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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 328

From जैनकोष



मिच्छत्तं जदि पयडी मिच्छादिट्ठी करेदि अप्पाणं।तम्हा अचेदणा ते पयडी णणु कारगो पत्तो।।328।।

समझ के सावधान―तुम किस पर को कर्ता मानते हो ? कोई चेतन प्रभु या अन्य जीव तो कर्ता है नहीं। इसका वर्णन तो पहिले कर ही दिया गया है तो क्या मिथ्यात्व आदिक प्रकृतियां क्या जीव के विभाव को करने वाली हैं ? जैसे कहेंगे आप कि मिथ्यात्व नामक प्रकृति जीव को मिथ्यादृष्टि बना देती है, तो इसका अर्थ यह है कि जीव को करने वाला अचेतन हो गया। किसी अन्य पदार्थ में तो यह सामर्थ्य नहीं है कि किसी जीव के परिणमन को कर दे। पर यह अचेतन कर्म प्रकृति में सामर्थ्य बन गई कि वह जीव के परिणमन को कर दे क्या ऐसा है ? इस प्रकरण को बड़ी सावधानी से सुनकर समझ सकते हैं। वस्तु के या आत्मतत्व के संबंध में सर्व प्रकार का परिज्ञान तब होगा जब वस्तु की स्वतंत्रता भी पूरी समझ में रहे और निमित्त नैमित्तिक भाव भी पूर्ण समझ में रहे।

निमित्त नैमित्तिक संबंध के अवगम का आधार―निमित्त नैमित्तिक भाव तब सिद्ध होता है जब यह देखा जा रहा हो कि पदार्थ वर्तमान में इस प्रकार की योग्यता वाला है। इतने प्रकार के परिणमन होने की योग्यता है उनमें से जैसा सहज निमित्त सुयोग होता है वैसा यह परिणम जाता है। परिणमता है अपनी ही परिणति से। यह जब देखने में आएगा तब निमित्त नैमित्तिक भाव की सिद्धि होती है यद्यपि एक कल्पना में एक दृष्टि में ऐसा भी ध्यान आता है कि कल के दिन पदार्थ का जो कुछ होना होगा चाहे हम नहीं जानते मगर वही तो होगा ना ? अथवा अवधिज्ञानी जीव भविष्य की बात को देखकर आज बता देते हैं कि अमुक दिन यह होगा। वही होता है ना। यद्यपि एक दृष्टि में यह भी बात विदित होती है कि जब जो होना है तब उसमें वही होता है। और वैसा ही निमित्त सुयोग होना है यह भी एक दृष्टि में है, किंतु सर्वथा इस ही को तथ्य माना जाय और दूसरी ओर आँखें बंद कर ली जाय तो यह समझ कि उसमें अभी परिणमन पद्धति का पूर्ण परिज्ञान नहीं किया गया है।

कार्य के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि―भविष्यज्ञताकी दृष्टि में नियतपना है पर यहां विज्ञान दृष्टि में तो यह भी है कि जैसे कोई मिट्टी का सना हुआ लोंदा है कुम्हार के चाक पर चढ़ा दिया है उस मिट्टी के लोंदे में कितने ही कुछ बन जाने की योग्यता है। वहां यह नहीं देखना कि आगे जिस एक पर्याय रूप परिणमेगा उसकी ही मात्र योग्यता है। यह जानन दर्शनमात्र और न्याय शास्त्र के अनुकूल नहीं है, कितने ही परिणमनों की उसमें योग्यता है। युक्ति से सिद्ध विज्ञान से सिद्ध, अब इतने परिणमनों में से वह परिणमन प्रकट होता है जिसके अनुकूल निमित्त का सहज योग मिला। इस दृष्टि में यह भी बात तथ्य की पड़ी हुई हैं कि यहां भी उपादान परिणमन स्वतंत्रतया करता है सब दृष्टियों का एक आत्मा में समन्वय हो सके इसके लिए सर्वतोमुखी ज्ञान के बल की आवश्यकता है ऐसी सावधानी के फल में स्वयं वस्तु याथातथ्य का ज्ञान हो जाता है।

