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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 183

From जैनकोष



एदं तु अविवरीदं णाणं जइया दु होदि जीवस्स ।

तइया ण किंचि कुव्वदि भावं उवओगसुद्धप्पा ।।183।।

यथार्थज्ञान होने पर मिथ्या विकल्पों का अभाव―जीव के ऐसा सत्यार्थ ज्ञान जिस काल में होता है उस काल में केवल उपयोगस्वरूप यह शुद्ध आत्मा उपयोग के सिवाय अन्य कुछ भी भावों को नहीं करता है । यह ज्ञानमात्र आत्मा है । वह ज्ञान के सिवाय और कहाँ रहेगा? पर पदार्थ खुद के अपने असाधारण स्वरूप में ही रहते हैं ।

आकाश का अन्य द्रव्य के साथ आधार-आधेयपने का प्रभाव―जैसे पूछा जाये कि बतलाओ आकाश कहाँ रहता है? चौकी कहा रहती है? बतलाओ । आकाश कहाँ रहता है? उत्तर दो । आकाश अपने प्रदेशों में रहता है तो जैसे एक इस आकाश को अपनी बुद्धि में रखकर जब आधार-आधेय भाव सोचा जाता है तो शेष जो अन्य द्रव्य हैं उनका अधिरोपण तो हो नहीं सकता । क्या ऐसा कहा जा सकेगा कि आकाश जीव में रहता है, आकाश पुर-गल आदिक द्रव्यों में रहता है, ऐसा अधिरोपण नहीं हो सकता है । जैसे कहीं वृक्षों का अधिरोपण कर दिया कि यहाँ लगाना है, इसी तरह आकाश को यह नहीं कहा जा सका कि किस जगह लगाना है । बुद्धि में भिन्न अधिकरण न आ सकेगा ।

सभी द्रव्यों का परस्पर आधार-आधेय भाव का अभाव―आकाश आधेय हो, अन्य द्रव्य आधार हों, ऐसा नहीं हो सकता । जब भिन्न आधार नहीं बन सकता तो एक आकाश को एक ही प्रदेश में रहने वाले द्रव्यों में भी परस्पर आधार और आधेय भाव नही झलक सकता । कोई भी द्रव्य किसी अन्य द्रव्य में नहीं रहता । यद्यपि इस आकाश में हम जीवादिक बहुत से द्रव्य रह रहे हैं फिर भी हम आकाश में नहीं रह रहे हैं । आप हम सब जीव आकाश में नहीं रहते । कहां रहते हैं? अपने प्रदेशों में रहते हैं । ये आकाश को छोड़कर क्या अन्यत्र रहते हैं? इससे हमें क्या मतलब? आकाश पड़ा है दुनियाभर में पड़ा रहे, पर मैं आकाश में नहीं रहता । मैं अपने प्रदेशों में ही रहता हूँ । प्रत्येक पदार्थ अपने ही प्रदेश में रहते हैं ।

ज्ञान का ज्ञान में ही आधार-आधेय भाव―एक ही ज्ञान को जिस काल में अपनी बुद्धि में रखकर आधार-आधेय भाव लिया जायेगा तो शेष द्रव्यांतरों का अधिरोप रुक जायेगा । इसलिए कुछ बुद्धि में भिन्न आधार न मिलेगा । ज्ञान किसमें रहता है? ज्ञान, ज्ञान में रहता है । ज्ञान आत्मा में रहता है यह भी सिद्ध है पर और सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो ज्ञान, ज्ञान में रहता है । और इससे भी अधिक सूक्ष्म दृष्टि में जाओ तो यह कहा जायेगा कि आपको ऐसा प्रश्न ही न करना चाहिए कि ज्ञान कहां रहता है । ज्ञान में ज्ञान है । उसमें षट्कारक की बात लगाना भी व्यवहार है । यद्यपि वह परमार्थ निर्देशक व्यवहार है लेकिन व्यवहार ही तो है । इसका कारण यह है कि भिन्न षट्कारकों के परिचय वाले मनुष्य के समझने के लिए अभिन्नषट्कारक का उपाय बताया है । तो ज्ञान का कोई भिन्न अध्ययन न मिलेगा । जब कोई भिन्न अध्ययन नहीं मिलता तो एक ही ज्ञान में ज्ञानस्वरूप में प्रतिष्ठित करने वाला ज्ञान है । वहाँ अन्य आधार और आधेय प्रतिभास नहीं होता ।

ज्ञानानुभूति द्वारा आत्मानुभवपूर्वक भेदविज्ञान―भैया ! आत्मा भी नहीं दिखता, अर्थात् अनंत गुणपर्याय से पिंडरूप से आत्मा नहीं दिखता । वह आत्मा केवल ज्ञानमात्र अनुभव में आता है और अनुभव में आया हुआ ऐसा ज्ञानमात्र भाव ही आत्मा है । आत्मा का अनुभव ज्ञानभाव के अनुभव से होता है । आत्मा की दशाएँ देखने से आत्मा का अनुभव नहीं होता । किंतु ज्ञानमात्र ज्योति सामान्य अनुभव में आने पर ही आत्मा का अनुभव होता है । इसलिए ज्ञान में ज्ञान है । ज्ञान में अन्य कुछ नहीं है और ज्ञान अन्य किसी में नहीं है । क्रोध में क्रोध ही है, क्रोध में अन्य कुछ नहीं है, और क्रोध अन्य किसी में नहीं है । ऐसा भेदविज्ञान इस सम्यग्दृष्टि के प्रतिष्ठित होता है । यह भेदविज्ञान परमार्थ शरण है, रक्षक है । इस भेदविज्ञान के प्रताप से ही जीव संसार के संकटों से मुक्त होता है।

अज्ञानभाव की विदीर्णता के लिये परिणाम―भैया ! धन, समाज समागम, वैभव, राजपाट ये किसी काम न आयेंगे । ये मोह की नींद में थोड़े दिनों का स्वप्न है पर यह आत्मज्ञान यह भेदविज्ञान प्रकट तो हो जाये, एक बार संसार से दिल फट तो जाये फिर उसका उत्थान उद्धार सुनिश्चित है । हे सत्पुरुषों ! इस भेदविज्ञान को प्राप्त करके रागादिक भावों से रहित एक शुद्ध ज्ञानघन का आश्रय करो, एक शुद्ध ज्ञानस्वरूप में ही रमकर आनंद पाओ । यह भेदविज्ञान किस प्रकार के परिचय से प्रकट होता है? चैतन्यस्वरूप का धारण करने वाला तो है ज्ञान और जड़रूपता का धारण करने वाला है रागादि कषाय । जहां कषाय और चैतन्यस्वरूप में भेद प्रतिभास नहीं होता उस अज्ञान दशा को निज स्वरूप के अनुभव के बल से विदीर्ण कर दो ।

अज्ञानरूप संधि का विदारण―भैया ! जहाँ ज्ञानानंद है वहाँ अज्ञानदशा नहीं ठहरती । जहाँ अज्ञान दशा है वहाँ ज्ञान की झलक नहीं होती । ये दोनों विपरीत परिणमन हैं । सो हे सत्पुरुषों ! अपने अंतर में बड़ी दारुण परख करो, अपने इस मिले हुए चैतन्यस्वरूप व कषाय भावों की संधि का घात कर दो । जैसे जमी हुई तो चीजों के बीच में किसी वस्तु को छिन्नभिन्न कर देते है अथवा किसी काठ पर बड़ी दारुणता से करौंती को चलाकर दो टुकड़े कर देते है इसी प्रकार चैतन्यस्वरूप और कषायभाव इन दोनों का जिस कुबुद्धि में एकीकरण होता है, इस भाव पर भेदविज्ञान की तीक्ष्ण धारा चलाओ । इससे ज्ञान का और राग का भेदविज्ञान प्रकट हो जायेगा । सो इस अज्ञानभाव से उन्मुख होकर अपने आनंद स्वरूप को प्राप्त करो ।

भेदविज्ञान का श्रेय―भैया ! जो पुरुष द्वितीय वस्तु से अलग हटा होता है वह ही इस आत्मीय आनंद को प्राप्त करता है । ज्ञान तो चैतन्यस्वरूप है और रागादिक चूँकि पुद्गल के विकार हैं अर्थात् पुद्गलकर्म के उदय के निमित्त से उत्पन्न हुए विकार हैं इसलिए जड़ है । ज्ञानी इन पुद्गलों को जड़रूप मानते हैं । सो जब भेदविज्ञान प्रकट होता है, रागादिकभावों से भिन्न अपने भावों के अभ्यास से प्रकट होता है । तब ऐसा लगता है कि अहो यह तो मैं ज्ञानमात्र ही हूँ । ज्ञान का स्वभाव तो जाननमात्र ही है, पर ज्ञान में जो रागादिक की आकुलता विकल्पजाल कलुषता प्रतिभास होती है वे सब पुद्गल के विकार हैं । यों ज्ञान और रागादिक के भेद का विज्ञान यह ज्ञानी जीव प्राप्त करता है । यह भेदविज्ञान सब विभाव भाव के मेंटने का कारण है और परम संवर भाव को प्राप्त कराता है । इसलिए हे संतपुरुषों ! इस भेदविज्ञान को पाकर रागादिक से रहित होकर शुद्ध ज्ञानमय आत्मा का आश्रय लेकर आनंद को प्राप्त करो ।

