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असही: Difference between revisions

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Revision as of 12:12, 30 December 2022 (view source)
J2jinendra (talk | contribs)
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Revision as of 09:18, 23 July 2023 (view source)
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<span class="GRef">अनगार धर्मामृत अधिकार 8/132-133</span> <span class="SanskritText">वसत्यादौ विशेत् ततस्थं भूतादिं निसहीगीरा। आपृच्छ्य तस्मान्नर्गच्चेत्तंचापृच्छ्यासहीगिरा ॥132॥ आत्मान्यात्मासितो येन त्यक्ता वाशास्य भावातः। नीसह्यसह्यौ स्तोऽन्यस्य तदुच्चारणमात्रकम् ॥133॥</span>
<span class="GRef">अनगार धर्मामृत अधिकार 8/132-133</span> <span class="SanskritText">वसत्यादौ विशेत् ततस्थं भूतादिं निसहीगीरा। आपृच्छ्य तस्मान्नर्गच्चेत्तंचापृच्छ्यासहीगिरा ॥132॥ आत्मान्यात्मासितो येन त्यक्ता वाशास्य भावातः। नीसह्यसह्यौ स्तोऽन्यस्य तदुच्चारणमात्रकम् ॥133॥</span>
<span class="HindiText">= साधुओं को जब मठ चैत्यालय या वसति आदि में प्रवेश करना हो तब उन मठादिकों में रहने वाले भूत यक्ष नाग आदिकों से `निसही' इस शब्द को बोलकर पूछकर प्रवेश करना चाहिए। इसी तरह जब वहाँ से निकलना हो तब `असही' इसी शब्द के द्वारा उनसे पूछकर निकलना चाहिए ॥132॥ निसही और असही शब्द का निश्चयनय की अपेक्षा अर्थ बताते हैं। जिस साधु ने अपनी आत्मा को अपनी आत्मा में ही स्थापित कर रखा है उसके निश्चयनय से `निसही' समझना चाहिए। और जिसने इस लोक परलोक आदि संपूर्ण विषयों की आशा का परित्याग कर दिया है उसके निश्चय नयसे `असही' समझना चाहिए। किंतु उसके प्रतिकूल जो बहिरात्मा हैं अथवा आशावान हैं उसके ये निसही और असही केवल शब्दोच्चारणमात्र ही समझना चाहिए।</span>
<span class="HindiText">= साधुओं को जब मठ चैत्यालय या वसति आदि में प्रवेश करना हो तब उन मठादिकों में रहने वाले भूत यक्ष नाग आदिकों से `निसही' इस शब्द को बोलकर पूछकर प्रवेश करना चाहिए। इसी तरह जब वहाँ से निकलना हो तब `असही' इसी शब्द के द्वारा उनसे पूछकर निकलना चाहिए ॥132॥ निसही और असही शब्द का निश्चयनय की अपेक्षा अर्थ बताते हैं। जिस साधु ने अपनी आत्मा को अपनी आत्मा में ही स्थापित कर रखा है उसके निश्चयनय से `निसही' समझना चाहिए। और जिसने इस लोक परलोक आदि संपूर्ण विषयों की आशा का परित्याग कर दिया है उसके निश्चय नय से `असही' समझना चाहिए। किंतु उसके प्रतिकूल जो बहिरात्मा हैं अथवा आशावान हैं उसके ये निसही और असही केवल शब्दोच्चारणमात्र ही समझना चाहिए।</span>
   
   



Revision as of 09:18, 23 July 2023

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 150/345/11  जिनायतनं यतिनिवासं वा प्रविशन् प्रदक्षिणीकुर्यान्निसीधिकाशब्दप्रयोगं च। निर्गंतुकाम आसीधिकेति। आदिशब्देन परिगृहीतस्थानभोजनशयनगमनादिक्रिया। = जिनमंदिर अथवा यतिका निवास अर्थात् मठ में प्रवेश कर प्रदक्षिणा करें। उस समय निसिधिका शब्द का उच्चारण करें, और वहां से लौटते समय आसीधिका शब्द का उच्चारण करें। इसी तरह स्थान, भोजन, शयन, गमनादि क्रिया करते समय भी मुनियों को प्रयत्नपूर्वक प्रवृत्ति करनी चाहिए।

अनगार धर्मामृत अधिकार 8/132-133 वसत्यादौ विशेत् ततस्थं भूतादिं निसहीगीरा। आपृच्छ्य तस्मान्नर्गच्चेत्तंचापृच्छ्यासहीगिरा ॥132॥ आत्मान्यात्मासितो येन त्यक्ता वाशास्य भावातः। नीसह्यसह्यौ स्तोऽन्यस्य तदुच्चारणमात्रकम् ॥133॥ = साधुओं को जब मठ चैत्यालय या वसति आदि में प्रवेश करना हो तब उन मठादिकों में रहने वाले भूत यक्ष नाग आदिकों से `निसही' इस शब्द को बोलकर पूछकर प्रवेश करना चाहिए। इसी तरह जब वहाँ से निकलना हो तब `असही' इसी शब्द के द्वारा उनसे पूछकर निकलना चाहिए ॥132॥ निसही और असही शब्द का निश्चयनय की अपेक्षा अर्थ बताते हैं। जिस साधु ने अपनी आत्मा को अपनी आत्मा में ही स्थापित कर रखा है उसके निश्चयनय से `निसही' समझना चाहिए। और जिसने इस लोक परलोक आदि संपूर्ण विषयों की आशा का परित्याग कर दिया है उसके निश्चय नय से `असही' समझना चाहिए। किंतु उसके प्रतिकूल जो बहिरात्मा हैं अथवा आशावान हैं उसके ये निसही और असही केवल शब्दोच्चारणमात्र ही समझना चाहिए।



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