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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 213

From जैनकोष



अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो णाणी य णेच्छदे पाणं ।

अपरिग्गहो दु पाणस्स जाणगो तेण सो होदि ।।213।।

ज्ञानी के पान में भी निष्परिग्रहता―इच्छारहित पुरुष अपरिग्रही है । ज्ञानी पान भी नहीं चाहता है । पीने की चीजें, दूध पीना, रस पीना, शरबत पीना, इस पान को भी वह ज्ञानी जीव नहीं चाहता । इसलिए ज्ञानी पान का अपरिग्रही है । वह तो पान का केवल ज्ञायक ही है । यह भी बड़ी कठिन बात है । खाना खाते हुए खाना से वियोगबुद्धि रखना, ज्ञायक रह जाना यह अज्ञानी को कठिन है, इसी प्रकार पानी आदि पीते हुए उससे वियोगबुद्धि रखे, मात्र ज्ञायक रहे, यह भी कठिन है ।

ज्ञानी के अज्ञानमय भाव का अभाव―इच्छा का नाम परिग्रह है । जिसके इच्छा नहीं है उसके परिग्रह नहीं है । इच्छा अज्ञानमय भाव है । अज्ञानमय भाव ज्ञानी के नहीं होता है । ज्ञानी के ज्ञानमय ही भाव होता है । ज्ञानी अपने ज्ञानमय भाव से पान को भी नहीं चाहता । चाहना स्वयं अज्ञानमय भाव है । ज्ञानमय भाव तो ज्ञान का परिणमन है । ज्ञान के स्वरूप को जानना यह ज्ञानमय भाव है और राग हो, द्वेष हो, चाहे हो, जो भाव स्वयं जाननहार नहीं है किंतु जाननहार के द्वारा भोगे जाने वाले हैं उन सब भावों को अज्ञानमयभाव कहते हैं । तो अज्ञानमय भाव ज्ञानी के नहीं है । वह पान को नहीं चाहता । अत: ज्ञानी के पान का भी परिग्रह नहीं है । ज्ञानमय एक ज्ञानमात्र होने से वह पान का ज्ञायक ही रहता है ।

ज्ञानी की विविक्तता―भैया ! यों चार गाथाएँ एक से विषय को बताने वाली निकली हैं, जिनका संकेत यह है कि लोक में पुण्य-पाप खान-पान इन चारों की प्रसिद्धि है । ज्ञानीपुरुष इन चारों को नहीं चाहता । न पुण्य चाहता, न पाप चाहता, न खाना चाहता, न पान चाहता । और ये चारों बातें तो उपलक्षणात्मक हैं । सभी पर और परभावों को यह ज्ञानी नहीं चाहता । मनुष्य तिर्यंच आदिक पर्यायें उत्पन्न होती हैं और उन पर्यायों में रहकर सर्व पर्यायों के रूप प्रवृत्ति करना पड़ता है किंतु अनुभव उसका यही रहता है कि मैं मनुष्य नहीं हूँ, तिर्यंच नहीं हूँ, मैं तो एक ज्ञानमात्र हूँ ।

ज्ञानी की सर्वत्र ज्ञायकता―पुरुष लिंग धारण करके भी यह ज्ञानी अंतर में श्रद्धा रखता है कि मैं पुरुष नहीं हूँ । स्त्री शरीर धारण करके भी उस शरीर में रहने वाला अंतरात्मा ज्ञानी यह अनुभव करता है कि मैं स्त्री नहीं हूँ । ज्ञानी पुरुष अपने आपको ज्ञानमयरूप से ही अनुभव करता है । अत: उनके इन सब बातों का परिग्रह नहीं होता, किंतु आत्मीय आनंद में तृप्त होकर खान पान आदि के संबंध में निष्परिग्रही रहता है । जैसे दर्पण में बिंब झलकता है इसी प्रकार ज्ञानी में वे आहार अशनादिक आहार के वस्तु वस्तुरूप में झलकते हैं । यह उनका ज्ञायक है पर रागरूप से ग्रहण करने वाला नहीं है । खाओ, पियो, इससे ही भला है, इससे ही मेरा पोषण है, यही मेरा सब कुछ है, इससे ही मेरा अस्तित्व है ऐसे रागरूप से आहार आदि का ग्रहण नहीं करता ।

ज्ञानी का आशय―ज्ञानी पुरुष में किसी भी प्रकार की बाह्य द्रव्यों में आकांक्षा, तृष्णा, मोह, इच्छा नहीं होती है । तब वह स्वाभाविक परमानंद में तृप्त होता है, इन सबका मात्र ज्ञायक रहता है । यह भी है इस रूप से, उनका जाननहार ही रहता है, रागरूप से लगाव नहीं करता है । जैसे कि चरणानुयोग के ग्रंथों में भी बताया है कि साधु पुरुष साधना के लिए आहार नहीं करते, शरीर साधने के लिए, आयु रखने के लिए नहीं किंतु ज्ञान के लिए, संयम के लिए, ध्यान के लिए आहार करते हैं । आहार ज्ञानी भी करते हैं मगर विवेक से करते हैं । वह ज्ञानी पुरुष तो अपनी आत्मसाधना के लिए जिंदा रहना चाहता है, जिंदा रहने के लिए जिंदा नहीं रहना चाहता है, ऐसा अंतर में अंतर आने के कारण ज्ञानी जीव निष्परिग्रही रहता है और उनका ज्ञायक ही रहता है ।


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