• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

इंद्रभूति: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 13:32, 12 January 2023 (view source)
J2jinendra (talk | contribs)
No edit summary
← Older edit
Revision as of 00:24, 28 August 2023 (view source)
Shilpa jain (talk | contribs)
mNo edit summary
Newer edit →
Line 26: Line 26:
</noinclude>
</noinclude>
[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: इ]]
[[Category: इतिहास]]

Revision as of 00:24, 28 August 2023



सिद्धांतकोष से

पूर्व भव में आदित्य विमान में देव थे। ( महापुराण सर्ग संख्या 74/357) यह गौतम गोत्रीय ब्राह्मण थे। वेदपाठी थे। भगवान् वीर के समवशरण में मानस्तंभ देखकर मानभंग हो गया और 500 शिष्यों के साथ दीक्षा धारण कर ली। तभी सात ऋद्धियाँ प्राप्त हो गयीं ( महापुराण सर्ग संख्या 74/366-370)। भगवान् महावीर के प्रथम गणधर थे। ( महापुराण सर्ग संख्या 74/356-372)। आपको श्रावण कृष्ण 1 के पूर्वांह्ण काल में श्रुतज्ञान जागृत हुआ था। उसी तिथि को पूर्व रात्रि में आपने अंगो की रचना करके सारे श्रुत को आगम निबद्ध कर दिया। ( महापुराण सर्ग संख्या 74/369-372)। कार्तिक कृष्ण 15 को आपको केवलज्ञान प्रगट हुआ और विपुलाचल पर आपने निर्वाण प्राप्त किया।

( महापुराण सर्ग संख्या 66/515-516)।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

(1) मगधदेश के अचलग्रामवासी घरणीजट ब्राह्मण और उसकी पत्नी अग्निला का पुत्र, अग्निभूति का सहोदर । महापुराण 62. 325-326

(2) गौतम गोत्रीय महाभिमानी वेदपाठी-ब्राह्मण । भगवान् महावीर के समवसरण में मानस्तंभ देखकर इनका मानभंग हो गया था । इन्होंने अपने पाँच सौ शिष्यों के साथ दीक्षा धारण की थी । तप करके इन्होंने सात ऋद्धियों प्राप्त की थी । महावीर के ये प्रथम गणधर हुए । श्रावण कृष्णा एकम के पूर्वाह्न में ये श्रुतज्ञानी हुए और उसी तिथि को पूर्व रात्रि में इन्होंने संपूर्ण स्वत को आगम के रूप में निबद्ध कर दिया था । इनका दूसरा नाम गौतम है । सुधर्माचार्य ने इनसे ही श्रुत प्राप्त किया था । इंद्र द्वारा पूजित होने से इनको यह नाम मिला था । अंत में विपुलाचल पर्वत पर इन्होंने मोक्ष पाया था । महापुराण 2.53, 74.356-372, 76.507-517, पद्मपुराण 1.41 हरिवंशपुराण 1.60, 3.41, वीरवर्द्धमान चरित्र 18.159-160


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=इंद्रभूति&oldid=118122"
Categories:
  • इ
  • पुराण-कोष
  • इतिहास
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 28 August 2023, at 00:24.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki