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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 47-48

From जैनकोष



राया हु णिग्गदो त्ति य एसो बलसमुदयस्स आदेसो ।ववहारेण हु उच्चइ तत्थेक्को णिग्गदो राया ।।47।।

एमेव य ववहारो अज्झवसाणादि अण्णभावाणं ।जीवो त्ति कदो सुत्ते तत्थेक्को णिच्छिदो जीवो ।।48।।

76. दृष्टांतपूर्वक प्रकृत व्यवहार निश्चय प्रतिपादन―सेना समुदाय के संबंध में ऐसा कथन होता है कि यह राजा जा रहा है, सो यह व्यवहारनय से कहा जाता है । निश्चय से देखो तो वहाँ एक ही राजा जा रहा । बाकी तो सब सेना के लोग हैं । इसी प्रकार अध्यवसानादि अन्य भावों के संबंध में ऐसा कथन होता है कि यह जीव है सो सूत्र (सिद्धांतशास्त्र) में व्यवहार किया गया है (व्यवहारनय से ऐसा कहा गया है) । निश्चय से देखो तो वह एक ही (अनाद्यंनंत एकस्वरूप) जीव निश्चित किया गया है । जैसे एक राजा सज-धज करके सेना के साथ जा रहा है । लोग उसको देखकर कहते हैं कि देखो, यह राजा 10 कोस में फैला हुआ गया है । लेकिन राजा तो एक 3-4 हाथ का होगा, वह तो 10 कोस में फैल नहीं सकता है । परंतु व्यवहार में कहते हैं कि यह राजा 10 कोस में फैल करके जा रहा है । राजा तो एक पुरुष मात्र है; मगर राजा का सेना के साथ संबंध है अत: राजा को 10 कोस में फैलकर चलने वाला बताया जाता है । इसी प्रकार जीव तो एक है । वह नाना परिणतियों में जाता है, अत: जिन-जिन पर्यायों में से वह गुजरता है, उन-उन पर्यायों को भी व्यवहार में जीव कहने लग गये हैं । अत: पर्यायों में जीव का उपचार किया जाता है । देखो, जितनी पर्यायें हैं, उतने जीव नहीं हैं, क्योंकि जीव तो नाना पर्यायों में क्रम-क्रम से जाता है । जीव तो वास्तव में उन अनुगत पर्यायों में एक है, वह नाना पर्यायों में चलता रहता है । हम जीव एक हैं, मनुष्य तिर्यंच देवादि नाना पर्यायों में क्रम-क्रम से जाते हैं । नाना पर्यायों में जाना जीव तो नहीं हुआ । जीव यद्यपि एक है, चैतन्यमात्र है, तथापि रागादि जो अनेक परिणमन है, वह उनमें व्याप्त हो गया है । वस्तुत: जीव का जैसा स्वरूप माना, वैसा है, जीव का स्वरूप रागादि में व्याप्त नहीं है, फिर भी व्यवहारी जन रागादि भावों में जीव मानते हैं ।

77. आनंदधाम अंतस्तत्त्व के आश्रय से आनंद लाभ―देखो, आत्मा में आनंद भरा है, जिस आनंद को आश्रय करके जीव अत्यंत आनंद को प्राप्त होता है । धन के उपार्जन से आकुलता ही मिलती है । धन को चोर, डाकू लूट ले जायेंगे, 24 घंटे इसी का भय बना रहता है । बाह्य जितने भी पदार्थ हैं उनमें आत्मबुद्धि जाने से जीव को अनाकुलता नहीं मिलती है । वास्तव में देखा जाये तो शरीर, मैं नहीं हूँ । जैसे जीव के निकलने पर शवमात्र रह जाता है, ऐसा ही तो यह शरीर है । जिस काल शरीर में जीव रह रहा है, तब भी शरीर जीव नहीं है । शरीर से मैं जुदा हूँ । शरीर मेरे से जुदा है । इस आत्मा में रूप नहीं है, स्पर्श नहीं है, रस नहीं है, गंध नहीं है, शब्द नहीं है । यह आत्मा पकड़ने पर नहीं पकड़ा जाता है । यह आत्मा ज्ञान द्वारा समझ में आता है । जीव का सीधा साधा लक्षण यह है कि जो जानता है, सो जीव हैं । जीव अखंड है । यह जीव अपने गुणों पर्यायों में रत है । इसका परिणमन इसमें ही होता है । आत्मा का परिणमन इससे बाहर नहीं हो सकता है । इसे दुनिया के लोग पहिचान नहीं सकते हैं । लोग जिसे देखते हैं, वह मैं आत्मा नहीं हूँ । मैं तो चैतन्यमात्र हूँ, इस प्रकार की भावना से पर के विकल्प दूर हो जाते हैं, इन विकल्पों के हटने से आनंद प्राप्त होता है । इस निर्विकल्प दशा से जो आनंद प्राप्त होता है, ऐसा आनंद कुछ भी किया जाये, अन्यत्र नहीं मिल सकता है ।

