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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 228

From जैनकोष



आत्मा का स्वसमयपना और परसमयपना―समस्त जीव दो श्रेणियों में विभक्त हैं―स्वसमय और परसमय । स्वसमय में चतुर्थ गुणस्थानवर्ती जीव से लेकर सिद्ध पर्यन्त सब स्वसमय कहलाते हैं । और इसके अतिरिक्त नीचे के गुणस्थान वाले सब जीव परसमय कहलाते हैं । स्वसमय अर्थात् सम्यग्दृष्टि जीव अपने आत्मा का सहजस्वरूप पहिचान लेते हैं और उन्हें यह अनुभव हो जाता है कि यह स्वयं ज्ञानानन्दस्वरूप है, परिपूर्ण है । बाहर में कुछ करने को नहीं पड़ा है । इस श्रद्धा के बल से उन जीवों में इतना बल प्रकट होता है कि पदार्थों में कैसा ही परिणमन हो, उस परिणमन के कारण अपने में कोई शंका नहीं लाते हैं । सम्यग्दृष्टि जीव आठ गुणों सहित होता है सम्यग्दर्शन अष्ट अंगयुत होता है । जैसे मनुष्य के शरीर में आठ अंग हैं इसी प्रकार सम्यग्दर्शन भी 8 अंग वाला है । मनुष्य का कोई अंग निकल जाये, हाथ टूट जाये तो मनुष्य वह कार्य नहीं कर सकता जो अष्टांग पुरुष कर सकता है । मर तो नहीं जायेगा वह, पर उनमें कोई अंग ऐसा विकट कट जाये कि मर्म घाती हो तो मर भी जाये । इसी तरह इन 8 अंगों में कोई अंग सम्यग्दर्शन का कम हो जाये तो अष्टांग सम्यग्दर्शन का जो फल होता है वह फल इस अंगहीन सम्यक्त्व का नहीं होता है और कदाचित् वह अंग इस तरह से कटे कि सम्यग्दर्शन के मर्म का ही घात कर दे तो सम्यग्दर्शन नष्ट भी हो जाता है ।

सम्यग्दर्शन के अष्ट अङ्ग―सम्यग्दर्शन के 8 अङ्ग ये हैं―निःशंकित, नि:कांक्षित, निर्विचिकित्सित, अमूढ़दृष्टि, उपगूहन, वात्सल्य, स्थितिकरण और प्रभावना । इनका संक्षिप्त स्वरूप यह है कि जिनेन्द्रदेव के वचन में शंका न करना, अपने स्वरूप का संदेह न करना सो नि:शंकित अङ्ग है । भोगों की आकांक्षा न करना नि:कांक्षित अङ्ग है, धर्मी पुरुषों से ग्लानि न करना निर्विचिकित्सित अङ्ग है, मूढ़ता भरी बात में न बह जाना सो अमूढ़दृष्टि अङ्ग है, दूसरों के दोषों को अप्रसिद्ध करना उपगूहन अङ्ग है, धर्मी पुरुषों से निष्कपट प्रेम करना वात्सल्य अङ्ग है, धर्म से च्युत हो रहे धर्मी जनों को तन, मन, धन से सहारा लगाना सो स्थितिकरण अंग है और जगत में धर्म की प्रभावना करना सो प्रभावना अंग है ।

दृष्टान्त में देहाङ्ग की तुलना में प्रथम अङ्ग―देखो भैया ! शरीर के 8 अंगों में भी सम्यग्दर्शन के 8 अंगों की तरह कला बस रही है । जब मनुष्य चलता है, मानो एक दाहिना पैर आगे धरता है तो चलते हुए में निःशंक कदम रखता जाता है । कोई शंका भी वह आगे कदम रखने में करता है क्या? जब वह चलता है तो अपना कदम आगे बढ़ाने में कोई शंका तो नहीं करता? कहीं ऐसी शंका वह नहीं करता कि धरती न धंस जाये, मेरा पैर जमीन में न घुस जाये । वह तो निःशंक होकर शूरता के साथ अपना कदम आगे बढ़ाता है । शरीर के 8 अंगों में से दो पैर दो अंग है, दो हाथ दो अंग हैं और वक्षस्थल एक अंग है, पीठ एक अंग है और जिस पर बैठते हैं वह नितंब भी एक अंग है और सिर भी एक अंग है, ऐसे 8 अंग हैं । शरीर के आठ अंगों में भी सम्यग्दर्शन के अंगों जैसी कला भरी हुई है । जब यह मनुष्य चलता है तो अगला पैर निःशंक होकर रखता है । सम्यग्दर्शन में एक नि:शंकित अंग कहा है, तो मान लो कि जब दाहिना पैर रखते हैं तो वह पैर नि:शंकित अंग का प्रतिनिधि बन गया ।

द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ अङ्ग की तुलना―नि:कांक्षित अङ्ग में भोगों की आकांक्षा नहीं रहती है, उपेक्षा रहती है, हटाव रहता है तो जब दाहिना पैर रखा तो पिछले पैर की क्या हालत होती है? उपेक्षा कर देता है, हटा देता है, उस जमीन को देखता भी नहीं है, तो वह दूसरा पिछला पैर नि:कांक्षित अंग का प्रतिनिधि बन गया । तीसरा अंग होता है निर्विचिकित्सित अंग । ग्लानि न करना । मनुष्य टट्टी जाता है और बांये हाथ से शुद्धि करता है तिस पर भी किसी भी प्रकार की ग्लानि नहीं करता, यही हुआ निर्विकित्सित अंग । ऐसा यह बांया हाथ निर्विचिकित्सित अंग का प्रतिनिधित्व करता है । चौथा अंग है अमूढ़दृष्टि अंग । किसी गलत रास्ते में न बह जाना यही है अमूढ़दृष्टि । इसके बड़ा बल होता है और दृढ़ता के साथ वह अपनी बात पेश करता है, तो यह दाहिना हाथ भी बड़ी दृढ़ता के साथ टेबुल ठोककर अपनी बात पुष्ट करता है । कभी जोर से कहने का मौका आये, किसी बात को यथार्थ जताने का मौका आये तो बांया हाथ नहीं ठोका जाता है, दाहिना हाथ ही ठोका जाता है, यह दृढ़ता गलतफहमियों में नहीं है । यह दृढता से अंगुली मटकाकर कहता है । वस्तुस्वरूप ऐसा ही है तो यह दाहिना हाथ अमूढ़दृष्टि अंग का प्रतिनिधि बन गया ।

पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अङ्ग की तुलना―इसके बाद है उपगूहन अंग । दोषों को छिपाना । प्रत्येक पुरुष अपने नितंब छिपाते हैं । तौलिया पहिने हों, धोती पहिने हों तो भी छुपाते हैं तो इन नितंबों को छिपाने में वह छिपाना ही उपगूहन का प्रतिनिधि बन गया । इसके बाद का अंग है स्थितिकरण । स्थितिकरण वह कहलाता है कि धर्मात्माओं को स्थिर कर दे, मजबूत कर दे । इनका बोझ खुद उठा ले । तो ठीक है । पीठ ही ऐसी मजबूत है कि उस पर बोझा लाद लिया जाता है । लोग कहते हैं ना कि इस बोझ को पीठ पर लादकर ले जाइए । बड़ा बोझ पीठ पर ही लादा जा सकता है । यह पीठ इस स्थितिकरण अंग का प्रतिनिधि बन गई । इसके बाद है वात्सल्य अंग । वात्सल्य अंग में धर्मात्मा जनों पर निष्कपट प्रीति दर्शायी जाती है । इस वात्सल्य अंग का प्रतिनिधि बनता है हृदय । वात्सल्य हृदय ही करता है, प्रेम करने का कार्य हृदय ही निभाता है । इसके बाद है प्रभावना अंग । प्रभावना का काम सिर से होता है । सिर न हो सारा शरीर हो तो वह बेकार है । सिर न हो, तो प्रभावना का प्रतिनिधि क्या बनेगा? किसी मनुष्य पर प्रभाव पड़ता है तो मुख मुद्रा से और सिर की चेष्टाओं से पड़ता है । अभी कोई मनुष्य मुंह ढके हुए बैठा हो तो उसका डर नहीं लग सकता । कैसा ही बड़ा पुरुष हो उसका संकोच और लिहाज नहीं किया जा सकता । और

उघड़ा हुआ सिर हो तो उसका प्रभाव होता है । तो इस प्रभावना अंग का प्रतिनिधि सिर बन गया ।

शरीर के अंगों की तरह सम्यग्दर्शन के 8 अंग होते हैं । इन्हीं आठ अंगों का इस निर्जराधिकार में वर्णन चलेगा । ये अन्तिम 8 गाथाएँ हैं । निर्जराधिकार में इसमें एक गाथा में एक अङ्ग का वर्णन है । उनमें सर्वप्रथम नि:शंकित अंग का वर्णन किया जा रहा है ।

सम्माद्दिट्ठी जीवा णिस्संका होंति णिब्भया तेण ।

सत्तभयविप्पमुक्का जम्हा तम्हा दु णिस्संका ।।228।।

ज्ञानी की निर्भयता का कारण―सम्यग्दृष्टि जीव चूंकि तत्त्वज्ञानी है, अत: निःशंक होता है, इसी कारण से वह निर्भय है, अथवा जिस कारण सम्यग्दृष्टि पुरुष 7 भयों से विमुक्त होता है इस कारण उसे नि:शंक कहा गया है । सम्यग्दृष्टि जीव सदा काल ही समस्त कर्मफलों की अभिलाषा से रहित है । इसी कारण अत्यंत कर्मों से निरपेक्ष है और इसी कारण उनका आत्मा अत्यंत निःशंक दृढ़तम निर्विकल्प रहता है । ऐसा होता हुआ यह सम्यग्दृष्टि जीव अत्यंत निर्भय कहा जाता है । भय 7 प्रकार के होते हैं । इस लोक का भय, परलोक का भय, वेदना का भय, अरक्षा का भय, अगुप्ति का भय, मरण का भय और आकस्मिक भय । इन 7 भयों के बारे में क्रमश: वर्णन चलेगा ।

इहलोक भय

इहलोक भय के कुछ उदाहरण―प्रथम भय का नाम है लोकभय । ऐसा भय हो कि इस लोक में हमारी जिंदगी अच्छी तरह निभेगी या नहीं? क्या हाल होगा, अनेक वृद्ध पुरुषों को देखा जाता है कि उनकी कोई जान पूछ नहीं करता, लोग उनकी परवाह नहीं करते । जब जान लिया कि अब यह किसी काम का नहीं रहा तो उसकी परवाह करने वाला विरला ही सपूत होता है । वृद्धावस्था सबके ही आया करती है । वृद्धावस्था आने पर मेरा क्या हाल होगा, इस प्रकार का भय करना, यह लोकभय है । अथवा बड़ा विकट कानून बन रहा है । अभी जमींदारी मिटने का कानून लगा दिया था तो उससे कितने ही घरबार दु:खी हो गए । स्वर्ण का कंट्रोल कर दिया तो कितने ही दुकानदार उससे परेशान हो गए । मकान किराये का मामला भी विचित्र है । कभी ऐसा कानून बन जाये कि जिस मकान में जो रहता है वह किराये का 20 गुना दे दे या कुछ कर दे उसका ही है । ऐसा हो गया तो यह भी गया अथवा चारों ओर से आक्रमण की बात सुनाई दी जा रही है, क्या हाल होगा, इस प्रकार का भय करना यह सब लोक भय है । वर्तमान जिंदगी में जीवन संबंधी, आजीविका संबंधी भय करना लोकभय कहलाता है । यह भय सताता है पर्यायदृष्टि के जीवों को ।

लोक का व्युत्पत्तिपरक आध्यात्मिक भाव―सम्यग्दृष्टि पुरुष तो जानता है कि मेरा लोक मैं हूँ । मेरे से बाहर मेरा लोक नहीं है । जो देखा जाय उसका नाम लोक है । ‘देखने’ शब्द में कितनी ही धातुएँ हैं--देखना, तकना, अवलोकना, लुकना, लोकना, निरखना, निहारना आदि अनेक धातुएं हैं । ये दिखने में एक से शब्द हैं, पर इन सब शब्दों के जुदे-जुदे अर्थ हैं । मोटे रूप से एक बात कह देते हैं पर अर्थ जुदे-जुदे हैं । जैसे तकना । तकना वह कहलाता है जो जरा से पोल के अंदर से देखा जाये । बच्चे लोग खेला करते हैं तो वे तक्का-तक्का से देखते हैं, देख लिया खुश हो गये, इसे कहते हैं तकना । देखना क्या कहलाता है? चक्षुओं से देखना―देखना कहलाता है । निहारना क्या है? उसका मर्म सोचते हुए, उसके भीतर की परख करते हुए की स्थिति को देखना इसे निहारना कहते हैं । कहते हैं न कि क्या निहारते हो? बड़ी देर से देखना―इसका नाम निहारना है । लोकना क्या है ? किसी का पता न हो, स्वयं है, गुप्त होकर कुछ देखा जाये इसका नाम है लोकना । जो लोका जाये उसे लोक कहते हैं । उसे कोई नहीं जान सकता, उसे मैं ही जानता हूँ, ऐसा मेरे द्वारा मैं ही अवलोका जाता हूँ तो यह लोक मैं स्वयं ही हूँ ।

परमार्थ इहलोक की विशेषतायें―यह लोक शाश्वत है । मेरा लोक कभी नष्ट होने वाला नहीं है, सदा काल व्यक्त है अथवा सब जीवों में प्रकट है । इस विविक्त आत्मा के शुद्धस्वरूप को तत्त्वज्ञानी पुरुष स्वयं ही केवल देखता है, ऐसा चेतन लोक में यह अकेला ही अवलोकन करता हूँ । इस लोक में कहाँ से हानि है? क्या किसी भी प्रदेश में मेरा विनाश हो सकता है? मेरा क्या, जगत के किसी भी पदार्थ का कभी नाश नहीं हो सकता । परिणतियां बदलें, यह बात अलग है, मगर विनाश नहीं हो सकता है । यह लोक शाश्वत है, सदा काल व्यक्त है । इस लोक में यह आत्मा स्वयं ही एक अकेला अवलोकन करता है, अकेला अवलोका जाता है । इस लोक का कहीं से भी कुछ विनाश नहीं होता है । कैसा ही गड़बड़ कानून बन जावे, मेरा आत्मा शाश्वत है, यह सदा काल रहेगा ।

आनंदमय तत्त्व पर तृष्णा का आघात―भैया ! विचारों की तृष्णा की तो हद नहीं है । तृष्णावश जिस भी परिस्थिति में अपने को दु:खी माना करे तो यह उसकी कल्पना की बात है । परंतु है आत्मा अविनाशी व क्लेश से रहित । जिसकी जो परिस्थिति है तृष्णा लगी है तो उस परिस्थिति में वह संतोष नहीं करता । उससे आगे की बात सोचता है । अभी मेरे पास कम है, इतना और हो जाये तो ठीक है । सो इस तृष्णा में क्या होता है कि जो वर्तमान में सुख का साधन मिला है उसे ही सुख से नहीं भोग सकता । उस तृष्णा से भविष्य की बात तो हाथ नहीं और हाथ में आई बात का सुख नहीं, इसलिए सब एक से गरीब हैं । लखपति हो तो, करोड़पति हो तो, हजारपति हो तो और भिखारी हो तो जिसके तृष्णा है वही गरीब है । और जब तृष्णा न रहे, जो वर्तमान में पाये हुए समागम को आराम से भोगकर शांति और धर्म की प्रीति रखे, अमीरी तो उसे कहा जायेगा, पर जो जिस परिस्थिति में है वह अपनी परिस्थिति से आगे तृष्णावश कल्पनाएं दौड़ाता है और दु:खी होता है । तो तृष्णा रखने वाले सभी गरीब हो गए ।

तृष्णा की गरीबियों की समानता―वैसे शरीर का रोग कोई-सा भी हो, सहा नहीं जाता, उसमें जब छंटनी करने बैठते हैं तो कोई कहता है फोड़ा फुन्सी होने पर कि इससे तो बुखार हो जाने में अच्छा था । आराम से पड़े रहते, मगर यह फोड़ा तो असह्य वेदना कर रहा है । जब जिसके बुखार आता है और शरीर में बड़ी पीड़ा होती है तो वह सोचता है कि इससे तो अच्छा था कि कोई अंगुली टूट जाती या चाकू से छिल जाती, फोड़ा ही हो जाता उससे आराम से बैठा तो रहता । इस तरह से शरीर में जो रोग होता है वह तो असह्य लगते हैं और अन्य रोग सरल लगते हैं । तो अब बतलाओ कि कौन-सा रोग अच्छा है? रोग सब एक से हैं और सभी दुःख के कारण हैं । इसी तरह हजारपति हो, लखपति हो, अरबपति हो, जिसके तृष्णा रहती है वे सब दु:खी हैं । अरबपति क्या सोचता है कि मेरा सारा मकान यदि कूलर होता तब गर्मी में आनंद मिलता । गर्मी के दिनों में इतने में कहाँ सुख रखा है? करोड़पति उन अरबपतियों की हालत को देखकर तरसते हैं, सो वे भी चैन से नहीं रह पाते हैं । और कदाचित् धनाढ्य पुरुषों के सत्कार में, प्रशंसा में कुछ कमी हुई तो वहाँ पर भी अंधेरा मच जाता है । यह मोह की नींद का सारा खेल है । तत्त्व कहीं कुछ नहीं रखा है । तृष्णा जिसके लगी है, चाहे करोड़पति हो, चाहे लखपति हो, चाहे हजारपति हो, सभी दु:खी हैं । केवल मोह के स्वप्न में सारा गौरव माना जा रहा है ।

आत्मा की परिपूर्णता व निर्भयता―यह मैं लोक सर्वसंकटों से परे हूँ । ज्ञान, दर्शनशक्ति, आनंद आदि अनंतगुणों का पिंड हूँ । स्वत: परिपूर्ण हूँ, यह मैं पूर्ण हूँ । प्रभु परमात्मा हैं वह तो उभयथा पूर्ण है । प्रभु का स्वभाव और भाव दोनों पूर्ण हैं, हमारा स्वभाव पूर्ण है, मैं परिपूर्ण हूँ, अखंड हूँ, अविनाशी हूँ, अनंत गुणों का पिंड हूँ । इस मुझ पूर्ण में से जब जो पर्याय प्रकट होती है वह पर्याय परिपूर्ण ही प्रकट होती है । किसी भी समय की पर्याय अधूरी नहीं । प्रत्येक पर्याय अपने समय में परिपूर्ण ही प्रकट होती है । किसी भी समय की पर्याय अधूरी नहीं रहा करती । प्रत्येक पर्याय अपने में पूर्ण ही हुआ करती है, चाहे विभाव पर्याय हो, या स्वभाव पर्याय हो, कोई भी पर्याय यह प्रार्थना नहीं करती है कि जरा ठहर जाओ, मैं अधूरी ही बन पायी हूँ । प्रत्येक समय में जो परिणमन होता है वह परिणमन पूर्ण ही होता है । वस्तु का स्वरूप ही ऐसा है । मैं परिपूर्ण हूँ, प्रभु भी परिपूर्ण है । इस पूर्ण से पूर्ण ही प्रकट होता है । अधूरा कुछ नहीं प्रकट होता है और यह पूर्ण परिणमन प्रकट होकर दूसरे समय में विलीन हो जाता है । तो यह पूरा का पूरा विलीन हो गया, फिर भी यह मैं पूरा का पूरा हूँ, ऐसा परिपूर्ण अविनाशी अखंड मैं आत्मा हूँ । इस आत्मा में कहां से भय?

लोक का परमार्थ आधार―मेरा लोक मुझ से बाहर नहीं है । यदि मेरा लोक मुझ से बाहर होता तो बाहर के संयोग वियोग के कारण मेरे लोक में फर्क आ जाता । पर मेरा लोक तो मैं ही हूँ । दुनिया के लोग भी ऐसा कहते हैं, जब किसी का कोई मात्र सहारा मालिक या पिता या स्त्री कोई गुजर जाये तो दुनिया के लोग कहते हैं कि मेरी तो दुनिया लुट गयी । अरे तेरी दुनिया कैसे लुट गई, तेरी दुनिया तेरा निज आत्मा है और अपने को असह्य मान बैठा है यही दुनिया लुट गई । तो मेरी दुनिया मैं ही हूँ, मेरी दुनिया मुझ से बाहर नहीं है । वह तो एक अज्ञानी का कथन है । परमार्थ से तो जब तक अज्ञान है तब तक दुनिया लुटी हुई है और जब ज्ञान होता है तो उसकी दुनिया आबाद रहती है । पर्याय बुद्धि से संयोग अथवा वियोग से बरबादी और आबादी है । परपदार्थ के संयोग वियोग से मेरी दुनिया न आबाद होती है और न लुटती है ।

संसार लुटे-पिटों का समूह―भैया ! यह सब लुटे हुए पुरुषों का ही समूह है । इसी को ही संसार कहते हैं । लुटे हुए पुरुषों के समूह का नाम संसार है । कौन-सा ऐसा भाव है जो लुटा हुआ नहीं है? एकेंद्रिय जीव पेड़ पौधे, पशु पक्षी ये क्या लुटे हुए नहीं है? ये अपना ज्ञान दर्शन सब कैसा गँवा चुके हैं । एक जड़वत् खड़े हुए हैं । ये कीड़े मकोड़े ये अरहंत सिद्ध की तरह प्रभुता वाले जीव होकर कैसी निम्न स्थिति में आहार, भय, मैथुन, परिग्रह चारों संज्ञाओं के वश होकर लुटे हुए जीवन गुजार रहे हैं । इन पशु पक्षियों की बात देखो । इनका सब कुछ लुटा हुआ है, पराधीन हैं बेचारे । छोटे बालक भी उन्हें डंडे से पीट सकते हैं । अगर तेजी से वह पशु सांस ले-ले तो अपना स्थान छोड़ कर बाहर भग जाते हैं, ऐसे बालक भी उन्हें पीट लेते हैं । ऐसे बलवान पशुओं को भी यह बालक डंडे के वश किए हुए हैं । ये शेर हाथी आदि जिनके बल का बहुत बड़ा विस्तार है―एक दुर्बल मनुष्य भी अंकुश लेकर, बिजली का कोड़ा हाथ में लेकर वश में किए हुए है । जहाँ चाहे घुमाए । जहाँ चाहे उनसे काम कराये । कैसे लुटे हुए हैं ये पशु पक्षी? और मनुष्य भी क्या लुटा हुआ नहीं है? लुटा हुआ है । अपने स्वार्थ की वासना में आसक्त होकर स्वार्थभरी आशा को लिए हुए यत्र तत्र दौड़ रहा है । अपना जो अनंत आनंद है, अनंत ज्ञान है उसकी परवाह नहीं है । क्या ये लुटे हुए नहीं हैं? ये सब लुटे हुए हैं । लुटे हुए जीवों के समूह का नाम संसार है । यह जीव अज्ञान से ही लुट गया है । ज्ञान हुआ कि यह आबाद हो जाता है । मेरा लोक मैं हूँ । स्वयं परिपूर्ण हूँ, मेरा विनाश नहीं है, ऐसा ज्ञान सम्यग्दृष्टि जीव के होता है, इस कारण वह सदा निःशंक रहता है ।

परलोकभय

सम्यग्दृष्टि के परलोकभय का अभाव―सम्यग्दृष्टि जीव के परलोक का भी भय नहीं रहता । परलोक का भय तो मिथ्यादृष्टि को भी नहीं रहता, उसे क्या परवाह पड़ी है? कैसा होगा, क्या न होगा? जो वर्तमान मौज है उसका मौज लेता रहता है, परलोक का भय तो मिथ्यादृष्टि के लट्ठमार पद्धति से नहीं रहता है । कदाचित् सम्यग्दृष्टि को परलोक का भय रहता है । हमारा परलोक न बिगड़ जाये, अच्छा समागम आगे मिले । कदाचित ऐसी कल्पनाएं भी हो जाती हैं । पर यहाँ प्रकृत विवरण अंतरंग श्रद्धा के भय की ओर से कहा जा रहा है । चूँकि सम्यग्दृष्टि जानता है कि जैसे यह लोक भी मेरे आत्मतत्त्व से बाहर की चीज नहीं है इसी प्रकार परलोक भी मेरे आत्मतत्त्व से बाहर की चीज नहीं है । कहीं भी होऊंगा यह मैं ही तो होऊंगा । और यह मैं अपनी जानकारी बनाए रहूं तो कुछ संकट ही नहीं है । संकट तो अपने आपकी जानकारी जब नहीं रहती है तब आते हैं । चाहे किसी भी गति में यह जीव हो, देव भी क्यों न हो, इंद्र भी क्यों न हो, यदि उसे अपने आत्मा का परिचय नहीं है तो वह संकट में है । राग-द्वेष भरी बाह्य वृत्तियों में वह रहेगा तो संकट अज्ञान में होते हैं । ज्ञान में तो संकट नहीं है । जब-जब भी किसी जीव का संकट किया जा रहा हो, समझना चाहिए कि हम ज्ञानवृत्ति में नहीं हैं, अज्ञान की वृत्ति में लगे हैं ।

परलोकभय के अभाव का कारण―भैया ! परलोक अन्य कुछ नहीं है । यह ही शाश्वत एक सदा व्यक्त ज्ञायकस्वरूप यह मैं आत्मा ही इस लोक की भांति परलोक भी हूँ, ऐसा सम्यग्दृष्टि के बोध रहता है । परलोक का भी भय नहीं रहता । इस जीव पर संकट जन्म मरण का लगा है । यहाँ के पुण्योदय से प्राप्त कुछ वैभव में क्या आनंद मानें? यहाँ के ये सारे समागम मेरे से अत्यंत भिन्न हैं, उनकी ओर से मुझ में कुछ आता नहीं है । मैं ही उनको विषयभूत बनाकर अज्ञान से कल्पनाएँ किया करता हूँ और दुःखी रहा करता हूँ । मेरा यह लोक जो मेरे द्वारा लोका जा रहा है वह मेरे अवलोकन में रहे तो वहाँ भय की कुछ बात नहीं है ।

भयास्पद संसार―भयों के स्वरूप की ओर देखो तो यहाँ भयों का भयानक वन है । कैसे-कैसे भव इस संसारी जीव के साथ शुरू से लगे? सबसे निम्न भव निगोद का है । निगोद जीव दो प्रकार के होते हैं―एक सूक्ष्म निगोद और एक बादर निगोद । सूक्ष्म निगोद तो किसी भी वनस्पति के आधार नहीं हैं । यह आकाश में सर्वत्र लोकाकाश में व्यापक हैं । उन्हें अग्नि जला नहीं सकती, जल उन्हें गला नहीं सकता, हवा उन्हें उड़ा नहीं सकता, लाठी की ठोकर उनके लग नहीं सकती । तब क्या वे बड़े सुखी होंगे? आग जलाए नहीं, पानी गलाए नहीं, हवा उड़ाए नहीं, किसी का आघात हो नहीं सकता । ऐसे सूक्ष्म निगोद जीव हैं तो क्या वे सुखी हैं? वे एक सेकेंड में 23 बार जन्ममरण कर रहे हैं निरंतर, जब तक उनके निगोद भव है और जन्म मरण के दु:ख का क्या स्वरूप बताया जाये? जो मरता है सो जानता है, जो जन्मता है सो जानता है । जन्म अपना हो चुके बहुत वर्ष व्यतीत हो गए, सो खबर नहीं है कि जन्म के क्या कष्ट होते हैं और मरण अभी आया नहीं है, सो मरण के भी कष्टों का पता नहीं है । इस जीव ने अनंत जन्म-मरण किए हैं मगर इसका ऐसा कमजोर ज्ञान है कि पूर्व भव के जन्ममरण की तो कथा ही क्या है, इस जन्म की भी याद नहीं है कि कैसे पैदा हुए थे, कैसे कष्ट थे, और जन्म की बात छोड़ो―साल दो साल की उम्र की भी बातें याद नहीं हैं । जब हमारा छोटा बचपन था उस समय कैसी स्थिति में रहते थे, यह कुछ याद नहीं है । जन्म मरण का बड़ा कठिन दुःख होता है ।

निगोद जीवों का संक्षिप्त विवरण―सूक्ष्म निगोद सर्वत्र भरे हैं । जहाँ सिद्ध भगवान विराजे हैं उस जगह सूक्ष्म ही निगोद हैं, साधार निगोद नहीं हैं । बादर निगोद वनस्पतियों के आश्रय रहते हैं । जिन वनस्पतियों के आश्रय रहते हैं उनका नाम है सप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति । त्रस जीवों के शरीर में भी बादरनिगोद रहते हैं, पर बादरनिगोद जीव स्वयं वनस्पतिकायिक है । बादरनिगोद की जाति स्थावर में शामिल है । आलू अरवी वगैरह ये स्वयं प्रत्येकवनस्पति हैं । देखने में आने वाले आलू ये निगोद नहीं हैं, ये प्रत्येकवनस्पति हैं । जैसे कि अमरूद, केला आदि खाने वाली चीजें प्रत्येकवनस्पति हैं । इसी तरह आलू आदि भी प्रत्येकवनस्पति है, पर अंतर यह हो गया कि आलू आदि में साधारणवनस्पति का और निवास है जब कि अमरूद आदि में साधारणवनस्पति का निवास नहीं है ।

भक्ष्यफल की अभक्ष्यता―ये फल जो भक्ष्य हैं जब कोमल अवस्था में होते हैं जिनकी रेखा नहीं निकलती उस समय साधारण वनस्पति रहती है और जैसे ही ये ककड़ी आदि फल बढ़ जाते हैं तो उनमें जवानी होने के चिन्ह प्रकट होते हैं, तब साधारणवनस्पति अपना स्थान छोड़ देता है । फिर अप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति कहलाता है । पहिले वह नहीं खाने योग्य है और बाद में वह खाने योग्य हो जाता है । बहुत कोमल भिंडी, बहुत कोमल ककड़ी जो बड़ी छोटी-सी रहती है वह सप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति है । छोटे में कोई भी हो वह सप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति होती है, पर कितनी ही वनस्पतियाँ ऐसी हैं कि पहिले अप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति रही थीं, पर पश्चात् सप्रतिष्ठित प्रत्येक बन जाती है । ऐसी भी कुछ वनस्पतियां हैं । वे न खाने योग्य वनस्पतियाँ हैं । जो खाने योग्य हैं वे सब प्रारंभ में सप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति होती हैं और बढ़ जाने पर अप्रतिष्ठित प्रत्येक हो जाती हैं ।

प्रत्येक शरीरी स्थावरों की विचित्र दशा―निगोद भव से निकला तो स्थावर के भव में देख लो―निगोद जीव तो साधारणवनस्पति है और आलू आदिक साधारणवनस्पति सहित प्रत्येकवनस्पति हैं । स्थावर में चलिए―कैसे-कैसे पेड़, लक्कड़ से खड़े हैं, आकार प्रकार कैसा है? एक जगह खड़े हैं, कुछ बल नहीं दिखा सकते हैं । जिसने काटा सो काट लिया, छेदा सो छेद लिया । ऐसी उनकी शक्ति की हालत है । हवा की बात देखो । पहियों में टायरों में भर दिया, भरी है 1 वर्ष तक । वह हवा जीव ही तो है । उसे फूंकते हैं आग के सामने, तो हवा आग के पास पहुंचती है, या नाना विचित्र दशाएँ होती हैं, और स्वयं कैसा हवा का स्वरूप है, यह अनंत शक्ति का स्वामी होकर भी इसकी कैसी-कैसी परिस्थितियां होती हैं? जल बन गया, अब घड़े-घड़े में जलकाय भरा हुआ है । पृथ्वी पत्थर के रूप में, जमीन के रूप में, सोना चाँदी के रूप में, कैसे-कैसे ढंग से इसका जन्म होता है?

संसारी प्राणियों की दयनीय दशा―स्थावरों से निकला तो त्रस में दो इंद्रिय के भव देख लो―केंचुआ, जोक, शंख, कौड़ी, सीप, लट, सुरसुरी कैसे-कैसे भव मिले हैं? अब इन जीवों में सूक्ष्मता से सबमें हड्डियाँ होती हैं, पर केंचुआ कुचल जाये तो हड्डी का पता ही नहीं चलता है । कैसा सूक्ष्म रूप उन इंद्रियों का बन गया, कैसा शरीर बन गया, ऐसा गंदा भव यह हुआ करता है । तीन इंद्रिय जीव दो इंद्रिय से कुछ अच्छा है सम्हला हुआ, शरीर है, कुछ कठोर है, कुछ पैर निकल आए हैं, चल-फिर सकता है, कुछ विकास हुआ है जीव की शरीर रचना में, पर वे भी यत्र तत्र डोलते रहते हैं । खाने पीने की ही उनकी धुन रहती है । कुछ विवेक नहीं है, कुछ बुद्धिमानी की बात नहीं कर सकते हैं । चार इंद्रिय जीवों में देख लो भौंरा, मक्खी, मच्छर कैसी-कैसी परिस्थितियों के ये भव हैं जिनकी मनुष्य की दृष्टि में कुछ कीमत ही नहीं है । जिनके पैर बाँधकर लोग खेल से मन बहलाया करते हैं । भैया ! पंचेंद्रिय में देख लो कैसे-कैसे पशु पक्षी पड़े हैं? समुद्र में कैसे-कैसे ढंग के जीव हैं, ये सब कारणपरमात्मा हैं और इनकी ऐसी परिस्थिति है । कैसा मगर का शरीर, कैसा मच्छ का शरीर, गैंडा, हाथी आदि कैसे-कैसे विचित्र शरीर वाले हैं । अज्ञानी नारकी मनुष्य देव का भी भव मिला तो भी क्या । ये ऐसे भयानक भव हैं, पर उन भवों की बात सोचकर जिसे भव से निकलने का मार्ग नहीं मिला है, आत्मस्वरूप परिचय में नहीं आया ऐसे जीवों को उन भवों का बड़ा भय लगता है ।

सम्यग्दृष्टि की निर्भयता―सम्यग्दृष्टि जीव चूंकि आत्मस्वरूप का सम्यग्ज्ञान बनाए हुए है, वह जानता है कि यह स्वरूप तो इस स्वरूप मात्र है । उसे इसमें कोई भय नहीं मालूम होता है । भयरहित ही है, ऐसा ज्ञायकस्वरूप अनुभव में आए इनकी यह चर्चा है । और उनके लिए ही यह बात शोभास्पद होती है । जहाँ गए वहाँ यही तो आत्मा है, यही ज्ञानस्वरूप है । एक कोई बहुत बड़ा ऑफीसर हो और उसका कहीं तबादला होने को हो तो बड़े ऑफीसर को तबादले के समय तबादले का जैसा अनुभव भी नहीं होता है कि मेरा तबादला हो रहा है । नौकर यहाँ भी मिलते हैं और जहाँ जायेगा वहाँ भी नौकर तैयार हैं । उसके जाने में रेलगाड़ी का एक डिब्बा रिजर्व रहता है । नौकर-चाकर ही सब सामान रखें, कोयला धरें तो नौकर-चाकर, गाय भैंस की रक्षा करें तो नौकर-चाकर । उसको तबादले का क्या दुःख है? छोटा आदमी तबादले की बात सुने तो उसे बड़ा दुःख हो जाता है । वहाँ मकान मिलेगा कि न मिलेगा । पहिले अकेले जावें, जब दो चार महीने जम लें तब सबको लिवा ले जायेंगे । समर्थ ऑफीसर के तबादले में कोई संकट नहीं है । वह जानता है कि जैसे यहाँ हैं तैसे ही वहाँ पहुंचेंगे । जैसा यहाँ लोगों का सत्कार है तैसा वहाँ भी सत्कार है । तो ज्ञानी पुरुष जिसने अपने आपको केवल ज्ञानानंदमय तका है उसका भी तबादला हो, मरण हो तो उसको भय नहीं रहता है । वह जानता है कि यह मैं पूरा का पूरा तो अब यहाँ से जा रहा हूँ । ज्ञानमय स्वरूप पर दृष्टि हो और ऐसी दृष्टि रहते हुए कहीं अवस्थित हो, कहीं गति हो, उसे कोई क्लेश नहीं है, कोई भय नहीं है । भय का कारण परभव नहीं है । भय का कारण स्वरूपदृष्टि से चिग जाना है।

भय का मूल स्वरूपच्युति―भैया ! इस लोक में मरण भी नहीं हो रहा, रोग भी नहीं आ रहे, खाने पीने के संकट भी नहीं आ रहे और स्वरूप से चिगा हुआ है तो उसको वहीं संकट है । मरण को ही संकट नहीं कहते हैं । स्वरूप से चिगने की स्थिति को संकट कहते हैं । क्या मिलता-जुलता है परवस्तुओं से? पर कैसी खोटी बान पड़ी हुई है कि अपने स्वरूप के स्पर्श में कुछ भी क्षण नहीं गुजार पाता और बाह्य पदार्थों के उपयोग में दौड़ा-दौड़ा फिरता है । ऐसे स्वरूप से न चिगने का दृढ़ संकल्प लिए हुए इस ज्ञानी जीव के संबंध में कहा जा रहा है कि इसको परलोक का भय नहीं होता, किंतु निःशंक होकर सतत स्वयं सहजज्ञान का अनुभव करता है । यह सम्यग्दर्शन के निःशंकित अंग का वर्णन चल रहा है । किसी प्रकार की सम्यग्दृष्टि को शंका नहीं रहती ।

ज्ञानी का निःशंक निर्णय―जिनेंद्र भगवान के वचनों में शंका न करना, यह व्यवहार से नि:शंकित अंग है और अपने स्वरूप में शंका न करना, भय न मानना सो यह निश्चय से नि:शंकित अंग है । नि:शंकितता तभी रहती है जब किसी प्रकार का भय नहीं होता । आखिरी इसका निर्णय शुरू से ही परवस्तुओं में यों रहता है कि कुछ बिगड़ता है बिगड़े, कोई वियुक्त होता है हो, परपरिणति से मुझमें कुछ बिगाड़ नहीं होता । प्राथमिक अवस्था में यह ज्ञानी भले ही थोड़ी शंका करे, पर ऊपरी भय करने पर भी अंतर में इसके सुदृढ़ निर्भयता है । ज्ञानी गृहस्थ है, सम्यग्दृष्टि है, वह सारी व्यवस्था बनाता है और अपने गुजारे के योग्य वस्तुओं का संरक्षण भी करता जाता है पर ऐसी भी हालत में यदि कहीं निर्णय की जैसी बात आए तो वह यही निर्णय देता है कि पर में जो कुछ हो सो हो, उसकी परिणति से मैं अपना विनाश नहीं मान सकूंगा ।

ज्ञान की प्रियतमता के प्रसंग में धन और परिजन में प्रियता की छटनी―सबसे अधिक प्रिय आत्मा को ज्ञान होता है । अधिक प्रियपने का लक्षण यह है कि दो पदार्थों को सामने रखो और इन दोनों पदार्थों के बिगड़ने का, नाश किया जाने का कोई अवसर आ रहा हो तो उन दो में से किसको बचाएं? जिसको बचाएँ उसको समझो प्रिय है । जैसे धन और परिवार के लोग । यदि कोई डाकू आकर धन और परिवार दोनों पर हमला करते हैं तो यह परिवार को बचाने का यत्न करता है और धन की उपेक्षा करता है । मिट जाओ तो मिट जाओ धन, पर घरवालों की जान तो बचे । यदि ऐसा उद्यम करता है तो बतलाओ कि उसको अधिक प्रिय धन हुआ कि कुटुंब के लोग हुए । कुटुंबी जन अधिक प्रिय हुए ।

ज्ञान की प्रियतमता के प्रसंग में परिजन व स्वयं में प्रियता की छटनी―यदि कुटुंबीजनों पर और इस खुद पर कोई डाकू गुंडा हमला करें तो ऐसी स्थिति में प्रकृत्या वह अपनी जान बचाने का यत्न करता है । तो क्या कहा जायेगा कि कुटुंबी जन और खुद इन दोनों में प्रियतम कौन रहा? खुद का शरीर, खुद की जान ।

ज्ञान की प्रियतमता―जब ज्ञान की उपादेयता साधुता जीवन में आयेगी तो अब वह जंगल में अपनी समता की सिद्धि में लगा है । कोई शेर, स्यालनी या शत्रु साधु की जान लेने को आ रहा है तो उस समय दो प्रकार के प्राणों पर हमला है―द्रव्यप्राण और भावप्राण । एक तो शरीर की जान याने द्रव्यप्राण की जान का हमला हो रहा है और साथ ही उसमें विकल्प रहे, राग रहे, मोह रहे तो ज्ञानस्वरूप भावप्राण के नाश का भी मौका है । जहाँ दोनों प्राण जा रहे हैं ऐसे अवसर पर वह ज्ञानी संत भावप्राणों की रक्षा करेगा और द्रव्यप्राणों की उपेक्षा कर देगा । जान जाती है तो जाओ, पर अपनी ज्ञाननिधि का विनाश नहीं करता । क्योंकि ज्ञाननिधि का विनाश करके जान बचाने का यत्न किया और बचे या न बचे, पर उस यत्न के विकल्प में जन्म-मरण की परंपरा बढ़ना निश्चित है । और एक ज्ञाननिधि बनी रहे और मरण होता हो होने दो, जान जाती है तो जाने दो । अब तक तो अनंत बार जन्म किया है । ज्ञाननिधि बचा लिया तो जन्म-मरण की परंपरा ही खतम हो जायेगी, ऐसा जानकर वहाँ भी द्रव्यप्राणों की उपेक्षा करता है और भावप्राणों की, चेतन प्राणों की, समता परिणाम की रक्षा करता है । बताओ उन दोनों में कौन प्रिय रहा? चैतन्यप्राण, भावप्राण । वह भावप्राण है ज्ञान । अधिक प्रियतम ज्ञानस्वरूप ही रहा । जगत के कोई पदार्थ हमारे लिए हित में और प्रियतम हैं नहीं ।

परलोक का अर्थमर्म―ज्ञानी जीव का निसर्गत: ज्ञानस्वरूप की ओर झुकाव रहता है। यह मेरा परलोक है, अथवा परलोक मायने उत्कृष्ट लोक। पर मायने उत्कृष्ट के भी है। मेरा उत्कृष्ट लोक यह चैतन्य है। पहले चिट्ठियों में लिखा जाता था कि अमुक लाल का परलोक हो गया। परलोक के मायने दूसरे लोक में चला गया―यह मूल में भाव न था, क्योंकि दूसरे लोक में चला गया, इसमें क्या प्रशंसा हुई? यों तो सभी जीव मरकर दूसरे लोक में जाते हैं। परलोक का अर्थ है उत्कृष्ट लोक । अब वे उत्कृष्ट लोक में चले गए । परलोक शब्द की बड़ी ऊंची व्याख्या है । यह परलोक स्वर्गलोक से भी बड़ा है, स्वर्ग उत्कृष्ट नहीं है, परलोक उससे भी उत्कृष्ट हो सकता है । तो परलोक लिखने की पहिले प्रथा थी । स्वर्गलोक लिखने की प्रथा पहिले नहीं थी । जिन्हें पता होगा पुरानी चिट्टियों का वे जानते होंगे । तो परलोक मेरा क्या है? यह ज्ञान स्वरूप, यह मैं स्वयं ही परलोक हूँ, उत्कृष्ट लोक हूँ । इस मुझ परलोक में किसी भी परपदार्थ से कुछ बाधा नहीं आती । हम ही स्वरूप से चिग जाते और अपने आपमें बाधा उत्पन्न कर डालते हैं ।

ज्ञानामृत के अनुभव का भाजन―निज-निज स्वरूपास्तित्व के दृढ़ किले में अवस्थित पदार्थों को निरखने वाले सम्यग्दृष्टि पुरुष इहलोक का भी भय नहीं करते और परलोक का भी भय नहीं करते । वे तो निःशंक होते हुए सतत स्वयं सहज ज्ञानस्वरूप का ही अनुभव करते हैं । यह ज्ञान ही तो अमृत है । जो न मरे सो अमृत । न मृतं इति अमृतं । ऐसा कौन है जो न मरे? वह आत्मा का सहज ज्ञानस्वरूप है । इसका कभी विनाश नहीं होता । सो ज्ञानी पुरुष इहलोक और परलोक के भय नहीं करता और सतत इस ज्ञान का पान किया करता है । जिन्हें अपने आत्मा का अनुभव करने का यत्न करना हो सीधा यह यत्न करना चाहिए, अपने आपके बारे में अपने को यों निरखना चाहिए कि यह ज्ञानमात्र है । अन्य-अन्यरूप में इसे न निरखो किंतु जाननस्वरूप, ज्ञान का जो स्वरूप है उसे अपनी दृष्टि में लो और वही-वही स्वरूप ही नजर में, अनुभव में लाने का यत्न करो, और कुछ बात सोचो तो केवल ज्ञप्ति स्वरूप के द्वार से इसे ज्ञानानुभव होगा । और जो शुद्ध ज्ञान का अनुभव है शुद्ध अर्थात् केवल मात्र जानन का अनुभव है वही आत्मा का अनुभव है । ज्ञानानुभव के द्वार से ही आत्मा का अनुभव हो सकता है । यह ज्ञान निःशंक सतत इस सहज ज्ञान का अनुभव करता है और दोनों लोकों के भय से दूर रहता है ।

वेदना भय

वेदनाभय के निषेध के प्रसंग में वेदना शब्द की निरुक्ति―आज के प्रकरण में यह बताया जा रहा है कि सम्यग्दृष्टि जीव को वेदना का भय नहीं रहता । अज्ञानी जन इस शरीर को अपना सर्वस्व मानते हैं । इस शरीर में थोड़ा बुखार आदि हरकत होने पर शरीर के अनन्यत्व भाव के कारण अपने में पीड़ा का अनुभव करते हैं । जैसे-जैसे शरीर में अहंबुद्धि ममबुद्धि तथा संबंध बुद्धि छूट जाती है वैसे ही वैसे जीव की शरीर की अवस्थाओं के कारण पीड़ा उत्पन्न नहीं होती । सुकुमार, सुकौशल, गजकुमार इत्यादि अनेक ऋषियों ने अनेक उपद्रव सहे, पर उन उपद्रवों के बीच उनके शरीर के प्रति अहंबुद्धि न थी इस कारण उन्होंने पीड़ा अनुभव न की । यह सामान्यतया सम्यक᳭दृष्टि जीव का विचार चल रहा है । वह जानता है कि वेदना तो यह ही एक मात्र है जो निश्चल ज्ञानस्वरूप स्वयं वेदा जाता है । वेदना कहते हैं जो वेदा जाये । तो जानने में परमार्थत: ज्ञानस्वरूप ही आता है ।

वस्तु की स्वतंत्रता―भैया ! जानना ज्ञानगुण का काम है, और ज्ञान की क्रिया ज्ञानगुण को छोड़कर अन्य वस्तु पर नहीं लगती है । ज्ञान जो कुछ करेगा वह ज्ञान का ही करेगा, परवस्तु का कुछ नहीं करता । ज्ञान परवस्तु का कुछ कर देता है यह सोचना अज्ञान है । करने की बुद्धि का ऐसा अंधकार अज्ञान में छाया रहता कि यह नहीं देखा जा पाता कि प्रत्येक वस्तु स्वतंत्र है, परिणमनशील है, वह अपने आपमें ही अपने को कुछ परिणमा सकता है । किसी अन्य पदार्थ का कुछ नहीं करता है । भले ही आग का निमित्त पाकर पानी गर्म हो गया पर आग ने पानी का कुछ नहीं किया । भले ही सूर्य का निमित्त पाकर यह उजेला हो गया पर सूर्य ने कमरे में घुसकर कुछ नहीं किया । इस प्रकाशमय वातावरण में हम आपके शरीर का निमित्त पाकर यहाँ यह छाया परिणम गई, फिर भी इस शरीर ने छाया परिणमी हुए जगह में कुछ नहीं किया । यह विभाव, विकार निमित्त बिना होता नहीं है और निमित्त इसे करता कुछ नहीं है ऐसे यथार्थता की बात बड़े विवेक के साथ समझी जा सकती है । यह हुआ एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के प्रति कथन ।

एक वस्तु में गुणों का स्वतंत्र स्वतंत्र स्वरूप―भैया ! अब अभेद विवक्षा को एक आत्मद्रव्य में ही देखो इसमें अनंतगुण भरे हुए हैं । वे समस्त अनंत गुण केवल अपनी-अपनी क्रियाएं करते हैं । दूसरे गुणों पर उनकी क्रिया आ जाये तो फिर गुण भेद ही क्या रहा? जानन की क्रिया यदि सुख गुण करने लगे तो फिर ज्ञान गुण मानने की जरूरत क्या रही? और इस प्रकार सुख गुण औरों की भी क्रिया करने लगे तो सभी गुणों का अभाव हो गया । और-और गुण सुख की क्रियाएं करने लगें तो सुख गुण का अभाव हो गया । प्रत्येक गुण मात्र अपनी ही क्रियाएं करता है दूसरे गुण की क्रिया नहीं करता है । आत्मा में ज्ञान गुण है वह जानने का ही काम करेगा और अपने गुणों की परिणति से ही जानन का काम करेगा, दूसरे में नहीं । इस तरह जानना जो होता है वह ऐसे ज्ञान का ही जानन होता है ।

परज्ञातृत्व के मंतव्य का अवकाश―भैया ! जानन ने क्या किया, निश्चय से बताओ । जानन में जानन ही आया । पर जानन में जो आकार झलका, जो बाह्य अर्थ का ग्रहण हुआ विषय बना उस पर दृष्टि पहुंचती है और इस दृष्टि में यह मोही, यह अज्ञानी यह कहता है कि मैंने मकान, घर दूकान जान लिया आदि, पर जानता कोई किसी अन्य को अन्य नहीं है । सब अपने आपको ही जानते रहते हैं । दूसरे को कोई नहीं जानते हैं । दूसरे की तो बात दूर रही, अपने आत्मा में जो अनंतगुण हैं उन गुणों में से ज्ञानगुण केवल ज्ञान को ही जानता है, अन्य गुणों को नहीं जानता, अन्यत्र क्रिया नहीं करता उपादान रूप से एक बनकर, हाँ विषय सब होते हैं । ज्ञान के विषय में जैसे ये बाह्यपदार्थ आ रहे हैं इसी प्रकार ज्ञान के विषय में आत्मा के ही दर्शन चारित्र सुख आदि गुण आते हैं। तो जैसे ज्ञान के ज्ञेय ये बाह्यपदार्थ बनते हैं इसी प्रकार ज्ञान के ज्ञेय आत्मा के अन्य गुण भी बनते हैं ।

ज्ञान की ज्ञान में गति की परमार्थता―इस आत्मा के द्वारा क्या वेदा जाता है, क्या अनुभवा जाता है, इसकी चर्चा चल रही है । ज्ञान के द्वारा परद्रव्यों को नहीं अनुभवा जाता किंतु ज्ञान के द्वारा स्व ही अनुभवा जाता है । परद्रव्य ज्ञान के विषय होते हैं तो विषय के लक्ष्य करने वाले लोग प्राय: ज्ञान की क्रिया का उपचार करते हैं । मैंने किवाड़ जाना । अरे मैं यहाँ रहता, अपने प्रदेश में बैठा, मेरा कार्य कहीं मेरे से बाहर हो जायेगा? किसी भी द्रव्य की क्रिया उस द्रव्य के बाहर नहीं होती है । फिर मेरा ज्ञान किवाड़ में कैसे चला गया? और सब लोग कहते हैं, निषेध किया जाये तो सब लोग झूठ मानेंगे । सारी दुनिया तो जानती है कि हमने घर जाना, किवाड़ जाना और मना किया जा रहा है कि आत्मा किसी परद्रव्य को जानता ही नहीं । अचरज होता है, किंतु अब युक्ति और विवेक का आश्रय लेकर आगे बढ़िये, तब यह बात स्पष्ट हो जाती है जब इस पुद्गल को देखते हैं तो पुद्गल की क्रिया पुद्गल में ही होती है, किसी अन्य द्रव्य पर नहीं होती है । यह बात बहुत स्पष्ट ज्ञान में आती है । एक ज्ञान ही ऐसा गुण है जिसका संदेह होने लगता कि ज्ञान परद्रव्यों में क्यों न जाना चाहिए? यह भी ज्ञान की ही महिमा है ।

आनंद गुण की परिणति का आधार―भैया ! अन्य गुणों के भी काम की बात देखो―आनंदगुण आनंदपरिणमन करता है । क्या मेरा आनंदगुण आपके आनंद का परिणमन कर सकता है? कभी नहीं कर सकता है । इसमें भी मोही जनों को संदेह हो सकता है । देखा तो जाता है कि पिता पुत्र को सुखी करता है । अमुक अमुक को आनंद देता है फिर कैसे मना किया जा रहा है? इसमें भी संदेह मोही जनों को हो सकता है पर ज्ञान की अपेक्षा आनंद की स्वतंत्रता जरा जल्दी समझ में आ सकती है, हम अपने आनंद का ही परिणमन किया करते हैं, दूसरे जीवों के आनंद का परिणमन नहीं कर सकते । मुझमें शक्ति नहीं है कि मैं किसी दूसरे द्रव्य में कुछ कर दूं ।

श्रद्धा गुण की परिणति का आधार―और भी गुण ले लीजिए । श्रद्धा है, मायने विश्वास करना है । हम अपने आपका श्रद्धान बना सकते हैं या दूसरे जीवों का श्रद्धान बना सकते हैं? यह आनंदगुण की अपेक्षा और जल्दी समझ में आयेगा । इसकी भिन्नता से हम मात्र अपने आपमें अपने आपका श्रद्धान कर सकते हैं, दूसरे जीवों के श्रद्धान का परिणमन हम नहीं बना सकते । तभी तो बहुत-बहुत समझाना पड़ता है अजी आप विश्वास रखो ऐसा ही होगा । आपको विश्वास में कमी नहीं करना है । फिर भी दूसरा हिचकिचाता है । जब तक उसका श्रद्धान अपने आपमें विश्वासरूप नहीं परिणम जाता है तब तक हिचकिचाता रहता है । आत्मा में श्रद्धा गुण है और उस श्रद्धागुण का कार्य अपने आपके आत्मा में होता है, परपदार्थों में नहीं होता है । इसी तरह आनंदगुण का कार्य अपने आपमें होता है किसी पर में नहीं होता है । इस प्रकार ज्ञानगुण की क्रिया अपने ही ज्ञानगुण में होती है, न अपने अन्य गुण में होती है और न अन्य द्रव्य में होती है । ज्ञान की क्रिया है जानन । जानन किसी परवस्तु के लिए नहीं होता । जानन अपने द्वारा होता है, अपने लिए होता है, अपने में होता है ।

पदार्थ के सत्त्व का प्रयोजन―भैया ! एक बात विशेष यह जानना है कि ये द्रव्य सब क्यों हैं, इनकी क्या जरूरत है? ये द्रव्य होकर अपना कौन-सा मतलब साध रहे हैं? न होते तो क्या था? तो यह प्रश्न तो उठता नहीं कि ये द्रव्य न होते तो क्या नुकसान था, क्योंकि ये हैं । अब हैं तो यह देखिए कि ये क्यों हैं, और ये द्रव्य अपना सत्त्व रखकर अपना कौन-सा प्रयोजन साध रहे हैं? तो एक नियम है कि परद्रव्यों का काम परिणमन उत्पाद व्यय अपना सत्त्व रखने भर के लिए होता है, उनका कोई दूसरा प्रयोजन नहीं । पदार्थ सब परिणमते हैं । वे सब अपना सत्त्व बनाए रहने के लिए परिणमते हैं, इससे आगे उनका प्रयोजन नहीं है । सो पुद्गल की यह बात जल्दी समझ में आ जाती है । ये पुद्गलद्रव्य हैं, इनका प्रयोजन अपने आपकी सत्ता बनाए रहना है और कुछ नहीं है । ये अपने आपसे बाहर अपनी कुछ हरकत नहीं करते । इनका और कोई प्रयोजन नहीं ।

सत्त्व के प्रयोजन के कुछ उदाहरण―ईंधन पड़ा है, जल जाये तो जल जाये । उस ईंधन का यह प्रयोजन नहीं है कि जलूँ नहीं, ऐसा ही बना रहूँ । पुद्गल है, जो होगा सो होगा । उसे क्लेश नहीं होता है । परिणम गया, राख बन गया, पर सत्त्व नहीं छोड़ा । पुद्गल के परिणमन का प्रयोजन अपनी सत्ता कायम बनाए रहना है । और क्या प्रयोजन है? यह घड़ी क्रिया कर रही है, क्या इसका यह प्रयोजन है कि सबको समय बताकर परोपकारशील बनी रहे? यह प्रयोजन घड़ी का नहीं है । इसे तो अपनी क्रिया करने भर का प्रयोजन है । हम आप देख लें तो देख लें, न देखें तो न सही । प्रत्येक पदार्थ परिणमते हैं । उनका प्रयोजन किसी को दुखी अथवा सुखी करने का नहीं है । वे मिले हैं तो सुखी करने के लिए नहीं मिले हैं और बिछुड़ते हैं तो दुःखी करने के लिए नहीं बिछुड़ते हैं । उन पदार्थों का प्रयोजन अपनी सत्ता कायम रखना है और अन्य प्रयोजन नहीं है । और सत्ता कायम रखना भी कोई बुद्धिपूर्वक प्रयोजन नहीं है । वस्तु का सत् सदा प्रयोजक है । पदार्थ का प्रयोजनमात्र अपनी सत्ता रखना है । ये अपने नानारूप परिणमते रहते हैं । उन सब परिणमनों का प्रयोजन अपनी सत्ता बनाए रहना है, और कुछ नहीं है ।

प्रत्येक गुण की प्रतिक्षण भावक्रियाशीलता―सत्त्व के परमार्थ प्रयोजन के अतिरिक्त सब मोह की कल्पना है, इंद्रजाल है । इंद्रजाल किसे कहते हैं? इंद्र मायने आत्मा और जाल मायने मायावी रूप । यह जो हम आप सबका झमेला है वह सब इंद्रजाल है । यह सब मोह की कल्पना भर है पर परमार्थ प्रयोजन नहीं है । और विशेषता से चलो तो प्रत्येक गुण का प्रयोजन चूँकि विशेषता लेकर कहा जा रहा है, अपनी-अपनी क्रिया करना है, कोई सत् खाली नहीं रह सकता । जो बड़ा काम करने वाला पुरुष है वह निरंतर काम करता रहता है और जो महाआलसी पुरुष है वह भी निरंतर काम करता रहता है । कर्मठ पुरुष अपने मन, वचन, काय की तरह-तरह की चेष्टाएं करके काम करता है तो प्रमादी पुरुष का मन क्या खाली रहता है? विकल्प नहीं करता है क्या? मन का काम बराबर चलता रहता है । शरीर का कार्य प्रतिसमय चल रहा है । रूप, रस, गंध, स्पर्श का प्रतिसमय परिणमन चल रहा है । और अपने में ही जगत के बीच में दौड़ लगाए जा रहा है । उनका खूब दौड़ हो रहा है मुर्दा तो बन ही नहीं सकता । पर प्रत्येक जीव निरंतर कुछ न कुछ काम करता है ।

प्रत्येक गुण का अपना-अपना स्वतंत्र कार्य व प्रयोजन―इस जीव में भेदरूप से गुणों को देखें तो प्रत्येक गुण निरंतर अपना कार्य कर रहा है । ज्ञान की क्रिया जानना है । सो ज्ञान जानता रहता है । श्रद्धा की क्रिया कुछ न कुछ विश्वास बनाए रहती है, सो प्रत्येक जीव में देखो कुछ न कुछ विश्वास बना हुआ है । आनंदगुण का काम आनंद की किसी अवस्थारूप परिणमना है । सो देख लो―कोई जीव दुःखरूप परिणम रहा है, कोई सुखरूप परिणम रहा है, वह भी तो आनंद का परिणमन है । और कोई आनंदरूप ही परिणम रहा है तो वह आनंदगुण का परिणमन है, यह ज्ञान जाननरूप परिणमता है । और इसके जानने का प्रयोजन क्या है? यह ज्ञान जानन क्यों करता है? जानन के लिए जानता रहता है । इस ज्ञान का जानन से अतिरिक्त और कोई प्रयोजन नहीं है । विषय साधना, राग-द्वेष करना ये प्रयोजन ज्ञान के नहीं हैं । ज्ञान की क्रिया होती है वह जानकर समाप्त हो जाती है जानन से आगे नहीं बढ़ती है । शरीर में कुछ बुखार फोड़ा आदि हरकत हो रहे हों, उस समय में यह जीव जानता है । किसे जानता है? ज्ञान को जानता है । सम्यग्दृष्टि जीव की विचारधारा चल रही है । ज्ञानी संत पुरुष समझ रहा है कि यह वेदना क्या चीज होती है और किसलिये होती है?

परमार्थत: वेदना का दिग्दर्शन―यह वेदना भय का प्रकरण है कि सम्यग्दृष्टि जीव के वेदना का भय नहीं होता । वेदना यह ही है कि जो अचल ज्ञान स्वयं वेदा जाता है । ज्ञान अन्य को वेद ही नहीं सकता । अहंत्व बुद्धि रखकर राग भाव के कारण कल्पना करता है कि मैं ठंडा हो गया, मुझे बुखार आ गया । मेरे में धौंकन हो रही । रागवश यह अनुभवा जाता है । परमार्थत: यह जीव अपने ज्ञान को ही वेद रहा है । जैसे आम चूसते हुए में यह जीव आम के रस का अनुभवन नहीं कर सकता है । कल्पना करता है कि मैंने आम के रस का स्वाद लिया, चूस लिया, पर वस्तुत: आम के रसविषयक ज्ञान को करता है, उसके साथ राग लगा है इस कारण उस प्रकार का सुख परिणमन करता है और साथ में अज्ञान लगा है इसलिए आम की ओर आकृष्ट होता है । और समझता है कि मैंने आम से सुख पाया । यह जीव आम के रस का अनुभव नहीं कर सकता । आम के रसविषयक ज्ञान का अनुभव करता है । यह जीव शरीर की पीड़ा का अनुभव नहीं कर सकता, शरीरविषयक हरकतों के ज्ञान का अनुभव कर सकता है । साथ ही राग लगा हो तो संक्लेशरूप परिणमन बन जायेगा, पर शरीर की वेदना को यह जीव नहीं जानता है ।

अनाकुल वेदना―जीव को केवल एक यह वेदना होती है जो यह अचल ज्ञान स्वयं वेदा जाता है । किस प्रकार वेदा जाता है? अनाकुलरूप होकर वेदा जाता है । आकुलरूप होकर तो परपदार्थ ही लक्ष्य में आयेंगे, स्वपदार्थ न आयेगा । अनाकुल होकर तो यह विश्वास जमेगा कि यह मैं तो केवल ज्ञान को ही वेदा करता हूँ, अन्य किसी को नहीं जानता । ऐसा ज्ञान कैसे हो जाता है? जब यह वेद्य-वेदक भाव को निर्भेद करता अर्थात् जानता हुआ भाव और जानने वाला भाव इनको निर्भेद रूप से जानता हो । ज्ञान और ज्ञेय का भेद नहीं उठता ऐसी स्थिति में अनाकुल होकर इस सम्यग्दृष्टि जीव का जीवन यह एक अचल ज्ञान स्वयं वेदा जाता है । ऐसा अनुभव होने के बाद उसकी यह दृढ़ श्रद्धा होती है कि बाह्य पदार्थों से तो वेदना ही नहीं आया करती है ।

एकक्षेत्रावगाहिता में भी पृथक्त्व―जैसे घर में रहते हुए घर के किसी कुटुंब में मन न मिले तो घर में रहते हुए भी आप न्यारे माने जाते हैं । जब प्रीति नहीं है, मन ही नहीं मिलता है, मुख मोड़े रहते हो तो घर में रहते हुए आप न्यारे हो रहे हैं । ऐसे ही यह शरीर और जीव एक क्षेत्रावगाह में है । जिस आकाशवृत्ति में जीव है उसी आकाशवृत्ति में शरीर है और जिस निज क्षेत्र में आत्मा है उसके साथ-साथ यह शरीर है, फिर भी यह आत्मा इस शरीर से प्रेम नहीं कर रहा, इसका मन ही शरीर में नहीं रहा, शरीर से उपेक्षा करता है, अपने ज्ञानस्वरूप परिणमन रूप हित की धुन में रहता है, तो यह तो शरीर से जुदा ही है, अथवा जैसे एक पुत्र से मन नहीं मिल रहा है, पुत्र से आप जुदा हैं और एक दिन को कहकर दालान में ठहरा हुआ मुसाफिर है उससे मन नहीं मिल रहा है, जुदा है, इसी तरह ये जुदा-जुदा हैं । उस ही एक क्षेत्रावगाह में अनेक पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल पड़े हुए हैं जिनका कि बंधन कुछ नहीं है । उनसे भी इस ज्ञानी का मन नहीं मिल रहा है और निमित्त-नैमित्तिक बंधन रूप पड़े हुए इन शरीर अणुओं से भी मन नहीं मिल रहा है, यह ज्ञानी उन समस्त परपदार्थों से जुदा है । तो इस मुझ आत्मा से अत्यंत जुदा जो शरीर है या अन्य भी कोई द्रव्य हो उसके इसकी वेदना ही नहीं है, तो फिर ज्ञानी जीव के शरीरादिक अन्य पदार्थों का भय कैसे हो सकता है?

शरीरवेदनाभय के अभाव का एक उदाहरण―भैया ! देखो पुराण समय में कैसे-कैसे पुरुष हो गए―सनत्कुमार चक्रवर्ती मुनि अवस्था के बाद पूर्व कर्मोदयवश जब उनके कोढ़ निकल आया तो एक देव ने आकर उनकी परीक्षा करना चाहा कि इनकी बड़ी प्रशंसा सुनी जा रही है कि अपनी श्रद्धा में, आचरण में, लगन में बड़े पक्के हैं सो देखें तो सही । वह देव वैद्य का रूप बनाकर सड़क पर चलता हुआ वह पुकारता जाये कि मेरे पास करोड़ की पेटेंट औषधि है―इस औषधि के लगाते ही सारा कोढ़ समाप्त हो जाता है । पुकारता हुआ वह साधु महाराज के पास पहुंच गया, बोला कि महाराज ! आप संतपुरुष हैं, क्या हम आपकी थोड़ी सेवा कर सकते हैं? साधु महाराज ने कहा कि हमें इस कोढ़ की परवाह नहीं है―हमें तो जन्म मरण और भव रोग मिटाने की परवाह है, अगर तुम मेरे आंतरिक रोग मिटा सके तो हम तुम्हारी सेवा लेने को तैयार हैं । वह देव चरण में गिर गया, बोला―महाराज उस रोग के वैद्य तो आप ही हैं । हम जैसे किंकरों से यह कहाँ बन सकता है? भयानक उपसर्गों के भयानक रोगों के प्रतिकार की वांछा न की जाये, यह किसी विशेष बल पर ही तो संभव है । वह विशेष बल है ज्ञान का ।

ज्ञानबल का प्रताप―निज ज्ञानस्वरूप के अनुभव का बल, समस्त परवस्तुओं से पृथक् ज्ञानमात्र अपने के अनुभव कर चुकने का बल, जिसके यह दृढ़ संकल्प रहता है कि परवस्तु किसी भी रूप परिणमे उसके किसी भी परिणमन से यहाँ रंच भी प्रभाव नहीं पड़ता है । यदि मैं ही अपने आपका परिणमन करूँ तो अपने आप प्रभावित होता हूँ, दूसरे पदार्थों से मैं प्रभावित नहीं होता, ऐसा वस्तु स्वातंत्र्य का भान सम्यग्दृष्टि पुरुष के होता है । जब अन्य पदार्थों से इस आत्मतत्त्व में कोई वेदना ही नहीं आती तो पर-वेदना का क्या भय? ज्ञानी जीव ऐसा जानता हुआ निःशंक रहता है । कुछ थोड़ीसी तबीयत खराब होने पर बड़ी खराब तबीयत का नक्शा खींच लिया जाता है और मोही जीव दु:खी होता है, यह न जाने अन्यरूप रख ले फिर क्या होगा?

ज्ञान के अनागत व आगतभय का अभाव―भैया ! जितना डर सामने आई हुई विपत्तियों का नहीं होता उतना डर अपने विकल्पों में आने वाली विपत्तियों का होता है । दरिद्रता कदाचित आ जाये उसमें अपना जीवन काट लेगा, मगर विकल्प ऐसा हो जाये कि यदि हमारा नुकसान हो गया तो फिर कैसे गुजारा होगा? उसमें पीड़ा अधिक होती है । गुजर जाये कोई इष्ट तो वह सह लेगा, पर विकल्प आ जाये तो उसकी बड़ी पीड़ा मालूम होती है । नरकगति के दुःख यह जीव सह लेता है, सहते ही हैं, सहने के आदी हो जाते हैं पर यहाँ नरकगति के दुःखों का जब वर्णन सुना जाता है तो दिल काँप जाता है । ओह कैसे-कैसे दुःख नरक में भोगे जाते हैं? तो यह विकल्पों का दुःख बड़ा कठिन दुःख होता है । ज्ञानी जीव के विकल्प ही नहीं होता है । इसलिए उसके ऐसी बात भी उपस्थित नहीं होती है । वह जानता है कि अपने स्वरूपास्तित्व के दृढ़ किले से गढ़ा हुआ यह मैं किसी अन्य के द्वारा बाधित नहीं हो सकता । इस शरीरादि से वेदना ही नहीं उत्पन्न होती । अत: निर्भय और निःशंक होता हुआ यह ज्ञानी पुरुष स्वयं सदा सहज ज्ञानस्वभाव का ही अनुभव किया करता है ।

अत्राण भय

ज्ञानी के अत्राणभय का अभाव―ज्ञानी पुरुष को भय नहीं रहता है, इस प्रकरण में आज अत्राण का भय ज्ञानी पुरुष को नहीं रहता है―इसका वर्णन होगा । जो पदार्थ सत् है वह नाश को प्राप्त नहीं होता है । यह वस्तु की स्थिति है । जो सत् है वह सत् के कारण अविनाशी हुआ करता है । यहाँ उसका सर्वथा अभाव कैसे किया जा सकता है? चाहे पानी का हवा हो जाये, हवा का पानी बन जाये फिर भी सद्भूत तत्त्व तो रहता ही है । सत् का कभी अभाव नहीं होता । ज्ञान स्वयं सत् है । यहाँ ज्ञान के कहने से ज्ञानमय द्रव्य को ग्रहण करना चाहिए । यह ज्ञानमय आत्मतत्त्व स्वयमेव सत् है, फिर दूसरे पुरुषों से इसकी क्या रक्षा कराना है? अज्ञानी जीव को यह भय रहा करता है कि मेरी रक्षा हुई या न हुई । मेरी रक्षा किससे होगी? पराधीन भाव वह बनाए रहता है, परोन्मुख रहता है । ज्ञानी सोचता है कि इसका तो कभी नाश ही नहीं होता है क्योंकि यह सत् है, फिर दूसरे से क्या रक्षा की याचना करना? अत: ज्ञानी के अत्राण का भय नहीं होता ।

स्वरक्षा के प्रति ज्ञानी की दृढ़ धारण―इस ज्ञान का अरक्षा करने वाला कुछ भी नहीं है । है कोई ऐसा पदार्थ जो इस ज्ञानमय सत् का अभाव कर डाले? जो सत् है वह सत् ही रहेगा । किसी भी सत् को कुचलकर, पीटकर, जलाकर क्या अभाव किया जा सकेगा? नहीं । पुद्गल घाटे पीटे जा सकते हैं तिन तक का तो अभाव है नहीं, फिर जो अमूर्त है, ग्रहण में नहीं आता ऐसे इस चैतन्य सत् के अभाव की क्या कल्पना की जा सकती है? इसकी किसी भी पदार्थ से अरक्षा नहीं है । कदाचित् मरण भी हो जाये तो भी यह अरक्षा में नहीं हैं । इसका नाता शरीर से नहीं है । आत्मा का नाता अपने स्वरूप से है, जिससे इसका संबंध है उससे यह कभी अलग नहीं होता । इतना ही तो ज्ञानी और अज्ञानी का अंतर है । अज्ञानी का आत्मा शरीर से संबंध जोड़ता है और ज्ञानी का आत्मा शरीर से पृथक् अपने स्वरूपसर्वस्व रूप अपने को तका करता है । शरीर भी छूट जाये तब भी मैं स्वरक्षित हूँ । यहाँ से कहीं भी चला जाऊँ तब भी मैं स्वरक्षित हूँ । इसकी अरक्षा नहीं हो सकती है । फिर ज्ञानीजीव को भय कहां से हो? वह निःशंक होता हुआ सतत् सहज ज्ञान का ही अनुभव करता है ।

किसी के द्वारा किसी दूसरे की रक्षा का असंभवता―वैसे तो लौकिक अरक्षा की दृष्टि से भी देखो तो उदय लौकिक रक्षा के योग्य है, पुण्य है तो लौकिक अरक्षा भी कोई नहीं कर सकता । और कभी न रहा इतना पुण्य तो लौकिक अरक्षा में स्वयं पहुंच जायेगा । परमार्थ से तो रक्षा है पवित्र भाव, स्वभावदृष्टि का स्वावलंबन का भाव और अरक्षा है परालंबी भाव । सो स्वावलंबी भाव में रहते हुए के अरक्षा का कोई प्रश्न ही नहीं होता । वह तो स्वयं अरक्षित है । परावलंबी भाव में तो मूढ़ जीव स्वयं की भी रक्षा नहीं कर सकता है, दूसरे की तो बात ही क्या है? दूसरे तो कदाचित् भी दूसरे की रक्षा नहीं कर सकते हैं ।

पर से पर की अरक्षा का एक उदाहरण―एक पौराणिक कथा है कि देवरति राजा अपनी रानी रक्ता में रत थे । सो राज्य की प्रजा व मंत्रियों ने राजा से कहा कि महाराज या तो राज्य का प्रबंध कीजिए या राज्य को छोड़ रानी को लेकर चले जाइए । हम सोसाइटी के लोग राज्य का प्रबंध करेंगे । उसे राज्य मंजूर न हुआ और रक्ता रानी को ले जाकर राज्य छोड़कर चल दिया । दूसरे के राज्य, एक शहर के किनारे वे दोनों एक दो दिन को ठहर गए । वहाँ राजा तो गया था शहर में कुछ सामान लेने और वहाँ खेत पर एक चरस हांकने वाला कूबड़ा, लंगड़ा चरस हाँक रहा था । और अच्छा सुरीला गाना गा रहा था । रानी गायन की बड़ी शौकीन थी । तो उसे वह गायन सुहा गया । और उसके पास जाकर उससे रानी बहुत कुछ कहने लगी कि तुम घर छोड़कर हमारे संग चलो तो कुबड़ा बोला कि तुम तो राजा की रानी हो, राजा सुनेगा तो हमारा भी सिर छेद करेगा और आपका भी सिर छेद करेगा । रानी बोली कि तुम कुछ परवाह न करो । अब वह उदास होकर बैठ गई । राजा ने पूछा कि क्या बात है? रानी ने कहा कि आज आपकी वर्षगाँठ का दिन है । तुम राजमहल में होते तो बड़े सिंहासन पर बैठाकर आपका समारोह मनाती । यहाँ जंगल में क्या करें? राजा बोला कि जो चाहो सो कर सकती हो । रानी ने कहा कि अच्छा फूल मंगाओ, डोरा मंगाओ । राजा ने फूल व डोरा मंगा लिया । अब रानी ने मोटे धागे में फूलो के हार 10-15 बनाये और कहा कि यहाँ महल तो है नहीं, यह पर्वत है सो उस पर्वत की चोटी पर चलो, मैं आपका समारोह करूंगी । चढ़ गए दोनों उस पहाड़ की चोटी पर । वहाँ पर राजा को बिठाकर चारों ओर से बाँध दिया और जब देख लिया कि अब राजा पूरे बंधन में आ गया तो वहाँ से धक्का लगा दिया । अब वहाँ से लुढ़कते-लुढ़कते राजा कहीं पहुंचा हो ।

कुबुद्धि का नाच―रक्ता को क्या मालूम कि राजा कहां गिरा है? वह तो खुशी से नीचे आई और कूबड़े को लेकर चल दी । पेट तो भरना ही है, सो एक चौड़ी डलिया लिया जिसमें बच्चे झूलते हैं । उस डलिया में कूबड़े को बिठाकर सिर पर रखकर जगह-जगह जाये । यह रक्ता नाचे, कुबड़ा गाये, जो कुछ मांगने से पैसे मिलें उनसे दोनों अपना पेट भरें । उधर देवरति राजा लुढ़कते हुए नदी में जा गिरे और उसमें बहकर किसी देश के किनारे में जा लगे । उसी समय उस देश का राजा मर गया था, सो मंत्रियों ने एक गजराज हाथी की सूंड में माला डालकर छोड़ दिया और यह तय किया कि यह हाथी जिस किसी के गले में यह माला डाल देगा उसे राजा बनाया जायेगा । उस हाथी ने घूम फिरकर उस देवरति के गले में वह माला डाल दी । अब तो देवरति राजा हो गया । उधर रक्ता अपने सिर पर डलिया रखे और उस पर कूबड़े को बिठाये घूम फिर रही थी और यह प्रसिद्ध कर रही थी कि मैं पतिभक्त हूँ । दोनों घूमते फिरते राजदरबार में पहुंचे । रक्ता को क्या मालूम कि वह राजा यहाँ का राजा बन गया होगा? उसे तो यही मालूम था कि वह राजा मर गया होगा । वहाँ भी रक्ता नाचे और कूबड़ा गाए । ऐसा देखते ही देवरति को वैराग्य हो गया कि ओह कर्मों का उदय ऐसा है ।

लोक में स्वकर्मानुसार रक्षा का एक दृष्टांत एवं सर्व सत᳭ की स्वयं सुरक्षा―भैया ! जिसका उदय अच्छा है उसके स्वयमेव रक्षा का प्रयत्न बन जाता है । श्रीपाल को धवल सेठ ने समुद्र में गिरा दिया, श्रीपाल किसी लकड़ी या किसी अन्य चीज का सहारा पाकर किनारे पहुँच गए । उस राज्य के राजा का यह वचन था कि जो इस समुद्र को तैरता हुआ किनारे आए उसे आधा राज्य देंगे और अपनी लड़की की शादी कर देंगे । इस कथा को सभी जानते हैं । तो जिसका उदय अच्छा है उसकी रक्षा स्वयमेव हो जाती है । जिसका उदय खोटा है उसकी दूसरा कौन रक्षा करेगा? खोटे लोग अपनी कल्पना में अरक्षित हैं फिर भी पदार्थों के स्वरूप की ओर से उदय खोटा हो तो, अच्छा हो तो, इस चेतन वस्तु का नाश कभी नहीं होता । किसी भी परिस्थिति में यह चेतन रहे रक्षित है । चेतन की ही बात क्या, प्रत्येक पदार्थ रक्षित है । किसी का कोई क्या बिगाड़ करेगा, वे नष्ट हो ही नहीं सकते । सत् का स्वयं सिद्ध अधिकार है कि डट कर बने रहना । कैसा भी आक्रमण हो, कैसा भी संयोग वियोग हो, फिर भी कोई सत᳭ अधूरा नहीं रहता । पूर्ण सत् बराबर रहा करता है । जो सत् है वह कभी भी नाश को प्राप्त नहीं होता । और यह ज्ञान स्वयं सत् है । इस ज्ञान को धर्म की दृष्टि से देखो तो सत् है, धर्म की दृष्टि से देखो तो सत् है, अभिन्न स्वरूप है । देखने की दो दृष्टियाँ है और धर्मी कुछ अलग से तो है नहीं, जो है सो है, वह न धर्मी है, न धर्म है । एक धर्म को मुख्य किया तो वह धर्मी हो गया और अन्य धर्म जो गौण किया गया वह धर्म हो गया । धर्म और धर्मी की व्यवस्था मुख्यतया और गौण रूप से है । इस आत्मा में कौन से गुण की मुख्यता की जाये कि इस धर्मी आत्मा का शीघ्र परिचय हो जाता है? समस्त गुणों में गुणराज ज्ञान गुण है जिस ज्ञान की प्रधानता से इस आत्मा का सुगमतया परिचय होता है । यह ज्ञान स्वयमेव सत् है इस कारण मुझे दूसरे से रक्षा की क्या आशा करना? दूसरे के द्वारा क्या रक्षित होना? मैं तो स्वयं स्वरक्षित हूँ । इसका कभी अत्राण ही नहीं है, अरक्षा ही नहीं है, फिर ज्ञानी जीव को भय कहां से हो? संसार में ऐसा वह ही बड़ा पुरुष है जिसका इस स्वतःसिद्ध आत्मतत्त्व पर अधिकार हो गया है । क्षण-क्षण बाद जब चाहे तब ही इस आत्मदेव की सिद्धि कर सकता है । ऐसा ज्ञानी में बल प्रकट हो गया है । वह बल है सत् के यथार्थ सत्त्व के ज्ञान का बल ।

कुछ भी वक्तव्य से वस्तुस्वरूप के परिवर्तन का अभाव―दुनिया कभी भी कुछ भी कहो, किसी भी द्रव्य पर किसी अन्य द्रव्य का कुछ अधिकार नहीं होता । अधिकार की बात कहना उपचार से है । जिसको निमित्त करके यह जीव कुछ विकल्प बनाता है और लोकव्यवस्था में जिसके पास अधिक समय तक वस्तु रहे उसे ही लोकव्यवस्था में अधिकारी कहा गया है । परमार्थ से इस जीव का किसी भी अन्य वस्तु पर रंच भी अधिकार नहीं है । ज्ञानी जानता है अपने अंतर की श्रद्धा में सत् का यथार्थस्वरूप । यह श्रद्धाबल इस ज्ञानी के संवर और निर्जरा का कारण होता है । गृहस्थ ज्ञानी में ऐसी कौन-सी खूबी है कि जिस खूबी के कारण सदा प्रसन्न, निर्मल, अनाकुल अंतर में रहा करता है, जबकि परिस्थितियां इसके विपरीत हैं । जिसके लिए लोग यह देखते हैं कि यह इतना घर में फंसा है, इतनी व्यवस्था में पड़ा है, लोगों को यह दिखता है पर ज्ञानी पुरुष की श्रद्धा में एक ऐसा अपूर्व बल है जिस बल के प्रसाद से परवस्तुओं में वह आत्मीय मधुर आनंद का अव्यक्तरूप में स्वाद लिया करता है ।

दृष्टि के अनुसार स्वाद―एक ऐसा कथानक है कि राजा और मंत्री राजसभा में बैठे हुए थे । मंत्री को नीचा दिखाने के लिए राजा ने बोलना शुरू किया कि मित्र मंत्री ! आज रात को हमें एक स्वप्न आया है कि हम आप दोनों आदमी घूमने जा रहे थे, रास्ते में दो गड्ढे मिले, एक गड्ढे में गोबर भरा था और एक में शक्कर भरी थी । सो गोबर के गड्ढे में तो आप गिर पड़े और मैं शक्कर के गड्ढे में गिर पड़ा । तो मंत्री बोला कि महाराज ऐसा ही हमें स्वप्न आया, बिल्कुल ठीक यही स्वप्न आया, पर इससे आगे थोड़ा और देखा कि आप हमें चाट रहे थे और मैं आपको चाट रहा था । अब बतलाओ कि राजा को क्या चटाया? गोबर । और स्वयं ने क्या चाटा? शक्कर । तो ये चातुर्य की बातें थीं । राजा शर्मिंदा हो गया कि इसने हमें गोबर चटाया । तो देखो गोबर में पड़ा हुआ भी व्यक्ति शक्कर का स्वाद ले सकता है । ज्ञानी गृहस्थ की बाह्य परिस्थितियाँ बहुत-बहुत कार्यों के व्यग्ररूप दिखा करती हैं पर धन्य है वह ज्ञानी जिसके अंतर में वस्तु की चतुष्टय सीमा का भान हो जाता है और जहाँ यह विश्वास हो जाता है कि मेरा उद्धार किसी अन्य वस्तु के द्वारा हो ही नहीं सकता वह ज्ञानी अंतर में ज्ञान का स्वाद ले लेता है ।

अज्ञानी और ज्ञानी की भावस्थिति―यह बहुत बड़ा भयानक अंधेरा है जो धन वैभव, नाम, प्रतिष्ठा, आबरू आदि की कोई तरंग उठा करे । करता क्या यह जीव? कर्मविपाकों के वशीभूत है । वशीभूत भी क्या है, उदय है पर क्षयोपशम भी साथ में है । उस क्षयोपशम के रहते हुए अपनी बुद्धि से चाहे अपने को कुपथ की ओर ले जाकर बिगाड़ कर ले, चाहे सत्पथ की ओर उपयोग कर ले, ऐसा प्रमादी है, ऐसा संस्कारों का शिकारी है कि वह निज ज्ञायकस्वभाव के मननरूप आश्रयरूप सत्पथ का परिग्रहण नहीं कर पाता है । ज्ञानी जीव की दृष्टि में वस्तु का यथार्थस्वरूप है । प्रत्येक पदार्थ स्वयं अस्तित्त्व लिए है । मेरा किसी अन्य पदार्थ में प्रवेश नहीं है ।

हम आपके इस पिंडोले में भी वस्तुओं की स्वतंत्रता―यहां ही देखो हम आप जितने भी लोग बैठे हैं ये मुख्यतया तीन चीजों के पिंडोला हैं । एक आत्मा, दूसरा कार्माणवर्गणा और तीसरी शरीरवर्गणा । इन तीनों का पिंडीभूत है यह पुतला । फिर भी प्रत्येक पदार्थ अपना-अपना जुदा-जुदा सत् रखते हैं । ऐसा पिंडीभूत होने की दशा में भी मैं पुद्गल का कुछ नहीं कर सकता; कर्म का, शरीर का कुछ नहीं कर सकता । जो होता है इन पदार्थों में वह उनमें स्वयमेव निमित्त पाकर होता है । स्वयमेव का अर्थ यह है कि केवल उनके स्व की परिणति होती है । पर तो निमित्त हो सकता है, किंतु परिणति केवल एक की ही होती है । प्रत्येक पदार्थ केवल अकेले परिणमता है । किसी दूसरे पदार्थ की परिणति को साथ लेकर नहीं परिणमता है । तब प्रत्येक पदार्थ केवल ही परिणमता है और प्रतिक्षण परिणमनशील है । अपनी जाति सीमा को छोड़कर भी परिणम नहीं जाता । तब ऐसा ही मैं हूं, फिर मेरी अरक्षा कहाँ है? ऐसा ज्ञानी जीव अपना विश्वास बनाए है इस कारण ज्ञानी के अरक्षा का भय नहीं है ।

ज्ञानी का विलास―यह ज्ञानी सम्यग्ज्ञान के कारण निःशंक होता हुआ अपने सहजज्ञान का, स्वाभाविक ज्ञान का ही निरंतर अनुभव करता है । अज्ञानी ज्ञान के स्वाद को कभी भी नहीं लेता, क्योंकि उसकी बहिर्मुखी दृष्टि है और ज्ञानी पुरुष श्रद्धा में अंतर में कभी भी पर का अनुभव करता हो, स्वाद लेता हो, कुछ बनाता है, ऐसा कभी ध्यान नहीं होता विश्वास नहीं होता । वह जानता हुआ भी नहीं जानता, करता हुआ भी नहीं करता, बोलता हुआ भी नहीं बोलता क्योंकि ज्ञानी की धुनि केवल अपने आपके सहज स्वरूप की दृष्टि के लिए लगी रहती है । यों ज्ञानी पुरुष अत्राण का भय नहीं करता । अत्राण मायने रक्षा न होना इसका उसे भय नहीं है । वह अपने आपको सदा स्वरक्षित, सुरक्षित मानता है । कैसा सुरक्षित है यह कि अनादिकाल से अनेक परभाव और परद्रव्यों के बीच रहता हुआ भी रहता चला आया हुआ भी यह अब भी सुरक्षित है । इसका सत् नहीं बिगड़ा, उतना का ही उतना वैसा का ही वैसा अपना सत्त्व स्वरूप लिए है । ऐसा देखने वाला ज्ञानी पुरुष सदा नि:शंक रहता है, निरंतर स्वयं ही अपने ज्ञान का अनुभव करता है ।

सहज भाव―सहज ज्ञान का मतलब जानन परिणति से नही है किंतु अनंत अहेतुक सदा प्रकाशमान जो असाधारण स्वरूप है ज्ञानस्वरूप, ज्ञानस्वभाव में ज्ञानस्वभाव का प्रयोजन है सहज ज्ञान का । सहज का अर्थ होता है―सह जायेते इति सहजं । जो एक साथ उत्पन्न हो उसे सहज कहते हैं । जब से पदार्थ है, जब से जो हो और जब तक पदार्थ है तब वही रहे ऐसा जो कुछ परिणाम है उसे कहते हैं सहज ।

