इष्टोपदेश - श्लोक 47: Difference between revisions
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Revision as of 15:22, 16 April 2020
आत्मानुष्ठाननिष्ठस्य व्यवहारबहि:स्थितेः।
जायते परमानन्दः कश्चिद्योगेन योगिन:।।४७।।
इष्ट का उपदेश—इस ग्रन्थ का नाम इष्टोपदेश है। जो इष्ट है उसका इसमें उपदेश किया है। कोई रोग में अनिष्ट चीज को इष्ट मान ले तो वह तो वास्तव में इष्ट नहीं है, ऐसे ही मोह रागद्वेष के रोगी विषय कषायों के ज्वर में पीड़ित ये प्राणी किसी भी वस्तु को इष्ट मान लें तो वे वास्तव में इष्ट तो न हो जायेंगे। जो जीव वास्तव में भला करें उसे इष्ट कहते हैं। इष्ट को इसमें उपदेश किया गया है।
आत्मनिर्णय—हम आप सब आत्मा है अर्थात् जानन देखनहार एक तत्त्व है। हमें जो कुछ निर्णय करना है वह आत्मतत्त्व के नाते निर्णय करना है। हम अपने को किसी जाति का, किसी कुलका न समझें यह तो दूर की बात है, हम अपने को मनुष्य भी न समझें किन्तु एक मनुष्य देह में आज बंध गया हूं, मनुष्य देह में बँधने वाला यह पदार्थ एक जाननहार चैतन्यस्वरूप है। उस आत्मा के नाते निर्णय करें हितका। जहाँ अपने स्वरूप का नाता जोड़ा, फिर बाहर में ये मायामय स्कंध नजर आते। जब खुद में लगने का खुद विषय नहीं रहा तो बाह्य पदार्थों में यह लगता है और उन्हें अपनाता है।
कल्याणकामुक की धर्मविषयक एक मुसीबत—कभी इस मोही जीव को कुछ धर्मबुद्धि जगे, कुछ कल्याण के करने की कामना की हिलोर आए, भावना जगे तो उसके मुसीबत इसके प्रसंग में एक बहुत कठिन आती है। वह मुसीबत है नाना पथों की उलझन में पड़ जाना। यह मुसीबत आ रही है नाना रूप कल्पनाएँ करने के कारण। मैं अमुक हूं, मेरा धर्म यह है, मेरा देव यह है, मेरी गोष्ठी वातावरण यह है, इस प्रकार का बाह्य में एक आत्मा का बोध होता है और उस आशय से यह कल्याण से वंचित होता है। यद्यपि यह बात ठीक है कि जो भी पुरुष अपना कल्याण कर सके हैं वे पुरुष जिस गोष्ठी में रहे हुए होते हैं,जिस जाति कुल अथवा प्रवृत्ति रूप धर्म को धारण करके मुक्त होते हैं वह व्यवहार धर्म पालन करने के योग्य है। ठीक है किन्तु दृष्टि में मुख्यता व्यवहार धर्म की जिसके रहे उसको मार्ग नहीं मिलता है। ये समस्त आचरण एक अवलम्बन मात्र है, करना क्या है, वह अपने अंतरंग में अपने आप सहज अनुभव की जाने वाली चीज है।
पर से दुःख और निज से सुख—अभी कुछ पूर्व में यह बताया गया था कि परपदार्थ तो पर ही है, उनसे दुःख होता है और अपना आप-आप ही है उससे सुख होता है, क्योंकि जो परपदार्थ है वे सदा मेरे निकट नहीं रह सकते हैं। जो परपदार्थ है वे अपनी ही परिणमनशीलता के कारण अपनी योग्यतानुसार परिणमेंगे, मेरी कल्पना से नहीं। ये दो मुख्य प्रतिकूलताएँ आती है इस कारण किसी पर से स्नेह करने मे सुख नहीं रहता ? लोक में भी कहते हैं कि अपना है सो अपना ही है, अर्थात जो खुद का घर है उसे कौन छुटा लेगा। उसमें रहना भला है। जो खुद के परिजन है वे कहाँ भाग जायेंगे, उनका विश्वास किया जा सकता है, किन्तु जो गैर है, जो पराधीन मकान है, दूसरे का है, उस पर स्नेह करना भला नहीं है। जरा और अपने हितमार्ग में अंतः टटोलकर निरखो। जो पर है, याने परिजन, धन सम्पदा आदि पर है, अपने आत्मतत्त्व को छोड़कर जितने भी अनात्मपदार्थ है वे सब पर है, ये भिन्न है, इनका वियोग होगा, ये मेरी इच्छा के अनुकूल परिणमते हैं,इस कारण उनके स्नेह में सदा क्लेश रहता है और अपने आपका आत्मतत्त्व अर्थात् ज्ञानस्वरूप जिस ज्ञान को हम जान रहे हैं उस ही ज्ञान का स्वरूप वह मुझ में कहाँ अलग होगा, वह अन्य भी नहीं है, माया रूप भी नहीं है, वह शाश्वत शक्ति है, परमार्थ है, मुझसे तन्मय है, उसका आश्रय लेने से नियम से आनन्द होगा क्योंकि यह मैं स्वयं आनन्दमय हूं और शाश्वत हूं।
आत्मपरिचय के मार्ग में—मैं मेरे को ही पहिचानूं तो उससे आनन्द मिलता है। इस कारण जो महात्मा जन होते हैं अर्थात् विवेकी ज्ञानी पुरुष होते हैं वे आत्मलाभ के लिए ही उद्यम किया करते हैं। इस आत्मलाभ में कौन सा अभीष्ट चमत्कार होता है? उसका वर्णन इस श्लोक में किया जा रहा है। आत्मा में किस उपाय से भोग किया जायगा, किस तरह अनुष्ठान बनेगा, कैसे अध्यात्म वृत्ति बनेगी, उसके लिए प्रथम उपाय यह जीव करता है प्रवृत्ति और निवृत्ति रूप व्यवहार का। कोई पुरुष जन्मते ही शुद्ध निश्चय अध्यात्म का परिज्ञान और प्रयोग करता हुआ नहीं आया। यह बात बने तब बने, किन्तु उससे पहिले क्या स्थितियां गुजरी, कितना व्यवहार किया, सत्संग, देवदर्शन, सदाचार, अध्ययन और कुछ मनन ध्यान का उद्योग आदि ये बहुत-बहुत प्रकार प्रवृत्तियां चलती रही। किसी दिन किसी क्षण जो कि एक नया दिन है समझना, आत्मा के लिए मिला। अपने सहज चित्स्वरूप की दृष्टि जगे तो आत्मा का परिचय मिले। लेकिन प्रथम तो प्रवृत्ति और निवृत्ति का व्यवहार ही चला करता है। अब जब आनन्दमय निज अंतस्तत्त्व का आश्रय हो तब उसके व्यवहार की स्थिति नहीं रही अब वह न कही प्रवृत्ति करता है और न कही निवृत्ति करता है। लोग अध्यात्म योग के अर्थ की गई विभिन्न परिस्थितियों में साधनाओं के मर्म को न जानकर कितने ही संदेह करने लगते हैं और कुछ नहीं करना चाहते। न पूजन, न ध्यान, न सत्संग। वे यह कहने की उलायत मचाते हैं कि ये पूजनादिक सब तो व्यवहार बताये गये हैं,इनसे भी अलग होकर धर्म मिलता है। ठीक है यह, किन्तु समर्थ स्थिति में ही प्रवृत्ति निवृत्ति का व्यवहार छूटता है। अपने भीतर के तत्त्व को न जान पाये और बहारों प्रवृतियों के ही कोई मार्ग निरखे तो उससे केवल धोखा ही होगा।
