• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

उपायविचय: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 15:40, 24 January 2023 (view source)
J2jinendra (talk | contribs)
No edit summary
← Older edit
Revision as of 12:32, 4 September 2023 (view source)
Jainusha (talk | contribs)
No edit summary
Newer edit →
Line 16: Line 16:


== पुराणकोष से ==
== पुराणकोष से ==
<div class="HindiText"> <p> धर्मध्यान का दूसरा भेद । योग की पुण्यरूप प्रवृत्तियों को अपने अधीन करना उपाय है । इस उपाय का संकल्पन और चिंतन उपाय-विचय है । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 56.41 </span></p>
<div class="HindiText">   धर्मध्यान का दूसरा भेद । योग की पुण्यरूप प्रवृत्तियों को अपने अधीन करना उपाय है । इस उपाय का संकल्पन और चिंतन उपाय-विचय है । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 56.41 </span></p>
   </div>
   </div>


Line 28: Line 28:
[[Category: उ]]
[[Category: उ]]
[[Category: चरणानुयोग]]
[[Category: चरणानुयोग]]
[[Category: द्रव्यानुयोग]]

Revision as of 12:32, 4 September 2023



सिद्धांतकोष से

हरिवंशपुराण/56/39-41 संसारहेतव: प्रायस्त्रियोगानां प्रवृत्तय:। अपायो वर्जनं तासां स मे स्यात्कथमित्यलम् ।39। चिंताप्रबंधसंबंध: शुभलेश्यानुरंजित:। अपायविचयाख्यं तत्प्रथमं धर्म्यमभीप्सितम् ।40। उपायविचयं तासां पुण्यानामात्मसात्क्रिया। उपाय: स कथं मे स्यादिति संकल्पसंतति:।41। =मन, वचन और काय इन तीन योगों की प्रवृत्ति ही, प्राय: संसार का कारण है सो इन प्रवृत्तियों का मेरे अपाय अर्थात् त्याग किस प्रकार हो सकता है, इस प्रकार शुभलेश्या से अनुरंजित जो चिंता का प्रबंध है वह अपायविचय नाम का प्रथम धर्म्यध्यान माना गया है।39-40। पुण्य रूप योगप्रवृत्तियों को अपने आधीन करना उपाय कहलाता है, वह उपाय मेरे किस प्रकार हो सकता है, इस प्रकार के संकल्पों की जो संतति है वह उपाय विचय नाम का दूसरा धर्म्यध्यान है।41। ।

धर्मध्यानका एक भेद-देखें धर्मध्यान - 1


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

धर्मध्यान का दूसरा भेद । योग की पुण्यरूप प्रवृत्तियों को अपने अधीन करना उपाय है । इस उपाय का संकल्पन और चिंतन उपाय-विचय है । हरिवंशपुराण 56.41


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=उपायविचय&oldid=118330"
Categories:
  • उ
  • पुराण-कोष
  • चरणानुयोग
  • द्रव्यानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 4 September 2023, at 12:32.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki