• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

शत्रुघ्न: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 16:29, 5 July 2020 (view source)
Vikasnd (talk | contribs)
m (Vikasnd moved page शत्रुघ्‍न to शत्रुघ्न without leaving a redirect: RemoveZWNJChar)
← Older edit
Revision as of 21:47, 5 July 2020 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
Newer edit →
Line 1: Line 1:
<ol class="HindiText">
== सिद्धांतकोष से ==
   <li>ह.पु./सर्ग/श्लोक-पूर्वभव भव सं.३ में भानुदत्त सेठ का पुत्र शूरदत्त था (३४/९७-९८) फिर मणिचूल नामक विद्याधर हुआ (३४/१३२-१३३) पूर्व भव में गंगदेव राजा का पुत्र सुनन्द था (३४/१४२) वर्तमान भव में वसुदेव का पुत्र कृष्ण का भाई था (३४/३)। कंस के भय से जन्मते ही किसी देव ने उठाकर सुदृष्टि सेठ के घर पहुँचा दिया (३४/७)। दीक्षा ग्रहणकर घोर तप किया (५९/११५-१२०) अन्त में गिरनार से मोक्ष प्राप्त किया (६५/१६-१७)।
<ol class="HindiText">
   <li>ह.पु./सर्ग/श्लोक-पूर्वभव भव सं.3 में भानुदत्त सेठ का पुत्र शूरदत्त था (34/97-98) फिर मणिचूल नामक विद्याधर हुआ (34/132-133) पूर्व भव में गंगदेव राजा का पुत्र सुनन्द था (34/142) वर्तमान भव में वसुदेव का पुत्र कृष्ण का भाई था (34/3)। कंस के भय से जन्मते ही किसी देव ने उठाकर सुदृष्टि सेठ के घर पहुँचा दिया (34/7)। दीक्षा ग्रहणकर घोर तप किया (59/115-120) अन्त में गिरनार से मोक्ष प्राप्त किया (65/16-17)।
   </li>
   </li>
   <li> प.पु./सर्ग/श्लोक सं.दशरथ का पुत्र तथा राम का छोटा भाई था (२५/३५) मधु को हराकर मथुरा का राज्य प्राप्त किया (७९/११६)। अन्त में दीक्षा ग्रहण की (११९/३८)।</li>
   <li> प.पु./सर्ग/श्लोक सं.दशरथ का पुत्र तथा राम का छोटा भाई था (25/35) मधु को हराकर मथुरा का राज्य प्राप्त किया (79/116)। अन्त में दीक्षा ग्रहण की (119/38)।</li>
   </ol>
   </ol>


[[शत्रु | Previous Page]]
<noinclude>
[[शनि | Next Page]]
[[ शत्रुंजय | पूर्व पृष्ठ ]]


[[Category:श]]
[[ शत्रुदमन | अगला पृष्ठ ]]
 
</noinclude>
[[Category: श]]
 
