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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 393

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वण्णो णाणं ण हवइ जम्हा वण्णो ण जाणये किंचि।

तम्हा अण्णं णाणं अण्णं वण्णं जिणा विंति।।393।।

वर्ण और ज्ञान में व्यतिरेक ― वर्ण ज्ञान नहीं है, क्योंकि ये वर्ण कुछ जानते ही नहीं हैं। कोई ऐसा तो नहीं करता कि जाते समय चौकी से कह जाय कि चौ की तुम इन की बातें सुनते रहना, हम आकर तुम से सब हाल पूछ लेंगे। अगर ये वर्ण ज्ञान करते होते तो अच्छी व्यवस्था बनती। कोई झूठ बोल ही न सकता था। खंभा से पूछ लो, चौकी से पूछ लो कि क्या बात है? वर्ण कुछ जानता नहीं है। इससे ज्ञान अन्य है और वर्ण अन्य है।

एक जज की युक्ति ― युक्तिबल से कोई अचेतनों के नाम से कुछ निर्णय कर ले, किंतु अचेतन जानता कुछ नहीं है। एक जज ने तो पेड़ से पूछ लिया था कि यह पुरुष सच बोलता है या झूठ? कैसे कि एक साहूकार ने एक बरगद के पेड़ के नीचे एक मनुष्य को 500) रुपये उधार दिया था। लिखा पढ़ी कुछ नहीं। साहूकार ने बहुत दिन हो गए, पैसा न दिये थे नालिस कर दी। अदालत में बयान हुए। तो जज बोला कि तुमने रुपये कहाँ दिये थे, बोला कि एक जंगल में दिये थे। उस समय और कौन था गवाह? कोई न था हम थे, यह था और बरगद का पेड़ था, जिस के नीचे बैठकर रुपये दिये थे। तो वह झूठमूठ नाराज होकर बोला कि ऐ साहूकार, तुम इसको ठगना चाहते हो, तुम अपने पेड़ को बुला कर लावो। वह पेड़ के पास गया। तो जरा देर में वह आ न पाया तो जज कहता है कि वह बदमाश है, अभी पेड़ को बुलाकर नहीं हाजिर हुआ। कर्जदार पुरुष जल्दी में कह गया कि महाराज ! वह पेड़ तो यहाँ से तीन मील दूर है। जज ने मालूम कर लिया कि हां उसने इसे रुपये दिए हैं। तो कहीं पेड़ ने नहीं बताया, उसने तो अपने ज्ञान से ही जान लिया।

देहरूप इंद्रजाल ― ये वर्णादिक यदि कुछ जानते होते तो या तो विडंबना बनती या एकदम सच्चाई पैदा हो जाती। ये वर्ण जानते नहीं हैं और यह वर्ण है क्या चीज? आंखों से तो बढ़िया दिखते हैं और इन को थोड़ा पकड़ने जावो तो पकड़ने में नहीं आते हैं। क्या है यह रूप और यहाँ तो कुछ समझ में भी थोड़ा आता है कि यह रंग लगा है, यह अटपट क्या है? इस शरीर पर तो कुछ समझ में ही नहीं आता। न चूना जैसा उखड़े, न हाथ में आये किंतु कोई काला है, कोई गोरा है, कोई मिलता है नहीं। यह रूप कुछ जानने वाला है क्या? जब आदमी सो जाते हैं तो चोर लोग बेखटके चोरी करते हैं वे जानते हैं कि ये सो रहे हैं, यह शरीर तो जान ही नहीं रहा है। जाननहार तो शरीर में आत्मा है यहाँ मुर्दा नहीं। यह वर्ण नहीं जानता है।

वर्ण की पुद्गल में तन्मयता व ज्ञान से भिन्नता ― वर्ण पुद्गलद्रव्य के वर्ण गुण की स्वतंत्र–स्वतंत्र पर्याय है काला, पीला, नीला, लाल, सफेद, हरा, स्वतंत्र रंग नहीं है। नीला और पीला मिलाने से हरा बनता है। तो यह वर्ण पर्याय और वर्ण नामक गुण यह पुद्गल में ही तन्मय है। आत्मा से इसका संबंध नहीं है। ज्ञान इस वर्ण विषय को जाने भी तो ज्ञान एक वर्ण विषय आया, पर यह ज्ञान खुद वर्ण नहीं बन गया। वर्ण आकार का बनना, वर्ण ज्ञेय का झलकना यह ज्ञानगुण का ही एक परिणमन है, वर्ण का परिणमन नहीं है। यहीं बैठे-बैठे पचासों चीजों को जान ले तो यह हमारी कला है,हमारी परिणती है । हम में पचासों चीजें आ नहीं जाती हैं, यह पचासों चीजों का असर नहीं है। वर्णादिक पदार्थ सब भिन्न हैं। यह मैं ज्ञानमात्र आत्मा भिन्न हूँ। वर्ण अन्य चीज है और ज्ञान अन्य चीज है। इसी प्रकार गंध के विषय में बतला रहे हैं कि गंध भी ज्ञान नहीं है।


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