सतत ज्ञानवेदी के अत्राणभय का अभाव―यह ज्ञानी पुरुष अत्राण का भी भय नहीं करता है । यह तो सतत निरंतर अपने ज्ञान का अनुभव करता है । सम्यक्त्व के होने पर स्वरूपाचरण चारित्र होता है । जिसका कार्य है कि अपने स्वरूप में अपना आचरण बनाए रहना । यह आचरण कहीं दृष्टिरूप है, कहीं आश्रयरूप है, कहीं आलंबनरूप है, कहीं अनुभवनरूप है और कहीं परिणाम रूप है । स्वरूपाचरण सम्यक्त्व होते ही यह प्रकट होगा और यह अनंतकाल तक रहेगा । सिद्ध जनों पर भी स्वरूपाचरण रहता है । देशव्रत, सकलव्रत ― ये तो अध्रुव हैं, सहेतुक हैं, स्वभाव भाव नहीं हैं, किंतु आत्मा का यह अकलंक सहजस्वरूप स्वत:सिद्ध है, अनादि अनंत है । जब से वस्तु है तब ही से इसके साथ तन्मयता भी है । ऐसे सहज ज्ञान से यह ज्ञानी जीव नि:शंक होता हुआ अपने आपका अनुभव करता है । यों ज्ञानी के अरक्षा का भय नहीं होता । इस प्रकरण में चतुर्थ भय का अभाव बताया है । प्रकरण चल रहा है कि ज्ञानी पुरुष में शंका नहीं रहती है, नि:शंक रहता है, क्योंकि अंत तक उसके यह बल बना हुआ है कि पर का और क्या होगा, वियोग हो जायेगा, छिद जायेगा भिद जायेगा । विनाश हो जायेगा क्या? अलग हो जायेगा तिस पर भी मुझ सत् का कभी विनाश नहीं होता है । ऐसा उस ज्ञानी के दृढ़तम श्रद्धान है इसलिए वह निःशंक रहता है और निःशंक होता हुआ सतत अपने सहज ज्ञान का ही अनुभव करता है ।

अगुप्तिभय

ज्ञानी के अगुप्तिभय का अभाव―नि:शंकित अंग के प्रकरण में ज्ञानी जीव अगुप्ति भय से पृथक् अपने आपको देख रहा है, वह क्या जानता है कि वस्तु का निजस्वरूप ही वस्तु की परमगुप्ति है । गुप्ति उसे कहते हैं अथवा दृढ़ किले जैसी निर्मिति को गुप्ति कहते हैं जिसमें अन्य कोई प्रवेश नहीं कर सकता । जैसे किला दृढ़ बनाया जाता है किसलिए कि इस किले के अंदर कोई प्रवेश नहीं कर सकता । ज्ञानी पुरुष का किला ज्ञानी पुरुष का स्वरूप है । यह किला है तो सबके पास । इसमें किसी भी अन्य पदार्थ का प्रवेश नहीं हो सकता, पर इसका पता अज्ञानी को नहीं है ज्ञानी को लगा है । जिसे अपने स्वरूप का पता है उसके उपयोग में अन्य कोई तत्त्व प्रवेश नहीं कर पाता है क्योंकि इसके प्रवेश का द्वार भावास्रव है, अज्ञान है, मिथ्यात्व है ।

अज्ञानी की अगुप्ति―दृढ़ किला होकर भी विभाव एक ऐसा विलक्षण घर बसा तत्त्व है कि यह सारा किला भी बालू रेत की तरह टूट जाता है, उपयोगद्वार से वैसे वस्तुस्वरूप टूटता नहीं है । स्वरूपकिला इतना मजबूत है कि वह किला कभी टूट ही नहीं सकता । पर इस आत्मा में जो अज्ञान का उपयोग है, सो अपने उपयोग द्वारा अपने इस स्वरूप किले को तोड़ देता है । पर ज्ञानी जीव अपने उपयोग को अपने स्ववश में रखता है और वह तोड़ नहीं पाता है । वस्तु का निजी स्वरूप ही वस्तु की परमगुप्ति है । यह ज्ञान ही इस जीव का स्वरूप है । ज्ञानी जीव को कुछ भी अगुप्ति नहीं है इसलिए ज्ञानी को अगुप्ति का भय नहीं है । ऐसा भय होता है लोगों को कि मेरे घर की भींत पक्की नहीं है अथवा यह कम ऊंची है या किवाड़ मजबूत नहीं हैं, कोई भी दुश्मन, डाकू कहीं से भी प्रवेश कर सकता है ऐसा उसे अगुप्ति का भय रहता है ।

ज्ञानी की गुप्ति―ज्ञानी जीव निहारता है कि मैं तो अपने स्वरूप में हूँ । इस स्वरूप में कोई भी परपदार्थ रंच भी प्रवेश नहीं कर सकता है । न अन्य जीव प्रवेश करता है, न कोई पुद्गल आदिक द्रव्य प्रवेश कर सकते हैं । एक क्षेत्रावगाह भी हो जाये फिर भी स्वरूप में प्रवेश नहीं होता । जैसे दूध और पानी एक गिलास में मिल जायें, जिसको अलग करना जरा कठिन है वहाँ भी दूध के स्वरूप में दूध ही है और पानी के स्वरूप में पानी ही है । पानी में मिट्टी का तेल डाल दिया जाता है और जहाँ पानी है वहाँ वह तेल भी है किंतु वहाँ एकदम स्पष्ट हो जाता है कि तेल पानी के ऊपर अथवा अगल-बगल पड़ा इकट्ठा सा नजर आता है । लो यह तेल है यह पानी है । तेल के स्वरूप में तेल है और पानी के स्वरूप में पानी है । मोटे अथवा सूक्ष्म अनेक दृष्टांतों से इस बात को जान सकते हैं कि एक क्षेत्र में भी रहकर एक पदार्थ अपने स्वरूप को किसी दूसरे पदार्थ को नहीं दे सकता है । तब पदार्थ का स्वरूप गुप्त हुआ ना, उनके स्वरूप को कोई भेद नहीं सकता । मेरा भी ऐसा ही सुरक्षित स्वरूप है कि उसमें परपदार्थ का प्रवेश नहीं है । अरक्षा का क्या भय है, आक्रमण का क्या भय है? इस कारण ज्ञानी निःशंक होकर निरंतर स्वयमेव अपने सहज ज्ञानस्वभाव का अनुभव करता है । यों यह मैं हूँ, यह पूरा हूँ, इसमें यह ही है, इसमें अन्य कुछ नहीं है ।

अज्ञानी का विकल्प व अनर्थ―यह जीव विकृत अवस्था में अज्ञान और मिथ्यात्व अंधकार से आच्छादित था, उस समय भी यह अपने आपका ही स्वामी था, कर्ता था, भोक्ता था । तब भी इसमें दूसरे के स्वरूप का प्रवेश न था भोजन करती हुई हालत में भी । हालांकि लोभी पुरुष आसक्त होकर मौज लेता हुआ भोजन चबाकर स्वाद ले रहा है उस समय भी उस ज्ञानी की आत्मा में भोजन का एक अणु अथवा रस आदि कुछ तत्त्व प्रवेश नहीं कर रहा है । वस्तु के स्वरूपकिला को कोई तोड़ नहीं सकता है पर वह अज्ञानी अपने आप में बैठा हुआ कल्पनाएँ कर रहा है कि मैं भोजन का स्वाद ले रहा हूँ । इसके बाद मीठे रस का मौज मानता है । माने भले ही पर वह उपयोगद्वार से बाहर किसी भी द्रव्य में नहीं गया । इसका पता नहीं है इसलिए अपनी प्रभुता का विपरीत उपयोग कर रहा है ।

स्वरूप की सहज दृढ़ता―जीव सब प्रभु हैं, ऐश्वर्य संपन्न हैं पर कोई अपने ऐश्वर्य में स्वाभाविक परिणमन कर रहा है जैसे कि परमात्मा । और कोई अपने उपयोग को ज्ञान की दृष्टि में परिणमन कर रहा है जैसे कि अंतरात्मा । और कोई अपने उपयोग को बाह्यपदार्थजन्य सुख की कल्पना करके परिणमन कर रहा है जैसे कि बहिरात्मा । पर सभी आत्माओं ने केवल अपने आपके स्वरूप में ही तो कुछ किया, पर बाहर से कुछ प्रवेश नहीं हो सकता । जैसे मजबूत किले के अंदर रहने वाले राजा के कुटुंब वाले परस्पर में तो लड़ें भिड़ें पर उस किले में दूसरा शत्रु प्रवेश नहीं हो पाता है । इसी तरह इस आत्मस्वरूप में इस मजबूत किले में स्वयं का उपयोग विकल्प रागादिक भाव विकृत होकर बिगड़ते हैं तो बिगड़ें, पर इस आत्मस्वरूप में किसी भी वस्तु का प्रवेश नहीं हो सकता है ।

निजबल का ज्ञानी―ज्ञानी जीव को ऐसा पता है इस कारण वह अपने उपयोग से बाहर नहीं जाता है । जिसमें किसी का प्रवेश नहीं हो सकता ऐसे गढ़ का नाम गुप्ति है, या कुछ भी मजबूत चीज हो उसका नाम गुप्ति है । इसमें यह मनुष्य होकर ठहरता है बढ़िया मकान बना हो, मजबूत किवाड़े हों तो किवाड़ों के बंद करके कैसे आराम से लोग सोया करते हैं और कभी खुली दालान वगैरह में रहने को मिले तो कितनी आशंका रहती है? निःशंक होकर सो नहीं सकते हैं, अधजगे सोते हैं क्योंकि अगुप्ति का भय है, गुप्ति नहीं है, सुरक्षित ओट नहीं है । पर ज्ञानी जीव के अंतर श्रद्धा की बात कही जा रही है । उसको यह विदित है कि मेरा अंतःस्वरूप परम सुदृढ़ है । इस स्वरूप में किसी अन्य का प्रवेश नहीं हो सकता, सो अपने स्वरूप में, प्रवेश में रहता हुआ यह प्राणी निर्भय बना रहता है ।

आत्मा में बल विकसित होने का स्वभाव―गुप्त प्रवेश न हो, खुला हुआ हो उसको अगुप्ति कहते हैं । वहाँ बैठने में अज्ञानी को भय उत्पन्न होता है । पर ज्ञानी ऐसा सोचता है कि जो वस्तु का निज स्वरूप है उसमें परमार्थ से दूसरी वस्तु का प्रवेश नहीं है । यही परमगुप्ति है, पुरुष का स्वरूप ज्ञान है । उस असाधारण ज्ञानस्वरूप में किसी अन्य का प्रवेश नहीं होता है । ऐसे सुदृढ़ श्रद्धान वाले पुरुष में भय कहाँ उत्पन्न होता है? जब जमींदारी खतम होने का कानून लागू हो रहा था उस समय लोग कितना भयशील थे कि इतनी बड़ी जायदाद, इतनी बड़ी आय का साधन यह सब समाप्त हो जायेगा, गुजारा कैसे होगा? इन्हीं प्रसंगों में जब बहुत-बहुत दुःखी होने लगे तो यह बल भी प्रकट हो गया कि जैसे इतने देश के बहुत लोग रहते हैं उस तरह से रह लेंगे, गुजारा हो जायेगा । उससे कम तो नहीं हो जायेगा । मुझे तो कोई न छुड़ा ले जायेगा । समय गुजरा, भय सब समाप्त हो गये ।

निर्भयता का मूल उपाय आकिंचन्य भावना―जितना आकिंचन्य की ओर मनुष्य बढ़ता है उतना ही उसे संतोष होता है । धनसंचय करके न किसी ने शांति पाया और न कोई शांत बन सकेगा । और धन का त्याग करके अथवा अच्छे कार्य में सदुपयोग करके न कोई पछता सकेगा । भाग्य में जितना होता है उतना ही रहता है । चाहे उसका जितना दान करें चाहे भोग करें अथवा दोनों बातें न करें तो नाश हो जायेगा―इन बाह्य समागमों की स्थितियों में इस आत्मा का कुछ कल्याण नहीं है । प्रत्येक स्थिति में अपने को आकिंचन्य अनुभव करो । धन हो अथवा न हो, धन के लिए बुरा बोलना, अच्छा बोलना उससे तो क्लेश ही बढ़ेंगे । गरीबी से भी अधिक क्लेश इसमें होता है । अपने माने हुए परिवार के वचन बाड़ भिद जाया करते हैं, उस समय में भी क्या औषधि है कि अपने क्लेश मिटें ? अपने आपको अकिंचन अनुभव करो । यही एक परम औषधि है । मैं आकिंचन्य हूँ अर्थात् मेरे स्वरूप के अतिरिक्त लोक में अन्य कुछ भी पदार्थ मेरा नहीं है । इस आकिंचन्य के अनुभव के प्रसाद से वे सारे क्लेश खतम हो जाया करते हैं ।

वचनसंयम का प्रताप एवं कुवचन की अनर्थता―विवेकी पुरुष तो अपने वचनों पर बड़ा कंट्रोल रखते हैं । किसी से वे बोलना ही नहीं चाहते । जब कोई अधिक गले पड़ जाये, आजीविका नष्ट होने को देखे अथवा अन्य कोई अपना बड़ा अहित होते देखे तो वह बोलता है अन्यथा वह कुछ बोलना पसंद ही नहीं करता है । बोल देने के बाद ये वचन फिर वापिस नहीं आते हैं । यदि कुछ खोटा बोल दिया तो बोल चुकने के बाद वे खोटे वचन वापिस नहीं आते । जैसे धनुष में से निकला हुआ बाण, छूटा हुआ बाण हो उससे कितनी ही मिन्नत की जाये, कितनी ही प्रार्थना की जाये कि ऐ बाण तू भूल से छूट गया है, अरे वापिस आ जा, तो वह वापिस नहीं आता । इसी प्रकार इस मुखरूपी धनुष से छूटा हुआ वचनबाण हो उससे कितनी ही मिन्नत करो, कितनी ही प्रार्थना करो तो भी वह वचन वापिस नहीं आ सकता । जिसमें निशाना करके मारा गया है उसे लगे बिना वापिस नहीं आ सकता है । यह मुख धनुष ही तो है । जब बोला जाता है तो मुख का आकार धनुष की तरह हो जाता है दोनों ओंठ ऐसा फैल जाते हैं जैसे खींचा हुआ धनुष । उस खिंचे हुए धनुष से बाण निकलता है । जब खोटे वचन बोले जाते हैं तो यह धनुष और तेज खुलता है । जब समतापूर्ण बात बोली जाती है तब इस धनुष का मुख थोड़ा ही खुलता है, पर जहाँ गुस्सा के वचन खोटे वचन बोले जाते हैं वहाँ पर यह बहुत ज्यादा खुल जाया करता है । यह वचनबाण निकलने पर कितना ही कहो कि भाई मेरी बात वापिस कर दो तो वापिस नहीं होती । यह सब अपने स्वरूप के वश में न रख सकने का परिणाम है ।

गुप्त स्वरूप के गुप्त रहने में गुप्ति―मन, वचन, काय को वश में रखना यही गुप्ति का सदुपयोग है । गुप्ति का अर्थ अप्रकट भी है और सुरक्षित भी है । जो रक्षा करे उसका नाम गुप्ति है । न तो छुपा हुआ इसका अर्थ है और न प्रकट हुआ इसका अर्थ है । जो रक्षा करे उसका नाम गुप्ति है । गुपू रक्षणे संस्कृत में धातु है, उससे गुप्ति शब्द बनता है । चाहे वह किला हो जो दुनिया को स्पष्ट दिखता है उसका भी नाम गुप्ति है और कोई अत्यंत छिपा हुआ हो वहाँ भी गुप्ति शब्द कहा जायेगा, क्योंकि कोई उस किले को नहीं भेद सकता है, वह मजबूत है और न कोई छिपे हुए पदार्थ को भेद सकता है क्योंकि वह दूसरे की नजर ही में नहीं है, सुरक्षित होने का नाम गुप्ति है । यह असाधारण चैतन्यस्वरूप पूर्ण सुरक्षित है ।

संश्लिष्ट होने पर भी असंश्लेष―अनादिकाल से अब तक यह आत्मतत्त्व इस विभाव और पर के निमित्त-नैमित्तिक बनने में ऐसा रह आया है कि एक तान होकर उनमें विस्तृत रहा । यह शरीर है और इस शरीर में जीव भरा हुआ है । तो कैसा घन भरा हुआ है कि इस शरीर के रग-रग में जीव मौजूद है । इस शरीर के अंदर जहाँ-जहाँ भी जो कुछ पोल है, नाक के छिद्रों में, कान के छिद्रों में, पोल में जीव प्रदेश नहीं है, क्योंकि वहाँ शरीर ही नहीं है, जहाँ शरीर की वर्गणाएँ है वहाँ सर्वत्र आत्मप्रदेश है, ऐसा सघन बँधा हुआ यह जीव है । जब शरीर हिले चले तो आत्मा का भी हिलना चलना होता है । जब यह जीव जाता है तो इस शरीर को भी जाना होता है । ऐसा इसका परस्पर निकट संबंध है तिस पर भी आत्मा का स्वरूप मजबूत और गुप्त है । न शरीर के स्वरूप में जीव का प्रवेश हो पाता है और न जीव के स्वरूप में शरीर का प्रवेश हो पाता है । ये दोनों अपनी-अपनी जगह अपने स्वरूप में गुप्त हैं, सुरक्षित हैं, स्वत: सिद्ध हैं । ऐसा अवगम इस ज्ञानी जीव को वस्तुस्वरूप के दर्शन में होता है । अत: उसे किसी ओर से भी भय नहीं रहता है ।

आत्मसावधानी में संकट की समाप्ति―भैया ! जब कभी भी कोई उपद्रव, संकट, झंझट, चिंता, राग-द्वेष कुछ भी अनर्थ होने को हो उसी समय यह सम्यग्दृष्टि पुरुष सावधान रहता है । जाता है तो जाओ । तो यह मैं जानता हूँ, परिपूर्ण हूँ, इतना मात्र हूँ, हमारा कुछ भी बिगाड़ नहीं होता है । ऐसा ज्ञानी पुरुष को दृढ़ बोध है अपने आपके स्वरूप के विषय में । यों तो कितनी ही सीमा में पुद्गल में भी बातें निरख सकते हैं । समुद्र के पानी में हवा का बहुत सघन स्पर्श है तब लहर चल रही है । उस लहर के साथ हवा का भी पूरे रूप से संबंध है, चिपका हुआ है, लेकिन हवा के स्वरूप में हवा ही है और पानी के स्वरूप में पानी ही है । कोई किसी को अपना स्वरूप नहीं सौंप देता है ।

सर्वत्र निज निज का अभ्युदय―दो मित्र मिलकर किसी एक काम को कर रहे हों और बड़ा आह्लाद मना रहे हों, सुखी हो रहे हों वहाँ पर भी प्रत्येक मित्र का मात्र अपने आपमें ही परिणमन हो रहा है । अपने से अतिरिक्त अन्य किसी भी पर में परिणमन नहीं हो पाता है। ऐसी वस्तु की मर्यादा ही है । ऐसा स्पष्ट बोध जिस ज्ञानी जीव के रहता है उसको अगुप्ति का भय नहीं होता । वह अपने सहज ज्ञानस्वरूप को ही अपने आपमें स्थित होता हुआ अनुभव करता है । सहज ज्ञानस्वरूप की एक परिस्थिति है अनुभव में और कैसा हुआ है इसके लिए बाह्यविषयक यथार्थ साधारण ज्ञान करके जो इस आग्रह पर उतर गया है कि समस्त परपदार्थ पर ही हैं, किसी भी पर से मेरा हित नहीं है । ऐसा बोध करने पर उसे उपेक्षा करने का बल प्रकट होता है । जब मेरा हितकारक नहीं है, मेरा मोक्ष का साधक नहीं है, आनंद की सिद्धि करा सकने वाला नहीं है तो बाह्यपदार्थों में क्या ममत्व करना? ऐसे उठे हुए अंतरंग वैराग्य परिणाम से यह जीव समस्त वस्तुओं से उपेक्षा कर देता है तो स्वयं ही अपने आप इसका जो अपना स्वरूप है ज्ञान स्वरूप, जाननमात्र, उस जाननमात्र भाव के ही जानने में लग जाता है । कोई विकल्प नहीं है । जो भी विकल्प होता है उसको भी यह कहकर कि तू परभाव है, तू दुःख देने के लिए उत्पन्न होता है, तू हट जा ।

विकल्पविनाश का बुद्धिपूर्वक साधन ज्ञानार्जन―भैया ! विकल्प के हटते ही स्वयं ही ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व का अनुभव होता है । इसके लिए बहुत-सी साधनाएँ करनी पड़ती हैं । उन साधनाओं में मुख्य साधना है ज्ञानार्जन, स्वाध्याय । ज्ञानार्जन करने के तीन-चार तरीके हैं । एक तो अकेले मुख से क्रमश: अध्याय करना । दूसरे प्रतिदिन प्रवचन करना, शास्त्र का वाचन कर लेना । इस प्रकार 10-12 मिनट पठन किया और तीन चार मिनट उसके सारभूत बात के विचार में लग जाये, इस प्रकार स्वाध्याय करना ज्ञानार्जन का साधन है । तीसरा साधन वीतराग भाव से आत्महित के भाव से जैन सिद्धांत तत्त्व की चर्चा करना । चर्चा करने से बहुत-सी बातें स्पष्ट प्रकट हो जाती हैं । और चौथा उपाय यह है कि एक वर्ष में एक माह को घर छोड़कर सत्संग में रहना, 1 माह को घर छोड़ने के बाद भी यद्यपि घर आना है फिर वह छोड़कर अंतरंग में रहने पर धर्म की ओर चलता है । इन तीन चार उपायों को अपने ज्ञानार्जन में लेकर अपने ज्ञानस्वरूप की मजबूती का भान कर लेगा तब अपने स्वरूप का भली प्रकार पता हो लेगा, तब समझिये कि यह जीव कृतकृत्य होने को तैयार है ।

वास्तविक वैभव―यथार्थ ज्ञान का हो जाना ही सर्वोत्कृष्ट वैभव है । ये सब समागम धन, कन, कंचन, राजसुख ये सब ही मिल जाते हैं, ये सब सुलभ हैं । जितना मिला है उससे कुछ और अधिक मिल जायेगा, दुगुना हो जायेगा तो उससे आत्मा की कौन-सी सिद्धि हो जायेगी? प्रत्युत व्यवस्था की धुनि हो जाने से इस बाह्य संपदा से क्लेश ही मिलेगा । गृहस्थावस्था है, आजीविका चलाना है, यह तो कर्तव्य ही है करो, पर धन कमाना अपने हाथ की बात नहीं है, केवल उद्यम करना ही अपना कर्तव्य है । उसे उपेक्षा भाव से करो और अपने ज्ञानार्जन को मुख्यता दो तो अपने इस गुप्त आत्मा का भान होगा और यह बल मिलेगा कि किसी भी समय मेरे में पर से कोई आपत्ति नहीं आया करती है ।

पर से मेरे बिगाड़ का अभाव―परपदार्थों का मेरे में कदाचित् भी प्रवेश नहीं हो सकता है । हम बिगड़ते हैं तो अपने आपकी परिणति से बिगड़ते हैं, सुधरते हैं तो अपने आपकी परिणति से सुधरते हैं । ऐसा इस ज्ञानी जीव के अपने दृढ़ स्वरूप का भान है, अत: उसको अगुप्ति भय नहीं होता । वह तो निःशंक होता हुआ निरंतर स्वयं ही अपने अनादि अनंत अहेतुक असाधारण सहज ज्ञानस्वरूप का ही अनुभव किया करता है । इस प्रकार इस भय के प्रकरण में अगुप्तिभय से सम्यग्दृष्टि पुरुष दूर है, इस बात का वर्णन किया ।

मरणभय

ज्ञानी के मरणभय का अभाव―सम्यग्दृष्टि जीव चूँकि आत्मस्वरूप से परिचित है और आत्मा के शुद्ध ज्ञायकस्वरूप के उपयोग के कारण परमआनंद का स्वाद ले चुका है, अत: अब उसे विश्व में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता है । वे भय 7 प्रकार के होते हैं, उनमें से एक लौकिक जनों को बड़ा भयंकारी भय है मरण का, किंतु ज्ञानी जीव को मरण का भय नहीं होता ।

गति व आयु की प्रकृति में अंतर―नारकी जीवों को छोड़कर बाकी सभी अज्ञानी जीव मरण से डरते हैं । नारकी मरण को चाहते हैं पर उनका असमय में मरण हो नहीं सकता । गतियों में दो गतियां पुण्य हैं और दो गतियाँ पाप हैं, किंतु आयुओं में एक आयु पाप है और तीन आयु पुण्य हैं । नरक आयु तो पापप्रकृति है और तिर्यंच, मनुष्य, देव ये तीन आयु पुण्यप्रकृति हैं । गतियों में नरक गति और तिर्यंचगति ये दो गतियाँ पापप्रकृति है किंतु मनुष्यगति और देवगति ये दो गतियाँ पुण्यप्रकृति हैं । इस विषमता का क्या तात्पर्य है कि तिर्यंचगति के जीव अपनी अवस्था को बुरी अवस्था मानते हैं, दुःखी भी होते रहते हैं पर मरण नहीं चाहते हैं । कैसा ही क्लेश हो तिर्यंचों को पर मरण नहीं चाहते हैं । तिर्यंचों को आयु प्रिय है इस कारण वे आयु चाहते हैं, और नारकी जीव अपनी वर्तमान अवस्था को भी नहीं चाहते और मरण चाहा करते हैं इस कारण उन्हें अपनी आयु प्रिय नहीं है । सो नरक आयु केवल पापप्रकृति है, पर वे मरण चाहते हैं यह एक स्थूल दृष्टि से है पर अंतर से तो कोई भी जीव अपना विनाश नहीं चाहता ।

आत्मा का परमार्थ प्राण―मरण कहते हैं प्राणों के उच्छेद हो जाने को, विनाश हो जाने को । पर आत्मा का प्राण क्या है? प्राण उसे कहते हैं जो वस्तु के सत्त्व का मूल आधार हो । आत्मा के सत्त्व का मूल आधार इंद्रिय नहीं, किंतु ज्ञान, दर्शन, चैतन्य स्वभाव है । आत्मा में ज्ञान दर्शन चैतन्य स्वभाव न हो फिर आत्मा रह आये ऐसा नहीं हो सकता है, क्योंकि आत्मा के सत्त्व का मूल आधार लक्षण ज्ञान दर्शन है । अत: आत्मा का परमार्थ प्राण ज्ञानस्वरूप है । सो वह ज्ञान शाश्वत है, स्वयमेव है वह कभी भी किसी भी प्रकार छिद नहीं सकता, वियुक्त नहीं हो सकता । इस कारण इस ज्ञान का मरण ही नहीं है । जब इस ज्ञान का मरण नहीं है तब ज्ञानी जीव को भय किस बात का? सबसे बड़ा विष जीव के साथ लगा है तो मोही, मलिन, मायावी, तुच्छ पुरुषों में मेरा नाम हो जाये यही विष लगा है । यह सारा जगत मायामय है । और संभव है कि जिस जीवलोक में हम अपना नाम जताना चाहते हैं वह जीवलोक अपने से भी निम्न दशा में हो । और प्राय: ऐसा है । तो मायामय, असार, मलिन, दु:खी, मोही प्राणियों में नाम की चाह यह सबसे बड़ा भयंकर विष है । जीव संज्ञी और समर्थ होकर भी इस ख्याति की आन में चलकर अपने प्राणों को भून डालते हैं ।

नाम किसका―ये जो नाक, आंख, कान हैं, जिनका फोटो उतारता है क्या उनका नाम चाहते हो? यह लोक की दृष्टि में बड़ा उच्च जंच जाये तो इससे क्या आत्मा का संसार कट जायेगा? मरण होने पर क्या वे नरक तिर्यंच निगोद गतियाँ छूट जायेंगी? किसका नाम चाहते हो? जो तू है सो तेरा नाम नहीं है । तू बिना नाम का चेतन है । तू अपने आपको देख । तू बाहरी वस्तुओं को देखता है कि यह भींत है, यह खंभा है । जरा अंतरदृष्टि करके अपने आपके भीतर इस स्वरूप को निहारो, यह तो सर्व साधारण एक चित्प्रकाशमात्र है । इसका कुछ नाम है क्या? कोई इसको जानता हो तो नाम भी धरे, पर दुनिया के लोग इस मुझको जानते कहाँ है? फिर नाम किसका? इस मुझ आत्मा का संबंध मेरे अन्य लोक से बाहर रंच मात्र भी नहीं है । कहाँ नाम चाहते हो? किसको बताना चाहते हो? अपनी करनी अच्छी होगी तो अपने को लाभ मिलेगा । अपनी करनी बहिर्मुखता की है तो उसमें अपने प्राणों का विनाश है । बाहर कुछ मत ढूंढों । जो कुछ किया जाये वह अपनी विशुद्धि के लिए किया जाये, विषय कषायों से हटते हुए रहना यह बहुत बड़ा लाभ है ।

विषय दावाग्नि―भैया ! पंचेंद्रिय का विषय यह है दावाग्नि । इन विषयों की चाह यही है भयंकर दहन । इसमें जगत के जीव जले जा रहे हैं । इसको बुझाने के लिए समर्थ केवल ज्ञानजल है । उस ज्ञान के द्वारा इन विषयों से निवृत्ति पायें तो आत्मा को हित का मार्ग मिलेगा । मनुष्य को कुछ न कुछ काम चाहिए । यदि निर्विकल्प समाधि में ही रह सको तो रहो, पर एक रूखी धर्म की धुनि बनाकर कि अपना ही काम करो, अपना ही हित करो, ऐसी रूखी धुनि करके और साधर्मी जनों की सेवा से दूर रहकर कर्तव्यव्यवहार से कर्तव्यमार्ग से पृथक् रहकर सेवा के कार्य से निवृत्त रहकर तो न अपना ही कार्य बन पाता है और न लौकिक प्रसन्नता भी साथ रह पाती है । सूना-सूना सा रहता है । अपने मन का मिट्ठू हुआ बना रहता है । हमारा आपका मुख्य काम क्या है स्वाध्याय करना ज्ञान ध्यान समाधि में रहना, सो इतना तो हो नहीं पा रहा है और इसके एवज में पर्याय बुद्धि रहती है । कितनी ही दुनिया की खोटी बातें हृदय में आती रहती हैं, अपना विषय वासना की बातें मन में आती हैं; अपना कर्तव्य है कि ऐसी वृत्ति में लगें, ऐसी परसेवा में लगें जिससे ये भयंकर विषयकषाय के भाव हमसे दूर हो सकें ।

परसेवा का उद्देश्य―परसेवा का उद्देश्य विषय-कषायों से निवृत्ति पाना है । और देखते ही हो कि कभी किन्हीं रोगी, दु:खी, कोढ़ी पुरुषों के बीच से निकलो तो वहाँ परिणाम कैसा बदल जाता है? वहाँ परिणाम भाव नहीं सता पाते हैं । परसेवा प्रसंग विषयकषायों की निवृत्ति का उद्देश्य लिए हुए है । इस जीव का इस लोक में कोई साथी नहीं है । जिसको अपना घर मान रखा है और जिन घर वालों के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया जाता है, अन्य जीवों के समान वे भी अत्यंत भिन्न हैं । उनसे मोह बसाने से क्या प्राप्त होता है? अंत में हाथ रहता भी कुछ नहीं है । यह हंस अकेला का अकेला ही रहता है । इसका कोई सहाय नहीं होता है । जिसने इस जीवन में निर्मल शुद्ध ज्ञायकस्वरूप का लक्ष्य करके अपने आपका पोषण किया है वही पुरुष कल्याण का पात्र हो सकता है ।

परमार्थ मरण व काल्पनिक मरण―भैया ! संसार के सभी जीव मरण से डरते हैं पर मरण तो वास्तविक निरंतर जीव का प्रतिसमय होता जा रहा है । विभाव परिणामों को करके जो शुद्ध ज्ञानस्वभाव का विकास बन रहा है ज्ञान सुधारस का स्वाद नहीं लिया जा सकता है वह मरण ही तो है । जैसे आजकल पतली बरसाती चादर आती है । कागज से भी अधिक पतली होती है उसको मुंह के आगे लगाकर पानी में डूबे हैं, उसके ऊपर पानी लबालब भरा है पर पानी अत्यंत दूर है । उस पानी का एक बूँद भी मुँह में नहीं जा सकता है । पानी और मुँह के बीच में कागज से भी पतला एक प्लास्टिक का पर्दा है, सो पानी का स्वाद नहीं लिया जा सकता है । इसी तरह अत्यंत निकट और निकट ही क्या, स्वयं ज्ञानघन आनंदमय यह आत्मतत्त्व है पर इस आत्मतत्त्व और सदुपयोग के बीच विषय-कषायों का अमूर्तिक अत्यंत पतला जिसमें लंबाई चौड़ाई मोटाई कुछ नहीं है, न कोई पिंडरूप है, हवा से भी पतला अमूर्तिक विषय-कषायों का पर्दा पड़ा हुआ है जिसके कारण इस परमात्म रस का स्वाद नहीं लिया जा सकता है । यह परमार्थ प्राणाघातरूप प्रतिसमय मरण हो रहा है इस मरण की ओर तो दृष्टि नहीं है किंतु इस जगत के जीव इस शरीर के मरण से डरा करते हैं । मरण से डरें तो वास्तविक मरण से डरें । यह तो कोई मरता नहीं है यह तो पुरानी कुटी से निकलकर नई कुटी में पहुंचने जैसी बात है । यदि अपना आत्मतत्त्व अपनी दृष्टि में है तो भय किस बात का है? और अपना आत्मतत्त्व अपनी दृष्टि में नहीं है तो निरंतर मरण हो रहा है । वह जीना भी मरण से बुरा है, जिस जीने में जीव न दिखता हो, परमात्मस्वरूप का दर्शन न हो सकता हो, मोह अंधकार में भी बुरा है ।

अज्ञानी की त्रुटि के परिचय का अधिकारी―भैया ! इस मोही जीव पर हंसी करने वाला ज्ञानी ही हो सकता है । अज्ञानी तो उसका समर्थन करता है । तुमने बहुत अच्छी कला खेली है, तुमने बड़ी सुंदर व्यवस्था बनायी है―इस तरह से अज्ञानी तो उसका समर्थन किया करता है । अज्ञानी की गलती पर ज्ञानी ही एक मधुर हास्य कर सकता है । अहो कितना व्यर्थ का ऊधम ये जीव कर रहे हैं? कितना बाहरी पदार्थों की पकड़ में ये जीव लगे हुए हैं और अपने आपके प्रभु का घात किए जा रहे हैं । ज्ञानी पुरुष के तद्भव मरण का भय नहीं है । यह अपने आपकी दृष्टि में यथार्थ रूप से बना रहे तो यह तो सदा हराभरा है । इसका मरण कहाँ है? ज्ञानी जीव मरण भय से दूर रहता है, निःशंक रहता है । जिसने अपने आत्मा से रिश्ता लगाया उसको मरण नहीं दिखता, जिसने निज सहजस्वरूप ज्ञानमय अपने आपको ही माना उसको यहाँ कोई भय नहीं है ।

मरणभय के प्रधान कारण―भैया ! मरण के समय जीव को दो प्रकार के भय होते हैं―एक तो बड़ी मेहनत से धन जोड़ा, कुटुंब परिवार मिले वे सब छोड़ने पड़ रहे हैं, एक तो इस आशय की चोट लगी है । दूसरे शरीर जो उसे प्रिय लग रहा है, उस शरीर से प्रेम है, उस शरीर से प्राण जंत्री में से चाँदी के तार की तरह खिंचकर जाना होता है तो शरीर के मोह से वह अपने में दुःख मानता है । जिस ज्ञानी पुरुष के अपने शुद्ध स्वरूप की दृष्टि है अर्थात् अपने आप यह मैं आत्मा जो सत् हूँ, जो मुझमें सर्वस्व है, जिस स्वरूप से मेरा निर्माण है, जिस स्वरूपमय मैं स्वरसत: हूँ ऐसे उस प्रतिभासमात्र स्वरूप का अनुभव किया है उसे किसी भी परपदार्थ से मोह नहीं रहता है । सभी पर पृथक् हैं । जहाँ पर से मोह नहीं रहता वहाँ मरण का भय भी नहीं रहता है । ज्ञानी पुरुष मरण के भय से सदा दूर रहता है । वह तो निःशंक होता हुआ निरंतर स्वयं अपने ज्ञानस्वरूप का अनुभव करता है ।

मरण के भेद―मरण दो प्रकार के होते हैं―एक तद्भव मरण और एक आवीचि मरण । दोनों ही व्यवहारनय से हैं । तद्भव मरण इस आयु का समाप्त हो जाना है अर्थात् इस भव से वियुक्त हो जाना यह होता है तद्भव मरण । और आवीचि मरण क्या है कि प्रत्येक समय में आयु के निषेक खिरते हैं और उनके खिरने से यह बात हो जाती है कि अब आत्मा तो इस समय को भी मरण गया है, अर्थात् जीवन का यह क्षण भी चला गया । आयु कम हो जाना, जीवन का वह क्षण चला जाना यही है आवीचि मरण । ये दोनों मरण व्यवहारनय से हैं । परमार्थत: इसका मरण जो हो रहा है वह यही है कि ज्ञान का पूर्णविकास नहीं है, शुद्ध ज्ञानमात्र रह नहीं पाता है । यही इस प्रभु का निरंतर मरण है । किंतु विशुद्ध परमार्थ दृष्टि से निरखें तो यह अपने अंतर के मरणरहित अनादि अनंत सदा नित्य प्रकाशमान बना हुआ है ।

स्वयं की स्वयं से अत्यंत दूरी का कारण―भैया ! जो अपने प्रभु को नहीं देख पाता है उसके लिए यह अपना प्रभु उतना दूर है जितना कि मुँह के आगे बरसाती झीनी चादर । चादर के आगे पानी भरा हुआ है पर स्वाद नहीं लिया जा सकता । ऐसा ही उसके लिए यह परमात्मा अत्यंत दूर है । जिसकी ओर पीठ कर ली है उसकी ओर दृष्टि करना है और जिसकी ओर दृष्टि कर ली है उससे मुंह फेरना है । ऐसा उपयोग हो तो आत्मदृष्टि से आत्मा का ग्रहण कर सकते हैं । अज्ञानी जीव के तो निज परमात्मतत्त्व से पीठ फिरी हुई है । यह जीवलोक जहाँ दृष्टि लगाये हैं वहाँ से पीठ फेर ले और जहाँ पीठ फेरे हुए है वहाँ पर दृष्टि लगा ले तो फिर उसके मुक्ति का उपाय बनने में विलंब नहीं है । ज्ञानी पुरुष कुछ खेद करता है । तो वह अपने ज्ञान प्राण के मरण पर खेद करता है । वह शरीर के मरण पर खेद नहीं करता है । वह ज्ञानी पुरुष दुनिया में कोई अपनी कीर्ति नहीं चाहता है । वह ज्ञानीपुरुष लोक में झूठा नाम फैलाने की धुन करके अपने को बरबाद नहीं करता है । वह इस शुद्धज्ञायकस्वरूप का ही अनुभव करके तृप्त रहना चाहता है । उसके लिए मरण कुछ नहीं है । इस प्रकार ज्ञानी पुरुष मरण के भय से निवृत्त होकर निःशंक होकर निज ज्ञान का ही अनुभव करता है ।

अपवित्रता और पवित्रता―सबसे बड़ा संकट है बहिर्मुखता, सबसे बड़ी मलिनता है बहिर्मुखता । यह सब व्यवहार से है । आत्मा अपवित्र बनता है तो बहिर्मुखदृष्टि से । उस अपवित्रता से कुछ नुकसान नहीं है यदि अनाकुलता न हो, पर बहिर्मुखता से ही इसके आकुलता आती है । सबसे बड़ी अपवित्रता है जीव की बहिर्मुखता । जो अंतर्मुख है, अपने भीतर के वैभव को पहिचानता है वह पवित्र है, पवित्रता है । यह अमूर्त ज्ञानमात्र है, आकाशवत् निर्लेप है । यह ज्ञान प्रकाश इस ज्ञानी के ज्ञान में आ जाये तो उससे बढ़कर पवित्रता इस लोक में हो नहीं सकती है । यही सच्चा जीवन है, यही सच्ची आत्मवर्तना है इसके प्यासे होते हैं ज्ञानी पुरुष । ज्ञानीपुरुष परवस्तु के प्यासे नहीं होते हैं । बहिर्मुखता एक महासंकट है क्योंकि वह कोरा भ्रम है । जहाँ मिलना-जुलना कुछ नहीं केवल भ्रमभरी कल्पनाएं बढ़ रही हैं, उनके विषय होते हैं परपदार्थ ।

निर्भ्रांति में अनाकुलता का दृष्टांत―जैसे कोई पुरुष कुछ भ्रम करके दुःखी हो, रस्सी को साँप जान करके भ्रम करके घबड़ायेगा, पर जिसे मालूम है कि यह कोरी रस्सी है तो वह उस भ्रमी पुरुष पर बड़ी समीक्षा प्रकट करता है । अहो कुछ भी तो बात नहीं है, यह दुःखी हो रहा है । उसे समझाता है कि क्यों दु:खी होते हो, वहाँ तो कुछ भी नहीं है, कोरी रस्सी है । तब उसकी समझ में आता है, ऐसा लगता है कि अहो इतना समय व्यर्थ ही कल्पना में बिताया है । इस घर में तो कुछ डर की बात ही न थी । जब ज्ञान जागृत होता है, वस्तु की स्वतंत्रता विदित होती है, समस्त वस्तुओं से विविक्त यह आत्मतत्त्व ज्ञान में आता है तब समझ में बात आती है कि अहो व्यर्थ ही इस भ्रमपूर्ण संकल्प विकल्प में पड़कर इतना काल व्यतीत कर डाला । ज्ञानी पुरुष के यथार्थ ज्ञान होने पर फिर शंका नहीं रहती है ।

जागृति में काल्पनिक भय की समाप्ति―जैसे किसी को स्वप्न आ रहा हो कि मैं जंगल में जा रहा हूं, सामने से सिंह आ रहा है, मुझ पर आक्रमण करने के लिए दौड़ रहा है, मैं चादर ओढ़े हुए अपनी जान चादर में छिपाता जा रहा हूँ, पर उसने तो तीव्र हमला कर दिया, चादर भी नुच गया, ऐसा स्वप्न जब आ रहा हो उस ही प्रसंग में घबड़ाकर ही नींद खुल जाये और आँख खोलकर देखता है कि मैं तो यहाँ अपने घर में बड़े सजे सजाए कमरे में बैठा हुआ हूँ, तो उसके भय एकदम समाप्त हो जाता है । क्या रंच भी शंका है अब उसके? नहीं है, क्योंकि जग गया है । इसी तरह जब तक मोह की नींद इस ज्ञानी को दबाए हुए है, जब तक इसके पर्यायबुद्धि लगी है, जब तक यह ज्ञानस्वरूप को नहीं जान पाता तब तक इस पर्याय की बिगाड़ को यह अपना बिगाड़ मानता है । सो पर्याय तो अध्रुव है, उसका तो बिगाड़ नियम से होता है । तो जब विनाश का, बिगाड़ का, वियोग का समय आता है तब यह ज्ञानी बड़ा दु:खी होता है । क्योंकि मोह की नींद में परवस्तु का वियोग मान करके यह एक स्वप्न बना रहा है । कभी इसे बोध हो जाये । अहो कहाँ हूँ मैं इस शरीररूप? मैं तो चैतन्यमात्र यह सत् हूँ । इस प्रकार अपने शुद्ध स्वरूप का यथार्थ बोध हो जाये तो फिर इस ज्ञानी पुरुष को क्या मरण का भय सता सकता है? नहीं ।

स्वरूपगृहीता के मरणभय का अभाव―भैया ! सबसे बड़ा वैभव है अपने स्वरूप की पकड़ । किससे बात करना, किससे संबंध बनाना, किससे दिल मिलाकर रहना, किसमें विश्वास बनाना? यहाँ तो परमाणुमात्र भी अन्य पदार्थ हमारी शरण नहीं है । उदयवश चलना फिरना पड़ता है, रहना पड़ता है । भूख प्यास की वेदना धर्ममार्ग से विचलित कर सकने का भी कारण बन जाती है । उसकी व्यवस्था बनानी पड़ती है, हो रहा है सब कुछ, पर मेरा रिश्ता किसी से कुछ नहीं है । ये सब भी बलायें हैं, विपत्तियाँ हैं, इन सबसे विविक्त निरापद अपने स्वरूप की जो दृष्टि करता है वह ही पुरुष निःशंक रहता है । सर्व से प्रधान भय मरण का भय है । मरणभय ज्ञानी पुरुष के नहीं रहता है । इंद्रिय आदिक प्राणों के विनाश को ही तो इस लोक में मरण कहते हैं । और ये इंद्रिय आदिक प्राण आत्मा के परमार्थस्वरूप नहीं हैं । निश्चय से इस आत्मा का ज्ञान ही प्राण है । वह प्राण अविनाशी है, इस कारण आत्मा का मरण ही नहीं है । ऐसा स्पष्ट बोध रहने से ज्ञानी पुरुष के मरण का भी भय नहीं रहता । वह तो निःशंक होता हुआ अपने ज्ञानस्वरूप का ही स्वयं निरंतर अनुभव किया करता है । यों ज्ञानी पुरुष मरण भय से अत्यंत दूर है ।

लोकभय के अभाव का पुन: संक्षिप्त विवरण―सम्यग्दृष्टि जीव सातों भयों से रहित होता है । उन सातों भयों में से 6 प्रकार के भयों का वर्णन हो चुका है, आज सप्तम भय का वर्णन चलेगा । इस 7 वें भय का नाम है आकस्मिक भय । इसके पहिले 6 भय आ चुके थे । इह लोकभय अर्थात् मेरा इस लोक में कैसे गुजार हो, कैसे नियम कानून बनेंगे, संपत्ति रहेगी अथवा नहीं । इहलोक में सम्यग्दृष्टि जीव को भय नहीं होता है । इस लोक में उसे भय नहीं होता क्योंकि इस दिखते हुए लोक को वह लोक ही नहीं मानता । अपने आत्मा का जो स्वरूप है, स्वयं आत्मा है वह ही उसका लोक है । परलोक का भय यह कहलाता है कि परभव में मेरी कैसी गति होगी, किसी खोटी गति में उत्पन्न हो गया तो फिर क्या गुजरेगा? इस प्रकार का भय करना परलोक भय है । ज्ञानी जीव को परलोक का भय यों नहीं होता है क्योंकि उसके लिए परलोक, परलोक ही नहीं है, किंतु पर अर्थात् उत्कृष्ट निजलोक मायने ज्ञायकस्वभाव ही मेरा परलोक है । वह जानता है कि मैं अपने इस ज्ञायकस्वभावमय उत्कृष्ट लोक में रहता हूँ तो यहाँ कोई शंका ही नहीं आती है ।

मरणभय व अत्राणभय के अभाव का पुन: संक्षिप्त विवरण―तीसरा भय है वेदनाभय । शरीर में पीड़ा होगी तो कैसी होगी-ऐसी आशंका हो जाती अब क्या होगा? यह रोग बढ़ जायेगा तो कैसी वेदना होगी, ऐसा ही डरने का नाम वेदनाभय है । ज्ञानी को यह वेदना का भय नहीं होता है क्योंकि वह जानता है कि जो ज्ञान वेदा जाता है वही तो वेदना है । वेदना किसी दूसरे तत्त्व का नाम नहीं है । वेदना शरीर में नहीं होती है । वेदना आत्मा में होती है और वेदना ज्ञान की वेदना होती है । वेदना का अर्थ जानन है । किसी भी प्रसंग में वह जानता है, किंतु किसी पर को न वह करता है, न भोगता है । जब वेदना मेरे स्वरूप से बाहर ही नहीं है तो भय किसका हो उसे? ज्ञानी जीव को अत्राण भय भी नहीं होता है । मेरी रक्षा कैसे हो, मेरा रक्षक कोई नहीं है ऐसा वहम सम्यग्दृष्टि पुरुष के नही होता है क्योंकि वह जानता है कि यहाँ भी मेरी रक्षा कर कौन रहा है? जब तक उदय अनुकूल चलता है चार आदमी मुझे पूछ लेते हैं, अथवा वे चार आदमी भी पूछते नही हैं, वे भी अपने में कषाय भाव बनाते हैं और उन कषाय भावों के अनुसार होने वाली चेष्टा हमारे सुख का निमित्तभूत होती है । ये भी कोई शरण नहीं हैं । तो अन्यत्र मेरा कौन शरण होगा? वास्तविक शरण तो मेरा मैं ही हूं । मैं स्वतःसिद्ध हूँ, अत: अपने पास स्वरक्षित हूँ । सम्यग्दृष्टि पुरुष के अत्राण भय नही होता ।

अगुप्तिभय व मरणभय के अभाव का संक्षिप्त विवरण―सम्यग्दृष्टि से अगुप्तिभय भी नहीं है । जैसे लोगों को यह भय हो जाता है कि हमारे घर की भींत कच्ची है, ऊँची नहीं है, दरवाजा छोटा है तो शत्रु अथवा डाकू कहीं से भी आक्रमण कर सकते हैं । कैसे मेरी रक्षा हो, मैं तो अरक्षित हूँ । ज्ञानी पुरुष के यह भय नहीं होता है क्योंकि वह जानता है कि मैं अपने स्वरूप में ऐसा गुप्त हूँ और अपने स्वरूप के ऐसे दृढ़ किले में रहता हूँ कि उसको कोई तोड़ नहीं सकता, भेद नहीं सकता । ऐसा ज्ञानी संत का दृढ़ निर्णय है, इस कारण उसे अगुप्तिभय नहीं रहता । छठवें भय का नाम है मरणभय । इसका वर्णन कल हो चुका था । ज्ञानी को मरण का भय इसलिए नहीं होता कि उसे विश्वास है कि मेरा मरण ही नहीं हुआ करता, भय किसका मानें? मेरा प्राण है ज्ञानदर्शन, जिसका उच्छेद नहीं होता । प्राणों के उच्छेद का ही तो नाम मरण है । मेरे प्राणों का विनाश नहीं है । मैं सदा ज्ञानदर्शनस्वरूप रहता हूँ । यदि प्राण ही मेरे चले जाएं तो इसका अर्थ यह है कि मैं असत् हो गया अर्थात् मेरा कुछ भी न रहा । सो लोक में ऐसा होता ही नहीं है कि जो हो उसका समूल अभाव हो जाये । ऐसा एक भी दृष्टांत न मिलेगा । ईंधन है, जलकर राख हो जाता है पर उसका अभाव नहीं हो जाता है । उसके परमाणु धुआं बनकर सब फैल गए, कुछ परमाणु राख की शकल में आ गए, और राख उड़ जाये तो उसके छोटे-छोटे कण के रूप में सर्वत्र फैल गए । दिखे भी नहीं तो भी उसका सत्त्व कहीं नहीं गया । जितना सत् है, जितने परमाणु हैं, जितने पदार्थ हैं उनका तीन लोक में भी अभाव नहीं हो सकता । मेरा कभी अभाव ही नहीं होता है । अज्ञानी तो मरण में इस बात को रोता है कि हाय मेरा घर छूटा, हाय मेरे लड़के छूटे, हाय मेरे घर के लोग छूटे, इसका खेद उस अज्ञानी को होता है । ज्ञानी को रंच भी खेद नहीं है । मरण का भय उसे नहीं है ।

आकस्मिक भय

ज्ञानी के आकस्मिक भय का अभाव―अब बतलाया जा रहा है कि इस जीव को आकस्मिक भय भी नहीं होता है । आकस्मिक भय उसे कहते हैं कि किसी ओर से अकस्मात् कोई उपद्रव आ जाये, उपसर्ग आ जाये । पर ज्ञानी जानता है कि यह तो मैं ज्ञानस्वरूप ही हूँ । अनादि अनंत हूँ, अचल हूँ, स्वतःसिद्ध हूँ । जब तक यह है जितना यह है उतना ही यह है । यहाँ दूसरी चीज का प्रवेश ही नहीं हो सकता है । किसी भी परपदार्थ से मुझमें आयेगा क्या? अनादि काल से अब तक मुझ में अनंत कार्माणवर्गणाओं का पुंज निमित्त-नैमित्तिकरूप से एक क्षेत्रावगाहरूप से बंधनरूप को बनाता हुआ चला आया है तिस पर भी एक भी अणु मुझमें प्रवेश नहीं कर सकता । मेरे क्षेत्र में प्रवेश कर गया हो, पर मेरे स्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकता है । मैं वही का वही रहा । एक बहुत मोटी बात है―एक गिलास में पाव-पाव भर दूध और पानी मिला दिए गए, वे एक जगह आ गए फिर भी दूध के अंश में पानी प्रवेश नहीं कर सकता और पानी के अंश में दूध प्रवेश नहीं कर सकता । जब सजातीय स्कंधों में भी बेमेलपना देखा जाता है तो ये तो अत्यंत विजातीय पदार्थ हैं―आत्मा और पुद्गलकर्म । वे कैसे एक हो सकते हैं? ऐसा इस ज्ञानी संत के दृढ़ निर्णय है, उसमें किसी चीज का प्रवेश नहीं होता है ।

वहम, सितम, गजब―अपने आपके प्रभु का जो शुद्ध ज्ञानस्वरूप है जिसका केवल वही निज स्वरूपास्तित्व है, जिसमें रंच भी आपत्तियाँ नहीं हैं, कष्ट नहीं है, क्षोभ भी नहीं है, ऐसे अपने परमपिता परमेश्वर कारणसमयसार की दृष्टि न देकर यह जीव कितना विह्वल हो रहा है कितनी शंकाएं मचा रहा है? आज कुछ गजब न ढा जाये । इस दुनिया में गजब क्या होगा? यही कि धन का नुकसान हो गया । अरे इससे मुझ आत्मा पर क्या गजब है? धन तो पुद्गल का स्कंध है, आना-जाना तो उसके स्वरूप में है । वह यहाँ न रहा, किसी दूसरी जगह चला गया । क्या सितम ढा गया आत्मा पर और गजब क्या कहलाता है? परिवार का कोई मर गया, बिछुड़ गया, चला गया, क्या गजब हो गया? तो तू यह भ्रम किए था कि ये मेरे कुछ हैं; थे कुछ नहीं । जैसे जगत के अनंत जीव हैं वैसे ही ये परिजन के जीव हैं । इनसे मेरा रंचमात्र भी संबंध नहीं है । फिर भी संकट क्या हुआ? बस उस भ्रम का सहारा टूट गया, इसी को ही गजब कहा करते हो ना? तुम्हारे बहम का आश्रय मिट गया यह तो आनंद की बात होना चाहिए था, कि लो अब मेरे विकल्प का आश्रय नहीं रहा, अब मैं अंतरोंमुख रह सकूँगा, पर इस जीव ने अपने आप ही अपने पर अपनी भूल से सितम ढा रखा है । सितम कहते हैं जुल्म को और गजब क्या होगा? यही गजब हो सकता है कि दुनिया के लोग मेरा अपयश करेंगे, निंदा करेंगे । यह तो जीव के गजब की बात नहीं है ।

निंदा में विपत्ति का भ्रम―भैया ! धन के न होने से तो थोड़ा वर्तमान में इतना क्लेश हो सकता है कि अब रोटी कैसे खाये, पेट कहाँ से भरें? अपने परिवार के लोग न रहने से थोड़ी यह बात अनुभव की जा सकती है कि मुझे खाने पीने, नहाने धोने को कौन आराम देगा? सो उनके उपयोग से तो कुछ साधारणतया माना भी जा सकता है कि थोड़ी तकलीफ हो गई, पर एक-दो, दस या सर्व जगत के जीव एक स्वर से मिलकर निंदा की बात कहने लगें तो उससे तो यहाँ कुछ बाधा नहीं हो सकती है । मानने के लिए तो जिस चाहे बात को बाधा मान लें । गजब और दुनिया में क्या होगा? एक बड़ा यह भी अपराध चल रहा है कि मोही मलिन पुरुषों के मुख से दो बातें सुनकर अपने आपको भूल जाते हैं और ज्ञान को गड्ढे में पटक देते हैं । उसे गजब नहीं मानते हैं।

स्वच्छंदता की अहितकारिता―मोही जीवों को जो अपने को परपरिणति प्रतिकूल लगती है उसे तो समझते हैं कि यह अनहोनी हो रही है और जो परपरिणति अपने को अनुकूल जंचती हैं उसे मानते हैं कि यह बात तो मेरे जैसे नवाब के लिए होना ही चाहिए । पर ये सारे विभाव आत्मा पर क्लेश के लिए ही आये हुए हैं । ये सब किसी परपदार्थों से नहीं आये, कर्मों से नहीं आये हैं । कर्मों का उदय तो निमित्तमात्र है । ये विभाव मेरी ही अज्ञानपरिणति से उठे हुए हैं । मुझ पर कोई विपत्ति आती है तो मेरे ही अज्ञान परिणमन से आती है, किसी अन्य पदार्थ से नहीं आती है । हममें आकस्मिक कोई विपत्ति ही नहीं है । किसी अन्य से विपत्ति नहीं आती । हम अपने को सम्हाले रहें सावधान बनाए रहें और मेरे ही किसी परिणाम से मुझे विपत्ति आ जाये सो ऐसा भी आकस्मिक उपद्रव नहीं है ।

ज्ञान व आत्मा का अभेद―यह ज्ञान एक है, अखंड है, बिखरा हुआ नहीं है । स्वरूप को देखो तो इसमें लंबाई, चौड़ाई, मोटाई नहीं है । लंबे, चौड़े रूप में फैले हुए ढंग में अनुभव होता है तो आनंद का अनुभव होता है, किंतु ज्ञान का अनुभव लंबे चौड़े फैले हुए ढंग से नहीं होता है । फैले हुए ढंग से ज्ञान का अनुभव होगा तो कितना ही लंबा चौड़ा फैले हुए ढंग से अनुभव होगा, पर आनंद का अनुभव होगा तो केवल आत्मप्रदेश मात्र में हो जायेगा । यह ज्ञान एक है, अखंड है, ज्ञानमय आत्मा एक पदार्थ है, अनादि है, अनंत है, अचल है । ज्ञान अथवा आत्मा कहो, इसमें भेद न डालना । ज्ञानगुण का भेद वस्तु के निहारने का आनंद खो देता है । यह ज्ञान स्वतःसिद्ध है । जब तक है तब तक सदा वही है । यह ज्ञान कब तक के लिए है―इस ज्ञानपरिणति की बात कही जा रही है । इस ज्ञानस्वभाव की बात जो समग्र ज्ञान पदार्थ का मूल स्रोत है, जहाँ अनंत ज्ञान परिणतियाँ निकलीं और निकलेगी, फिर भी जिसका ज्ञानभंडार कभी रिक्त नहीं होता है ऐसे उस ज्ञानस्वभाव की बात कही जा रही है । वह ज्ञानस्वभाव कब तक है? अनंत काल तक है । जब तक है वह वही है, उसमें दूसरे का उदय नहीं है । इसलिए ऐसा भी कुछ नहीं है कि इस आत्मा में अकस्मात᳭ कोई नई बात उत्पन्न हो जाये ।

आत्मा में अन्य किसी से भय का अभाव―मुझमें जो हो सकता है वही होता है । जो नहीं हो सकता है वह त्रिकाल नहीं होता है । ऐसा विचार करने से अकस्मात् भय सर्व समाप्त हो जाता है । सभी द्रव्य हैं और अपने स्वरूप से हैं, परिणमते हैं, और अपने में ही परिणमते हैं । ये चार विशेषताएं प्रत्येक द्रव्य में स्वरसत: पायी जाती हैं और इन्हीं विशेषताओं के कारण यह लोकव्यवस्था बन रही है । यदि कोई द्रव्य किसी दूसरे द्रव्य को अपना स्वरूप, अपनी शक्ति, अपनी परिणति कुछ भी देने लगे तो यहाँ संकर व्यतिकर हो जायेगा, कोई पदार्थ फिर रहेगा नहीं । एक ने दूसरे को बदला, उसने दूसरे को बदला । यदि दोनों ही परस्पर में एक दूसरे को बदलने लगें तो संसार में कुछ न रहेगा । यह सारा विश्व आज तक है, यह इस बात का प्रमाण है कि प्रत्येक द्रव्य स्वतःसिद्ध हैं और अपने में परिणमते रहते हैं । इस प्रकृति को कोई भी पदार्थ कभी भी छोड़ नहीं सकता है । जब वस्तुस्थिति ऐसी है तब मुझमें किसी दूसरे पदार्थ से उपद्रव आ जाये, यह कैसे हो सकता है?

दु:ख का कारण स्वकीय अपराध―हम जब-जब दुःखी होते हैं तब-तब अपने अपराध से ही दुःखी होते हैं । दूसरे के अपराध से हम दुःखी हो सकें ऐसा त्रिकाल भी नहीं हो सकता है । कोई-सी भी घटना ले लो, किसी भी प्रसंग में हम दुःखी हैं तो अपना ही अपराध विचारें । अपने अपराध बिना हम दुःखी नहीं हो सकते हैं । दुःख ही एक अपराध है, उस अपराध को कोई दूसरा नहीं कर सकता है । मोटे रूप से कहा भी है कि एक हाथ से ताली नहीं बजती । अपराध वहाँ दोनों का होता ही है । तो दोनों के अपराध में ऐसा नहीं है कि अन्य के अपराध से अन्य कोई दुःखी होता हो । दोनों ही अपराध करते हैं और दोनों ही अपने-अपने अपराध से दु:खी होते हैं । ऐसी एक घटना ले लो कि कोई मुनिराज शांत स्वभाव से बैठे हुए हैं और अनेक लोग उन्हें गालियां दें, निंदा करें और कभी मारपीट भी करें, अनेक दुःख भी दें, अब बतलाओं कि वे मुनिराज दूसरे के अपराध से दुःखी हो रहे हैं ना? अरे ऐसी बात नहीं है कि कोई मुनिराज किसी दूसरे पुरुष के अपराध से दुःखी हो जाये । वे अपने अपराध से ही दुःखी हुए, प्रथम तो अपने स्वरूप से चिगे, यह दुःख है, यह अपराध है । अब और देखो―वह ज्ञानी संत ज्ञानदेव को मिटाकर उस दुःख पर्याय में जो आया है उसके दुःखी होने का अपराध बहुत पहिले से चला आया । कभी कषाय किया था जिसके निमित्त से इस ही प्रकार के कर्मों का बंध हुआ और उस बद्ध कर्म के उदय का ऐसा निमित्त जुड़ा कि क्लेश हुआ । तो उस जीव के पहिले समय में अपराध हुआ था जिस अपराध की परंपरा में इसे आज आकुलित होना पड़ा ।

दुःख में वर्तमान अपराध―भैया और कहां जा सकता है कि ये तो पहिले भव के अपराध आप कहे जा रहे हैं, इस ही भव के अपराध बताओ जीव के अपराध हो सकते हैं । किसी दुश्मन ने सताया है आज वह शांत है । तो दुश्मन बना कब था, किस घटना में बना था? जैसे पांडवों को उनके वंश के या कौरव के वंश ने उनकी मुनि अवस्था में तप्त गरम लोहे के कड़े पहिनाए । उन पांडवों का अपराध इस ही भव का था कि उन्होंने युद्ध किया । उस युद्ध में उनके इष्ट जन हार गए, मर गए तो बदला चुका रहे हैं । जिसने इस भव में किसी के साथ कोई व्यवहार न किया हो और फिर भी उसे दुःख मिले तो इसमें अपराध क्या है? उत्तर―पहिला अपराध यह है कि वह बहिर्मुख बन रहा है, अपने उपयोग से चिगकर किसी बाह्यपदार्थ में अपना उपयोग लगा रहा है, यह उसका एक विकट अपराध है । तो जितने भी जीव हैं वे सब अपने ही अपराध से दु:खी होते हैं, दूसरे के अपराध से कोई नहीं दुःखी होता है । क्योंकि किसी दूसरे की परिणति मेरे आत्मा में प्रवेश नहीं पा सकती है । यह ही आत्मा संतोष में न रहा और बाह्य पदार्थों में विकल्प करके व्यर्थ की झूठी पोजीशन में सार समझकर मायावी पदार्थों में विकल्प करने का ऊधम करो तो इस ऊधम करने का फल तो कोई दूसरा भोगने न आयेगा । जो अपराध करता है वही दुःखी होता है । अपराध किसी दूसरे पुरुष से नहीं प्राप्त होता है ।

ज्ञानदृष्टि में निर्भयता―यह ज्ञान स्वतःसिद्ध है । मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, इस ज्ञानमय आत्मा में किसी दूसरे का उदय ही नहीं है । मेरा ज्ञान ही काम है । स्वरसत: ही मेरी परिणति है, उस जाननस्वरूप में राग तक का भी उदय नहीं आता है । परवस्तु की बात तो दूर रही । इस जाननस्वरूप में इस जाननभाव के अतिरिक्त किसी अन्य गुण का विलास तक नहीं आ पाता है । अन्य पदार्थों की तो गति ही क्या है? तब इस मुझमें किसी भी दूसरे पदार्थ से कोई वृत्ति नहीं आती है । तब भय की कौन-सी बात है? ऐसी वृत्ति साधारणतया सम्यग्दृष्टि ज्ञानी पुरुष के होती है । अपना ही बल अपनी मदद कर सकेगा । दूसरे का बल मेरे किसी काम का नहीं है । अपने ही वस्तुस्वरूप के निर्णय से उत्पन्न हुए ज्ञानबल का भरोसा रखना चाहिए । इस मुझ आत्मा में कुछ आकस्मिक होता ही नहीं है तब भय कहाँ से उत्पन्न हो? ऐसा निर्णय रखने वाला ज्ञानी पुरुष निःशंक रहता है और सदा सहज ज्ञानस्वरूप का अनुभव किया करता है । सहज ज्ञान कहते हैं जो आत्मा के सत्त्व के साथ ही हो । जब से आत्मा है तब से स्वरूप जो बना हुआ हो उसे सहज कहते हैं । जो वस्तु का निजस्वरूप है वही वस्तु का सहजभाव है । मेरा यह ज्ञानस्वभाव ही सहज पारिणामिक भाव है ।

सहजता और पारिणामिकता का अविनाभाव―सहज और पारिणामिक―इन दो शब्दों का अविनाभावी जोड़ा है । सहज पारिणामिक होता है और पारिणामिक सहज होता है । सहज का अर्थ है जब से वस्तु का सत्त्व है तब से जायमान है वह सहज है । और पारिणामिक का अर्थ है कि जिसका परिणमन ही प्रयोजन हो अर्थात् जिस पर परिणमन तो चल रहे हैं, पर जो ज्यों का त्यों है उसे पारिणामिक कहते हैं । ज्ञानस्वभाव सहजपारिणामिक भाव है, इसकी दृष्टि निकट संसारी जीव को होती है, भव्य जीव को होती है । जिसने इस आत्मदर्शन की उपलब्धि की वह कृतकृत्य हो गया और जिसने इस आत्मदर्शन को न पाया, पुण्य के उदय से कितना ही महान वैभव पाया हो वह समस्त वैभव इस जीव के हित का कारण नहीं है, प्रत्युत अहित का ही कारण है । यह ज्ञानी जीव समस्त परपदार्थों की ओर से निःशंक रहता है, उसके किसी भी प्रकार का कोई विकल्प नहीं हो सकता है । आंधी चले, आग जले, तूफान चले, सारे लोक में हो-हल्ला मचे पर यह ज्ञानी तो आकाशवत् निर्विकल्प ज्ञानमय आत्मस्वरूप को देखता है ।

