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स्वयंप्रभा: Difference between revisions

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<p id="7">(7) विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी के राजा विद्याधर ज्वलनजटी और रानी वायुवेगा की पुत्री । यह अर्ककीर्ति की बहिन थी । पिता ने इसका विवाह पोदनपुर के राजकुमार प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ से किया था । <span class="GRef"> महापुराण 62.44, 74.131-155,  </span><span class="GRef"> पांडवपुराण 4.11-13, 53-54  </span><span class="GRef"> वीरवर्द्धमान चरित्र 3.71-75, 94.95 </span></p>
<p id="7">(7) विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी के राजा विद्याधर ज्वलनजटी और रानी वायुवेगा की पुत्री । यह अर्ककीर्ति की बहिन थी । पिता ने इसका विवाह पोदनपुर के राजकुमार प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ से किया था । <span class="GRef"> महापुराण 62.44, 74.131-155,  </span><span class="GRef"> पांडवपुराण 4.11-13, 53-54  </span><span class="GRef"> वीरवर्द्धमान चरित्र 3.71-75, 94.95 </span></p>
<p id="8">(8) विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी में भोगपुर नगर के राजा वायुरथ विद्याधर की रानी । प्रभावती की यह जननी थी । <span class="GRef"> महापुराण 46.147-148 </span></p>
<p id="8">(8) विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी में भोगपुर नगर के राजा वायुरथ विद्याधर की रानी । प्रभावती की यह जननी थी । <span class="GRef"> महापुराण 46.147-148 </span></p>
<p id="9">(9) वृषभदेव के नौवें पूर्वभव का जीव-ऐशान स्वर्ग के ललितांग देव की महादेवी । यह पति की पृथक्त्व पल्य के बराबर आयु शेष रह जाने पर उत्पन्न हुई थी । पति का वियोग होने पर इसे दु:खी देखकर अंत:परिषद के सदस्य दृढ़धर्म देव ने इसका शोक दूर कर इसे सन्मार्ग पर लगाया था । यह छ: माह तक जिनपूजा में उद्यत रही । पश्चात् सौमनस वन के पूर्वदिशा के जिन मंदिर में चैत्यवृक्ष के नीचे समाधिमरणपूर्वक देह त्याग कर पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रदंत की श्रीमती नाम की पुत्री हुई । <span class="GRef"> महापुराण 5.253-254, 283-286, 6. 50-60  </span>देखें [[ श्रीमती#13 | श्रीमती - 13]]</p>
<p id="9">(9) वृषभदेव के नौवें पूर्वभव का जीव-ऐशान स्वर्ग के ललितांग देव की महादेवी । यह पति की पृथक्त्व पल्य के बराबर आयु शेष रह जाने पर उत्पन्न हुई थी । पति का वियोग होने पर इसे दु:खी देखकर अंत:परिषद के सदस्य दृढ़धर्म देव ने इसका शोक दूर कर इसे सन्मार्ग पर लगाया था । यह छ: माह तक जिनपूजा में उद्यत रही । पश्चात् सौमनस वन के पूर्वदिशा के जिन मंदिर में चैत्यवृक्ष के नीचे समाधिमरणपूर्वक देह त्याग कर पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रदंत की श्रीमती नाम की पुत्री हुई । <span class="GRef"> महापुराण 5.253-254, 283-286, 6. 50-60  </span>देखें [[ श्रीमती#13 | श्रीमती - 13]]</p>
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[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: स]]
[[Category: स]]
[[Category: प्रथमानुयोग]]

Revision as of 22:03, 17 October 2022



सिद्धांतकोष से

महापुराण/ सर्ग/श्लोक स्वर्ग में ललितांगदेव (ऋषभदेव के नवमें भव) की अति प्रिय देवी थी (5/286)। यह ललितांगदेव के स्वर्ग से च्युत होने पर अति दुखी हुई (6/50)। अंत में पंचपरमेष्ठी के स्मरण पूर्वक स्वर्ग से च्युत हुई (6/56-57)। यह श्रेयांस राजा का पूर्व का पाँचवाँ भव है-देखें श्रेयांस ।


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पुराणकोष से

(1) स्वयंभूरमण द्वीप के स्वयंप्रभ व्यंतर देव की देवी । यह कृष्ण की पटरानी पदमावती के तीसरे पूर्वभव का जीव थे । महापुराण 71. 451-452, हरिवंशपुराण 60-116

(2) मंदोदरी की छोटी बहिन । रावण ने इसे सहस्ररश्मि को देना चाहा था किंतु उसने इसे स्वीकार न करके दीक्षा ले ली थी । पद्मपुराण 10. 161

(3) कृष्ण की रानी जांबवती के पूर्व का जीव । यह कुबेर की स्त्री थी । हरिवंशपुराण 60.50

(4) विजया पर्वत की दक्षिणश्रेणी के रथनूपुरचक्रवालनगर के राजा सुकेतु की रानी । इसकी पुत्री सत्यभामा का विवाह कृष्ण से हुआ था । महापुराण 71. 313, हरिवंशपुराण 36.56, 61, 60. 22, पांडवपुराण 11. 60

(5) समवमरण के आम्रवन की एक वापी । हरिवंशपुराण 57. 35

(6) समुद्रविजय के छोटे भाई स्तिमितसागर को रानी । हरिवंशपुराण 19.3

(7) विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी के राजा विद्याधर ज्वलनजटी और रानी वायुवेगा की पुत्री । यह अर्ककीर्ति की बहिन थी । पिता ने इसका विवाह पोदनपुर के राजकुमार प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ से किया था । महापुराण 62.44, 74.131-155, पांडवपुराण 4.11-13, 53-54 वीरवर्द्धमान चरित्र 3.71-75, 94.95

(8) विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी में भोगपुर नगर के राजा वायुरथ विद्याधर की रानी । प्रभावती की यह जननी थी । महापुराण 46.147-148

(9) वृषभदेव के नौवें पूर्वभव का जीव-ऐशान स्वर्ग के ललितांग देव की महादेवी । यह पति की पृथक्त्व पल्य के बराबर आयु शेष रह जाने पर उत्पन्न हुई थी । पति का वियोग होने पर इसे दु:खी देखकर अंत:परिषद के सदस्य दृढ़धर्म देव ने इसका शोक दूर कर इसे सन्मार्ग पर लगाया था । यह छ: माह तक जिनपूजा में उद्यत रही । पश्चात् सौमनस वन के पूर्वदिशा के जिन मंदिर में चैत्यवृक्ष के नीचे समाधिमरणपूर्वक देह त्याग कर पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रदंत की श्रीमती नाम की पुत्री हुई । महापुराण 5.253-254, 283-286, 6. 50-60 देखें श्रीमती - 13


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