ज्ञानानंदमय आत्मदेव से ज्ञानभाव व आनंदभाव की उद्भूति―आनंद आत्मा के आश्रय से ही मिल सकता है, लेकिन सुख में भी जो जीव सुख का अनुभव करता है वह आत्मा की ओर झुककर ही सुख का अनुभव करता है । जिसे जब तृप्ति और संतोष होता है चाहे वह किसी भी भोग के प्रकरण में होता हो, संतोष लेने की पद्धति आत्मा में झुककर लेने की है । कोई पुरुष आंखें फाड़कर बाहरी पदार्थ में झुककर संतोष नहीं पाता । अनेक प्रसंगों में भी उसे यदि संतोष मिलता है तो अपने आपमें ही झुककर मिलता है । इस प्रकार यह भेदविज्ञान जब ज्ञान के विपरीतपने की कणिका को भी नहीं ग्रहण करता और अविचल ठहर जाता है । चूँकि शुद्धोपयोगमय आत्मस्वरूप की ही बात हुई ना, इस कारण ज्ञान, ज्ञानरूप होता हुआ फिर कुछ भी रागद्वेष मोहरूप परिणाम को नहीं रचता ।

जीव का मूलकार जानन―भैया ! इस जीव के जानने की आदत है । वह जाने बिना कभी रह ही नहीं सकता । निगोद पर्याय में हो तो वहाँ भी जानेगा, अन्य पर्यायों में हो तो वहाँ भी जानेगा । अरहंत और सिद्ध हो जाये तो वहाँ भी वह जानेगा । जानन आत्मा का स्वभाव है । जानना छूट नहीं सकता, पर यह जानना जानने के विपरीतपने को जाने तो संसार में रुलता है और यह जानना जानने के विपरीतपने की कणिका को भी ग्रहण न करे तो यह फिर रागद्वेषों की सृष्टि नहीं रचना । जो भी जीव दु:खी हुए वे अपने ही अपराध से दु:खी हुए ।

केवल का निरखन―भैया ! भेदविज्ञान से ही शुद्ध आत्मा की प्राप्ति होती है । तुम्हें अपने आपको अकेला शुद्ध निरखना है तो उसका उपाय केवल भेदविज्ञान से । केवल को निरखना है तो उसमें दो पुरुषार्थ होते हैं । पहिला तो मूल हुआ पदार्थों के यथार्थस्वरूप को जानकर पर से हटना फिर द्वितीय पुरुषार्थ होता है केवलज्ञान । मायने आत्मा के बल मायने अपनी शक्ति लगाना अर्थात् जो अपने आत्मा में ही अपनी ज्ञानात्मक शक्ति का प्रयोग करे वह शुद्ध आत्मा को प्राप्त कर सकता है । शुद्ध आत्मा को प्राप्त कर ले तो वहाँ रागद्वेषमोह का अभाव रूप संवर प्रकट होता है । यह संवरतत्त्व का अधिकार है । संवर की उपयोगिता और संवर के उपाय का इसमें वर्णन चल रहा है ।

