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शुद्धाद्वैत (शैव दर्शन)

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  1. शुद्धाद्वैत (शैव दर्शन)
    1. सामान्य परिचय
      ई. श. 15 में इसकी स्थापना हुई। वल्लभ, श्रीकंठ व भास्कर इसके प्रधान संस्थापक थे। श्रीकंठकृत शिवसूत्र व भास्कर कृत वार्तिक प्रधान ग्रंथ हैं। इनके मत में ब्रह्म के पर अपर दो रूप नहीं माने जाते। पर ब्रह्म ही एक तत्त्व है। ब्रह्म अंशी और जड़ व अजड़ जगत् इसके दो अंश हैं।
    2. तत्त्व विचार
      1. शिव ही केवल एक सत् है। शंकर वेदांत मान्य माया व प्रकृति सर्वथा कुछ नहीं है। उस शिव की अभिव्यक्ति 16 प्रकार से होती है–परम शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर, शुद्धविद्या, माया, माया के पाँच कुंचक या कला, विद्या, राग, काल, नियति, पुरुष, प्रकृति, महान् या बुद्धि, अहंकार, मन, पाँच ज्ञानेंद्रिय, पाँच कर्मेंद्रियाँ, पाँच तन्मात्राएँ और पाँच भूत। उनमें से पुरुष आदि तत्त्व तो सांख्यवत् है। शेष निम्न प्रकार हैं।–
      2. एक व्यापक, नित्य, चैतन्य, स्वरूप शिव है। जड़ व चेतन सब में यही ओतप्रोत है। आत्मा, परमेश्वर व परासंवित् इसके अपरनाम हैं।
      3. सृष्टि, स्थिति व संहार (उत्पाद, ध्रौव्य, व्यय) यह तीन उस शिव की शक्तियाँ हैं। सृष्टि शक्ति द्वारा वह स्वयं विश्वाकार होता है। स्थिति शक्ति से विश्व का प्रकाशक, संहार शक्ति से सबको अपने में लय कर लेता है। इसके पाँच भेद हैं–चित्, आनंद, ज्ञान, इच्छा व क्रिया।
      4. ‘अहं’ प्रत्यय द्वारा सदा अभिव्यक्त रहने वाला सदाशिव है। यहाँ इच्छा शक्ति का प्राधान्य है।
      5. जगत् की क्रमिक अभिव्यक्ति करता हुआ वही सदाशिव ईश्वर है। यहाँ ‘इदं अहं’ की भावना होने के कारण ज्ञान शक्ति का प्राधान्य है।
      6. ‘अहं इदं’ यह भावना शुद्धविद्या है।
      7. ‘अहं’ पुरुष रूप में और ‘इदं’ प्रकृति रूप में अभिव्यक्त होकर द्वैत को स्पष्ट करते हैं यही शिव की माया है।
      8. इस माया के कारण वह शिव पाँच कंचुकों में अभिव्यक्त होता है। सर्व कर्ता से असर्व कर्ता होने के कारण कलावान् है, सर्वज्ञ से असर्वज्ञ होने के कारण विद्यावान्, अपूर्णता के बोध के कारण रागी, अनित्यत्व के बोध के कारण काल सापेक्ष तथा संकुचित ज्ञान शक्ति के कारण नियतिवान् हो जाता है।
      9. इन पाँच कंचुकों से आवेष्टित पुरुष संसारी हो जाता है।
    3. सृष्टि व मुक्ति विचार
      1. जैसे वट बीज में वट वृक्ष की शक्ति रहती है वैसे ही शिव में 35 तत्त्व सदा शक्तिरूप से विद्यमान हैं। उपर्युक्त क्रम से वह शिव ही संसारी होता हुआ सृष्टि की रचना करता है।
      2. पाँच कंचुकों से आवृत पुरुष की शक्ति संकुचित रहती है। सूक्ष्म तत्त्व में प्रवेश करने पर वह अपने को प्रकृति के सूक्ष्म रूप के बराबर समझता हुआ। ‘यह मैं हूँ’ ऐसे द्वैत की प्रतीति करता है। इस प्रतीति में ‘यह’ और ‘मैं’ समान महत्त्व वाले होते हैं। तत्पश्चात् ‘यह मैं हूँ’ की प्रतीति होती है। यहाँ ‘यह’ प्रधान है और ‘मैं’ गौण। आगे चलकर ‘यह’ ‘मैं’ में अंतर्लीन हो जाता है। तब ‘मैं हूँ’ ऐसी प्रतीति होती है। यहाँ भी ‘मैं’ और ‘हूँ’ का द्वैत है। यही सदाशिव तत्त्व है। पश्चात् इससे भी सूक्ष्म भूमि में प्रवेश करने पर केवल ‘अहं’ की प्रतीति होती है यही शक्ति तत्त्व है। यह परम शिव की उन्मीलनावस्था है। यहाँ आनंद का प्रथम अनुभव होता है। यह प्रतीति भी पीछे परम शिव में लीन होने पर शून्य प्रतीति रह जाती है। यहाँ वास्तव में सर्व चिन्मय दिखने लगता है। यही वास्तविक अद्वैत है।
      3. जब तक शरीर में रहता है तब तक जीवनमुक्त कहाता है। शरीर पतन होने पर शिव में प्रविष्ट हो जाता है। यहाँ आकर ‘एकमेवाद्वितीयं नेह नानास्ति किंचन’ तथा ‘सर्व खल्विदं ब्रह्म’ का वास्तविक अनुभव होता है।


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