78. अध्यवसानादि में जीवत्वव्यवहार के दर्शन का दृष्टांत―व्यवहारनय किस तरह निरूपण करता है और निश्चयनय किस तरह उससे हटा हुआ है? इस विषय में दृष्टांत दिया जा रहा है । जैसे कोई बड़ा राजा अपनी बड़ी सेना सजाकर बड़े ठाठ से जा रहा है तो देखने वाले लोग कहते हैं कि आज तो राजा बीस कोश में फैला हुआ जा रहा है । अथवा जितने भी उसके परिकर हैं उतने में फैला हुआ जा रहा है तो यह तो बतलावो कि क्या राजा 20 कोश का लंबा चौड़ा है जो कि 20 कोश में फैला हुआ जा रहा है ? राजा तो वही साढ़े तीन हाथ का लंबा है पर उसका जो ठाठ है, जो कि राजा के साथ चलता है, राजा से संबंधित है, उस परिकर में राजा के संबंध के कारण राजा का व्यपदेश किया गया है, इसी प्रकार इन सबको जीव कहते हैं । जीव इन सबमें व्याप्त है, फैला हुआ है । मनुष्य भी जीव, पशु भी जीव, पक्षी भी जीव, जितने ये भाव हैं उन भावों को देखकर और उसमें जितने रागादिक भाव उठ रहे हैं उन रागादिक भावों को निरखकर कहते हैं कि ये सारे अध्यवसान, विकल्प इसमें फैलकर प्रवृत्ति कर रहा है, जा रहा है, मगर यह तो बतलावो कि परमार्थभूत जो कुछ भी एक जीव जिसका चैतन्य से ही संबंध है, जो चैतन्यात्मक हो सो जीव; वह जीव क्या इन रागादिक भावों में फैलकर रह रहा है । थोड़ा दृष्टांत में एक चीज लीजिये । एक दर्पण है, दर्पण में सामने के मनुष्यों की फोटो पड़ी, छाया हुई तो छाया में क्या स्वच्छता व्याप्त रही है? स्वच्छता का स्वरूप देखना है, तन्मात्र दर्पण को समझना है तो स्वच्छता से छाया न्यारी मालूम होती है । देखिये―उस स्वच्छता की वजह से छायारूप परिणमन हुआ अथवा वह स्वच्छता वहाँ तिरोभूत हुई, स्वच्छता का स्वच्छतारूप में स्वाभाविक परिणमन नहीं रहा, छायारूप से विभाव परिणमन हो गया, तिस पर भी बुद्धि यह कहती है कि छाया स्वच्छता से निराली चीज है । दर्पण तो स्वच्छतामात्र है, इसी प्रकार आत्मा में उपाधि के संबंध से राग-द्वेषादिक नाना अध्यवसान चल रहे हैं तिस पर भी चूँकि आत्मा चैतन्यस्वरूप है, इन रागादिकों से चेतन नहीं नजर आता । लगता ऐसा है कि जिस समय राग अथवा द्वेषरूप परिणमन करते हैं तो साथ ही साथ होश चेतना चैतन्य ज्ञान यह भी बना हुआ है । ज्ञान के बिना राग क्या लेकिन जब स्वरूप पर दृष्टि डालते हैं । राग का स्वरूप क्या है, चैतन्य का स्वरूप क्या है ? वे दोनों एकाधिकरण हैं इस कारण सब कुछ ठीक-सा जंच रहा है, लेकिन रागभाव चैतन्यभाव से निराला है । चैतन्य का चेतन काम है, रागादिक का रज्जमानता काम है । तो व्यवहार से ही यह कहा जाता कि यह चेतन रागादि भावों को व्याप कर रह रहा है । वस्तुत: वह तो स्वभावमात्र है । यह जीव नहीं है, तब फिर जीव क्या है? उसके उत्तर में अगला श्लोक कहते हैं ।

79. परमार्थ में पहुँचने का उपाय―हम परमार्थ में कैसे पहुंचें, इसके लिये उपाय व्यवहार है । जैसे व्यवहार से सेना को राजा कह देते हैं, उसी प्रकार इन रागादि को भी व्यवहार में जीव कह देते हैं । परमार्थ से जीव एक ही है । देखो जैसे व्यवहारी जन किसी संबंध के कारण सेना समुदाय में यह राजा है ऐसा व्यवहार करते हैं । परमार्थ से तो राजा एक ही है न; इसी प्रकार व्यवहारी जन किसी संबंध के कारण अध्यवसानादि अन्य भावों में “यह जीव है” ऐसा व्यवहार करते हैं । परमार्थ से तो जीव की जितनी पर्यायें हैं वे जीव हों तो जीव अनेक हो गये । यहाँ अनंत जीवों को एक होने का दोष नहीं दिया जा रहा है किंतु किसी भी एक जीव के बारे में विचार करो, उस जीव की भूत, भविष्य, वर्तमान संबंधी अनंत पर्यायें हैं। वे यदि जीव हों तो जीव अनेक हो जावेंगे । उनमें एक जीव तो रहा नहीं, फिर तो असत् का उत्पाद, सत् का विनाश, व्यवहार का लोप, मोक्षमार्ग का लोप आदि सभी विडंबनायें प्रस्तुत होगी, जो कि हैं नहीं । अत: व्यवहार को असत्य न समझो, किंतु व्यवहार का विषय जानकर उसमें मध्यस्थ होकर परमार्थतत्त्व का आश्रय लो । यथार्थ ज्ञान होने पर सब समझ में आ जाता है । विज्ञेष्वलमधिकेन । अब पूछते हैं कि परमार्थ में एक ही जीव है तो यह किस लक्षण वाला है? इसका उत्तर आचार्य इस गाथा द्वारा देते हैं:―


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