• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

वाचना: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 23:26, 5 October 2014 (view source)
Vikasnd (talk | contribs)
No edit summary
 
Latest revision as of 20:51, 6 February 2025 (view source)
Chirag (talk | contribs)
No edit summary
 
(9 intermediate revisions by 3 users not shown)
Line 1: Line 1:
<ol>
<ol>
   <li><span class="HindiText"><strong name="1" id="1">वाचना </strong></span><strong><br></strong>स.सि./९/२५/४४३/४<span class="SanskritText">.निरवद्यग्रन्थार्थोभयप्रदानं वाचना।</span> = <span class="HindiText">निर्दोष ग्रन्थ,  उसके अर्थ का  उपदेश अथवा दोनों ही उसके पात्र को प्रदान करना वाचना है। (रा.वा./९/२५/१/६२४/९); (त.सा./७/१७); (चा.सा./१५३/१); (अन.ध./७/८३/७१४)। </span><br />
   <li class="HindiText"><strong name="1" id="1">वाचना </strong></span><strong><br></strong><span class="GRef"> सर्वार्थसिद्धि/9/25/443/4 </span><span class="SanskritText">निरवद्यग्रंथार्थोभयप्रदानं वाचना।</span> = <span class="HindiText">निर्दोष ग्रंथ,  उसके अर्थ का  उपदेश अथवा दोनों ही उसके पात्र को प्रदान करना वाचना है। <span class="GRef">( राजवार्तिक/9/25/1/624/9 )</span>; <span class="GRef">( तत्त्वसार/7/17 )</span>; <span class="GRef">( चारित्रसार/153/1 )</span>; <span class="GRef">( अनगारधर्मामृत/7/83/714 )</span>। </span>
     ध.९/४,  १, ५५/२६२/७ <span class="PrakritText">जा तत्थ णवसु आगमेसुवायणा  अण्णेसिं भवियाणं जहासत्तीए गंथत्थपरूवणा। </span><br />
     <span class="GRef"> धवला 9/4,  1, 55/262/7  </span><span class="PrakritText">जा तत्थ णवसु आगमेसुवायणा  अण्णेसिं भवियाणं जहासत्तीए गंथत्थपरूवणा। </span>
    ध.९/४,  १, ५४/२५२/६ <span class="SanskritText">शिष्याध्यापनं वाचना। </span>=  
    <span class="GRef"> धवला 9/4,  1, 54/252/6  </span><span class="SanskritText">शिष्याध्यापनं वाचना। </span>=  
     <ol>
     <ol><li class="HindiText"> वाचना आदि नौ आगमों में वाचना अर्थात् अन्य भव्य जीवों के लिए शक्त्यनुसार ग्रंथ के अर्थ की प्ररूपणा। <span class="GRef">( धवला 14/5,  6, 12/9/3 )</span>। </li>
      <li class="HindiText"> वाचना आदि नौ आगमों में वाचना अर्थात्‌ अन्य भव्य जीवों के लिए शक्त्यनुसार ग्रन्थ के अर्थ की प्ररूपणा। (ध.१४/५,  ६, १२/९/३)। </li>
       <li class="HindiText"> शिष्यों को पढ़ाने का नाम वाचना है। <span class="GRef">( धवला 14/5,  6, 12/8/6 )</span>। <br />
       <li class="HindiText"> शिष्यों को पढ़ाने का नाम वाचना है। (ध.१४/५,  ६, १२/८/६)। <br />
       </li>
       </li>
     </ol>
     </ol>
   </li>
   </li>
   <li><span class="HindiText"><strong name="2" id="2"> वाचना के भेद व लक्षण </strong></span><br />
   <li class="HindiText"><strong name="2" id="2"> वाचना के भेद व लक्षण </strong></span><br />
     ध.९/४,  १, ५४/२५२/५ <span class="SanskritText">सा चतुर्विधा नन्दा भद्रा जया  सौम्या चेति। पूर्वपक्षीकृतपरदर्शनानि निराकृत्य स्वपक्षस्थापिका व्याख्या नन्दा। तत्र युक्तिभिः प्रत्यवस्थाय पूर्वापरविरोधपरिहारेण विना तन्त्रार्थ कथनं जया।  क्वचित्‌ क्वचित्‌ स्खलितवृत्तेर्व्याख्या सौम्या।</span> = <span class="HindiText">वह (वाचना) चार प्रकार है -  नन्दा,  भद्रा, जया और सौम्या। अन्य दर्शनों को  पूर्वपक्ष करके उनका निराकरण करते हुए अपने पक्ष को स्थापित करने वाली व्याख्या  नन्दा कहलाती है। युक्तियों द्वारा समाधान करके पूर्वापर विरोध का परिहार करते हुए  सिद्धान्त में स्थित समस्त पदार्थों की व्याख्या का नाम भद्रा है। पूर्वा पर विरोध के परिहार के बिना सिद्धान्त के अर्थों का कथन करना जया वाचना कहलाती है। कहीं-कहीं स्खलनपूर्ण वृत्ति से जो व्याख्या की जाती है, वह सौम्या वाचना है। </span></li>
     <span class="GRef"> धवला 9/4,  1, 54/252/5  </span><span class="SanskritText">सा चतुर्विधा नंदा भद्रा जया  सौम्या चेति। पूर्वपक्षीकृतपरदर्शनानि निराकृत्य स्वपक्षस्थापिका व्याख्या नंदा। तत्र युक्तिभिः प्रत्यवस्थाय पूर्वापरविरोधपरिहारेण विना तंत्रार्थ कथनं जया।  क्वचित् क्वचित् स्खलितवृत्तेर्व्याख्या सौम्या।</span> = <span class="HindiText">वह (वाचना) चार प्रकार है -  नंदा,  भद्रा, जया और सौम्या। अन्य दर्शनों को  पूर्वपक्ष करके उनका निराकरण करते हुए अपने पक्ष को स्थापित करने वाली व्याख्या  '''नंदा''' कहलाती है। युक्तियों द्वारा समाधान करके पूर्वापर विरोध का परिहार करते हुए  सिद्धांत में स्थित समस्त पदार्थों की व्याख्या का नाम '''भद्रा''' है। पूर्वापर विरोध के परिहार के बिना सिद्धांत के अर्थों का कथन करना '''जया वाचना''' कहलाती है। कहीं-कहीं स्खलनपूर्ण वृत्ति से जो व्याख्या की जाती है, वह '''सौम्या वाचना''' है। </span></li>
</ol>
</ol>


[[वाचक | Previous Page]]
<noinclude>
[[वाचनोपगत | Next Page]]
[[ वाचक | पूर्व पृष्ठ ]]


[[Category:व]]
[[ वाचनोपगत | अगला पृष्ठ ]]
 
</noinclude>
[[Category: व]]
[[Category: द्रव्यानुयोग]]

Latest revision as of 20:51, 6 February 2025



  1. वाचना
    सर्वार्थसिद्धि/9/25/443/4 निरवद्यग्रंथार्थोभयप्रदानं वाचना। = निर्दोष ग्रंथ, उसके अर्थ का उपदेश अथवा दोनों ही उसके पात्र को प्रदान करना वाचना है। ( राजवार्तिक/9/25/1/624/9 ); ( तत्त्वसार/7/17 ); ( चारित्रसार/153/1 ); ( अनगारधर्मामृत/7/83/714 )। धवला 9/4, 1, 55/262/7 जा तत्थ णवसु आगमेसुवायणा अण्णेसिं भवियाणं जहासत्तीए गंथत्थपरूवणा। धवला 9/4, 1, 54/252/6 शिष्याध्यापनं वाचना। =
    1. वाचना आदि नौ आगमों में वाचना अर्थात् अन्य भव्य जीवों के लिए शक्त्यनुसार ग्रंथ के अर्थ की प्ररूपणा। ( धवला 14/5, 6, 12/9/3 )।
    2. शिष्यों को पढ़ाने का नाम वाचना है। ( धवला 14/5, 6, 12/8/6 )।
  2. वाचना के भेद व लक्षण
    धवला 9/4, 1, 54/252/5 सा चतुर्विधा नंदा भद्रा जया सौम्या चेति। पूर्वपक्षीकृतपरदर्शनानि निराकृत्य स्वपक्षस्थापिका व्याख्या नंदा। तत्र युक्तिभिः प्रत्यवस्थाय पूर्वापरविरोधपरिहारेण विना तंत्रार्थ कथनं जया। क्वचित् क्वचित् स्खलितवृत्तेर्व्याख्या सौम्या। = वह (वाचना) चार प्रकार है - नंदा, भद्रा, जया और सौम्या। अन्य दर्शनों को पूर्वपक्ष करके उनका निराकरण करते हुए अपने पक्ष को स्थापित करने वाली व्याख्या नंदा कहलाती है। युक्तियों द्वारा समाधान करके पूर्वापर विरोध का परिहार करते हुए सिद्धांत में स्थित समस्त पदार्थों की व्याख्या का नाम भद्रा है। पूर्वापर विरोध के परिहार के बिना सिद्धांत के अर्थों का कथन करना जया वाचना कहलाती है। कहीं-कहीं स्खलनपूर्ण वृत्ति से जो व्याख्या की जाती है, वह सौम्या वाचना है।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वाचना&oldid=135534"
Categories:
  • व
  • द्रव्यानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 6 February 2025, at 20:51.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki