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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 356

From जैनकोष



जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होइ।तह जाणगो दु ण परस्स जाणगो जाणगो सो दु।।356।।

पर का पर के साथ स्वस्वामी संबंध का अभाव―जैसे खड़िया एक पदार्थ है, जो भींत पर फैला दी जाती है, चूना कह लो। चूना जानते हो किसे कहते हैं ? जिसे लगा देने पर चूवे नहीं। तभी तो चूने की छत डालते हैं। तो चूना एक पुद्​गल स्कंध है और स्वयं सफेदी के गुण से भरा हुआ स्वभाव रखता है। लोग कहते हैं कि इस कलई ने भींत को सफेद कर दिया। हम आपसे पूछते हैं कि भींत ने क्या कलई को सफेद किया ? यह सफेद दिखने वाली जो भींत है इसका और इस सेटिका का क्या संबंध है ? इस पर जरा विचार करें। यह सफेदी क्या भींत की है ? सफेदी मीन्स सेटिका, खड़िया, चूना। सफेदी उस खड़िया से चूना से अलग नहीं है, तो क्या यह भींत की है ? यदि यह सफेदी भींत की हो जाय तो या तो भींत रहेगी या सफेदी रहेगी, किंतु किसी द्रव्य का उच्छेद हो ही नहीं सकता। इस कारण पर का पर के साथ स्वस्वामी संबंध नहीं है।

दृष्टांतपूर्वक स्वस्वामीसंबंध के अभाव की सिद्धि―जैसे स्कूल में किसी बच्चे की किताब गुम जाय और किसी को मिल जाय तो एक बालक कहता है कि यह किताब किसकी है तो दो चार बालक बोल उठते हैं कि यह किताब कागज की है। वह किसी लड़के की नहीं है, लड़के लड़के हैं, किताब-किताब है। लड़के का तो आकार है, रूप है, गंध है। ये सब बातें लड़के की लड़के में हैं। तो जिसकी जो चीज होती है वह उसमें ही तन्मय होती है और वह एक होती है। संबंध नाम की चीज कुछ नहीं है। इसीलिए संबंध नाम का कारक संस्कृत भाषा में नहीं माना। 6 कारक तो माने कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान और अधिकरण, संबंध को नहीं माना। संबंध एक काल्पनिक चीज है, मान लिया कि यह चीज मेरी है। जिसे आप मानते हो यह मेरी है, वही पदार्थ जब दूसरे के अधिकार में पहुंच जाय तो अब उसका हो गया। तुम्हारा तो नहीं रहा। यह सफेदी यदि भींत की हो गयी तो फिर भींत ही रह गयी, सफेदी के द्रव्य का विनाश हो गया।

स्वतंत्र वस्तुओं में स्वस्वामीसंबंध का अनवसर―ये दो अंगुलि हैं आसपास एक छोटी और एक बड़ी। यह छोटी अंगुलि किसकी है, उत्तर दो ? इस बड़ी अंगुलि की है क्या ? अरे इससे तो कोई संबंध ही नहीं है। यह छोटी अंगुलि तो इस छोटी अंगुलि की ही है। तो इसी तरह अंगुलि के अलावा जितने भी द्रव्य हैं उन सब द्रव्यों की अंगुलि नहीं है। यह अंगुलि किसकी है ? आप तो कहेंगे कि तुम्हारी है। अरे हमें तुमने देखा है। हम क्या चीज हैं ? हम एक आत्मा है। वह आत्मा परद्रव्य है अंगुलि से। फिर मेरी अंगुलि कैसे हो गयी ? यदि हमें मानते हो ऐसे शरीर के आकार वाला तो उस शरीर आकार का यह एक अंग है। उसमें व्यवहार दृष्टि से भेद डाला है कि यह अंगुलि हमारी है। जैसे किसी वृक्ष में चार बड़ी शाखाएँ हों तो उसे कहते हैं कि ये चार शाखाएँ किसकी हैं ? पेड़ की हैं। तो पेड़ महाराज को तो यहीं धरा रहने दो और चार शाखावों को थोड़ी देर के लिए यहां भेज दो तो क्या यह हो सकेगा ? शाखावों के बिना पेड़ कुछ न रहेगा। इसी प्रकार ये हाथ पैर पीठ पेट बतावो किसके हैं ? तुम्हारे हैं इसका कुछ अर्थ नहीं, यह तो एक भेद की बात है। वस्तुत: किसी पदार्थ का कोई अन्य पदार्थ कुछ नहीं है।