 
== पुराणकोष से ==
<p id="1"> (1) सौघर्मेन्द्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । <span class="GRef"> महापुराण 25.201 </span></p>
<p id="2">(2) वसुदेव और देवकी का पाँचवां पुत्र । यह अपने भाई जितशत्रु के साथ युगल रूप से उत्पन्न हुआ था । कंस का यह घातक था । कंस-जन्मते ही इसका वध करना चाहता था । सुनैगम देव ने भद्रिलसा नगर के सुदृष्टि सेठ की अलका सेठानी के यहाँ हुए मृतयुगल पुत्र लाकर देवकी के पास रखे और देवकी के ये युगल पुत्र उसके पास रखकर इनकी रक्षा की थी । कंस मृत पुत्र देवकी के ही समझा था । यह अपने अन्य पाँचों भाइयों के साथ अरिष्टनेमि के समवसरण में आया था । यहाँ धर्म को सुनकर ये सभी भाई अरिष्टनेमि से दीक्षित हो गये थे । अन्त में छहों भाई तपकर गिरनार पर्वत से मोक्ष गये । चौथे पूर्वभव में यह मथुरा नगरी के भानु सेठ का शूरदत्त नामक पुत्र था । तीसरे पूर्वभव में यह सौधर्म स्वर्ग में त्रायस्त्रिंश जाति का देव हुआ । इस स्वर्ग से चयकर दूसरे पूर्वभव में धातकीखण्ड द्वीप के पूर्व भरतक्षेत्र सम्बन्धी विजयार्ध की दक्षिणश्रेणी में नित्यालोक नगर के राजा चित्रचूल का पुत्र मणिचूल विद्याधर और प्रथम पूर्वभव में यह भरतक्षेत्र के हस्तिनापुर नगर के राजा गंगदेव और रानी नन्दयशा का पुत्र सुनन्द था । <span class="GRef"> महापुराण 71.201-204, 245-251, 260-263, 293-296,  </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 33.3-8, 97, 130-143, 59.115-120, 65.16-17 </span></p>
<p id="3">(3) जम्बूद्वीप भरतक्षेत्र की अयोध्या नगरी के राजा दशरथ और रानी सुप्रभा का पुत्र । पद्म (राम) लक्ष्मण और भरत इसके बड़े भाई थे । पद्म का दूसरा नाम राम था । राम और लक्ष्मण के जन्म के समय दशरथ वाराणसी के राजा थे और भरत तथा इसके जन्म के समय वे अयोध्या में रहने लगे थे । लंका विजय करने के पश्चात् अयोध्या आकर राम के द्वारा अयोध्या का आधा राज्य या पोदनपुर, राजगढ़, पौड्रनगर आदि नगरों में किसी भी नगर का राज्य लेने के लिए इससे आग्रह किये जाने पर इसने राम से मथुरा का राज्य चाहा था । मथुरा में राजा मधु का शासन था । इसने हतान्तवक्त्र के</p>
<p>शत्रु-शमक्य सेनापतित्व में सेना संगठित कर अर्धरात्रि के समय मधु पर आक्रमण किया । युद्ध करते-करते ही मधु को वैराग्य उत्पन्न हुआ । द्विविध परिग्रह त्याग करके मधु ने हाथी पर बैठे-बैठे ही केशलोंच किये । मधु की यह स्थिति देखकर इसने नमस्कार करते हुए उससे क्षमा याचना की थी । इस प्रकार इसे मथुरा का राज्य प्राप्त हो गया था । मधु को दिया गया शूलरत्न लौटकर आने से मधु का मरण जानकर चमरेन्द्र कुपित हुआ और उनने मथुरा में महारोग फैलाये थे । चमरेन्द्र के उपसर्गों से त्रस्त होकर और कुल देवता की प्रेरणा से यह अयोध्या लौट आया था । सप्तर्षियों के आने पर उपसर्ग दूर होने के समाचार ज्ञातकर यह मथुरा आया तथा इसने सप्तर्षियों के उपदेशानुसार नगर के भीतर और बाहर सप्तर्षि प्रतिमाएँ चारों दिशाओं में स्थापित कराई थी । अन्त में राम इसे राज्य देकर तप करना चाहते थे किन्तु इसने राज्य न लेकर समाधि रूपी राज्य प्राप्ति की कामना की थी । अन्त में यह निर्ग्रन्थ होकर श्रमण हो गया था । <span class="GRef"> महापुराण 67.148-153, 163-165,  </span><span class="GRef"> पद्मपुराण 25.19, 22-26, 35-36, 89.1-10, 36, 56, 96-116, 90. 1-4, 22-24, 92.1-4, 7-11, 44.52, 73-82, 118.124-126, 119.38 </span></p>
 
<noinclude>
[[ शत्रुंजय | पूर्व पृष्ठ ]]
 
[[ शत्रुदमन | अगला पृष्ठ ]]
 
</noinclude>
[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: श]]

Revision as of 21:47, 5 July 2020

== सिद्धांतकोष से ==

  1. ह.पु./सर्ग/श्लोक-पूर्वभव भव सं.3 में भानुदत्त सेठ का पुत्र शूरदत्त था (34/97-98) फिर मणिचूल नामक विद्याधर हुआ (34/132-133) पूर्व भव में गंगदेव राजा का पुत्र सुनन्द था (34/142) वर्तमान भव में वसुदेव का पुत्र कृष्ण का भाई था (34/3)। कंस के भय से जन्मते ही किसी देव ने उठाकर सुदृष्टि सेठ के घर पहुँचा दिया (34/7)। दीक्षा ग्रहणकर घोर तप किया (59/115-120) अन्त में गिरनार से मोक्ष प्राप्त किया (65/16-17)।
  2. प.पु./सर्ग/श्लोक सं.दशरथ का पुत्र तथा राम का छोटा भाई था (25/35) मधु को हराकर मथुरा का राज्य प्राप्त किया (79/116)। अन्त में दीक्षा ग्रहण की (119/38)।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