परिस्थिति की विभिन्नता पर कथानक—एक उपन्यास है जिसका नाम गधा है। गधा की कहानी है पहिले बहुत चलती थी, विद्यार्थी जीवन में हमने सुनी थी। एक घटना है, धोबी के यहां एक गधा था और कुतिया भी थी। कुतिया के बच्चे हुए। एक दिन वह धोबी कुतिया के बच्चों को खिला रहा था। वे बच्चे मुख से भी काटें और पजों से भी मारें, पर धोबी प्रसन्न होकर उन्हें खिला रहा था। गधा सोचने लगा कि कितना तो मैं इसके काम आता, इसके सब लोगों का हमारे ही कारण गुजारा चलता है फिर भी हमसे प्यार नहीं करता और ये कुतिया के बच्चे इसके कुछ काम भी नहीं आते, फिर भी यह कितना प्यार करता है? ओह मुझे मालूम पड़ता है कि ये पैरों से भी मारते और दांतों से भी काटते, इसी से यह उनसे प्रेम करता है। सो एक बार हम भी ऐसा ही प्रयोग करके देखें तो हमसे भी यह प्रेम करने लगेगा। तो अपना गिरवां तोड़कर मालिक को खुश करने के लिए उसके पास पहुंचा और दुलतियां जड़ने लगा व थोड़ा काटा भी। उस धोबी ने डंडा उठाया और खूब पीटा। गधा अपनी खूंटी के पास फिर आ गया और सोचता है कि जो काम इन बच्चों ने किया वही काम तो मैंने किया, गलती कहां खायी? मैं क्यों पीटा? अरे सबकी परिस्थिति एक सी नहीं होती है। उन पिल्लों की बात निरखकर गधा भी नकल करने लगे तो उसे तो डंडे ही मिलेंगे।
विवेक की दशा—भैया! किसी ज्ञानी की बाहरी वृत्ति को निरखकर ज्ञान मर्म से अनभिज्ञ पुरुष बाह्य प्रवृत्ति को करके कही संतोष का मार्ग न पा लेगा। मुक्ति का मार्ग, शान्ति का मार्ग जो अंतरंग ज्ञानप्रकाश में है। और उसको थोड़े ही शब्दों में कहना चाहें तो यह कह लें कि समस्त परसे न्यारा केवल ज्ञानमात्र यह मैं आत्मतत्त्व हूं। जो ज्ञान और आनन्द रससे परिपूर्ण है ऐसा ज्ञान करें, श्रद्धान करें और ऐसा ही अपना संकल्प बना ले कि मुझे अब इस आनन्दधाम से हटकर कही बाहर में नहीं लगना है। कदाचित् लगना भी पड़े तो उसकी स्थिति सेठ के मुनीम जैसी बने। जैसे मुनीम सारे कामों मे लग रहा है। रोकड़ सम्हाले, बैंक का हिसाब रक्खे, और कोई ग्राहक आये उसे हिसाब बताना पड़े तो यह भी कह देता है कि मेरा तुम पर इतना गया, तुम्हारा हम पर इतना आया, इतने सब व्यवहार करके भी मुनीम की श्रद्धा में दोष नहीं है। वह जान रहा है कि मेरा यह वर्तमान परिस्थिति में करने का काम है। कर रहे हैं किन्तु मेरा कुछ नहीं है। तो कुछ करना भी पड़े और अपनी ही और झुकाव रहे तो अपनी रक्षा है। कोई किसी की रक्षा न कर सकेगा।
मोह, राग द्वेष में अकल्याण—भैया ! किसी में मोह रागद्वेष करने का परिणाम भला नहीं है। किसमें मोह करते हो? कौन तुम्हारा कुछ सुधार कर देगा? यदि कोई शाश्वत आनन्द पहुंचा दे तो मोह करो, किन्तु कौन ऐसा कर सकता है? आनन्दमय करने की बात तो दूर रहो, यह दृश्यमान समागम तो केवल क्लेश का ही कारण है। यह परिजनों का जो समागम हुआ है वह प्रकट भिन्न और असार है, किसमें राग करना? कोई पुरुष मेरा विरोधी नहीं है ऐसा निर्णय करके यह भी भावना बनाओ कि मुझे किसी में द्वेष भी नहीं करना है। जो भी पुरुष जो भी चेष्टा करता है उसके भी दिल है, उसमें भी अपने प्रयोजन की चाह है, उसके भी कषायों की वेदना है, वह अपने कषाय की वेदना को शान्त करने का उद्यम कर रहा है, वह अपने अभीष्ट स्वार्थ को सिद्ध करने का उद्योग कर रहा है। इसके लगा हो अपना स्वार्थ और वहाँ जंचे बाधा, तो इसने कल्पना करली कि उसने मुझे कष्ट दिया, इसने नुकसान पहुंचाया। उस बेचारे ने अपने आप में अपना काम करने के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं किया, किसे द्वेषी माना जाय? इस जगत में कोई मेरा विरोधी नहीं है, इस दृष्टि से जरा निहार तो लो। किसी को विरोधी मान-मानकर कोई काम बना पाता हो तो बतलावों। अरे विरोध को मिटाना है तो उसका मिटाना अत्यन्त सुगम है। विरोधी न मानकर उसे सद्व्यवहारी मान लो, विरोध एकदम खत्म हो जायगा, अर्थात् जब विरोध भाव नहीं रहा तो जिसका विरोधी नाम रखा था वह मित्र बन जायगा।
वस्तुस्वरूप का दृढ़तम दुर्ग—यह वस्तुस्वरूप का दुर्ग बड़ा मजबूत है। किसी वस्तु में किसी अन्य वस्तु का न द्रव्य, न स्वभाव, न गुण, न पर्याय कुछ प्रवेश नहीं करता है। बड़े-बड़े रासायनिक, वैज्ञानिक प्रयोग भी कर लें तो वहाँ भी आप मूल बात पायेंगे की जो मूल सत् है वह पदार्थ न किसी दूसरे रूप होता है और न उसका कभी अभाव होता है। यह बात अवश्य चलती है कि किसी पदार्थ के संयोग का निमित्त पाकर दूसरे पदार्थ भी दूसरे के अनुरूप परिणमते हैं। इस ही को व्यवहार में लोक कहते हैं। देखो यह भी बन गया। जो यह है वह यह ही रहेगा। जो वह है वह-वह ही रहेगा। केवल निमित्तनैमित्तिक प्रसंग में निमित्त के सद्भाव के अनुरूप पर्याय बन जाती है। जगत में जितने भी सत् है उनमें से न कोई एक कम हो सकता है और न कोई असत् सत् बन सकता है, केवल एक पर्याय ही बदलती रहती है। जितने भी पदार्थ है वे सब परिवर्तनशील होते हैं,पर मूल सत्त्व को कोई पदार्थ नहीं छोड़ता है। यह मैं आत्मा स्वयं सत् हूं और किसी भी पररूप नहीं हूं।
योगी का ज्ञान, समाधिबल व आनन्दविकास—ये सकल पदार्थ अपना सत्त्व तभी रख सकते हैं जब त्रिकाल भी कोई किसी दूसरे रूप न परिणमन जाये। ये दो अंगुली है एक छोटी और एक बड़ी। ये अपना सत्त्व तभी रख सकती है जब एक किसी दूसरे रूप न परिणम जाये। अंगुली का दृष्टान्त बिल्कुल मोटा है क्योंकि यह परमार्थ पदार्थ नहीं है। यह भी मायारूप है, किन्तु जो परमार्थ सत् है वह कभी किसी दूसरे रूप हो ही नहीं सकता है। जब ऐसा समस्त पदार्थों का स्वरूप है तब मैं किसके लिए मोह करूं, किसके लिए राग और द्वेष करूँ? परोपयोग के व्यर्थ अनर्थ श्रम से विश्राम लेकर जो अपने आत्मा में ठहरता है, सहज विश्राम लेता है ऐसे योगी पुरुष इस समाधिबल से कोई विचित्र अलौकिक अनुपम आनन्द प्रकट होता है।
विषयविपदा—भैया ! ये विषयों के सुख कोई आनन्द है क्या? इनमें तो दुःख ही भरा हुआ है। जितने काल कोई भोजन कर रहा है उतने काल भी वह शान्त नहीं है। सूक्ष्म दृष्टि से देखो—इन विषयों के सुख में जो भी कल्पना उठती है वह शान्ति की प्रेरणा को पाकर नहीं उठती है, किन्तु अशान्ति की प्रेरणा को पाकर उठती है, कोई भी विषयभोग, किसी भी इन्द्रिय का साधन न पहिले शान्ति करता है, न भोगते समय शान्ति देता है और न भोगने पर शान्ति देता है। जिन भोगो के पूर्व वर्तमान और भविष्य अवस्था क्लेशरूप है उन ही भोगों के लिए अज्ञानी पुरुष अपना सब कुछ न्योछावर किये जा रहे हैं आनंद यहाँ कही न मिलेगा। अरे एक दिन ये सब कुछ छोड़कर चले जाना है। जिस समय है उस समय भी ये तेरे कुछ नहीं है। तू सबसे विविक्त प्रत्यक्ष ज्योतिस्वरूप अपने अंतस्तत्त्व का अनुभव करे। यही धर्म पालन है।