सेटिका व भित्ति में स्वस्वामीसंबंध का अभाव―यदि यह खड़िया भींत की हो जाय तो खड़िया का उच्छेद हो जायेगा। पर कोई भी द्रव्य किसी भी अन्य द्रव्य में संक्रांत नहीं होता इसलिए उच्छेद नहीं हो सकता। खड़िया-खड़िया ही है, भींत-भींत ही है। अरे अभी जल्दी समझ में न आता हो तो उस भींत को जरा खुदेड़ दो, खड़िया नीचे गिर जावेगी और भींत काली कलूट जैसी थी वैसी सामने आ जायेगी। तब मालूम पड़ेगा। ओह खड़िया अलग है और भींत अलग है। तो जब खड़िया अलग नहीं होती है तब भी भींत अलग है। तो यह खड़िया भींत की नहीं हुई।

सेटिका का परमार्थत: स्वामी―फिर भैया ! खड़िया किसकी है ? और विचार करो―हां हां कर लिया विचार। खड़िया किसकी है ? खड़िया खड़िया की है। तो वह दूसरी खड़िया क्या है जिसकी यह खड़िया बन गयी ? ऐसी कोई सफेद खड़िया किसी दूसरी खड़िया की नहीं है। किंतु एक स्व-स्वामी के अंश का ही व्यवहार है। दूसरी खड़िया कहां है, एक ही तो है। फिर एक में स्व-स्वामी के संबंध का व्यवहार क्या करना ? उससे प्रयोजन क्या निकला ? प्रयोजन तो कुछ नहीं। इसलिए यह निश्चय करना कि खड़िया-खड़िया ही है वह किसी की नहीं। तिजोरी-तिजोरी की है और किसी की नहीं क्योंकि तिजोरी किसी दूसरे द्रव्य की तो बन नहीं सकती और तिजोरी की तिजोरी है। ऐसा कहने का कोई मतलब नहीं है। इसी दृष्टि से सर्वपदार्थों को निरखना कि ये समस्त पदार्थ किसके हैं ? किसी के नहीं हैं।

ज्ञाता व ज्ञेय परद्रव्य का अत्यंत पार्थक्य―इसी तरह जरा आत्मा में निरखो―यह ज्ञायक आत्मा, ज्ञाता आत्मा किसका है संबंध तो विचारिये जरा। कहते हैं लोग कि यह ज्ञाता मकान का है दुकान का है। आपने यदि इस चौकी को जान लिया तो क्या कहते हैं कि यह ज्ञाता चौकी का है। ज्ञाता यह आत्मद्रव्य चौकी का कुछ बन सकता है क्या ? चौकी भिन्न द्रव्य है, भिन्न क्षेत्र में है, भिन्न काल में है, भिन्न भाव को लिए हुए है। यह आत्मा की कैसे बन सकती है ? यदि यह ज्ञाता चौकी का हो जाये तो ज्ञाता का उच्छेद हो गया, बस चौकी भर रह गयी। सो तो ऐसा होता नहीं कि ज्ञाता का ही उच्छेद हो जायेगा। दो न्यारी-न्यारी चीजें हैं। ज्ञातापुरूष और ज्ञेय चौकी।

स्वामित्व वर्णन में अपमान―भैया ! यह ज्ञेय चौकी बेचारी अजीव है, सो सारी गाली सुन रही है। सुनती नहीं है, अलंकार में कह रहे हैं। यह चौकी हमारी है ऐसा कहने में हमारा तो सम्मान हुआ , पर चौकी का अपमान हुआ। जैसे किसी ने कह दिया कि यह आदमी तो हमारा है तो बतलावो कि सम्मान किसका हुआ और अपमान किसका हुआ ? सम्मान तो तुम्हारा हुआ और अपमान उस आदमी का हुआ। स्वामी का तो सम्मान होता है और जिसका स्वामी कहा जाय उसका अपमान होता है। यदि यह चौकी भी कुछ हरकत कर सकती होती तो यह भी कह बैठती कि यह आदमी मेरा है। आप कहते हैं यह मकान मेरा है। कह डालों 10-20 बार पर यह मकान भी यदि कुछ हरकत कर सकता होता तो यह भी कहता कि यह आदमी हमारा है। अरे जितना स्वतंत्र यह मकान है उतना ही स्वतंत्र यह आत्मा है। जीव का तो मकान कह डाला और मकान को जीव नहीं कहा। जब गड़बड़ ही करते हो तो खूब गड़बड़ करो। गड़बड़ की कोई व्यवस्था भी है क्या ?

परद्रव्य का ज्ञातृत्व भी मात्र व्यवहार―ये समस्त पुद्​गलादिक द्रव्य आत्मा के व्यवहार से ही ज्ञेय हैं। इन पुद्​गलादिक ज्ञेय परद्रव्यों का यह ज्ञायक आत्मा क्या कुछ होता है या नहीं होता है, इस संबंध में विचार करते हैं। यदि यह चेतयिता पुद्​गलादिक का होता है तो जिसका जो होता है वह उसका ही होता है, पर अभिन्न है। आत्मा का जैसे ज्ञान है तो ज्ञान आत्मा से अभिन्न है। तो ज्ञान, आत्मा ही है। आत्मा जुदा नहीं, ज्ञान जुदा नहीं देखना, यह तात्त्विक संबंध है इसी तरह यह चेतयिता ज्ञाता यदि पुद्​गलादिक का है तो ये सब केवल पुद्​गलादिक ही रह जायेंगे। दो अलग-अलग नहीं रह सकते। या ज्ञेय रह जाय या ज्ञाता रह जाय। अब कौन एक रह जाय इसका निर्णय करो। ज्ञेय रह गया तो ज्ञाता बिना ज्ञेय क्या और ज्ञाता रह गया तो ज्ञेय बिना ज्ञाता क्या ? इसी प्रकार आत्मा के स्वद्रव्य का उच्छेद हो जायेगा। इससे यह निर्णय करना कि पुद्​गलादिक का यह ज्ञाता कुछ नहीं है।

मोहियों का झमेला―भैया ! यहां तो मोहियों का झमेला है। ये सब अन्याय कर रहे हैं मगर कौन किससे कहे ? क्या अन्याय हो रहा है अंतरंग में कि इन बाह्य वस्तुओं को अपना मान रहे हैं और इनमें ही आसक्त हो रहे हैं। अब कोई किसी को कैसे बुरा कहे ? चल रहा है ढंग। कोई तीन चार लोग थे। पढ़े लिखे तो न थे, वे पंडित या पंडा कहलाते थे। सो कहा कि तुम्हारे यहां अमुक ग्रह लगा है, जाप करा लो तो मिट जायेगा। कहा कि कर दो। बैठ गये। तो एक बोला कि विसनू विसनू स्वाहा। इतना ही सीखा था। दूसरा बोला कि तुम जपा सो हम जपा स्वाहा। तीसरा बोला कि ऐसा कब तक चलेगा स्वाहा, तो चौथा बोला कि जब तक चले तब तक सही स्वाहा। इसी तरह यहां सब गड़बड़ कर रहे थे। कोई किसी को कान पकड़कर समझाने वाला नहीं है, तो अपनी मनमानी प्रवृत्ति सभी कर रहे हैं। सो ऐसा रंग ढंग कब तक चलेगा ? ऐसी जन्ममरण की परिपाटी कब तक चलावोगे ? भैया ! इस संकट से मुक्ति का उपाय ढूँढ़ लेना चाहिए।

ज्ञेय ज्ञाता का पार्थक्य―प्रकरण यह चल रहा है कि यह ज्ञेय ज्ञाता का है क्या ? यह ज्ञाता ज्ञेय पदार्थ का कुछ है क्या ? जैसे खंभे कायह आत्मा कुछ लगता है क्या ? इन तीन बातों में पहिली बात तो कुछ ऐसी लगती होगी कि हां ज्ञेय का ज्ञाता तो है, लेकिन उसका ज्ञेयभूत पदार्थ का अर्थ यह है कि यह ज्ञाता आत्मा है कुछ क्या ? इसमें कुछ समझ में आया कि हां नहीं होना चाहिए और तब इस ही को सीधा बोल दिया कि इस खंभे का यह आत्मा कुछ लगता है क्या ? तो जरा झट समझ में आयेगा कि कुछ तो नहीं लगता हैं,यह बात इन तीनों में कही गयी है। यह आत्मा ज्ञायक ज्ञेय का कुछ नहीं है। यदि यह ज्ञेय का ज्ञायक हो जाय तो या ज्ञेय ही रहे या ज्ञायक ही रहे। सो जब ज्ञेय ही रहा तो ज्ञायक का उच्छेद हो जायेगा। ज्ञायक ही रहा तो ज्ञेय बिना ज्ञायक। क्या ? जो वस्तुभूत है उसका कभी उच्छेद नहीं होता और मान लो ज्ञायक का उच्छेद हो गया तो ज्ञेय रहा ही क्या ? फिर सर्व लोप हो जायेगा। इसलिए ज्ञेय का ज्ञायक कुछ नहीं है।

ज्ञायक का स्वामित्व―तो फिर भैया ! यह ज्ञायक किसका ज्ञायक है ? देखो अभी यहां ज्ञायक सुनकर जानने वाला यह अर्थ नहीं करना किंतु ज्ञायक मायने चैतन्य स्वभावी आत्मद्रव्य। क्या यह ज्ञेय का ज्ञायक है ? नहीं। तब फिर ज्ञायक किसका है ? यह ज्ञायक, ज्ञायक का ज्ञायक है। वह दूसरा ज्ञायक कौन ? जो ज्ञायक है वह दूसरा ज्ञायक कौन ? जिसका यह ज्ञायक है। वह कोई भिन्न चीज नहीं है, एक ही है। तो फिर ऐसा कहने का प्रयोजन क्या है ? भाई प्रयोजन तो कुछ नहीं है, किंतु जिसकी बुद्धि स्वस्वामी संबंध में लगी हुई है उनको समझाने के लिए इस तरह कहा जा रहा है। अर्थ तो यह कि ज्ञायक ज्ञायक ही है। यह घर किसका है ? तो कोई कह उठेगा कि यह घर हमारा है। तो जो जिसका होता है वह उसमें तन्मय होता है। तो घर रह गया तुम्हारा विनाश हो गया। पर है तो नहीं विनाश, इस कारण तुम्हारा घर नहीं है। तो तुम्हारा कौन है ? तुम्हारे तुम ही हो। वह तुम कौन ? जिसके स्वामी हो और वह कौन तुम जो स्वामी हो। कोई अलग दो तुम तो नहीं हो। फिर ऐसा बताने का प्रयोजन क्या ? प्रयोजन कुछ नहीं। प्रयोजन माना है कि जिसकी यह भ्रमबुद्धि लगी थी कि यह घर मेरा है। उसको समझाने के लिए इतना बोलना पड़ा है कि तुम तो तुम ही हो और घर घर ही हैं।

परमार्थत: ज्ञायक का ही ज्ञातृत्व―अब इस ही बात को जरा वाच्यरूप में भी देखो। यह आत्मा किसी परद्रव्य को जानता भी है क्या ? हां व्यवहार दृष्टि से तो परपदार्थ को जानता है और निश्चयदृष्टि से यह आत्मा अपने आपमें अपने ज्ञायकस्वरूप के परिणमन को जानता है अन्य पदार्थ को नहीं जानता। जैसे आप दर्पण सामने लिए हों और दर्पण में पीछे के खड़े हुए दो चार बालकों की फोटो आ गयी हो तो आप उस दर्पण को देख कर ही सब बताते जा रहे हैं कि अब उस लड़के ने यों टाँग उठायी, उसने यों जीभ मटकायी, उसने यों हाथ हिलाया, लेकिन आप क्या उन लड़कों को देख रहे हैं ? नहीं। आप तो उस दर्पण को ही देख रहे हैं। इसी तरह आपका स्वच्छ यह ज्ञायकस्वरूप जिस प्रकार से जो पदार्थ अवस्थित है उसका ग्रहण इसमें हो रहा है। अर्थात् यह इस प्रकार से अपना जानन परिणमन कर रहा है कि जिस प्रकार बाह्य में पदार्थ अवस्थित है। तो आप सीधा अपने आपको जान रहे हैं किसी परपदार्थ को नहीं जान रहे हैं। पर अपने आपको जानते हुए ही आप सब बातों का बखान करते हैं, अमुक यों है, अमुक यों है। इसी तरह सबकी बात समझते जावो।

प्रभु की परमार्थत: आत्मज्ञता―सर्वज्ञदेव के संबंध में तो यह बात प्रसिद्ध ही है कि भगवान आत्मा व्यवहार से समस्त विश्व को जानता है और निश्चय से केवल अपने आत्मा को जानता है। पर यह बात केवल भगवान के लिए ही नहीं है, जगत् के सभी जीव व्यवहार से परपदार्थों को जानते हैं और निश्चय से अपने आपको जानते हैं। भले ही कोई अज्ञानी जीव अपने आपको विपरीतरूप से समझे, पर्यायरूप जाने, फिर भी यह ज्ञायक परपदार्थों का ग्राहक कैसे कहला सकता है ? सर्वपदार्थ स्वतंत्र हैं, अहो एक इस वस्तु की स्वतंत्रता नजर हो जाने पर एक कल्याण का निर्णय हो जाता है और एक इस स्वतंत्रता का परिचय न होने पर, इन बाह्य पदार्थों के साथ अपना संबंध मानने पर यह संसार परिभ्रमण का निर्णय हो जाता है।

महती विपत्तियों का मूल दृष्टि का फेर―भैया ! विपत्ति कितनी बड़ी हैं ? पर वे सब विपत्तियां केवल अपने एक हठ पर ही लग गयीं कि हमने अपने सहज स्वभाव को न अपनाकर परिणमन को अपनाया। केवल भाव बनाया और यह सारा उपद्रव सामने आ गया। किया कुछ नहीं और जन्ममरण के चक्कर लग गए। किया केवल बैठे-बैठे ही एक भाव। जैसे एक कमजोर लड़का किसी बड़े लड़के को बस गाली देता है और कुछ नहीं कर सकता है वह। वह अपनी ही जगह खड़े हुए थोड़ा बक गया, अब उस बड़े लड़के ने उसे पीट दिया। उस पीटने का दुःख जब नहीं सहा गया तो फिर गाली दे दिया। उसने फिर पीट दिया। यह गाली देता है वह पीटता है। गाली के सिवाय और कुछ भी कर नहीं सकता। कमजोर हड्डी निकली हुई है। जोर से तमाचा मार दिया जाय तो गिर पड़े ऐसा वह कमजोर बालक और कुछ भी नहीं कर पाता, वह जरा सा मुँह से बोल देता है कि इतने में वह लातों घूँसों की वर्षा शुरू कर देता है। सो यहां उस लड़के ने कुछ तो विशेष किया दृष्टांत में, यह आत्मा तो कुछ भी नहीं करता है। यह तो अपने प्रदेशों में रहता हुआ केवल एक ऐसा भाव ही बनाता है कि लो यह मैं हूँ, रागादिक परिणाम या जो पर्याय है यही मैं हूँ। इतना चुपके से भीतर ही भीतर परिणाम बनाया कि ये सभी उपद्रव इसके ऊपर आ गए।

सृष्टि का स्रोत विकल्प―जैसे कोई लोग कहते हैं कि सृष्टि कैसे बनी ? ब्रह्मा एक है, और उसके जब यह परिणाम आया कि ‘एकोहं बहुस्याम्’ मैं एक हूँ बहुत हो जाऊँ―इतना भाव करते ही यह सारा संसार एकदम बन गया। उन्होंने यह कहा है। पर इसमें अपने तथ्य की बात निकालें। प्रत्येक जीव एक-एक स्वतंत्र, स्वतंत्र पदार्थ है, यह सहज सिद्ध तो सहज शुद्ध है, अपने स्वरूपमात्र है किंतु ‘बहुस्याम्’ का इसमें भाव लगा हुआ। जो बहुत-बहुत परिणमन हैं, रागादिक भाव हैं, इन पर्यायों को अपनाने का परिणाम लगा हुआ है। इसके फल से ये सारे नटखट हो रहे हैं। कल्याण चाहते हो, आनंद चाहते हो, सुख चाहते हो तो अपने आपमें चुपके ही अपनी ओर मुड़कर अपने एकत्व और अकिंचन स्वरूप का अनुभव करलें। यह आपका पुरूषार्थ आपके काम देगा और इससे बाहर के जितने विकल्प हैं ये विकल्प अपना अहित ही करेंगे।

