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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 351

From जैनकोष



जह सिप्पिओ उ करणाणि गिण्हइ ण सो दु तम्मओ होइ।तह जीवो करणाणि दु गिण्हइ ण य तम्मओ होइ।।351।।

व्यवहार से गृहीत साधनों में तन्मयता का अभाव―जैसे शिल्पी करणों को ग्रहण करता है, पर उन करणों में तन्मय नहीं होता है इसी प्रकार यह जीव भी करणों को ग्रहण करता है पर किसी करण में साधन में तन्मय नहीं होता है। यहां कर्तापन के प्रसंग में एक द्रव्य केवल अपने ही परिणमन का कर्ता है, यह सिद्ध किया गया है। मोही जीवों के केवल एक ही यह भ्रम है जिसके आधार पर कर्ता और भोक्तापन को भ्रम लग गया है। वह भ्रम है पर्याय बुद्धिपने की अर्थात् जिस समय जो अपना परिणमन होता है उस परिणमन में आत्मद्रव्य को स्वीकार करना यह ही मैं हूँ, जहां अपनी पर्याय में अहंपने का भ्रम हुआ वहां फिर और संबंध बनाना, कर्ता भोक्ता के ख्याल आना, इष्ट अनिष्ट को बुद्धि जगना―ये सब आपत्तियां आने लगती हैं इस कारण सर्व प्रकार की आपत्तियों से मुक्त होना है तो मूल भ्रम मिटाने की आवश्यकता है।

आपत्तियों का मूल स्रोत पर्यायबुद्धिरूप भ्रम―मूल भ्रम यह पड़ा है कि जीव अपने स्वभाव को लिए ध्रवस्वरूप है, उस ध्रुव स्वरूप को अंगीकार नहीं करता, जो वर्तना हुई, परिणति हुई उस परिणति को ही आत्मसर्वस्व मानता है। फिर जहां रागद्वेष को माना कि यह मैं हूँ तो रागद्वेष के कारण जो समागम मिला, निकट समागम, शरीर का समागम इनको मान लिया कि यह मैं हूँ, जब शरीर को मान लिया कि यह मैं हूँ तो इस शरीर के जो साधक है उनको मान लिया इष्ट और जो शरीर के विरोधक हैं उनको मान लिया अनिष्ट, तब जगत में इष्ट और अनिष्ट उसे दिखने लगे। जहां इष्ट अनिष्ट का ख्याल चला वहां अनेक विपित्तियां आने लगती हैं और यह जाल ऐसा बढ़ जाता है तथा उछलता जाता है कि फिर यह चिरकाल तक भी हट नहीं पाता है। एक को इष्ट मानने पर अनेक को अनिष्ट मानना पड़ता है और इस तरह इष्ट और अनिष्ट की मान्यता की परंपरा बढ़ती रहती है, और इस इष्ट अनिष्ट के द्वेष में यह जीव अपना अमूल्य समय बरबाद किए चला जा रहा है।

कल्याण के सुअवसर की उपेक्षा का अनौचित्य―भैया ! जरा सोचो तो सही, जीव की जितनी पर्यायें होती हैं उन सब पर्यायों में अपने आपकी छटनी तो कर लो कि कितनी उत्कृष्ट परिणति हमने पायी ? ये कीड़े, मकोड़े, पेड़, पौधे, पृथ्वी, जल आदि सब केवल क्लेश भोगने के लिए रहते हैं, उनमें विवेक नहीं, उनमें बुद्धि नहीं। ये अपना कल्याण करने का यत्न कर नहीं सकते और ऊपर चढ़कर देखें तो पंचेंद्रिय जीवों में अनेक पशु हैं, अनेक पक्षी हैं, उन पशु, पक्षियों की क्या हालत है ? उनमें विवेक नहीं जगता, वे अपना आत्महित करने में समर्थ नहीं हैं, केवल एक मनुष्य भव ऐसा है कि जिस भव में चाहें तो हम सदा के लिए संकटों से छूटने की बात बना सकते हैं। पर मोह का ऐसा नशा पड़ा हुआ है कि यह नहीं बनाना चाहता है अपने कल्याण का मार्ग। ये निःसार बाह्य पदार्थ ही जंच रहे हैं इस मोही को अपने हित रूप। वे इन्हीं में लगते हैं, इन्हीं को अपना मानते हैं।

दुर्लभ समागम की उपयोगिता―देखो भैया ! ऐसी उत्कृष्ट स्थिति पायी, तिस पर भी हम अपना क्या उपयोग कर रहे हैं ? इस बात में अपन को कुछ खेद अवश्य होना चाहिए। और कभी तो इंद्रियों को संयत करके इन कल्पनाओं को बंद करके अपने आप में एक अपने सहजस्वरूप के दर्शन का प्रयत्न करना चाहिए। जब तक अपना ज्ञानमय स्वरूप अपने आप में विदित न होगा तब तक हम कल्याण का मार्ग न पा सकेंगे। बाहर में कितनी ही हलचल मचा लें, कितनी ही मन, वचन की चेष्टाएँ करलें, पर जब तक अपने आपमें अपना स्वरूप न टिकेगा तब तक हित के पात्र नहीं हो सकते। देव, शास्त्र, गुरु का अवलंबन इसीलिए है कि हम बारबार उस शुद्ध देव का चिंतन करके अपने आपमें ऐसी भावना जगाएँ कि मैं भी देव हो सकूं। गुरु का संग करके अपने आपमें ऐसी भावना जगाएँ कि जो उपाय ये करते हैं उन्हीं उपायों द्वारा हम भी मोक्ष मार्ग में बढ़ें और शांति लाभ करें। इसीलिए ये सब सत्संग हैं और इन सत्संगों से इस देव, शास्त्र, गुरु के समागम से, स्वाध्याय से, तत्त्वचर्चा से यदि हम अपने आपके हित की ओर नहीं झुकते हैं, करते हैं व्यवहार धर्म और लगते हैं विषय-कषायों में तो इससे हमें उद्धार का कोई मार्ग न मिलेगा। सो बाहरी बातों को उपेक्षित करके अपने आपके अंत:स्वरूप को तकना चाहिए।


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