आत्मा का शाश्वत हितु संवर―हमारा निजी शाश्वत साथी एक संवरतत्त्व है । आस्रव तो सदैव धोखा देने वाला है । बंध तो दुःखरूप दशा है । निर्जरा भी हमारा मित्र है । पर वह ऐसा उदासीन मित्र है कि वह आपका काम संभाल देगा पर सदा के लिए आपका साथ न निभायेगा । हम आप संकट में हों तब आपकी रक्षा कर देगा । जब आपको सुरक्षित कर दिया फिर आपका साथ न करेगा । जरूरत भी नहीं रहती मुक्ति के बाद निर्जरा की । एक संवरतत्त्व ऐसा है जो अब भी हमारा मित्र है, संकट से बचाने वाला है । संकटों से बचा करके फिर कभी हम पर संकट न आ सके ऐसा सदैव जागरूक रहता है । सिद्ध होने के पश्चात् भी यह संवरतत्त्व पहरेदार का काम करता रहता है, अनंतकाल तक फिर कोई प्रकार के कर्म नहीं आ सकते, ऐसा अद्भुत पराक्रम संवरतत्त्व का सदैव बना रहता है । वह संवरतत्त्व रागद्वेष मोह के अभावरूप है । शुद्ध आत्मा की उपलब्धि होने से रागद्वेष मोह के अभावरूप संवर तत्त्व प्रकट होता है । ग्रंथों के अध्ययन का फल संवर होना चाहिए । हम अध्ययन करते जायें और उसको हम अपनी शक्ति के अनुसार उतारें नहीं तो इसी बात पर सुआ बत्तीसी का बोल बना है ।

सुआरटन, चतुर अज्ञानी के रटन―भैया ! सुआ को खूब पढ़ा दिया कि नलनी पर बैठना नहीं और बैठ की जाना तो दाने नहीं चुगना । दाने चुगना तो उलटना नहीं और उलट भी जाना तो छोड़कर भाग जाना । उसे इस तरह से पक्का याद हो गया । जैसे हमारे अनेक भाइयों को पूजा एकदम याद है । इसी तरह उस सुआ ने सब याद कर लिया । एक दिन पिजड़ा खुला ही रह गया, मौका पाया झट पिंजड़े से भाग गया । खूब उछलता कूदता जहाँ शिकारी ने पक्षियों के फांसने के लिए षड़यंत्र रच रखा था, वहीं पर पहुंच गया । उस नलनी पर बैठा हुआ ही रटता जा रहा है कि नलनी पर बैठना नहीं । बैठ जाना तो दाने चुगना नहीं । दाने चुनना तो उलटना नहीं और उलट जाना तो पंजा छोड़कर भाग जाना । ऐसा ही पढ़ता हुआ तोता उस नलनी पर बैठ गया । ऐसा ही पाठ पढ़ता हुआ वह दाने चुगने लगा, ऐसा ही पाठ पढ़ता हुआ वह उलट गया पर पंजा नहीं छोड़ता है, कहीं गिर न जायें । सो पंजों से उसे दृढ़ पकड़े हुए यही पाठ वह रटता चला जा रहा है । इसी प्रकार यह अज्ञानी मोही जीव भी धर्म से पुण्य से सब सुख मिलता है―इस तृष्णा में आकर धर्म के कार्य करता है पर शुद्ध आत्मा के अनुभवरूप संवरतत्त्व को प्रकट नहीं करता है । तो इतना सब परिश्रम करने के बावजूद भी वह मोक्षमार्ग में नहीं आ पाता । हां, कुछ मंदकषाय होने से पुण्य बंधता है । तो जरा कुछ धन वैभव समागम इसे मिल जायेगा पर इससे आत्मा का पूरा क्या पड़ता है? आखिर इन सबको भी तो छोड़कर जाना ही पड़ेगा ।

भेदविज्ञान का अभिनंदन―यह आत्मा अपने ज्ञानद्वारा अपने आपके ज्ञान में ही ठहरे तो इसका उपकार हो सकता है । इस तरह संवर के परम उपायभूत भेदविज्ञान का उक्त तीन गाथाओं में अभिनंदन किया गया है । अभिनंदन कहते ही इसे है कि गुणानुवाद करते जाना और खुद में प्रसन्न होते जाना तथा जिस गुण का अनुवाद किया जा रहा है उस गुणरूप चलने का यत्न करना । सो ऐसा अभिनंदन ज्ञानी पुरुषों के द्वारा ही किया जा सकता है । इस प्रकरण में यह कहा जा रहा है कि भेदविज्ञान से शुद्ध आत्मा की प्राप्ति होती है। परपदार्थों से निज-निजस्वरूपास्तित्व की दृष्टि से यह विविक्त है । जो स्वयं सहज एतावन्मात्र है वह शुद्ध ही देखने में जाना जाता है और शुद्ध आत्मा के अवलंबन से ही रागद्वेष मोह का अभाव हो जाता है । रागद्वेष के मूलभूत मोह को अभाव का ही नाम सम्यक्त्वक्त्व है । अब प्रश्न किया जा रहा है कि भेदविज्ञान से ही शुद्ध आत्मा की प्राप्ति कैसे होती है?


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