(1) सौघर्मेन्द्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 25.201

(2) वसुदेव और देवकी का पाँचवां पुत्र । यह अपने भाई जितशत्रु के साथ युगल रूप से उत्पन्न हुआ था । कंस का यह घातक था । कंस-जन्मते ही इसका वध करना चाहता था । सुनैगम देव ने भद्रिलसा नगर के सुदृष्टि सेठ की अलका सेठानी के यहाँ हुए मृतयुगल पुत्र लाकर देवकी के पास रखे और देवकी के ये युगल पुत्र उसके पास रखकर इनकी रक्षा की थी । कंस मृत पुत्र देवकी के ही समझा था । यह अपने अन्य पाँचों भाइयों के साथ अरिष्टनेमि के समवसरण में आया था । यहाँ धर्म को सुनकर ये सभी भाई अरिष्टनेमि से दीक्षित हो गये थे । अन्त में छहों भाई तपकर गिरनार पर्वत से मोक्ष गये । चौथे पूर्वभव में यह मथुरा नगरी के भानु सेठ का शूरदत्त नामक पुत्र था । तीसरे पूर्वभव में यह सौधर्म स्वर्ग में त्रायस्त्रिंश जाति का देव हुआ । इस स्वर्ग से चयकर दूसरे पूर्वभव में धातकीखण्ड द्वीप के पूर्व भरतक्षेत्र सम्बन्धी विजयार्ध की दक्षिणश्रेणी में नित्यालोक नगर के राजा चित्रचूल का पुत्र मणिचूल विद्याधर और प्रथम पूर्वभव में यह भरतक्षेत्र के हस्तिनापुर नगर के राजा गंगदेव और रानी नन्दयशा का पुत्र सुनन्द था । महापुराण 71.201-204, 245-251, 260-263, 293-296, हरिवंशपुराण 33.3-8, 97, 130-143, 59.115-120, 65.16-17

(3) जम्बूद्वीप भरतक्षेत्र की अयोध्या नगरी के राजा दशरथ और रानी सुप्रभा का पुत्र । पद्म (राम) लक्ष्मण और भरत इसके बड़े भाई थे । पद्म का दूसरा नाम राम था । राम और लक्ष्मण के जन्म के समय दशरथ वाराणसी के राजा थे और भरत तथा इसके जन्म के समय वे अयोध्या में रहने लगे थे । लंका विजय करने के पश्चात् अयोध्या आकर राम के द्वारा अयोध्या का आधा राज्य या पोदनपुर, राजगढ़, पौड्रनगर आदि नगरों में किसी भी नगर का राज्य लेने के लिए इससे आग्रह किये जाने पर इसने राम से मथुरा का राज्य चाहा था । मथुरा में राजा मधु का शासन था । इसने हतान्तवक्त्र के

शत्रु-शमक्य सेनापतित्व में सेना संगठित कर अर्धरात्रि के समय मधु पर आक्रमण किया । युद्ध करते-करते ही मधु को वैराग्य उत्पन्न हुआ । द्विविध परिग्रह त्याग करके मधु ने हाथी पर बैठे-बैठे ही केशलोंच किये । मधु की यह स्थिति देखकर इसने नमस्कार करते हुए उससे क्षमा याचना की थी । इस प्रकार इसे मथुरा का राज्य प्राप्त हो गया था । मधु को दिया गया शूलरत्न लौटकर आने से मधु का मरण जानकर चमरेन्द्र कुपित हुआ और उनने मथुरा में महारोग फैलाये थे । चमरेन्द्र के उपसर्गों से त्रस्त होकर और कुल देवता की प्रेरणा से यह अयोध्या लौट आया था । सप्तर्षियों के आने पर उपसर्ग दूर होने के समाचार ज्ञातकर यह मथुरा आया तथा इसने सप्तर्षियों के उपदेशानुसार नगर के भीतर और बाहर सप्तर्षि प्रतिमाएँ चारों दिशाओं में स्थापित कराई थी । अन्त में राम इसे राज्य देकर तप करना चाहते थे किन्तु इसने राज्य न लेकर समाधि रूपी राज्य प्राप्ति की कामना की थी । अन्त में यह निर्ग्रन्थ होकर श्रमण हो गया था । महापुराण 67.148-153, 163-165, पद्मपुराण 25.19, 22-26, 35-36, 89.1-10, 36, 56, 96-116, 90. 1-4, 22-24, 92.1-4, 7-11, 44.52, 73-82, 118.124-126, 119.38


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=शत्रुघ्न&oldid=43985"
Categories:
  • श
  • पुराण-कोष
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 5 July 2020, at 21:47.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki