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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 208

From जैनकोष



मज्झं परिग्गहो जदि तदो अहमजीवदं तु गच्छेज्ज ।

णादेव अहं जम्हा तम्हा ण परिग्गहो मज्झ ।।208।।

स्व से स्वामी की तन्मयता―यदि कोई अजीव पदार्थ मेरा परिग्रह बन जाये तो उसका अर्थ यह है कि मैं अजीव हो गया । जैसे पूछें कि चौकी का मालिक कौन है? तो चौकी का मालिक वह बतावो जिससे चौकी कभी अलग न होती हो । वह मालिक कैसा कि जिससे चीज अलग हो जाये । तो चौकी का ऐसा मालिक चौकी ही है । चौकी से चौकी जुदा नहीं हो सकती है । इसी तरह पूछा जाये कि बतलाओ आत्मा का मालिक कौन है? तो आत्मा का स्वामी आत्मा ही है, क्योंकि यह अलग नहीं हो सकता है । जो अलग हो जाये वह मालिक नहीं है । वह झूठ-मूठ की कल्पना से मालिक है । तो अजीव का स्वामी कौन होगा? अजीव का स्वामी जीव नहीं । क्योंकि जो जिसका स्वामी होता है वह उसमें तन्मय होता है । जैसे पुस्तक का स्वामी कौन? ऐसा स्वामी बताओ जिसके पास पुस्तक सदा रहती हो । कभी न छूटे । यदि पुस्तक का स्वामी मनुष्य को बताओ तो वह तो मनुष्य से छूट जायेगी । तो उसका स्वामी क्या अन्य कोई हो सकता है जो उससे कभी अलग न हो तो उस पुस्तक का मालिक पुस्तक ही है । परमाणु का मालिक परमाणु ही है, पुद्गल का मालिक पुद्गल ही है ।

स्वयं ही स्वयं का अधिकारी―यदि मैं इस परमाणु का, अजीव का स्वामी बन जाऊं तो मैं अजीव हो गया, क्योंकि जो जिसका स्वामी होता है वह उसमें तन्मय होता है । अच्छा मैं किसको ग्रहण करता हूँ? इस बात पर विचार करिये । मैं आत्मा हूँ अमूर्त, ज्ञानमय । तो ज्ञानमय यह अमूर्त आत्मा बाहर की किसी चीज को क्या ग्रहण कर सकता हूं? नहीं । किसी चीज को पकड़ भी नहीं सकता हूँ । ग्रहण करने के मायने हैं अपने स्वरूप में ले लेना । तो क्या आत्मा अपने स्वरूप में किसी बाहरी पदार्थ को ले सकता है, नहीं ले सकता है । हाथ को हाथ ग्रहण किए है, घड़ी को घड़ी ग्रहण किए है, जीव को जीव ग्रहण किए है । निश्चय से कोई पदार्थ कोई दूसरे पदार्थ को ग्रहण नहीं करता । पदार्थ उसको ही ग्रहण किए हुए है जो कभी उससे छूट नहीं सकता । तो यह आत्मा अपने आपको ग्रहण किए हुए है । किसी परपदार्थ को ग्रहण किए हुए नहीं है ।

पर के परिहार से आत्मसत्त्व की रक्षा―यदि मैं परपदार्थों को ग्रहण करने में लग जाऊं, अजीव को ग्रहण करने में लग जाऊं तो अवश्य ही वह अजीव पदार्थ मेरा स्व बने और मैं उस जीव पदार्थ का स्वामी बनूं, पर अजीव का जो स्वामी है वह अजीव ही है । सो अजीव का यदि मैं स्वामी बन गया तो मैं अजीव हो जाऊंगा । चूंकि अजीव नहीं हुआ मैं सो मैं ज्ञानमात्र हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ, मेरा मैं ही स्वामी हूँ, स्व हूं, अजीवपना न आने में तो ज्ञान ही रहेगा । इस ज्ञानमय भाव के कारण यह ज्ञानी जीव किसी भी परद्रव्य का ग्रहण नहीं करता है, सो मैं भी किसी परपदार्थ का ग्रहण करता हूँ । पूर्ण निश्चय से यह आत्मा के बहुत भीतरी मर्म की बात कही जा रही है । मैं किसी दूसरे पदार्थ को छू नहीं सकता हूँ, किसी दूसरे पदार्थ को कहीं ले नहीं जा सकता हूँ, मैं किसी अन्य पदार्थ का स्वामी ही नहीं हूँ । मैं तो उस पदार्थ का स्वामी हूँ जो कभी मेरे से छूटे नहीं । मेरे स्वरूप से मेरा चैतन्यस्वरूप छूटता नहीं । इस कारण मेरा चैतन्य स्व है और मेरा मैं स्वामी हूँ ।

भैया ! संसार के संकटों से मुक्ति पा लेना कोई प्रमाद में नहीं हो सकता । उसके लिए हमारी बड़ी तैयारी होनी चाहिए कि जगत के किसी भी द्रव्य से मुझमें कोई संबंध न दिखे, इसी बात को अब दुबारा कहते हैं कि―


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