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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 353

From जैनकोष



एवं ववहारस्स उ वत्तव्वं दरिसणं समासेण।

सुणु णिच्छयस्स वयणं परिणामकदं तु जं होइ।।353।।

निश्चयनय से कर्ता, कर्म व कर्मफल का विवरण―यहां जो कुछ अभी तक वर्णन किया गया है यह व्यवहारनय का वक्तव्य संक्षेप से कहा गया है। अब जरा निश्चयनय का वचन सुनिए कि इस प्रसंग में सुनार ने क्या किया अथवा जीव ने क्या किया और क्या भोगा ? निश्चयनय से अपने परिणमन को तो कर्म कहते हैं और अपने ही परिणमन से उत्पन्न हुआ अपने में जो प्रयोजन मिला, उसे फल कहते हैं। यह बात आगे की गाथाओं से बतायी जायेगी।

पदार्थ के अस्तित्व का प्रयोजन क्या―वर्तमान में कुछ प्रकरण प्राप्त प्रश्न का उत्तर देते चलें। ये दिखने वाले भौतिक पदार्थ किसलिए हैं इसका उत्तर बतावो। पुद्​गल किसलिए सत् बना है, यह क्यों है और यह जीव क्यों सत् बना है ? इस जीव का प्रयोजन क्या है ? ये हैं, इसी होने के संबंध में पूछा जा रहा है। किसलिए ये हैं ? यह चौकी किसलिए है, कोई लोग कहेंगे कि पुस्तक रखने के लिए है, कोई कहेगा कि पूजन के लिए है, कोई कहेगा कि घर में चौकी न हो और त्यागियों को जिमाना है तो उनकी थाली धरने के लिए है। कोई कुछ कहेगा। बहुत सी चीजें ये सब किसलिए है। इसका सही उत्तर तो बताओ।

पदार्थ के अस्तित्व का प्रयोजन―इसका सही उत्तर यह है कि वस्तु परिणमने के लिए है, अपने आपमें परिणमने के लिए है, आपकी पुस्तक धरने के लिए नहीं है। आपके किसी भी प्रयोग के लिए नहीं है। वह है तो परिणमने के लिए है। उनका प्रयोजन केवल परिणमना है और प्रयोजन नहीं है।

वस्तु के परिणमने का प्रयोजन―अच्छा, ये परिणमते किसलिए हैं ? इसका क्या जवाब है ? ये पुद्​गल किस प्रयोजन के लिए नया-नया परिणमन करते हैं पुराना परिणमन मिटाते हैं। ये ऐसा किसलिए करते हैं ? इसका उत्तर है कि ये पदार्थ सब जो परिणमते हैं इनके परिणमने का प्रयोजन मात्र इतना है कि ये बने रहें। इनकी सत्ता कायम रहे, इसके लिए इनका परिणमन हो रहा है। जो कोई भी पदार्थ जिस किसी भी रूप परिणमता है, प्रयोजनमात्र सत्ता बनाये रहना है। इससे आगे बाहर में कोई प्रयोजन नहीं है। यह परमार्थदृष्टि की बात है। व्यवहार में तो अपनी अपनी वांछावों के अनुकूल पचासों उत्तर देते हैं।

तो यहां शिल्पकार ने कुंडल बनाया, हथौड़े से बनाया। हथौड़ी को ग्रहण किया और कुंडल के फल में भोजन खाया। यह व्यवहारनय का कथन है। अब निश्चय नय की बात सुनिए।


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