ज्ञातृत्व का महान् बल―देख लो भैया ! यह ज्ञायकस्वरूप भगवान आत्मा अपने आपमें स्वतंत्र अपने ऐश्वर्य सहित अपने में जगमग स्वरूप सर्व से निराला विराजमान् रहता है। यदि अपने मालिक को तका कि सारे उपद्रव क्लेश समाप्त हो जायेंगे। हे भाई ! यदि बहुत तपस्या करना नहीं बनता है तो मत करो। घोर तप का आज समय नहीं है, न करिये क्योंकि आप एक कोमल आदमी हैं। बड़े आराम में पलते आए हैं। परंतु एक बात जो केवल विचारों द्वारा ही साध्य है, केवल परिणाम करने से ही बनता है और आपकी कोई चेष्टा नहीं चाहता है ऐसा जो कार्य है क्या कि कषाय रूप शत्रु को अपना शुद्ध ज्ञान परिणाम करके जीत लेना, इतना काम यदि नहीं बन सकता है तब तो क्या कहा जायेगा ? केवल व्यामोह। सीधा सा काम है जो केवल अपने परिणामों द्वारा ही सिद्ध हो जाता है। उसमें भी इतनी हैरानी रखना यह तो कोई विवेक वाली बात नहीं है।

आत्महनन―देखो अपने इस सहजस्वरूप को यह ज्ञायकस्वरूप भगवान आत्मा अनंत समस्त द्रव्यों से, परपदार्थों से निराला अपनी ऋद्धि वैभव सहित शाश्वत विराजमान् है। इसे न पहिचान कर बाहर में अपना मानकर हमने अपने आपका स्वयं हनन किया। आग को हाथ में लेकर दूसरे को मारने वाला पुरूष क्या करता है कि अपने ही हाथ को जलाता है इसी प्रकार समस्त द्रव्यों को लक्ष्य में लेकर क्रोध, मान, माया, लोभ के परिणाम करने वाला यह जीव परद्रव्यों को क्या करता है, केवल अपना घात करता है।

क्रोध से स्वयं का बिगाड़―क्रोध जगता है तो किसी परपदार्थ को ख्याल में लेता है तब जगता है। उस क्रोध के करने में पर का कुछ बिगाड़ किया क्या ? नहीं किया। उसका ही होनहार ऐसा हो, पूर्वकृत कर्म ऐसा ही हो और बिगाड़ हो जाय तो हो जाय, पर उसने नहीं किया।

मनुष्य ऐंठीला जीवन―मान घमंड जो उत्पन्न होते हैं वे भी किसी परद्रव्य को लक्ष्य में लेकर होते हैं। खुद ही खुद के लक्ष्य में रहे तो वहां अभिमान जगना तो दूर रहा, अभिमान का पता ही नहीं पड़ता है। एकरस होकर आनंदमग्न हो जाता है। मनुष्य में कौनसी कषाय प्रबल है ? क्रोध प्रबल नहीं है, माया प्रबल नहीं है, लोभ प्रबल नहीं है, मान प्रबल होता है। यह सिद्धांत के अनुसार कह रहे हैं। यहां तो कोई ऐसे भी लोभी मिलेंगे कि धन के पीछे चाहे 10 जूते भी कोई मार ले तो भी सह लेते हैं। तब भी उस पुरूष ने 10 जूते के लोभ के कारण नहीं, किंतु अंतर में एक मान बसा है, यह मारता है तो मार ले, इतना धन आ जायेगा तो इन लोगों के बीच में छाती फुलाकर चलने का तो मौका लगेगा। यह भीतर में मान पड़ा हुआ है। यद्यपि लोभ की तीव्रता उसके है ही जो मान अपमान सह करके भी तृष्णा नहीं छोड़ता, फिर भी उसके अंतर में मान पड़ा हुआ है। चार कषायों की प्रबलता के स्वामी―नरक गति के जीवों में क्रोध कषाय की प्रबलता होती है। तिर्यंच गति के जीव में माया कषाय की प्रबलता होती है। किसी छिपकली को देखा होगा कि किस तरह से माया करके छिपकर कीड़ों को ले लेती है। छिपकली का अर्थ क्या है, छिपकर ली। याने जो अपने शिकार को छिपकर लेने के लिए धीरे-धीरे चलती है, पहिले तो मरी सी बैठी रहती है फिर एकदम ही छपक कर ले लेती है। जो कुत्ता बिल्ली आदि हिंसक जानवर हैं उनकी वृत्ति देखो और इसी प्रकार सब तिर्यंचों में माया कषाय की प्रबलता है और देवों में लोभ कषाय की प्रबलता है। लोभ तो देवों के लिए बताया है, मनुष्यों के लिए शास्त्र में नहीं बताया है। मनुष्य में मानकषाय की प्रबलता―मनुष्यों में मान कषाय की प्रबलता है। तो मान के वश होकर यह जीव कितना विवाद करता है, कितनी अशांति मचाता है, उसका स्थान होना चाहिए। कहां होना चाहिए मोहियों में। मलिन पुरूषों में उसका अवलंबन होना चाहिए, ऐसा होड़ मचाते हुए यह जीव मान के वश होकर दु:खी होता है। तो मान करके इस जीव ने क्या किया ? इस ज्ञायकस्वभावी प्रभु का आदर किया। मायावी ह्रदय में धर्म का अप्रवेश―मायाचार तो बड़ा विकट कषाय है। जैसे जिस गुरिया के छेद टेढ़ा हो उसमें सूत नहीं प्रवेश कर सकता। जो माला बनाने वाले लोग होते हैं वे माला बनाते हुए में कोई ऐसी गुरिया आ जाय कि जिसका छेद टेढ़ा हो तो उसमें सूत क्या प्रवेश कर सकता है ? नहीं। सो उसे अलग हटा देते हैं। इसी तरह जिसका टेढ़ा दिल है, मायाचार से पूर्ण है उसमें धर्म का सूत्र क्या प्रवेश कर सकता है ? नहीं। वह तो निरंतर दु:खी है। लोभ का रंग―इसी तरह लोभ कषाय का रंग बड़ा पक्का रंग बताया है। सर्व कषायें पहिले मिट जाती हैं, लोभ कषाय के मिटने का नंबर सबसे अंत में आता है। लोभ मिटा तो फिर यह निर्णय हो गया कि अब सब कषायें समाप्त हो गयीं; इन कषायों के वशीभूत होकर यह जीव एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ के साथ संबंध मानता है। मान की विडंबना―एक दरबार में जहां विद्वानों का बड़ा आदर होता था। सो एक कवि का बहुत दिनों से सम्मान न हो पाया था। सो सभा में बोला कि महाराज हम ऐसी कविता बनाएंगे कि जैसी आज तक किसी से न बनाई और न बन सकती है और न किसी से कभी बन सकेगी। राजा बोला कि अच्छा दिखावो। सो जेब से एक कोरा कागज निकाला जिसमें कुछ नहीं लिखा था और राजा के हाथ में देते हुए बोला कि महाराज यह है वह कविता किंतु यह कविता उसको ही दिखेगी जो एक बाप का, होगा, जो असली बाप का होगा उसको ही महाराज यह कविता दिखेगी। देखिये महाराज ! तो महाराज ने जो कागज उठाया तो उसमें कुछ लिखा तो था नहीं मगर सारी पब्लिक को यह बता दिया कि यह कविता इतनी ऊँची है कि ऐसी कोई लिख ही नहीं सकता। और यह उसको ही दिखेगी जो एक बाप का हो। महाराज सोचते हैं कि यदि यह कह दूं कि इसमें तो कुछ नहीं लिखा तो यह हज़ारों की पब्लिक क्या कहेगी ? लोग यह जान जायेंगे कि यह तो 3 साढ़े तीन बाप के होंगे। सो राजा उस कागज को हाथ में लेकर कहता है कि वाह वाह बड़ी सुंदर कविता है। राजा ने कहा कि ऐसी सुंदर कविता कोई नहीं बना सकता है। फिर पास में एक पंडित जी बैठे थे उनसे कहा कि देखो कितनी बढ़िया कविता है? तो उन पंडित जी ने जब देखा तो आश्चर्य करके रह गए कि इस कवि ने तो बड़ी चतुराई खेली, लेकिन वह भी कहता है कि वाह वाह कितनी सुंदर कविता है ? कहा कि अच्छा तीसरे पंडित जी को बताइये, बाबू साहब को बताइये। इन सेठजी को बताइये, सभी ने प्रशंसा की कि बहुत सुंदर कविता है। अब केवल इस शान पर कि कोई यह न कह दे कि यह डेढ़ बाप के होंगे, सो सभी झूठझूठ ही बखान कर रहे हैं। सो कषाय के वशीभूत होकर ये जगत के प्राणी जो कुछ भी करते अनुचित उचित अविवेक ये सब इसकी निगाह में थोड़े हैं। वस्तु की स्वतंत्रता का दर्शन―देखो भैया ! जैन सिद्धांत में कही हुई सार बात यदि कुछ है तो जो अन्यत्र कहीं न मिले वह है वस्तु की स्वतंत्रता। व्रत, तप, उपवास आदि को तो सभी कहते हैं, सभी जगह लिखा है मगर वस्तु की स्वरूपमात्रता का ऐसा दर्शन जिसके आधार पर व्रत, तप, चारित्र, श्रद्धान सब कुछ निर्भर है आप को जैनदर्शन में मिलेगा। ऐसे इस महान् दर्शन को प्राप्त करके फिर भी श्रद्धा ऐसी नहीं बना सकते कि मेरा तो मात्र मैं ही हूँ और यह सतत् परिणमन कर रहा है। अपने द्रव्य गुण पर्याय के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। ऐसी दृढ़ श्रद्धा यदि न बन सकी तो समझो कि मणि को पाकर पैरों को धोकर उसका बुरा उपयोग करने के बराबर है। दुर्लभ नरजीवन की बड़ी जिम्मेदारी―त्रसकाल कितना है ? कुछ अधिक दो हजार सागर। इस त्रसकाल के बीच यह जीव त्रस पर्याय पाता रहता है। इसमें मुक्त हो जाय तो भला है और न मुक्त हो जाय तो अंत में उसे स्थावरों में जन्म लेना पड़ता है और उन त्रस पर्यायों में मनुष्य की पर्याय यों 48 रहती हैं और यों ढंग में 24 मिलती है। और वहां कुछ सदुपयोग न कर सके तो इससे अच्छा यह था कि मनुष्य न बनते, तो आपकी सीट और नंबर सुरक्षित तो रहता कि फिर मनुष्य हो सकते थे। तो मनुष्य होना बड़ी जिम्मेदारी वाली बात है। जैसे सभी कहते हैं कि कुटुंब में बड़ा भाई होना बड़ी जिम्मेदारी की बात है। उससे भी अधिक जिम्मेदारी इस मनुष्यपने की है। यदि इस मनुष्य पर्याय को पाकर न चेते तो भला बतलावो अन्यत्र चेतने का अवसर क्या आयेगा और चेतना यही है कि इस जीव का कोई दूसरा जीव कुछ नहीं लगता। ऐसा परखकर सभी वस्तुओं की स्वतंत्रता देखो इसी से निर्मलता बनती है और इस निर्मलता से ही धर्म है। जिस प्रकार ज्ञायक आत्मा ज्ञेय पदार्थ का कुछ नहीं है, इसी प्रकार दर्शक आत्मा पदार्थ का कुछ नहीं है, अर्थात् दृश्य का दर्शक नहीं है, दृश्य दृश्य ही है और दर्शक-दर्शक ही है, इस बात का वर्णन करते हैं।


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