ज्ञानी की नि:शंकता―ज्ञानी संत समझता है कि मेरे आत्मा में किसी भी परपदार्थ का प्रवेश नहीं है, मैं कहाँ यहाँ वहाँ मुँह उठाऊं? जैसे सारे नगर में कर्फ्यू मच गया खिड़की से जो झांके उसी के गोली मार दो यह आर्डर होता है । तो जिसने खिड़की से बाहर सिर निकाला उसके गोली लगी । तो इस प्रकार से तुम बाहर कहां ढूंकते हो, यहाँ कर्फ्यू चल रहा है, जगत में महान् उपद्रवरूपी परपदार्थों का ही हल्ला मच रहा है तो मचो । तुम कहाँ अपने ज्ञानानंदमय गृह से चिग कर बाहर ढूंकते हो । ज्ञानी देख रहा है कि मैं तो अपने परमविश्राम गृह में हूँ, इस मुझ आत्मा में किसी भी परपदार्थ से कुछ उपद्रव नहीं आता है । सो वह निःशंक होता हुआ संत निज सहज ज्ञानस्वभाव का ही अनुभव करता है । इस प्रकार यह सम्यग्दृष्टि जीव 7 प्रकार के भयों से रहित है । ऐसी निर्भयता और निःशंकता ही इस सम्यग्दर्शन का प्रथम अंग है । यह निश्चय से नि:शंकित अंग का स्वरूप चल रहा हे ।

ज्ञानी का उद्यम―सम्यग्दर्शन के 8 अंगों के सप्तभयरहित अवस्था को बताया गया है । इसी प्रकार 8 अंगों का भी वर्णन है । अभी प्रथम अंग का प्राकरणिक लक्षण नहीं आया है किंतु प्रथम अंग में जो भयरहित अवस्था होती है उस अवस्था का वर्णन किया है । सम्यग्दर्शन के निःशंकित आदि सर्व चिह्न समस्त कर्मों को हनन करते हैं अर्थात् कर्मों की निर्जरा करते हैं । और जिस कर्म का बंध पहिले होता था उसके उदय को भोगते हुए उस सम्यग्दृष्टि ज्ञानी के नियम से निर्जरा होती है । कर्मों की निर्जरा का कारण है कि कर्मों का लगाव रखने वाले भावों का अभाव हो जाये । यह जीव कर्मों से स्वरसत: न्यारा है । कर्मों से न्यारा करने का और श्रम नहीं करना है । व्यर्थ का जो श्रम कर्मों के आने का हो रहा है उस श्रम को दूर करना है । इस जीव में ऐसी मोहबुद्धि पड़ी हुई है कि यह मोहवश है, राग हो रहा है । इस जीव का जीव ही है । जीव का परमाणु मात्र भी कुछ नहीं है । जीव का चतुष्टय जीव में ही है, उसका कुछ भी उससे बाहर नहीं है ।

अनंत प्रभुओं पर अन्याय―ये दिखने में आने वाले जो मायामय स्वरूप मनुष्यादिक हैं इनसे कहीं मेरा कुछ सुधार न हो जायेगा । पर पर्यायबुद्धि ऐसी अपवित्रता है कि जहाँ सार भी नहीं है और चाह रहे हैं कि दुनिया में मेरा नाम हो जाये । जिसका जितना प्रसंग है, जितनी पहुंच है उतने घेरे के बीच यह चाहते हैं कि मैं दुनिया में अच्छा कहाऊं । तो सब लोगों में अच्छा कहलाने की इच्छा होने का अर्थ यह है कि अन्य जो भगवान हैं, जीव हैं उनका आघात कर रहे हैं; मैं इन सबमें अच्छा कहलाऊँ इसके मायने हैं कि ये सब लोग न कुछ रहें, छोटे रहें, तो इन अनंत भगवानों पर हमला किया कि नहीं? जो भगवानों पर हमला करेगा उसका क्या भला होगा? लोगों में अपना नाम बड़प्पन कहलवा लेना इसका भाव यही है कि तुम इन सबको ठुकराना चाहते हो । सबको ऊंचा देखने का भाव हो इसमें नम्रता की वृत्ति बनती है । मैं सबमें लीन हो जाऊं, मुझे कुछ अपना बड़प्पन नहीं दिखाना है, ऐसी भावना में तो इसकी प्रगति है, और मोहवश यह जीव उल्टा चाहता है कि मेरा लोक में कुछ बड़प्पन बने । अरे इस लोक और संसार को ही मिटाने की आवश्यकता है । जब तक संसार में रहेंगे तब तक चतुर्गतियों में भ्रमण ही करना पड़ेगा, फिर कुछ न मिलेगा ।

ज्ञानदृष्टि के अभाव में विकट आधि―भैया ! ज्ञान की बात तो यह है कि अपने यथार्थस्वरूप का निर्णय कर लें, हमारा स्वरूप आकाशवत् निर्लेप अमूर्त केवल ज्ञानमात्र है । इस स्वरूप की ओर जिसकी दृष्टि रहती है जो इस स्वरूप के उन्मुख होता है वह संत पूज्य है । ज्ञानियों के ज्ञान का मार्ग पवित्र और गुप्त है । इस असार संसार में अपने पर्याय का नाम जाहिर कर देने की बुद्धि बिल्कुल निष्फल जाती है । प्रथम तो इस धन की तृष्णा का थाह नहीं है । हजारपति हों तो लखपति होना चाहते । लखपति हों तो करोड़पति होना चाहते । जो करोड़पति हैं वे सुख चैन से नहीं खा पाते हैं । वे उससे ज्यादा की धुनि में हैं । कोई ऐसा धनिक नहीं है एक ज्ञानी पुरुष को छोड़ करके कि जो किसी धन से संतोष तो कर सके । इसी प्रकार जगत में नाम बढ़ाने की तृष्णा की भी थाह नहीं है । मोहल्ले में मेरा नाम रहे, हो गया, मेरा सारे नगर में नाम रहे, हो गया, तो अब सारे देश में नाम हो, लो हो गया, अब देश से अतिरिक्त विदेशों में नाम हो, हो गया, सारे लोक में नाम हो । जैसे धन की तृष्णा की चाह नहीं है इसी तरह नाम की चाह की तृष्णा की भी चाह नहीं है । जैसे धन में तृष्णा करना व्यर्थ है क्योंकि सब छूट जायेगा । और वर्तमान में भी जब तक धन का साथ है तब तक भी कुछ संतोष आराम सुख नहीं है । और जिन्हें संतोष है उन्हें धन के कारण संतोष नहीं है किंतु ज्ञान के कारण है । इसी तरह मर मिटे, लो नाम गया । यह जीव मरकर मान लो घोड़ा बन गया और यहाँ नाम बहुत फैला हुआ है, जगह-जगह कीर्ति स्तंभ बने है, बड़े-बड़े बोट साइन लगे हैं तो लगे रहें, वहाँ तो उस जीव पर कोड़े पड़ रहे हैं । नाम वाला जब तक जीवित है तब तक भी आराम से नहीं रह पाता है ।

नाम की चाह अनंतप्रभुओं पर अन्याय―ज्ञान का मार्ग जिन्हें मिलता है वे ही आराम पा सकते हैं । अज्ञान में तो आराम है नहीं । और फिर मोटी बात यह है कि लोक में नाम चाहने का अर्थ यह है कि मैं बड़ा कहलाऊँ और ये सब न कुछ रहें, तुच्छ रहें । तो इसका अर्थ क्या यह नहीं हुआ कि तुमने हजारों भगवानों पर आघात किया? एक पर्यायबुद्धि में बहकर अज्ञान में मानी हुई कुमति के पथ में होकर इन सब प्रभुओं पर आक्रमण कर रहे हो । ये न कुछ रह जायें मैं इन सबमें बड़ा कहलाऊँ यही तो इस चैतन्य भगवत् स्वरूप का आघात है । इतना अपराध करने के फल में क्या यह आराम से रह सकेगा ? कोई किसी दूसरे पर अन्याय करता है तो वह भी व्यथित रहता है और जो अनंत प्रभुओं पर अन्याय कर रहा है, उनका आघात कर रहा है, तो अपनी कुमति के भावों से क्या वह आराम से रह सकेगा? नहीं । यही कारण है कि नाम चाहने वाला कभी सुख से नहीं रह सकता ।

नामचाह की व्यर्थता―धन तो कदाचित् कुछ पीड़ा हरने का हेतुभूत हो सकता है । कदाचित अपने व्यवहारधर्म के चलाने में सुविधा का आश्रय हो सकता है, क्योंकि स्वास्थ्य अच्छा रहे तो धर्म की साधना में सहायता मिलती है, पर नाम से क्या मिलता है? नाम चाहने वाले लोग इसी कारण आराम से नहीं रह सकते हैं । यह पिशाच ऐसा विकराल पिशाच है कि इसके फंदे में कोई आ तो जाये, फिर यह जीवन भर सुख से नहीं रह सकता है । कभी ज्ञान की झलक ऐसी आए कि अपनी पर्याय को भी अपने स्वरूप से उपयोग द्वारा दूर निकाल फेंके और केवल पारिणामिक भाव स्वरूप निज चैतन्यस्वरूप का आदर रखे तो इसको शांति हो सकती है ।

अष्टांगों की अशुचिविनाशकता―यहाँ सम्यग्दर्शन के 8 अंगों का वर्णन चलेगा । उन 8 अंगों में शुद्ध भावों की घोषणा है । शुद्ध भाव को धर्म कहते हैं । जो अशुद्धताएँ हैं उनको हटा लो शुद्धता प्रकट हो जाये । शंका करना, भय करना यह अशुद्धता है । उसके हटने से निःशंकित अंग प्रकट होता है । इच्छा करना, निदान बाँधना, इच्छा की चाह करना, पर के उन्मुख बनना ये सब संकट हैं, अपवित्रताएँ हैं । इन वांछाओं को दूर करने से नि:कांक्षित अंग प्रकट होगा । किसी से ग्लानि करना उसको तुच्छ समझे बिना नहीं हो सकता है । किसी को तुच्छ समझा जाये तभी तो उससे ग्लानि हो सकती है । यही अपवित्रता का परिणाम है । यह ग्लानि का परिणाम दूर हो इससे निर्विचिकित्सक गुण प्रकट होता है । अपवित्रताएँ हटाने का ही नाम रत्नत्रय है । सम्यग्दर्शन अपवित्रता दूर होने से, मिथ्यात्व दूर होने से प्रकट होता है । सम्यक्चारित्र मिथ्याचारित्र की अपवित्रता दूर होने से प्रकट होता है । अपवित्रताएँ दूर हुई कि इसमें यह अंग प्रकट होने लगता है । मोह बुद्धि होना, मुग्ध हो जाना, विवेक खो देना, जिस चाहे के पीछे लगना, अमुक देव से हित होगा, अमुक गुरु से हित होगा, वह देव है या कुदेव है, वह गुरु है या कुगुरु है इसका भी कुछ निर्णय न होना, ये सब अपवित्रताएं ही तो हैं । इन अपवित्रताओं का न होना अमूढ़दृष्टि अंग है । कुगुरु किसे कहते हैं, कुदेव किसे कहते हैं कि देव तो न हो, गुरु तो न हो और देव गुरु माना जाये वही तो कुदेव और कुगुरु है ।

कुदेवत्व का आधार निज का विकल्प―भैया ! देव तो यहाँ के लोग भी नहीं हैं तो क्या ये कुदेव कहलाने लगे । जो देव नहीं है उसे कुदेव कहेंगे क्या? नहीं । जो देव नहीं है और उसे देव मानें तो कुदेव है तो कुदेवपना दूसरे प्रभु में है या उस मानने वाले के आत्मा की बुद्धि में है? दूसरा तो जो है सो है । आप भी देव नहीं हैं और स्त्री पुत्र रखने वाले जो लोग प्रसिद्ध हो रहे हैं वे भी देव नहीं हैं । सो देव नहीं है यह तो ठीक है पर हम लोगों का नाम कुदेव नहीं पड़ता है, और उनका नाम कुदेव पड़ा । तो इसमें कारण वे नहीं हैं, इसकी मान्यता है । स्वरूप तो ज्ञान में आ रहा है परिचय में आ रहा है कुदेवपने का और मान्यता बना रहे हैं देवपने की, इसी को कहते हैं कुदेव । और इस पद्धति से जो ऐसी जगह है क्षेत्र की जगह मान ली है कि वहाँ जाओ तो अपना कार्य सिद्ध होगा, पुत्र होंगे, विवाह होगा, मुकदमा जीतेगा, ऐसी बुद्धि रखकर मानना यह भी कुदेवपना हुआ कि नहीं? यह भी कुदेवपना हुआ क्योंकि कुदेवत्व तो पर में नहीं है । यह कुदेवत्व मानने वाले की बुद्धि में है । ये सुख दुःख देंगे ऐसा स्वरूप मानते हो, फिर उसे महावीर स्वामी बोले तो कुदेव का स्वरूप तो परिचय में आ रहा है और देव मान रहे हैं तो इसमें कुदेवत्व करना पड़ा कि नहीं? यह बात औरों के प्रति है कि देव स्वरूप नहीं है । स्त्री रखे हैं, शस्त्र रखे हैं, शंख चक्र रखे हैं, युद्ध करवाते हैं, जहाँ चाहे मौज उड़ाते हैं, यह देव स्वरूप नहीं है और देव माने उसे कुदेव कहते हैं । ऐसे ही सर्वत्र घटा लो । शुद्ध दृष्टि न होना सो मूढ़दृष्टि है । मूढ़दृष्टि अपवित्रता है । अपवित्रता के अभाव का नाम है अमूढ़दृष्टि ।

उपगूहन अंग का मर्म―दूसरे के दोषों को प्रसिद्ध करना, धर्मात्मा जनों के दोषों को प्रकट करना यह अपवित्रता है । क्यों अपवित्रता है कि धर्म में कलंक लगता है । यदि कोई अपने धर्म का रूप रखे हो और दोष करता हो तथा अनेक बार विधिवत् समझाने पर भी दोष न छोड़ता हो तो उसके प्रति यह मेरा साधु नहीं है ऐसा प्रसिद्ध करो, फिर दोष कोई प्रकट करो तो धर्म में कलंक न लगेगा । यह भी दुनिया को बताओ कि यह मेरा साधु है, यह मेरा गुरु है, यह मेरा साधर्मी है और फिर दोष कहो तो यह अपवित्रता है । एक बार निर्णय दे दिया कि यह उस लाइन का है नहीं, यह धर्मात्मा नहीं है, फिर दोष कहो तो धर्म में कलंक नहीं है । अपना भी माने और दोष भी लोक में प्रकट करे तो यह धर्मपालन के विपरीत बात है, यह अपवित्रता है । कोई किसी पर अन्याय करे, धर्मात्मा के दोष दुनिया में प्रकट करे तो क्या यह एक व्यक्ति पर अन्याय है? नहीं । सारी जनता पर अन्याय है । यह जनता श्रद्धा से हट गई । धर्म में कुछ लगने की जिसकी भावना है वह यह सोचेगा कि यह तो ऐसा ही होता है, कुछ यहाँ तत्त्व नहीं है यों सोचकर वह श्रद्धा से चिग गया है । तो इसमें उसने हजारों लाखों पर अन्याय किया । जिसने धर्मात्मा का दोष प्रकट किया उसने उन भगवंतों पर अन्याय किया । यह अनुपगूहन अपवित्रता है । इसके नाश होने को उपगूहन कहते हैं ।

स्थितिकरण का मर्म―जिसमें बल है, सामर्थ्य है ऐसा पुरुष दूसरे धर्मी पुरुषों को धर्म से विचलित देखे और उनको सहयोग न दे, उनको धर्म में स्थिर न करे और देखता जाये, तो उसके धर्म की तीव्र रुचि नहीं है । जिसे धर्म में रुचि होती है वह जानता है कि जो अपने धर्म को सम्हाले, अपने स्वभाव को सम्हाले वह पुरुष संकटों से दूर हो जाता है । वहाँ यह नहीं है कि दूसरे मोक्ष जाने वाले तैयार हैं तो हमारे मोक्ष का नंबर देर से आए । उसमें रुकावट नहीं होती है । बल्कि उस धर्मपथ पर जाने वाले के प्रति अनुकंपा व गुणस्मरण जगता है तो अपने धर्म में प्रगति होती है । विचलित होने वाले पुरुष को धर्म में स्थिर कर देना यही अपवित्रता का विनाश है और गिरते हुए को धक्का लगा देना यही अपवित्रता है ईर्ष्या । अविवेक जब जगता है तब जाकर ऐसी परिणति होती है कि हो रहा है तो हो रहा है । गिर रहा है तो गिरने दो । उसे छोड़ देने से वह और गिर गया । मनुष्य का सर्व कुछ बल वचनों में है । वचनों से ही किसी को सम्हाल ले और वचनों से ही किसी को गिरा दे । तन, मन, धन, वचन इन सबमें वचन की चोट बहुत बुरी होती है । और लगता भी कुछ नहीं है । लेकिन अविवेक का जब उदय है तो अपने वचन अपने से सम्हाले नहीं जा सकते हैं । कषाय भीतर में भरी हो तो वचनों को ऐसे निकल जाना ही पड़ता है । इन्हीं वचनों के द्वारा बड़ा अनर्थ हो जाता है और इन्हीं वचनों के द्वारा लोगों की सम्हाल हो जाती है । गिरते हुए जीव को गिरने देना, देखते रहना, यह भावना न हो कि इसको सहयोग दूं और इसका परिणाम स्थिर हो जाये, तो इसे कहते हैं अपवित्रता । पहिले समय में स्थितिकरण का बड़ा यत्न होता था । आज के युग में जुदी-जुदी खिचड़ी पकाने जैसा ढंग बढ़ गया है । बहुत समय व्यतीत हो जाता, यह पता नहीं रहता कि हमारे मोहल्ले में धर्मीजन कितने रहते हैं । पड़ोस में भी इतना पता नहीं रहता है । पढ़े लिखे, ज्ञानी, संत, समझदार गृहस्थ लोगों का पता ही नहीं है कि कहां कौन है? तो ऐसी अस्थितिकरण होने जैसा ढंग अपवित्रता है और इस अपवित्रता के अभाव को स्थितिकरण कहते हैं ।

इन सब दोषों में और है क्या? अशुद्ध भाव । प्रेम परस्पर में न रहना, प्रेम के बजाये विद्वेष बढ़ जाना एक दूसरे को न सुहाना―ये सब कहलाते हैं भावजन्य अपवित्रता । निज शुद्ध चेतन का बोध हो तो उस शुद्ध चैतन्य स्वरूप के दर्शन हों । और ऐसी प्रीति जगे कि अहो यहाँ तो सर्व समानता है । जो मैं हूँ सो ही सब हैं! भगवान के लिए ऐसा कह लिया जाता है कि जो भगवान सो अहं । जो भगवान हैं सो मैं हूँ और अपने धर्मीजनों के प्रति इस बात की झलक न आ सके कि अहो सब एक ही तो मामला है । वही सर्वत्र विराजमान है । जो यह है सो मैं हूँ, जो मैं हूँ सो यह है । साधर्मी जनों से ऐसा जो घुलमिल न सके उसे अपवित्रता कहते हैं । न घुलमिल सके तो न सही, पर अपना ज्ञान तो सही बना लेना चाहिए । जिसे अपने चैतन्यस्वरूप का दर्शन हुआ, मुक्ति का मार्ग मिला वह उस मार्ग से चलकर वहाँ घुलमिल सकता है । ऐसा वात्सल्य ज्ञानी संतों के होता है । साधर्मी जनों पर अवात्सल्य रखना यह दोष है, और इस दोष के अभाव में सम्यग्दर्शन का वात्सल्य गुण प्रकट होता है ।

अप्रभावना की अपवित्रता―लोगों के बीच में धर्मात्माजन देखे जा रहे हों और उन धर्मात्माजनों के प्रति अपनी जिम्मेदारी न समझें, अपने हित की बात पर जोर न दे सकें और यथा-तथा प्रवृत्तियाँ कर डालें यही है अप्रभावना । धर्म की प्रभावना धर्मात्माजनों के चरित्र द्वारा होती है । सदाचार का एकदम सीधा प्रभाव पड़ता है । पहिले समय में खजांची प्राय: जैन ही पुराण में सुने गए हैं । इतिहास में मुगल बादशाह हुए तो क्षत्रिय बादशाह हुए तो खजांची, कोषाध्यक्ष अथवा सलाहकार संख्या के अनुपात से कई गुणा अधिक जैन लोग हुए । और कचहरी में गवाही देने वाला जैन है इतना ज्ञात होते ही इसकी गवाही में कई गुणबल आ जाता था । कारण यह था कि ज्ञान था, वैराग्य था, उदारता थी, संयम का पालन था, बाह्य सदाचार, अंतरंग सदाचार उन सबका प्रभाव था । आज देश के आगे अब वह स्थिति नहीं रही । यह सब अप्रभावना दोष का फल है । तो अप्रभावना अपवित्रता है । इस अपवित्रता के अभाव में प्रभावना अंग प्रकट होता है ।

सम्यक्त्व की विशेषता―सम्यग्दर्शन के 8 अंग आत्मा के शुद्धभाव हैं और ये ही समस्त लक्षण सम्यग्दृष्टि के कर्मों को नष्ट करते हैं । क्योंकि इस सम्यग्दृष्टि पुरुष ने टंकोत्कीर्णवत् निश्चल अपने ही स्वभाव से एकत्रित उपयोग में बसाये गये ज्ञान सर्वस्व को प्राप्त कर लिया है सो अब कर्मों के आस्रव बंध का कारण नहीं रहा । अत: निर्दोष सम्यग्दृष्टि पुरुष समस्त कर्मों को दूर करता है । सो अब उनके कर्मों का ही बंध नहीं रहा और जो पूर्वभव में अज्ञान से कर्म बंधे थे उनका उदय आ रहा है और विपाक काल में अनुभव भी हो रहा है क्लेश भी आ रहा है पर समतापरिणाम से उन सबको भोग रहे हैं, टाल रहे हैं इसलिए पूर्वबद्ध कर्मों की भी उनके निर्जरा ही होती है । अब इसके बाद सम्यग्दर्शन के 8 प्रकार के दोषों के लक्षण का विवरण सहित क्रम से वर्णन चलेगा ।

अब नि:शंकित अंग का स्वरूप कह रहे हैं ।



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