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चूड़ामणि: Difference between revisions

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Revision as of 17:22, 21 August 2022 (view source)
Amanjain7585 (talk | contribs)
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Revision as of 08:20, 15 May 2023 (view source)
J2jinendra (talk | contribs)
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       <li class="HindiText"> विजयार्ध की उत्तर श्रेणी का एक नगर। (देखें [[ विद्याधर ]])। </li>
       <li class="HindiText"> विजयार्ध की उत्तर श्रेणी का एक नगर। (देखें [[ विद्याधर ]])। </li>
       <li class="HindiText"> इंद्रनंदि श्रुतावतार  के अनुसार तुंबुलाचार्य ने ‘कषायपाहुड़’ तथा ‘षटखंडागम’ के आद्य 5खंडों पर  कन्नड़ भाषा में 84000 श्लोक प्रमाण चूड़ामणि नामक एक टीका लिखी थी। ई.1604 के  भट्टाकलंक कृत कर्णाटक शब्दानुशासन में इसे ‘तत्त्वार्थ महा शास्त्र’ की 16000  श्लोक प्रमाण व्याख्या कही गई है। पं.जुगल किशोर जी मुख्तार तथा डा.हीरा लाल  जी शास्त्री के अनुसार ‘तत्त्वार्थ महा शास्त्र’ का अभिप्रेत यहाँ उमास्वामी  कृत तत्त्वार्थ सूत्र न होकर सिद्धांत शास्त्र है। <span class="GRef">(जै./1/275-276)</span>    </li>
       <li class="HindiText"> इंद्रनंदि श्रुतावतार  के अनुसार तुंबुलाचार्य ने ‘कषायपाहुड़’ तथा ‘षटखंडागम’ के आद्य 5खंडों पर  कन्नड़ भाषा में 84000 श्लोक प्रमाण चूड़ामणि नामक एक टीका लिखी थी। ई.1604 के  भट्टाकलंक कृत कर्णाटक शब्दानुशासन में इसे ‘तत्त्वार्थ महा शास्त्र’ की 16000  श्लोक प्रमाण व्याख्या कही गई है। पं.जुगल किशोर जी मुख्तार तथा डा.हीरा लाल  जी शास्त्री के अनुसार ‘तत्त्वार्थ महा शास्त्र’ का अभिप्रेत यहाँ उमास्वामी  कृत तत्त्वार्थ सूत्र न होकर सिद्धांत शास्त्र है। <span class="GRef">(जैन साहित्य और इतिहास/1/275-276)</span>    </li>
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Revision as of 08:20, 15 May 2023



सिद्धांतकोष से

  1. विजयार्ध की उत्तर श्रेणी का एक नगर। (देखें विद्याधर )।
  2. इंद्रनंदि श्रुतावतार के अनुसार तुंबुलाचार्य ने ‘कषायपाहुड़’ तथा ‘षटखंडागम’ के आद्य 5खंडों पर कन्नड़ भाषा में 84000 श्लोक प्रमाण चूड़ामणि नामक एक टीका लिखी थी। ई.1604 के भट्टाकलंक कृत कर्णाटक शब्दानुशासन में इसे ‘तत्त्वार्थ महा शास्त्र’ की 16000 श्लोक प्रमाण व्याख्या कही गई है। पं.जुगल किशोर जी मुख्तार तथा डा.हीरा लाल जी शास्त्री के अनुसार ‘तत्त्वार्थ महा शास्त्र’ का अभिप्रेत यहाँ उमास्वामी कृत तत्त्वार्थ सूत्र न होकर सिद्धांत शास्त्र है। (जैन साहित्य और इतिहास/1/275-276)


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पुराणकोष से

देखें परिशिष्ट - 1।


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