जीव भाव के प्रकृति कर्तृत्व पर आपत्ति―वस्तु स्वातंत्र्य को भूलकर यह कहा जा रहा है कि आत्मा के मिथ्यात्व परिणमन को क्या मिथ्यात्व नामक प्रकृति करती है ? यदि मिथ्यात्व प्रकृति आत्मा के मिथ्यात्व भाव को करती है तो लोग चेतन से तो डर खाते थे कि कहीं अन्य चेतनकर्ता न बन जाय, किंतु लो अब यह अचेतन मिथ्यात्व प्रकृति कर्ता बन गयी। क्या यह मिथ्यात्व प्रकृति जीव के मिथ्यात्व रूप बन गयी ? यदि ऐसा है तो यह चेतन भी अचेतन हो जायगा। यहां निमित्त नैमित्तिक भाव तो है पर जिसमें जो कार्य हुआ है वह कार्य उस उपादान का ही प्रभाव है, निमित्त भूत वस्तु का प्रभाव नहीं है। पर, उपादान की ऐसी कला है कि वह अपना विभाव परिणमन रूप प्रभाव पर उपाधि का निमित्त पाकर प्रकट करता है। जैसे किसी बच्चे को कोई बड़ा पुरूष डांट गया, सता गया तो वह बच्चा खूब रोता है, अकेले खड़ा है, रोने के सिवाय और कोई चारा नहीं है। अब वह डांटने वाला तो भाग गया। अब वह बच्चा रो रहा है। रोते-रोते रोने की स्पीड कुछ हल्की हो ही जाती है, और बहुत देर हो जाय तो रोना फिर बंद भी हो जाता है। सो घन्टे भर तो वह रोया, आखिर में उसे रोना बंद करना पड़ा। अब आ गए उसके पिताजी। तो पिताजी को देखकर फिर उसने जोर-जोर से रोना शुरू किया। तो क्या उसके पिताजी ने उसे रूला दिया ? नहीं। उस रोने का प्रभाव उस बच्चे का ही है। पिता का दिखना वहां आश्रयमात्र है।

प्रभाव, प्रभावक व निमित्त का विश्लेषण―भैया ! इस प्रकार प्रत्येक उपादान विभावरूप प्रभाव बनाता है तो किसी पर द्रव्य का निमित्त पाकर ही बना पाता है। वह प्रभाव निमित्तभूत वस्तु का नहीं है किंतु वह उपादान का ही है। इस कारण यह जीव अपने सम्यक्त्व परिणमन से च्युत होकर जो मिथ्यात्व रूप परिणमन करता है उस मिथ्यात्व परिणमन में प्रभाव उस ही परिणमने वाले का है। मिथ्यात्व नामक प्रकृति के उदय का निमित्त पाकर वह प्रभाव बना है। अंत: स्वरूप दृष्टि से देखो तो आत्मा और कर्म में संबंध नहीं है, फिर भी निमित्त नैमित्तिक भाव का संबंध है, निमित्त नैमित्तिक अत्यंताभाव वाले पदार्थ में होता है। और जहां एक द्रव्य में भी एक गुण के परिणमन का निमित्त पाकर अन्य गुण में परिणमन होता है। जैसे कि आत्मा में इच्छा परिणमन का निमित्त पाकर आत्मा में योग परिणमन होता है। वहां यद्यपि इन दोनों गुणों का आधारभूत पदार्थ एक है तो भी उन गुणों के स्वरूप का परस्पर में अभाव है।अचेतन के कार्य की अचेतन से तन्मयता―यह मिथ्यात्व नामक प्रकृति पौद्​गलिक कार्माणवर्गणा का तत्व है अचेतन है और आत्मा चेतन है। आत्मा के विभावों में यह मिथ्यात्व प्रकृति निमित्त होती है, इस मूल विवाद को लेकर जिज्ञासु ने यह बात खड़ी की कि मिथ्यात्व नामक प्रकृति जीव के मिथ्यात्व भाव को करती है। इसके समाधान में यह बता दिया है आचार्य देव ने कि यदि मिथ्यात्व प्रकृति जीव के मिथ्या भाव को कर दे तो इसका अर्थ यह हुआ कि जीव के मिथ्या भाव का करने वाला अचेतन कर्म हुआ। अब इससे उल्टी एक समस्या और रखी जा रही है कि जीव पुद्​गल द्रव्य के मिथ्यात्व करता है, उसका समाधान भी इसी गाथा में है--



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