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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 360

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एवं तु णिच्छयणयस्स भासियं णाण दंसणचरित्ते।सुणु ववहारणयस्स य वत्तव्वं से समासेण।।360।।

दर्शन और श्रद्धान के वाचक का शब्दसाम्य―उक्त चार गाथावों में चार बातें बतायी गयी हैं―ज्ञायक, दर्शक, अपोहक और श्रद्धाता का परद्रव्य से कोई संबंध नहीं है। बतायी तो गयी चार बातें और इस गाथा में यह कह रहे है कि ज्ञान, दर्शन और चारित्र में निश्चयनय का वर्णन बताया है तो एक कौन सा खो दिया इसमें ? अगर कोई खो दिया है तो क्या जिसको नहीं कहा है क्या उसका परद्रव्य से संबंध है ? चारों का परद्रव्य से कोई संबंध नहीं है। फिर भी इस संधि वाली गाथा में तीन का जिक्र किया है कि ज्ञान, दर्शन और चारित्र के संबंध में निश्चयनय का वचन कहा गया है, पर तीन ही नहीं समझना। इन तीनों में चारों ही शामिल हैं। दर्शन शब्द दर्शन शब्द के लिए आता है और सम्यग्दर्शन के लिए भी आता है। इसलिए शब्दसाम्य में इन तीनों में चारों ही कहे गए हैं।

दर्शन और सम्यग्दर्शन का निकट संबंध―एक दर्शन शब्द के प्रयोग से यह भी ध्वनित होता है कि सम्यग्दर्शन और दर्शन का कुछ निकट संबंध है, यह दर्शनगुण जो चेतना का भेदरूप है, सामान्य चित् प्रतिभास है उस दर्शनगुण का और श्रद्धागुण के समीचीन पर्यायरूप सम्यग्दर्शन का निकट संबंध है और उस संबंध को संक्षिप्त शब्दों में कहा जाय तो यह कहा जा सकता है कि दर्शन का दर्शन सम्यग्दर्शन है। दर्शनगुण ने इस ज्ञायक आत्मा को अपने प्रतिभास में लिया है। इस दर्शनगुण का जो विषय कहा है उसको आत्मरूप से देखने का नाम सम्यग्दर्शन है।

अज्ञानी को दर्शन के जौहर का अविश्वास―दर्शन सभी जीवों के होता है। मिथ्यादृष्टि के भी दर्शन है, सम्यग्दृष्टि के भी दर्शन है और अरहंत सिद्ध भगवान के भी दर्शन है। मिथ्यादृष्टि के दर्शन बराबर होता रहता है अंतर अंतर्मुहूर्त बाद दर्शन परिणति होती रहती है। फिर भी इस अज्ञानी मिथ्यादृष्टि को दर्शन के जौहर का विश्वास नहीं होता। इसी कारण उसके सम्यग्दर्शन नहीं कहा है और सम्यग्दृष्टि को दर्शन के जौहर का पता हो जाता है, वह दर्शन के विषय का आत्मरूप से श्रद्धान कर लेता है, इसलिए उसके सम्यग्दर्शन होता है। जैसे किसी बड़ी चीज के लोभ में आकर कमरे से उठकर बाहर जायें और कमरे की चौखट, दिरौंदा थोड़ा सिर में लग भी जाय तो चूँकि उस बड़ी चीज का लोभ बहुत तेज सता रहा है सो उस चीज में ही उपयोग है, उस चीज की आसक्ति के कारण उस चौखट की चोट महसूस नहीं हो पाती है। क्योंकि किसी बड़ी चीज के लोभ में वह रंगा हुआ है। चौखट तो सिर में लग गयी पर कुछ भी भान नहीं है, इसी तरह परद्रव्य ज्ञेय का लोभी मिथ्यादृष्टि जीव के भी अंतर अंतर्मुहूर्त में दर्शन होता रहता है, आत्मस्पर्श होता रहता है, किंतु परद्रव्य ज्ञेय में इसको तीव्र लोभ है, आसक्ति है। इस कारण इसे अपने दर्शन का, आत्मस्पर्श का भाव नहीं हो पाता।

विषयसुख की धुन में सुअवसर का अनुपयोग―जैसे कोई विषय सुख की धुनि वाला और विषय सुख में प्रवृत्ति रखने वाला किसी सुंदर अवसर से लाभ नहीं उठा पाता है कि वह अपने शांतिपथ का लाभ उठाये। इसी तरह विषय सुख की धुनि में रहने वाला यह जीव पाये हुए इस दर्शन के शुभ अवसर का लोभ नहीं उठा पाता है।

विपरीत धुन में अभीष्ट के विच्छेद का एक दृष्टांत―एक धन का लोभी धन जोड़ने की फिक्र में यहां वहां दौड़ रहा था। एक मनुष्य ने बताया कि तुम यहां वहां क्यों दौड़ते भागते हो, देखो अमुक पहाड़ में पारस पत्थर भी पड़ा हुआ है, उस पारस पत्थर से जितना चाहे लोहे को सोना बनाते जावो, क्यों व्यापारादि में कष्ट उठाते हो ? उसके मन में यह बात समा गयी। वह चला गया पहाड़ के पास दो चार गाड़ियां लेकर और वहां से पत्थर बीनकर समुद्र के किनारे जोड़ दिया। बड़ा भारी ढेर पत्थरों का लगा दिया और समुद्र के किनारे लोहे की मोटी निहाई जैसी गाड़ दिया यह परीक्षा करने के लिए कि इस लोहे में पत्थर मारेंगे जिस पत्थर से यह लोहा सोना हो जायेगा वही पारस पत्थर होगा। उससे ही फिर मन माना सोना बनायेंगे। सो वह उस लोहा में पत्थर मारे और देखे कि सोना हुआ कि नहीं। यदि सोना नहीं हुआ तो उस पत्थर को वह फेंक दे। यदि समुद्र के किनारे नहीं बैठता तो जितना ढेर इस ओर था उतना ही ढेर इस ओर लग, जाता तो परखने में दिक्कत होती।

अन्य धुन में अभीष्टविच्छेद के प्रदर्शनपूर्वक दृष्टांत का समर्थन―अब वह पत्थर उठाये, निहाई में मारे, देखे कि लोहा सोना नहीं हुआ तो उसको समुद्र में फेंक दे। अब 10 हजार पत्थरों में एक पारस का भी पत्थर था सो जब लोहा सोना न हो तो उसकी धुनि बन गयी जल्दी-जल्दी करने की। पत्थर को निहाई पर मारे और समुद्र फेंके, निहाई पर मारे और समुद्र में फेंके। यह धुनि बन गयी उसकी और जरा जल्दी–जल्दी करने लगा, उठाया, मारा, फेंका, इस धुनि में इस प्रवृत्ति में एक बार पारस भी हाथ में आ गया सो उसी धुनि में उस पारस को उठाया, मारा और फैंका। फेंकने के बाद देखा कि यह तो सोना हो गया, तो पछताता है कि अब क्या करें, धुनि में रहकर उस पारस का अवसर भी खो दिया। इसी प्रकार में आत्मा को अंतर अंतर्मुहूर्त बाद सम्यग्दर्शन के अवसर आ रहे हैं अर्थात् दर्शन अपना परिणमन कर रहा है लेकिन विषयसुख की धुन में रहने के कारण अज्ञानी जन उस अवसर को बराबर खोता रहता है।

