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संसारी: Difference between revisions

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<ol>
== सिद्धांतकोष से ==
   <li><span class="HindiText">जीवों का एक भेद - देखें - [[ जीव#1 | जीव / १ ]]</span></li>
<ol>
   <li><span class="PrakritText">न.च.वृ./१०९ कम्मकलंकालीणा अलद्धससहावभावसब्भावा। गुणमग्गण जीवठिया जीवा संसारिणो भणिया।१०९।</span> =<span class="HindiText">कर्म कलंक से जो लिप्त हैं, स्वस्वभाव को जिन्होंने प्राप्त नहीं किया। गुणस्थान, मार्गणास्थान तथा जीवस्थान में जो स्थित हैं वे संसारी जीव कहे गये हैं।</span></li>
   <li><span class="HindiText">जीवों का एक भेद - देखें [[ जीव#1 | जीव - 1 ]]</span></li>
   <li><span class="PrakritText">न.च.वृ./109 कम्मकलंकालीणा अलद्धससहावभावसब्भावा। गुणमग्गण जीवठिया जीवा संसारिणो भणिया।109।</span> =<span class="HindiText">कर्म कलंक से जो लिप्त हैं, स्वस्वभाव को जिन्होंने प्राप्त नहीं किया। गुणस्थान, मार्गणास्थान तथा जीवस्थान में जो स्थित हैं वे संसारी जीव कहे गये हैं।</span></li>
   </ol>
   </ol>
   <p><span class="SanskritText">पं.का./ता.वृ./१०९/१७४/१३ कर्मचेतनाकर्मफलचेतनात्मका: संसारिण:...अशुद्धोपयोगयुक्ता: संसारिण:।</span> =<span class="HindiText">कर्म व कर्मफलचेतनात्मक संसारी जीव हैं। ...संसारी जीव अशुद्धोपयोग से युक्त हैं।</span></p>
   <p><span class="SanskritText">पं.का./ता.वृ./109/174/13 कर्मचेतनाकर्मफलचेतनात्मका: संसारिण:...अशुद्धोपयोगयुक्ता: संसारिण:।</span> =<span class="HindiText">कर्म व कर्मफलचेतनात्मक संसारी जीव हैं। ...संसारी जीव अशुद्धोपयोग से युक्त हैं।</span></p>
   <p><span class="SanskritText">पं.ध./उ./३४ बद्धो यथा स संसारी स्यादलब्धस्वरूपवान् । मूर्च्छितोऽनादितोऽष्टाभिर्ज्ञानाद्यावृतिकर्मभि:।</span> =<span class="HindiText">जो अनादिकाल से आठ कर्मों से मोहित होकर अपने स्वरूप को नहीं पाने वाला और बँधा हुआ वह संसारी जीव है।</span></p>
   <p><span class="SanskritText">पं.ध./उ./34 बद्धो यथा स संसारी स्यादलब्धस्वरूपवान् । मूर्च्छितोऽनादितोऽष्टाभिर्ज्ञानाद्यावृतिकर्मभि:।</span> =<span class="HindiText">जो अनादिकाल से आठ कर्मों से मोहित होकर अपने स्वरूप को नहीं पाने वाला और बँधा हुआ वह संसारी जीव है।</span></p>


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== पुराणकोष से ==
<p> ज्ञानावरण आदि आठ कर्मों से बंधा हुआ जीव । यह सुख पाने की इच्छा से इन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, दर्शन, सुख वीर्य को शरीर में ही निहित मानता है । इसे उन्हें पाने के लिए पर वस्तुओं का आश्रय लेना पड़ता है । कर्म-बन्धन से बँधे रहने के कारण यह संसार से मुक्त नहीं हो पाता । ये गुणस्थानों और मार्गणास्थानों में स्थित है । नरक, तिर्यंच, देव और मनुष्य इन चार गतियों में भ्रमते हैं । पर्यायो की अपेक्षा से अनेक भेद-प्रभेद होते हैं । <span class="GRef"> महापुराण 24. 94, 42. 53-59, 76, 67.56,  </span><span class="GRef"> पद्मपुराण 2.162-168,  </span><span class="GRef"> वीरवर्द्धमान चरित्र 16. 36-52  </span></p>
 
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[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: स]]

Revision as of 21:49, 5 July 2020

== सिद्धांतकोष से ==

  1. जीवों का एक भेद - देखें जीव - 1
  2. न.च.वृ./109 कम्मकलंकालीणा अलद्धससहावभावसब्भावा। गुणमग्गण जीवठिया जीवा संसारिणो भणिया।109। =कर्म कलंक से जो लिप्त हैं, स्वस्वभाव को जिन्होंने प्राप्त नहीं किया। गुणस्थान, मार्गणास्थान तथा जीवस्थान में जो स्थित हैं वे संसारी जीव कहे गये हैं।

पं.का./ता.वृ./109/174/13 कर्मचेतनाकर्मफलचेतनात्मका: संसारिण:...अशुद्धोपयोगयुक्ता: संसारिण:। =कर्म व कर्मफलचेतनात्मक संसारी जीव हैं। ...संसारी जीव अशुद्धोपयोग से युक्त हैं।

पं.ध./उ./34 बद्धो यथा स संसारी स्यादलब्धस्वरूपवान् । मूर्च्छितोऽनादितोऽष्टाभिर्ज्ञानाद्यावृतिकर्मभि:। =जो अनादिकाल से आठ कर्मों से मोहित होकर अपने स्वरूप को नहीं पाने वाला और बँधा हुआ वह संसारी जीव है।


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पुराणकोष से

ज्ञानावरण आदि आठ कर्मों से बंधा हुआ जीव । यह सुख पाने की इच्छा से इन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, दर्शन, सुख वीर्य को शरीर में ही निहित मानता है । इसे उन्हें पाने के लिए पर वस्तुओं का आश्रय लेना पड़ता है । कर्म-बन्धन से बँधे रहने के कारण यह संसार से मुक्त नहीं हो पाता । ये गुणस्थानों और मार्गणास्थानों में स्थित है । नरक, तिर्यंच, देव और मनुष्य इन चार गतियों में भ्रमते हैं । पर्यायो की अपेक्षा से अनेक भेद-प्रभेद होते हैं । महापुराण 24. 94, 42. 53-59, 76, 67.56, पद्मपुराण 2.162-168, वीरवर्द्धमान चरित्र 16. 36-52


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