अध्यात्मयोग—जो पुरुष प्रवृत्ति और निवृत्ति रूप व्यवहार से मुक्त होकर आत्मा के अनुष्ठान में निष्ठ होते हैं अर्थात् अध्यात्म में अपने उपयोग को जोड़ते हैं उनके उससे अलौकिक आनन्द होता है। योगी का अर्थ है जोड़ने वाला। यहाँ हिसाब में भी तो योग शब्द बोलते हैं। कितना योग हुआ अर्थात् दो को मिलाकर एक रस कर दे इसी के मायने तो योग है। चार और चार मिलाकर कितना योग हुआ? आठ। अब इस आठ में पृथक-पृथक चार नहीं रहे। वह सब एक रस बनकर एक अष्टक बन गया है। इस प्रकार ज्ञान करने वाला यह उपयोग और जिसका ज्ञान किया जा रहा है ऐसे उपयोग की ही आधारभूत शाश्वत शक्ति इस शक्ति में इस व्यक्ति का योग कर दो। अर्थात् न तो व्यक्ति को अलग बता सकें और न शक्ति को अलग बता सकें, किन्तु एक रस बन जाय इस ही को कहते हैं अध्यात्मयोग।
निज में ही निज के योग की संभवता—भैया! गलत योग नहीं कर लेना, परपदार्थ में अपने उपयोग को जोड़कर एकमेक करने का गलत हिसाब नहीं लगाना है। गलत हिसाब लग भी नहीं सकता है। किसी भी परपदार्थ में अपने उपयोग को जोड़े तो कितना ही कुछ कर डाले, जुड़ ही नहीं सकता। भले ही कल्पना से मान लो गलत हिसाब को कि मैंने सही किया, पर वहाँ जुड़ ही नहीं सकता। पर के प्रदेश भिन्न है, पर में है, अपने प्रदेश भिन्न है, अपने में है। इस शक्ति का और इस उपयोग का योग जुड़ सकता है, क्योंकि यह भी एक चैतन्यमय है और यह अंतस्तत्त्व भी चैतन्यस्वरूप है। जैसे समुद्र और समुद्र की लहर का समुद्र मे योग हो सकता हैक्योंकि लहर भी समुद्ररूप है और समुद्र तो समुद्र ही है, इस ही प्रकार इस उपयोग का इस परमब्रह्म में योग हो सकता है, ऐसा योग जिनके होता है। उन योगी पुरूषों के कोई अलौकिक आनन्द उत्पन्न होता है।
आत्मकर्तव्य—जब तक दृश्यमान बाह्यपदार्थ मे किञ्चित् मात्र भी ममता रहती है तब तक स्वरूप में लीनता नहीं हो सकती है, किन्तु जब अध्यात्मयोगी की किसी भी बाह्य तत्त्व में कोई ममता नहीं रहती तो वह स्वरूप में लीन होता है। यही स्वरूपलीनता परम तत्त्व की प्राप्ति का कारण है। यह चीज होगी रागद्वेष के अभाव से। रागद्वेष मिटेंगे वस्तुस्वरूप के यर्थाथ ज्ञान से। इस कारण वस्तुस्वरूप के यथार्थज्ञान का अभ्यास करना चाहिए। जो अनुभव में उतरे, जो यथार्थ ज्ञान है उस ज्ञान का अर्जन करे। वह गुरु कृपा बिना नहीं हो सकता। यदि साक्षात् गुरु न मिले कभी तो ये ग्रन्थ भी गुरु ही है? क्योंकि वे जो बोलते थे वह सब यहाँ अक्षरों रूप में है। इस प्रकार स्वाध्याय और सत्संग करके अपने ज्ञानार्जन का उद्यम करे, यह ही अपने कल्याण का उपाय है।