दर्शन में दोनों दर्शन के ग्रहण का निर्णय―भैया ! ज्ञानगुण के परिणमन में तो विकल्प रहते हैं। वे विकल्प परवस्तु के ग्रहणरूप हैं, रागद्वेष रूप नहीं है किंतु दर्शनगुण के परिणमन में पर के ग्रहण का भी विकल्प नहीं है। यह दर्शनगुण तो ज्ञेयाकार परिणमता हुआ इस ज्ञायक आत्मा का स्पर्श कर लेता है, सामान्य प्रतिभास लेता है, उसका कारण मालूम होता है कि दर्शन के साथ सम्यग्दर्शन का निकट संबंध है, अतएव ये चार बातें कही जाने पर भी इस संधिरूप गाथा में तीन बातों का नाम लिया गया है कि ज्ञान दर्शन और चारित्र के संबंध में निश्चयनय का भासित बताया है।

निश्चय और व्यवहारनय―निश्चयनय कहते हैं केवल एक पदार्थ को देखना। उस वस्तु में जो बात पायी जाय उसको ही निहारना यही निश्चयनय का दर्शन। इस दृष्टि में एक द्रव्य में दूसरे द्रव्य के साथ निमित्तनैमित्तिक संबंध भी ज्ञात नहीं होता है। क्योंकि इस दृष्टि की दो पर निगाह ही नहीं है। जैसे आँख से हम जिस ओर देखें वही तो दिखेगा। यदि दाहिनी ओर की भींत निरखें तो बांई ओर की भींत कहां दिखेगी ? निश्चयनय के दर्शन में व्यवहारनय का दर्शन नहीं होता है और व्यवहारनय के दर्शन में निश्चयनय का भी दर्शन नहीं होता है, फिर भी किसी एक के मुख्य होने पर दूसरे के विषय को निरखने की बात भी अंतर में पड़ी रहती है, इसे कहते हैं सापेक्ष बनना।

व्यवहारनय की सत्यता और असत्यता का दर्शन―व्यवहारनय का दर्शन असत्य नहीं है पर व्यवहारनय जो कहता है वह किसी एक वस्तु में नहीं पाया जाता है। इतना ही बताने का निश्चयदृष्टि के वर्णन का प्रयोजन है। जैसे कर्मोदय और विभावों का निमित्त नैमित्तिक संबंध है यह बात असत्य रंच भी नहीं है, सही है, युक्ति पर उतरने वाली है। आगम में बतायी गई है किंतु उस प्रसंग में भी जो भी कार्य होता है, जो भी एक परिणमन लें वह परिणमन दो में नहीं पाया गया और स्वरसत: एक में भी नहीं पाया गया, इस कारण इस निश्चयनय की दृष्टि में व्यवहार मिथ्या होता है। यह अभी ज्ञान, दर्शन और चारित्र के संबंध में निश्चयनय की बात कही गयी है। इसी प्रकार अन्य गुणों के संबंध में जानना।

ज्ञायक आत्मा की निज में कारकता―यह ज्ञायक आत्मा क्या कर रहा है ? ज्ञान की परिणति से परिणम रहा है। क्या यह अपने आत्मा से बाहर भी कुछ कर रहा है ? कुछ नहीं कर रहा है। बाहर हो तो करने का परिणमन भी बाहर सोचा जाय। इसके बाहर में तो यह ज्ञानगुण है ही नहीं। करेगा क्या ? इस कारण इस ज्ञायक ने ज्ञायक को ज्ञायक के द्वारा ज्ञायक के लिए ज्ञायक से ज्ञायक में ज्ञान परिणमन किया, इससे बाहर इस आत्मा ने कुछ नहीं किया। यह निश्चयनय का भाषित वचन है और इस परमार्थदृष्टि से देखा जाय तो यह जानने वाला इस जानते हुए को जानता रहता है। इससे बाहर और कुछ नहीं करता है। ऐसा करता भी है इस जानते हुए के द्वारा ही, किसी दूसरे साधन के द्वारा ऐसा नहीं करता है। जानने का प्रयोजन भी जानते रहना भर है और कोई प्रयोजन नहीं है।

ज्ञातृत्व के अमित प्रयोजन की प्रसिद्धि में पुद्​गल के अभिन्न प्रयोजन का दृष्टांत―जैसे पुद्​गल के अस्तित्व का प्रयोजन क्या है ? ये पुद्​गल किसलिए हैं? हम तो यह चाहते हैं कि ये पुद्​गल न होते तो अच्छा था। कुछ भी इनसे मतलब नहीं और उल्टा दंदफंद में पड़ गए। सो ये पुद्​गल न होते तो अच्छा था, हम तो यही चाहते हैं। ये हैं क्यों ? तो अज्ञानी तो उत्तर देगा कि ये हमारे भोगने के लिए हैं, और वे तो काव्य भी बना लेते हैं,--‘‘जिन आलूभटा न खायो, वे काहे को जग में आयो।’’ ये सारे पदार्थ भोगने के लिए ही तो है और काहे के लिए है ? अरे जरा सूक्ष्म दृष्टि करके तो देखो―इन पदार्थों के अस्तित्व का प्रयोजन क्या है ? प्रयोजन तो प्रयोजक की बात के लिए हुआ करता है। अन्य वस्तु का अन्य वस्तु के लिए प्रयोजन ढूंढ़ना यह तो वस्तुस्वरूप के विरूद्ध दृष्टि है। पुद्​गल है तो इनका भी प्रयोजन बतावो कि जो उस ही पुद्​गल के लिए हों। अब ढूंढ़ लो, अन्य कोई प्रयोजन न मिलेगा। केवल यही प्रयोजन मिलेगा कि अपना परिणमन करते रहने के लिए ही है और उसके अस्तित्व का प्रयोजन दूसरा नहीं है। अच्छा तो पुद्​गल के परिणमन का प्रयोजन क्या है ? ‘है’ का प्रयोजन तो परिणमना है और परिणमने का प्रयोजन क्या है ? क्यों परिणमते रहते हैं ये समस्त पुद्​गल ? तो परिणमने का प्रयोजन है ‘‘हैपना’’ बनाए रहना, और दूसरा प्रयोजन ही नहीं है। ‘‘है’’ का प्रयोजन परिणमना और परिणमने का प्रयोजन ‘‘है’’ रहना, इससे आगे और कोर्इ बात नहीं है।

व्याकरण से प्रयोजन की प्रसिद्धि―जो लोग संस्कृत भाषा जानते हैं वे समझ सकते हैं कि होने का वाचक धातु है भू जिसके भवति भवत: भवंति रूप चलते हैं। भू सत्तायां। भू का अर्थ क्या है ? सत्ता। वैसे प्रसिद्ध अर्थ सत्ता मायने ‘‘है’’ और भू मायने होना। होने का अर्थ क्या है ? है, और है का अर्थ क्या है ? होना। सत्ता जिस धातु से बनता है वह धातु है अस्। जिसके रूप चलते हैं―अस्ति स्त: संति। उस अस् धातु का क्या अर्थ है ? तो बताया है अस् भुवि। अस् धातु का अर्थ होना अर्थात् है का अर्थ है होना, और होने का अर्थ है ‘है’। यह क्या परस्पर में अभिन्न विनिमय है तो होने का संबंध ‘है’ का संबंध होने से रहा, होने का अर्थ व्यवहार में उत्पाद व्यय कहा जाता है। जो है नहीं वह हो गया, उसका नाम ‘‘होना’’ है और जो है सो ही है इसका नाम है ‘‘है’’। इससे सिद्ध होता है कि ‘‘है’’ से रहा और ‘‘है’’ का प्रयोजन होना और होने का प्रयोजन ‘‘है’’ है। इसको सैद्धांतिक शब्दों में यों कह लो कि सत् का स्वरूप है उत्पादव्यय ध्रौव्यात्मकता।

सिद्धांत में प्रयोजन का एकाधिकरण―उत्पाद व्यय का प्रयोजन है ध्रौव्य व ध्रौव्य का प्रयोजन है उत्पाद व्यय। साथ ही उत्पाद व्यय न हो तो ध्रौव्य न रहेगा, ध्रौव्य न हो तो उत्पाद व्यय न रहेगा, प्रयोजक न हो तो प्रयोजन न रहेगा। दृष्टांतपूर्वक जानने के प्रयोजन की प्रसिद्धि―तो जैसे पुद्​गल के अस्तित्त्व का प्रयोजन परिणमना मात्र है, सुखी दु:खी करना, भोग में आना बिगड़ना ये सब प्रयोजन नहीं हैं, इसी प्रकार आत्मा भी है तो उस आत्मा के भी हैं का प्रयोजन परिणमना है। अब इसके अंतर में जब और विचार करते हैं तो इस विषय को सामने रखिये कि यह आत्मा जानता किसलिए है ? वह प्रयोजन बतावो जो च्युत न हो सके, व्यभिचरित न हो सके। कार्य सिद्ध हो ही जाय। कार्य सिद्ध न हो ऐसी बात न आए। ऐसा प्रयोजन बतावो कि यह जानता किस प्रयोजन के लिए है ? इस जानने वाले आत्मा का प्रयोजन किसी अन्य वस्तु में न मिलेगा, वह सब सिद्ध न होगा, इस प्रयोजक ज्ञाता का प्रयोजन जाननभर है। यह जानता है जानने के लिए जानता है। बच्चों के जानने का प्रयोजनरूप एक मोटा दृष्टांत―जैसे कोई कई चीजें खोलकर बैठ जाय संदूक से निकालें और पास में 5-7 बच्चे हैं तो वे उन चीजों को देखे बिना चैन न पावेंगे। उनकी उत्सुकता होती है कि हम देख लें कि क्या है ? वे लड़के रोवेंगे रिसायेंगे पर देखने जानने को वे बड़े उत्सुक रहेंगे। जब उन बच्चों को मुट्ठी खोलकर बता दिया कि यह है तो बच्चों का रूठना, दु:खी होना, बेचैन होना सब खत्म हो गया। उनसे पूछो कि तुम क्यों जानना चाहते थे ? उन चीजों को लेने का अधिकार नहीं, उन चीजों का कुछ कर सकते नहीं, क्यों उन्हें जानना चाहते ? अरे बच्चों की आदत है कि वे जानने के लिए जानना चाहते हैं, इससे आगे उनका कोई मतलब नहीं है। खाने की चीज हो तो खाने के लिए देखना चाहते हैं, कोई चीज ऐसी रख दें कि जो भोग में न आ सके उसको क्यों जानना चाहते हो बालकों ! क्यों रूसते हो ? अरे जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। उस जिज्ञासा से उस बच्चे को बड़ा क्लेश है। कोई भी इच्छा हो जाय वह इच्छा कोई बेचैनी ही पैदा करती है। इसीलिए बताया गया कि मोक्ष की भी इच्छा मोक्ष की बाधक है। तो इच्छा जब होती है तब किसी न किसी प्रकार की बेचैनी होती है और वह जानने से ही मिटती है। इस कारण वे बालक वस्तु को जानने के लिए जानना चाहते है। उनका और कोई प्रयोजन नहीं है। यह एक मोटा दृष्टांत बताया है। जानन और अस्तित्व के प्रयोजन की संधि―यह ज्ञायक आत्मा जानता है तो उसके जानन का प्रयोजन क्या है ? किसलिए जाना करता है, निरंतर जानन का श्रम बनाए रहता है और जरा भी गम खाया नहीं जाता थोड़ी देर के लिए। ऐसी क्या आदत पड़ी है कि यह जानना देखना भर रहेगा। यह आत्मा जानता है जानन के लिए। क्या जानने के लिए ? किसको जानने के लिए ? जिसको जानता है उस तक का भी रागद्वेष नहीं है तब फिर यह