि धरंता सीलाणि तहा तवं च कुव्वंता ।

परमट्ठबाहिरा जे णिव्वाणं ते ण विंदंति ।।153।।

जो पुरुष परमार्थ आत्मस्वरूप की दृष्टि से जुदे हैं वे पुरुष व्रत और नियम को भी धारण करें, शील और तप की भी साधना करें, पर वे निर्वाण को नहीं जानते हैं, निर्वाण भी नहीं अनुभव सकते हैं । ज्ञान ही मोक्ष का कारण है ।

बंध के विपरीत भाव से बंध का अभाव―देखो एक पुद्गल और दूसरा पुद्गल परस्पर में बंधा हो, जैसे दो रस्सियों में परस्पर के गांठ लगा दी जाती है तो उसका मोक्ष तो गांठ खुलने की क्रिया से है । पर ऐसे आत्मा का तो किसी भी परपदार्थ के साथ बंधन नहीं । आत्मा का तो भावों का बंधन है । तो इसमें और क्या क्रियाएँ की जायें? आस्रव के द्वार को ही उल्टा कर लेने से बंधन मिट जाता है । जैसे दो रस्सियों में गांठ लगाते हैं तो जिस तरह से गांठ लगाई गई है उससे उल्टा गाँठ को खोलेंगे तो खुलेगी, याने उस गांठ को खोलने के लिए उल्टा हाथ चलाना पड़ता है । जैसे लगाया है गाँठ वैसे ही तो गांठ खुलेगी नहीं, उससे उल्टा विधि बनाओ तो गाँठ खुलेगी । इसी तरह जिस विधि से आत्मा का बंधन हुआ है उससे उल्टा बनो तो बंधन मिटता है ।

बंध का व बंधाभाव का कारण―भैया ! बंधन हुआ है अज्ञान से, पर में आकृष्ट होने से । तो बंधन मिटेगा पर का सच्चा ज्ञान करने से, आकर्षण खतम कर देने पर । ये सब काम ज्ञान द्वारा साध्य हैं इसलिए ज्ञान ही मोक्ष का कारण है । ज्ञान का अभाव होने पर स्वयं अज्ञानभूत हुए अज्ञानी जीव के शुभ कर्म भी खूब हो, भीतरी भावों से व्रत हो, नियम हो, शील हो, तपस्या हो, ऐसे शुभ काम भी हों तो भी मोक्ष नहीं होता है । जैसे बंदरों का दृष्टांत है कि जाड़ा मिटाने के लिए वे फूंस भी इकट्ठा कर लें उसमें लाल चीज जुगनू भी डाल दें, फूंक भी लगा दें और तापने के ढंग से भी बैठ जायें पर जाड़ा न मिटेगा । इसी तरह मोक्ष का कारण तो है ज्ञान, आत्मानुभव, ज्ञाता दृष्टा रहने की परिणति । ये तो हो नहीं और कितनी ही तपस्यायें करें, व्रत करें, नियम करें तो उससे मोक्ष की सिद्धि न हो जायेगी । ज्ञान ही मोक्ष का कारण है, बंध का कारण अज्ञान ही है । जैसे शरीर की चेष्टावों से मोक्ष नहीं होता इसी प्रकार शरीर की चेष्टा से कर्म का बंध या बंधाभाव भी नहीं होता ।

आत्मा के भाव के अनुसार सर्जन―भैया ! कर्मबंध भी भावों से होता है और मोक्ष भी भावों से होता है । कर्मबंध के योग्य भाव होने पर रहा नहीं जा सकता सो काय की चेष्टा करते हैं । मन, वचन की चेष्टा योग है । यह मन वचन की चेष्टा भावों के विकल्पों के अनुसार है और कभी इस तन, मन, वचन की क्रियावों के संयम करने से भावों का संयम भी संभव है, इस कारण काय की क्रियावों के रोकने का उपदेश दिया जाता है । बंध का कारण तो अज्ञान भाव ही है । किसी पुरुष में अज्ञान न हो, स्वयं ज्ञानभूत हो तो ऐसे ज्ञानी जीव के कदाचित् बाल व्रत नियम, शील, तप आदिक शुभकर्म न भी हों तो भी उसके मोक्ष का सद्भाव होता है ।

अव्यक्त साधना―प्रसिद्ध दृष्टांत है कि भरत चक्रवर्ती ने मुनि होने के बाद क्या तप किया था? अंतर्मुहूर्त के बाद ही उन्हें केवलज्ञान हो जाता है । पर इस साधना से पहिले उनके जीवनभर साधना रही है । घर में रहते हुए भी वे विरागी रहे । हजारों रानियों के बीच हास्य वचन व्यवहार करते हुए भी अंतर में परमात्मतत्त्व की भावना रही । बहुत सम्मान और दरबार के बड़े प्रसंगों में भी उन सबसे विरक्त रहे और इस शुद्ध परमात्मतत्त्व की भावना रही, इस कारण उनके धर्म की भावना तो आजीवन रही । बाद में मुनि व्रत धारण करके उस ही अंतर्मुहूर्त में केवल ज्ञानमय सिद्ध हो गए ।

क्या बनने का निर्णय―आप सोचो कि आपको क्या बनना है? निर्णय कर लो, कैसा बनने में आराम मिलेगा? चार-पांच हवेली वाले बन जायें तो आराम मिल जायेगा क्या? नहीं मिलेगा । पुत्र स्त्री वाले हो जायें तो आराम मिलेगा क्या? नहीं मिलेगा । दूसरों का वैभव देखकर जी ललचा जाता है कि ऐसा वैभव मेरे न हुआ । अरे जिनके पास वैभव है उनकी दशा तो देखो । वे चैन में हैं क्या? शांत हैं क्या ? तो खुद निर्णय कर लो कि आपको क्या बनना है? इस देश के बड़े नेता बन गए तो भी शांति न मिलेगी । शांति कहाँ मिलेगी सो बतलावो । शांति मिलेगी केवल रह जाने में । यह आत्मा तो सदा से जिस स्वरूप है उतना मात्र रह जाये इसमें शांति मिलेगी । ऐसा हुआ भी है कोई क्या? हाँ हुआ है । कौन हुआ । सिद्ध भगवान । वे केवल हैं । उनसे न शरीर का संबंध है, न वैभव का संबंध है न कोई परिग्रह है । केवल निर्दोष ज्ञानमात्र अपने में शुद्ध सहज परिणत हैं, यही उत्कृष्ट अवस्था है ।

निर्विकल्पता जैसी कुछ स्थिति से प्रभु के आनंद का ज्ञान―भैया ! आप कह सकते हैं कि सिद्ध भगवान का तो हमें पता ही नहीं है । वह है, कैसा है, कहाँ है, उनका तो पता नहीं है पर आपको अपना तो पता है । अपने आपको ही किसी समय ऐसा बनाकर रखो कि किसी भी पदार्थ का विकल्प नहीं है, किसी का संबंध नहीं है, किसी को मन में न रखो और अपने आपको केवल अनुभव करो, उस समय आपको जो आनंद होगा उससे अनुमान करलो कि सिद्ध प्रभु का, निर्दोष आत्मा का कितना अनंत आनंद है, कैसा शुद्ध विकास है? एक लक्ष्य होना चाहिए कि हम आपको बनना है क्या ? केवल बनना है । अगर केवल बनना है तो केवल का ज्ञान चाहिए, केवल का श्रद्धान चाहिए और केवल का आचरण चाहिए, तब केवल बन सकते हैं ।

सही श्रद्धा से ही सही काम―जैसे हम बात तो करें कुछ और काम करें कुछ तो उससे अपने पर प्रभाव नहीं रहता, न दूसरों पर रहता हे । जो उत्कृष्ट काम है उसको सच्चाई के साथ श्रद्धापूर्वक किया जाये तो उसमें फल मिलता है । जैसे घर के काम छोड़कर यहाँ मंदिर आते हैं 2 घंटे के लिए । मंदिर में आने का उद्देश्य है―आत्मस्मरण, आत्मचिंतन, आत्मा के उत्कृष्ट स्वरूप की स्मृति । जो शुद्ध आत्मा हुए हैं उनका ध्यान करें । सो ख्याल तो यहाँ न करें और मंदिर में बैठकर भी यहाँ वहाँ की चिंताएं लगाये रहें या कुछ लोगों से अपनी महत्ता लूटने का ढंग बनाएं तो दोनों ही तरफ से गए । अरे ये घर में होती तो अब तक लीपा-पोती का काम भी देख लेती, कुछ काम करा लेती, सो घर का काम छोड़कर मंदिर आये तो यहाँ भी कुछ नतीजा न निकाल पाते हैं, कष्ट करते हैं, पर सही श्रद्धा का काम करो तो उसका फल प्राप्त हो ।

समृद्धि अर्थात् शून्यता―क्या बनना है आपको? केवल । तो केवल का ज्ञान चाहिए । यह मैं आत्मा ज्ञानानंदस्वरूप सर्व से न्यारा अंत: प्रकाशमान हूँ । इसमें जो तरंग उठती है वह उसके स्वरूपदर्शन का बाधक है । दूसरा कोई पुरुष उसके स्वरूपदर्शन का बाधक नहीं है, किंतु यह ही जो पर का ख्याल है, उससे जो भाव उत्पन्न होते हैं ये भाव ही प्रभुदर्शन के बाधक हैं । कुछ तो लाइन क्लियर कर दो । अपने उपयोग को सूना कर दीजिए । क्लियर के मायने है सूना । साफ के मायने क्या है? सूना । कपड़ा साफ किया जाये, मायने इस कपड़े को सूना बना दो । इसके जो कुछ दूसरी चीज लगी है उससे शून्य कर दो । स्वच्छता कहो या शून्यता कहो एक बात है । इस कमरे को साफ कर दो, अर्थात् इस कमरे में जो न रखने लायक परतत्त्व हों उन्हें हटा दो, शून्य बना दो । रेलवे लाइन क्लियर है? हाँ क्लियर है, मायने लाइन पर अब कोई गाड़ी नहीं आ रही है । लाइन साफ है । साफ कहते हैं सूने को । तुम्हें साफ बनना है तो बन जावो, साफ बनने के लिए क्या चाहिए कि मेरे में मेरे स्वरूप के अतिरिक्त जो भाव तरंग हो गए हैं उन्हें हटा देना चाहिए । यही है अपनी स्वच्छता । ऐसा अनुभव हो उसको ही कहते हैं ज्ञान । और यह ज्ञान ही मोक्ष का कारण है ।

प्रभु की ढूंढ और मिलन का एक दृष्टांत―पुन: सोचिये कि मोक्ष का कारण क्या है? यह जो ज्ञानात्मक ध्रुव निज प्रभुता है, यह जो प्रतिभास हो रहा है यह तो मोक्ष का हेतु है । जैसे ये लड़के लोग छुपा छुपैया, टुका टुकैया खेलते हैं । एक को आंख मींचकर खड़ा कर दिया और दूसरे जो हैं वे कहीं छिप गये । अब आंख मींचने वाला लड़का व्यग्र होकर यहां वहाँ ढूँढता है । छुपे हुए लड़के को वह ऐसी जगह ढूंढ़ता है जहाँ घुस भी न पाये, छोटे-छोटे छेदों में देखता है कि यहाँ तो नहीं छुप गया । वह व्यग्र होकर ढूँढता है । ढूंढ़ते हुए में जब वह किसी बच्चे को देख लेता है तो वह उसे कितना हंसकर छूता है और जिसको छूता है वह भी हंस पड़ता है । दोनों के दोनों हंसते हैं ।

प्रभु की ढूंढ और मिलन―इसी तरह हमारे भगवान हमारी आंखें मीचे में हमारे ही अंदर कहीं छुपकर विराजे हैं, हम उन्हें ढूँढने के लिए व्यग्र हो रहे हैं । और ऐसे व्यग्र हो रहे हैं कि जहाँ संभावना भी नहीं है ऐसी जगह ढूंढ़ते फिरते हैं । मिल जाये तो कहीं । बड़े व्यग्र होकर ढूँढ़ते हैं मंदिर में, शास्त्रों में, गुरुवों में ढूंढ़ते हैं, पर भगवान तो आनंद का नाम है । सो उस भगवान को दाल में, रोटी में, विषयों में, दुकान में सब जगह ढूँढ़ते फिरते हैं, यदि कहीं भगवान निकट में आ जाये पता पड़ जाये कि लो यह है भगवान छिपे, तो देखने वाला भी प्रसन्न होगा और वह भगवान भी प्रसन्न हो जायेगा । देखने वाला तो प्रसन्न होगा ही, क्योंकि निर्मल बना और भगवान भी जो अनादिकाल से दु:खी बैठे थे छुपे हुए तो उनका भी तो उद्धार होता है । जब हम अपने उपयोग से भगवान को दृष्टि में लेते हैं तो भगवान का ही तो उद्धार होता है । तो भगवान भी प्रसन्न हो जाता है । तो अब इन सबमें आँख मिचौनी हो रही है, पर जिसके लिए आँख मिचौनी का खेल बना है उसे ढूँढ़ा, पर अब तक नहीं पाया है । व्यग्र होता हुआ यत्र-तत्र ढूंढ़ रहा है । तो ज्ञानात्मक यह ध्रुव अचल आत्मतत्त्व यह है भगवान । तो यह मोक्ष का कारण है ।

प्रभु को छुए बिना उपयोग पर धैया का भार―और भी देखो भैया ! वह बच्चा जिस पर धाई चढ़ी । जो कसूर वाला माना जाता है कि आंखें मोचता ही रहेगा जब तक पता न पाड़ ले तो धैया चढ़ी ही है । तब तक उस पर धैया चढ़ी रहेगी जब तक कि वह अन्य बच्चे को देख न ले, छू न ले । और जब देख लिया बच्चे को तो उस पर धैया का बोझा उतर जाता है । इसी प्रकार जब तक प्रभु को नहीं देख लेता यह उपयोग बालक तब तक इस पर धैया चढ़ी रहेगी । और जहाँ आत्मा को हेर (देख) लिया तो उस पर से धैया उतर जायेगी । देख लिया, ढूंढ़ लिया, हमारी शरण हमारा परम पिता, हमारा सर्वस्व कहाँ जा छिपा हुआ है? इस गुप्त स्वरूप में । गुप्त पद्धति से गुप्त मिलन होता है । ऐसे प्रभु से मिलते समय बड़ा अनोखा समा बांधता है ।

चैतन्य प्रभु और उपयोग भक्त का अपूर्व मिलन―रामलीला होने के बाद जब भरत राम मिलने का दिन होता है तो लोगों के दिल को देखा होगा, कैसी उत्सुकता से उस स्थान को तकते हैं । यह है प्रभु का और भक्त का अनोखा मिलन । इस अनोखे मिलन का कितना महान समा बनेगा, उसकी कथनी कौन कर सकता है? हम आप जितने भी संकटों में पड़े हैं इस प्रभु से विमुख होने के कारण संकटों में पड़े हैं । अन्यथा संकटों का तो कोई नाम निशान ही नहीं है । यों देख लो । यह है मोक्ष का हेतु और मोक्ष का हेतु ही नहीं, स्वयं ही यह मोक्ष तत्त्व है । इसके अंदर जो कुछ भी तरंगें हैं वे सब बंध के ही कारण हैं । इस कारण अपने आपको जितना देखोगे, अपने आपको जितना ज्ञानमात्र अनुभवन में लगावोगे उतना ही आप भगवान के निकट पहुंचेंगे । आत्मानुभव का सीधा उपाय है अपने को जाननमात्र अनुभव लेना । जैसे लोग अनुभवते हैं ना कि मैं बच्चों वाला हूँ, मैं लखपति हूँ, मैं बलवान हूँ, मैं पंडित हूँ, मैं साधु हूँ, मैं गृहस्थ हूँ इत्यादि रूप से अपने को अनुभवते हैं ऐसा अनुभवन न होकर यह अनुभवन हो जाये कि मैं जाननमात्र जो प्रतिभास है, जो ज्ञान है बस यही मैं आत्मा हूँ, इसके अतिरिक्त और कुछ मैं नहीं हूँ । ऐसा अनुभवन में आए उसको ही कहते हैं आत्मानुभव, मोक्ष का हेतु । सो जितने भी बंध के हेतु हैं उन सबको टाल कर और शिव के हेतु की रुचि करो ।

भ्रम के कारण बंधन की विशेषता―यहाँ ज्ञान को तो मोक्ष का कारण बताया और अज्ञान को बंध का कारण बताया । जैसे कोई छोटा बालक हो और आगे कोई जाती हुई ऐसी महिला देखे कि उसे भ्रम हो जाये कि यह मेरी मां है तो वह उसके पीछे दौड़ेगा । बड़ी जल्दी जायेगा । आगे जाकर धोती पकड़कर खड़ा हो जायेगा । और जब उसकी शकल देखा, अरे यह तो मेरी मां नहीं है तो बंध टूट गया, इसे दु:खभरा विश्राम समझो या सुखभरा विश्राम समझो, ऐसे मिश्रित विश्राम से वह वहाँ से लौट गया, अब एक स्थान पर बैठ जायेगा । भ्रम हुआ तो बंधन था और भ्रम मिटा तो बंधन मिटा । भ्रम मिटने के मायने यथार्थ ज्ञान होना है । और बंधन छूटने के मायने मोक्ष होना है । तो मोक्ष तो होता है यथार्थ ज्ञान से, आत्मा के यथार्थस्वरूप के बोध से, पर जो राग-द्वेष होता है वह है बंधन और होता है वह अज्ञान से । ज्ञानमात्र आत्मा के अवगम से जो तरंग मिट जाया करती है यह है मोक्ष का स्वरूप । अब जो पुण्यकर्म के पक्षपाती हैं उन्हें समझाने के लिए आत्मतत्त्व के निकट उन्हें बिठाते हैं ।


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