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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 402

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णज्झवसाणं णाणं अज्झवसाणं अचेदणं जम्हा।

तम्हा अण्णं णाणं अज्झवसाणं तहा अण्णं।।402।।

अध्यवसान ज्ञान नहीं है क्योंकि अध्यवसान अचेतन है। इस कारण ज्ञानतत्त्व और है और अध्यवसान बात और है।

अध्यवसान शब्द का तात्पर्य- अध्यवसान नाम है विभावों का। ज्ञानातिरिक्त जितने भी परिणमन हैं विभावरूप, वे सब अध्यवसान कहलाते हैं। अध्यवसान शब्द का अर्थ कितनी ही प्रकार से लगावो। अध्यवसान नाम निश्चय का भी है। वस्तुस्वरूप से अधिक निश्चय करना, सो अध्यवसान है, अधि+अवसान। जैसा है उस से भी ज्यादा ज्ञान कर लेना सो अध्यवसान है। पदार्थ जितने हैं, जो हैं, स्वतंत्र हैं, अपने रूप हैं, इससे आगे और बात तो नहीं है, पर और भी ज्यादा जान लेना, जैसे कि शरीर मैं हूँ, मकान मेरा हूँ, परिवार मेरा है, ये अधिक जानकारी हैं, ऐसी अधिक जानकारी का नाम अर्थात् ऐसे अधिक अध्यवसान का नाम अध्यवसान है। जितने हम हैं उतना ही माने, जितनी बात है उतनी ही माने तब तो भला है, उस से ज्यादा मानने चले उसही का नाम अध्यवसान है।

अध्यवसान शब्द का चरित अर्थ ―अथवा अधिवसान अवसान नाम है खत्म हो जाने का, बरबाद हो जाने का। जिस में बरबादी हो उसका नाम है अध्यवसान। रागद्वेषादिक परिणाम अचेतन हैं। यद्यपि ये चेतन के विकारपरिणमन हैं पर ये स्वयं अचेतन हैं, चेतन नहीं हैं। विभाव भी होता है अचेतक गुण के विकाररूप। जैसे श्रद्धा, चारित्र, आनंद जो स्वयं चेतन का, समझने का, जानने का माद्दा नहीं रखता है, ऐसे गुण के विकार का परिणमन हो सकता है। जानन और देखन गुण ये विकार को प्राप्त नहीं होते, फिर भी इसके अपूर्णविकास का नाम भी विभाव है।

अध्यवसान से ज्ञान का व्यतिरेक ―यहाँ यह कह रहे हैं कि रागद्वेषादिक अज्ञानमय परिणाम ज्ञान नहीं हो सकते। ज्ञान अन्य चीज है और अध्यवसान अन्य चीज है। अध्यवसान के स्वरूप के संबंध में इसी ग्रंथ में पहले के अधिकारो में विस्तृत वर्णन आया है। यह कर्मविपाक की माया से उत्पन्न होते हैं। औपाधिक भाव हैं, अशुचि हैं, दु:ख रूप हैं, दु:ख के कारण हैं विरुद्धस्वभावी हैं। ये सब अध्यवसान परिणाम अचेतन हैं। यह जानते कुछ नहीं हैं। मैं अध्यवसान से भिन्न हूँ।

मोही जीव की पर्यायबुद्धता ―इस मोही जीव की सबसे अधिक एकता इस विभावपरिणाम में है अथवा अन्य पदार्थ में तो एकता है ही नहीं। विभावपरिणाम में यह एकता कर रहा है अपने आप के स्वरूप का स्मरण न रहने से अथवा परिचय न रहने से यह अपने को नानारूप मान रहा है। जैसे कोई सिद्धांत कहता है कि ‘एकोहं बहु स्याम्।’ यह ब्रह्म एकरूप है किंतु जब ही इसने अपने आप में यह इच्छा की कि मैं बहुत हो जाऊँ, सो यह नाना सृष्टियों रूप हो जाता है। इस बात को अपने आप में घटावो। यह मैं ज्ञायक एकस्वरूप हूँ, स्वरसत:, स्वभाव से जैसा हूँ, वहीं एक हूँ चैतन्यस्वभावमात्र, पर यह अपने को इस एकरूप नहीं समझ पाता। इस एक से विपरीत अन्य बहुरूप मानता है, वही इसका मर्म है। मैं यह शरीर हूँ, मैं अमुक जाति का हूँ, अमुक काल का हूँ, अमुक मजहब का हूँ, इस घर का हूँ, इस गांव का हूँ, इस गोष्ठी का हूँ, इस प्रदेश का हूँ इत्यादि नाना प्रकार से अपने आप को मानता है और इसके फल में नाना इसकी गतियां हो रही हैं। अज्ञान को आत्मरूप माना तो इसके फल में यह अज्ञानी बनकर संसार में रुलता है।

ज्ञान और अध्यवसान का प्रकट कार्यभेद- अध्यवसान ज्ञान नहीं है। राग हुआ, सुहा गया। इस काल में भी ज्ञान कुछ काम कर रहा है, इसलिए यह जानने में कठिन हो रहा है कि वाह सुहा रहा है, जान रहे हैं तभी तो सुहा रहा है। तो सुहाना राग का काम है, और वह जानने को लिये हुए है, किंतु वहाँ जितना जाननरूप परिणमन है वह तो है ज्ञान का कार्य और जितना अनजानन रूप परिणमन है वह है राग का कार्य। पर वह राग ही रहे और ज्ञान का कुछ परिणमन न हो, ऐसा तो कभी होता ही नहीं है यह साथ है इसलिए यह कठिन पड़ गया है कि हम यह जान सकें कि रागादिक अचेतन हैं, किंतु स्वरूपदृष्टि के द्वार से हम इस बात को स्पष्ट जान सकते हैं कि रागादिक विभाव अन्य हैं, अचेतन हैं, यह मैं ज्ञान चेतन हूँ, रागादिक से विविक्त हूँ, इसके स्वलक्षण का निश्चय कर के यह निर्णय करना कि अध्यवसान भाव अन्य है और ज्ञान भाव अन्य है। मैं ज्ञानमात्र हूँ, अध्यवसान नहीं हूँ। मैं फिर क्यों अध्यवसान में रमकर घात करूं ?

इस प्रकार शब्द, रूप, वर्ण, रस, गंध, स्पर्श, धर्म, अधर्म, आकाश, काल, कर्म, अध्यवसान―इन से इस आत्मा को भिन्नपने से निश्चय कराकर अब वह ध्यान क्या है? ऐसा प्रतिपादन करते हैं।


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