जानन के लिए भी नहीं जानता, किंतु जानते हुए के लिए जानता है। इन दो बातों में भी आंतरिक रहस्य है। जानने के लिए जानने में कुछ भेदीकरण है और हुए के लिए जानने में अभेदीकरण है। तो इस ज्ञाता का प्रयोजन जानना भी नहीं रहा, किंतु क्या करे ? प्रत्येक परिणमन का प्रयोजन अस्तित्व बनाए रहना है। इस साधारण नियम के साथ मेल करता हुआ यह जाननरूप भी परिणमन उस ही अस्तित्व प्रयोजन को घोषित करता है। यह ज्ञायक जानता है, जानते हुए के लिए जानता है। जानने का अभिन्न अपादान―कोई भी क्रिया हो तो कुछ खलबली मचती है और उस खलबली के आधार दो होते हैं अपादान और अपादेय। अपादान तो वह अंश है जो ध्रुव है, स्थिर है और उपादेय वह अंश है जो अध्रुव है, निकला हुआ है। जैसे वृक्ष से पत्ता गिरा, तो एक यह क्रिया हुई, खलबली मची, यहां अपादान वृक्ष है और उपादेय पत्ता है। पत्ता गिरा कहां से ? वृक्ष से। इसी प्रकार इस ज्ञायक ने जाना तो कहां से जाना ? इस जानते हुए को ज्ञायक ने जानते हुए से जाना। ये दो द्रव्य नहीं हैं जो भिन्न उपादान और उपादेय बताए जा सकें। यह ज्ञायक अपने पुरातन ज्ञायक परिणति को अपने में विलीन करता हुआ उत्तर ज्ञायक परिणति को करता है और इस उत्पाद व्यय का आधारभूत यह ज्ञायक द्रव्य रहता है। निश्चयदर्शन के पश्चात् व्यवहारदर्शन की अनुसिद्धि―ऐसे इस ज्ञायक द्रव्य की यह साधारण असाधारण बात सबसे निराले अपने आपके ऐश्वर्य से भरी हुई है। इसका परद्रव्यों के साथ कोई स्व-स्वामी संबंध नहीं है। इस प्रकार इस ज्ञान, दर्शन, चारित्र और श्रद्धान के संबंध में वर्णन किया गया है। अब व्यवहारनय से इसकी क्या स्थिति है ? इस बात का वर्णन चलेगा। ज्ञान, दर्शन, चारित्र और श्रद्धान विषयक परपदार्थों के साथ ज्ञायक, दर्शक, अपोहक, श्रद्धाता आत्मा के संबंध की क्या नीति है ? इस विषय में व्यवहारनय से वर्णन किया जा रहा है। इस वर्णन में यह निर्णय रखना कि व्यवहारनय की यह दृष्टि है और व्यवहारनय में अनेक पर दृष्टि होती है। एक दूसरे के संबंध को बताने की बात व्यवहारनय में चलती है।

व्यवहार के मूल प्रकार―व्यवहार दो प्रकार से होता है―तोड़ का और जोड़ का। अखंड आत्मा में यह ज्ञान है, यह दर्शन है, यह चारित्र है इस तरह स्वभाव के खंड बनाना, उसे तोड़ना यह भी व्यवहार है और जो बात आत्मा में स्वभावत: नहीं पायी जाती है ऐसी चीज को आत्मा में जोड़ना यह भी व्यवहार है। सो प्रथम जो इस आत्मा में यह ज्ञान है, यह दर्शन है, यह चारित्र है, यह श्रद्धान है। इस तरह तोड़ रूप व्यवहार किया, अब उस तोड़ के साथ जोड़ भी लगाया जा रहा है कि यह परद्रव्य का ज्ञाता है, परद्रव्य का दृष्टा है, यह तोड़रूप व्यवहार के साथ-साथ जोड़रूप व्यवहार लगाया जा रहा है। अब यहां देखो कि व्यवहार की दृष्टि से यह जीव परद्रव्य को किस प्रकार जानता है ?




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