• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

उपादान: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 18:25, 14 December 2022 (view source)
Poonam Jain (talk | contribs)
No edit summary
← Older edit
Latest revision as of 22:16, 17 November 2023 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
 
(3 intermediate revisions by 2 users not shown)
Line 1: Line 1:
<p class="SanskritText"><span class="GRef"> न्यायविनिश्चय/ </span>वृ. 1/133/486/4 विविक्षतं वस्तु उपादानम् उत्तरस्य कार्यस्य सजातीयं कारणं प्रकल्पयेत्।</p>
<span class="GRef"> न्यायविनिश्चय/ वृत्ति 1/133/486/4</span> <p class="SanskritText">विविक्षतं वस्तु उपादानम् उत्तरस्य कार्यस्य सजातीयं कारणं प्रकल्पयेत्।</p>
<p class="HindiText">= विवक्षित उत्तर कार्यका सजातीय कारण कल्पित किया गया है।</p>
<p class="HindiText">= विवक्षित उत्तर कार्य का सजातीय कारण कल्पित किया गया है।</p>
<p class="SanskritText">अष्टसहस्री/पृ. 210 त्यक्तात्यक्तात्यरूपं यत्पूर्वापूर्वेण वर्तते। कालत्रयेऽपि तद् द्रव्यमुपादानमिति स्मृतम् ॥ यत् स्वरूपं त्यजत्येव यन्न त्यजति सर्वथा। तन्नोपादानमर्थस्य क्षणिकं शाश्वतं यथा।</p>
<span class="GRef">अष्टसहस्री/पृष्ठ 210</span> <p class="SanskritText">त्यक्तात्यक्तात्यरूपं यत्पूर्वापूर्वेण वर्तते। कालत्रयेऽपि तद् द्रव्यमुपादानमिति स्मृतम् ॥ यत् स्वरूपं त्यजत्येव यन्न त्यजति सर्वथा। तन्नोपादानमर्थस्य क्षणिकं शाश्वतं यथा।</p>
<p class="HindiText">= जो (द्रव्य) तीनों कालोंमें अपने रूपको छोड़ता हुआ और नहीं छोड़ता हुआ पूर्व रूपसे और अपूर्व रूपसे वर्त रहा है वह उपादान कारण है, ऐसा जानना चाहिए। जो अपने स्वरूपको छोड़ता ही है और जो उसे सर्वथा नहीं छोड़ता वह अर्थका उपादान नहीं होता जैसे क्षणिक और शाश्वत। भावार्थ-द्रव्यमें दो अंश हैं-एक शाश्वत और एक क्षणिक। गुण शाश्वत होनेके कारण अपने स्वरूपको त्रिकाल नहीं छोड़ते और पर्याय क्षणिक होनेके कारण अपने स्वरूपको प्रतिक्षण छोड़ती है। यह दोनों ही अंश उस द्रव्यसे पृथक् कोई अर्थांतर रूप नहीं हैं। इन दोनोंसे समवेत द्रव्य ही कार्यका उपादान कारण है। अर्थांतरभूत रूपसे स्वीकार किये गये शाश्वत-पदार्थ या क्षणिकपदार्थ कभी भी उपादान नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सर्वथा शाश्वत पदार्थ में परिणमनका अभाव होनेके कारण कार्य ही नहीं तब कारण किसे कहें। और सर्वथा क्षणिक पदार्थ प्रतिक्षण विनष्ट ही हो जाता है तब उसे कारणपना कैसे बन सकता है।</p>
<p class="HindiText">= जो (द्रव्य) तीनों कालों में अपने रूप को छोड़ता हुआ और नहीं छोड़ता हुआ पूर्व रूप से और अपूर्व रूप से वर्त रहा है वह उपादान कारण है, ऐसा जानना चाहिए। जो अपने स्वरूप को छोड़ता ही है और जो उसे सर्वथा नहीं छोड़ता वह अर्थ का उपादान नहीं होता जैसे क्षणिक और शाश्वत। भावार्थ-द्रव्य में दो अंश हैं-एक शाश्वत और एक क्षणिक। गुण शाश्वत होने के कारण अपने स्वरूप को त्रिकाल नहीं छोड़ते और पर्याय क्षणिक होने के कारण अपने स्वरूप को प्रतिक्षण छोड़ती है। यह दोनों ही अंश उस द्रव्य से पृथक् कोई अर्थांतर रूप नहीं हैं। इन दोनों से समवेत द्रव्य ही कार्य का उपादान कारण है। अर्थांतरभूत रूप से स्वीकार किये गये शाश्वत-पदार्थ या क्षणिक पदार्थ कभी भी उपादान नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सर्वथा शाश्वत पदार्थ में परिणमन का अभाव होने के कारण कार्य ही नहीं तब कारण किसे कहें। और सर्वथा क्षणिक पदार्थ प्रतिक्षण विनष्ट ही हो जाता है तब उसे कारणपना कैसे बन सकता है।</p>
<p>(ज्ञानदर्पण 57-58)</p>
<p class="HindiText"><span class="GRef">(ज्ञानदर्पण 57-58)</span></p>
<p class="HindiText"><p>अष्टसहस्री श्लो. 58 की टीका-"परिणाम क्षणिक उपादान है और गुण शाश्वत उपादान है।"</p>
<p class="HindiText"><span class="GRef">अष्टसहस्री श्लोक 58 की टीका</span>-<p class="HindiText">"परिणाम क्षणिक उपादान है और गुण शाश्वत उपादान है।"</p>
<p>निमित्त, उपादान चिट्ठी पं. बनारसीदास-<p class="HindiText">"उपादान वस्तुकी सहन शक्ति है।"</p>
<p class="HindiText"><span class="GRef">निमित्त, उपादान चिट्ठी पं. बनारसीदास</span>-<p class="HindiText">"उपादान वस्तु की सहन शक्ति है।"</p>
<p class="HindiText">2. उपादानकी मुख्यता गौणता - देखें [[ कारण#II | कारण - II]]</p>
<p class="HindiText">2. उपादान की मुख्यता गौणता - देखें [[ कारण#II | कारण - II]]</p>
   
   



Latest revision as of 22:16, 17 November 2023

न्यायविनिश्चय/ वृत्ति 1/133/486/4 

विविक्षतं वस्तु उपादानम् उत्तरस्य कार्यस्य सजातीयं कारणं प्रकल्पयेत्।

= विवक्षित उत्तर कार्य का सजातीय कारण कल्पित किया गया है।

अष्टसहस्री/पृष्ठ 210

त्यक्तात्यक्तात्यरूपं यत्पूर्वापूर्वेण वर्तते। कालत्रयेऽपि तद् द्रव्यमुपादानमिति स्मृतम् ॥ यत् स्वरूपं त्यजत्येव यन्न त्यजति सर्वथा। तन्नोपादानमर्थस्य क्षणिकं शाश्वतं यथा।

= जो (द्रव्य) तीनों कालों में अपने रूप को छोड़ता हुआ और नहीं छोड़ता हुआ पूर्व रूप से और अपूर्व रूप से वर्त रहा है वह उपादान कारण है, ऐसा जानना चाहिए। जो अपने स्वरूप को छोड़ता ही है और जो उसे सर्वथा नहीं छोड़ता वह अर्थ का उपादान नहीं होता जैसे क्षणिक और शाश्वत। भावार्थ-द्रव्य में दो अंश हैं-एक शाश्वत और एक क्षणिक। गुण शाश्वत होने के कारण अपने स्वरूप को त्रिकाल नहीं छोड़ते और पर्याय क्षणिक होने के कारण अपने स्वरूप को प्रतिक्षण छोड़ती है। यह दोनों ही अंश उस द्रव्य से पृथक् कोई अर्थांतर रूप नहीं हैं। इन दोनों से समवेत द्रव्य ही कार्य का उपादान कारण है। अर्थांतरभूत रूप से स्वीकार किये गये शाश्वत-पदार्थ या क्षणिक पदार्थ कभी भी उपादान नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सर्वथा शाश्वत पदार्थ में परिणमन का अभाव होने के कारण कार्य ही नहीं तब कारण किसे कहें। और सर्वथा क्षणिक पदार्थ प्रतिक्षण विनष्ट ही हो जाता है तब उसे कारणपना कैसे बन सकता है।

(ज्ञानदर्पण 57-58)

अष्टसहस्री श्लोक 58 की टीका-

"परिणाम क्षणिक उपादान है और गुण शाश्वत उपादान है।"

निमित्त, उपादान चिट्ठी पं. बनारसीदास-

"उपादान वस्तु की सहन शक्ति है।"

2. उपादान की मुख्यता गौणता - देखें कारण - II



पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=उपादान&oldid=119647"
Categories:
  • उ
  • द्रव्यानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 17 November 2023, at 22:16.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki