इष्टोपदेश - श्लोक 48: Difference between revisions
From जैनकोष
(Imported from text file) |
(Imported from text file) |
||
Line 20: | Line 20: | ||
[[ वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 49 | अगला पृष्ठ ]] | [[ वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 49 | अगला पृष्ठ ]] | ||
[[ क्षु. मनोहर वर्णी - इष्टोपदेश प्रवचन | अनुक्रमणिका ]] | [[ क्षु. मनोहर वर्णी - इष्टोपदेश प्रवचन | अनुक्रमणिका ]] | ||
</noinclude> | |||
[[Category: इष्टोपदेश]] | [[Category: इष्टोपदेश]] | ||
[[Category: क्षु. मनोहर वर्णी]] | [[Category: क्षु. मनोहर वर्णी]] | ||
[[Category: प्रवचन]] | [[Category: प्रवचन]] |
Revision as of 13:16, 17 April 2020
आनन्दो निर्दहत्युद्धं कर्मेन्धनमनारतम्।
न चासौ खिद्यते योगी बहिर्दुःखेष्वचेतन:।।४८।।
आत्मोत्थ शुद्ध आनन्द का परिणाम—पूर्व श्लोकों में यह कहा गया था कि जो योगी न तो प्रवृत्ति रूप व्यवहार कर रहा है और न निवृत्ति रूप भी व्यवहार कर रहा है इन दोनों व्यवहार से ऊपर स्वरक्षित होकर जब आत्मा के उपयोग में उपयुक्त होता है उस समय इस अपूर्व योग के प्रसाद से उस योगी के अपूर्व आनन्द प्रकट होता है। अब श्लोक में यह कहा जा रहा है कि उस आनन्द का फल क्या मिलता है आनन्द भव-भव के बाँधे हुए प्रबल कर्मरूपी ईधन को जला डालता है। जैसे ईधन कितने ही दिनों से ढेर करके संचित किया जाय, उस समस्त ईधन को जलाने में अग्नि समर्थ है इस ही प्रकार विकल्पों से जितने भी कर्म बंधन संचित किये हैं उन कर्मों को नष्ट करने यह योगी का आनन्द समर्थ है।
अध्यात्मयोग की आनन्दमग्नता से कर्मप्रक्षय—भैया! बाह्य में साधुजनों की तपस्याकायक्लेशरूप दिखती है लोगों को कि ये बहुत उपवास करते हैं,एक बार भोजन पान करते हैं आदि कितनी कठिन विपत्तियाँ सहते है? लोगों को दिखता है कि ये कष्ट सह रहें हे पर वे कष्ट सह रहे हो तो उनके कर्म नष्ट नहीं हो सकते। वे तो किसी अपूर्व आनन्द में मग्न हो रहे हैं जिस आनन्द के द्वारा वे कर्म नष्ट हो जाते हैं,जो हम आपके आत्मा में चिरकाल से बंधे है। कर्म शब्द के अर्थ पर दृष्टि डालो। कर्म शब्द के दो अर्थ है एक तो जो आत्मा के द्वारा किया जाय उसका नाम कर्म (भाव कर्म) है। दूसरे इस कर्म के निमित्त से जो कार्माणवर्गणा कर्मरूप होती वह कर्म है।
भावकर्म और द्रव्यकर्म—यह जीव जो कुछ भी करता है, उसका नाम कर्म है। जैसे रागद्वेष विकल्प संकल्प मोह ये सब कर्म कहलाते हैं,इसका नाम भावकर्म है। भावकर्म तो जिस समय किया उस ही समय रहा, बाद में नही रहते। क्योंकि भावकर्म जीव के एक समय की परिणति है, और उपयोग में आने की दृष्टि में अन्तर्मुहूर्त की परिणति है। वह परिणति दूसरे क्षण नही रहती। दूसरे क्षण अन्य रागद्वेष मोह उत्पन्न हो जाते हैं। प्रत्येक जीव के जिस समय रागद्वेष होता है वैसा परिणमन दूसरे क्षण नही रहता। इस कारण भावकर्म तो अगले क्षण नही रहते, नये-नये भाव उत्पन्न होते रहते हैं,किन्तु उस नवीन क्षणिक भाव के कारण जो कर्म बनते हैं,ज्ञानावरणादिक कर्म बनते हैं उनमें कितने ही कर्म अनगिनते अरबों, खरबों वर्ष तक इसके साथ रहते हैं,और वे उतने वर्षो तक जीव को सताने के कारण बन रहे हैं। एक क्षण की गल्ती से अरबो खरबो वर्ष तक जीव को कष्ट सहना पड़ता है।
कर्मस्थिति का समर्थन—जैसे कोई पुरुष रसना इन्द्रियाँ के स्वाद में आकर किसी हानिकारक चीज को खा जाय तो खाने में भोगने में कितना समय लगा? दो तीन मिनट का, किन्तु उससे जो दर्द बनेगा, रोग बनेगा वह भोगना पड़ेगा घंटों । ऐसे ही रागद्वेष करना तो आसान है, स्वच्छन्दता है, जो मन मे आए सो कर लो, पुण्य का उदय है। जिस चाहे को सताकर अपने मनको खुश कर लो, जिस स्त्री या पुरुष के प्रति कामवासना उत्पन्न हो, और-और भी पाप कार्य कर लो, केवल एक दो मिनट ही तो वह पाप कार्य करता है किन्तु उन पापों के करने के कारण जो द्रव्यकर्म बंधे है वे जीव के साथ अनगिनते वर्ष तक रहेंगे।
क्षणिक गलती से असंख्याते वर्षों तक क्लेश भोग—आगम में बताया गया है कि कोई मन वाला पुरुष जिसके विशेष समझ उत्पन्न हुई है वह मोह करेगा, गड़बड़ी करेगा तो उस तीव्र मोह में ७० कोड़ाकोड़ी सागर तक के लिए कर्म बँध जाते हैं। अभी बतावेंगे कि कोड़ा-कोड़ी सागर क्या चीज होती है। कर्म इस लोक में बहुत सूक्ष्म कार्माण मैटर है। वह कार्माण स्कंध के नाम से प्रसिद्व है।वह सब जगह भरा है, और इस मोही मलिन जीव के साथ तो बहुत सा सूक्ष्म मैटर साथ लगा रहता है जो इसके लिए सदा तैयार है। यह जीव कुछ मलिन परिणाम तो करे कि कर्म रूप बन जायेगें, जिसे विस्रसोपचय कहते हैं। ये कर्म रूप बनेंगे तो ७० कोड़ाकोड़ी सागर तक के लिए भी बँध जाते हैं। इसका अर्थ यहहुआ कि कुछ वर्षों के बाद वे कर्म जब उदय में आतें है तो अनगिनतें वर्षों तक उदय में आ आकर इस जीव को क्लेश के कारण बनते हैं।
सागर का प्रमाण—सागर का समय बहुत लम्बा समय है। यह गिनती में नही बताया जा सकता है। जिस चीज को गिनती में बताया ही न जा सके उसको किसी उपमा द्वारा बताया जायगा। कल्पना करो कि २ हजार कोश का कोई लम्बा चौड़ा गड्ढा है। सब कल्पना पर बात चलेगी, न कोई ऐसा कर सकता है। न किया जा सकेगा। पंरतु इतना लम्बा समय कितना है इसका परिज्ञान करने के लिए एक उपमारूप में बताया गया है। उस विशाल गड्ढे में छोटे-छोटे रोम खण्ड जिनका दूसरा खण्ड किया न जा सके, भर दिया जाय ठसकर और मानो उस पर हाथी फिरा दिया जाय, फिर उन बालो को सौ-सौ वर्ष बाद एक-एक टुकड़ी निकाला जाय, सब यह उपमा की बात है, जितने वर्षों में वे सब बाल निकल सकेंगे उसका नाम है व्यवहारपल्य। उससे असंख्यातगुणा समय लगता है उद्धारपल्य में, उससे असंख्यात गुणा समय लगता है अद्धापल्य में। एक करोड़ अद्धापल्य में एक करोड़ अद्धापल्य का गुणा करें उसका नाम है एक कोड़ाकोड़ी अद्धापल्य। ऐसे १० कोड़ाकोड़ी पल्यों का एक सागर बनता है। एक सागर में एक करोड़ सागर का गुणा करो तब तक कोड़ाकोड़ी सागर होता है। यों ७० कोड़ाकोड़ी सागर तक ये द्रव्यकर्म इस जीव को जकड़ डालते हैं।
दुर्लभ मनुष्यजन्म का अवसर—यह मनुष्य कैसी-कैसी कुयोनियों को भोग-भोगकर आज प्राप्त किया है। जरा दृष्टि तो डालो—अन्य जीवों की अपेक्षा मनुष्य जीवन कितना श्रेष्ठ है। वृक्ष, पृथ्वी, इन जीवों की जिन्दगी क्या जिन्दगी है? कीड़ा मकोड़ा भी क्या मूल्य रखते हैं लोग जूतों से कुचलते हुए चले जाते हैं,उनका कुछ भी मूल्य नही समझते। पशु पक्षी भी बन जाय तो भी क्या है, अक्षर नही बोल सकते। दूसरे की बात नही समझते। अटपट उनका भोजन, कैसी उनकी आकृति? परंतु मनुष्य को देखो यह विवेक कर सके, सब पर हुकूमत कर सके, बड़े-बड़े साहित्य रच सके, एक दूसरे के हृदय की बात समझ सके, कितने विकास वाला यह मनुष्य जीवन है? इतना विकास पाने के बाद यदि विषयकषाय पापों में ही अपना समय गंवाया तो उसका फल यह होगा कि जिन कुयोनियों से निकलकर मनुष्य पर्याय में आये हैं उन ही कुयोनियों में जन्म लेना पड़ेगा।
आत्मप्रभुपर अन्याय के दुष्परिणाम का दृष्टान्तपूर्वक प्रदर्शन—एक साधु था। उसके पास एक चूहा बैठा रहा करता था। चूहा को साधु का विश्वास रहा करे सो वहाँ बैठ जाया करे। एक बार कोई बिलाव उस चूहे पर झपटा तो साधु ने आशीर्वाद दिया चूहे को कि विडालों भव, तू भी बिलाव हो जा, सो वह चूहा भी बिलाव हो गया, उस पर झपटा एक कुत्ता तो साधु ने आशीर्वाद दिया कि श्वानो भव। तू भी कुत्ता बन जा, सो वह कुत्ता हो गया। अब उस पर झपटा एक तेदुवा (व्याघ्र)। तो साधु ने आशीर्वाद दिया कि व्याघ्रो भव। तू व्याघ्र हो जा। सो वह कुत्ता भी व्याघ्र हो गया। उस पर झपटा एक शेर। सो साधु ने आशीर्वाद दिया कि सिंहो भव। तू सिंह बन जा। वह भी सिंह बन गया। अब उसे लगी भूख, सो उसने सोचा कि क्या खाना चाहिए? ध्यान आया कि अरे ये ही साधु महाराज तो बैठे है, इन्हीं को खाकर पेट भर लेना चाहिए। सो ज्यों ही साधु को खाने का संकल्प किया और कुछ उद्यम करना चाहा त्यों ही साधु ने आशीर्वाद दिया कि पुनः मूषको भव, तू फिर चूहा बन जा, वह फिर चूहा बन गया। अरे कितना उठकर सिंह बन गया और जरा सी गफलत में चूहा बनना पड़ा। ऐसे ही हम आपके भीतर विराजमान जो कारणपरमात्मतत्त्व है, परमब्रह्म स्वरूप है, विशुद्व समयसार है, ज्ञानानन्द स्वभाव है उसका आशीर्वाद मिला, कुछ विकास बना तो यह स्थावरों से उठकर कीड़ा मकोड़ा बना, उससे भी और बढ़कर पशु पक्षी बना, वहाँ से भी उठकर अब यह मनुष्य बना। अब मनुष्य बनकर इस परमब्रहास्वरूप पर, इस कारणपरमात्मतत्त्व पर हमला करने की ठान रहा है।
आत्मदेव पर मनुष्य का अन्याय—जो मनुष्य विषय भोगता है, कषायों में प्रवृत्त होता है, मोह रागद्वेष को अपनाता है वह इस प्रभु पर ही तो अन्याय कर रहा है। जिस प्रभु के आशीर्वाद से, प्रभु के प्रसाद से जघन्य योनियों से निकलकर मनुष्य जैसे उत्तम पद में आए है, तो अब यह मनुष्य कैसी कलावों से विषयों का सेवन कर रहा है, यह कभी बैल, घोड़ा, गघा था। ये कलापूर्वक कुछ विषयसेवन नही कर पाते हैं और मनुष्य को योग्यता विशेष नही मिली ना, सो बढ़िया, साहित्यिक ढंग से बढ़िया रागभरी कविताएँ बनाकर कितनी कलावों से यह विषय भोग रहा है और कितना प्रसार कर रहा है? सब जीवों से अधिक अन्याय कर सकने वाला यह मनुष्य है, यह अपने आपके प्रभु पर अन्याय कर रहा है। यह जीव आनादि से निगोद अवस्था में था। निगोद कहते हैं,पेड़ और पृथ्वी से भी खराब योनि को। एक शरीर के अनन्त जीव स्वामी है। कितनी कलुषित निगोद की योनि है? वहाँ से निकलकर धीरे-धीरे विकास करके यह मनुष्य बना और अब यह अपने आश्रयभूत इस परमात्मप्रभु पर हमला करने लगा, विषय कषायों का परिणमन करने लगा, यही तो प्रभु पर अन्याय है। तो इस प्रभु ने भीतर से फिर आशीर्वाद दिया कि पुनः निगोदो भव। तू फिर से निगोद बन जा। तो मनुष्य जैसी उत्कृष्ट योनि पाकर फिर निगोद बन जाता है। ऐसे ये विकट कर्म बंधन है।
धर्म का आनन्द और कर्मक्षय—इन विकट कर्म ईधनों को जलाने में समर्थ शुद्ध आनन्द है, कष्ट नही है। धर्म कष्ट के लिए नही होता। धर्म कष्ट पूर्वक नही होता। धर्म करते हुए में कष्ट नही होता। कोई पुरुष जो यथार्थ धर्मात्मा है वह धर्म करने की भावना कर रहा हो तो वह प्रसन्नता और आनन्दपूर्वक ही कर सकेगा, कष्ट में नही जिस काल में धर्म किया जा रहा है उस काल में भी कष्ट नही हो सकता है, वहाँ भी आनन्द ही झर रहा होगा और धर्म करने के फल में उसे आनन्द ही मिलेगा। आनन्द में ही सामर्थ्य है कि भव-भव से संचित कर्मों को क्षणमात्र में जला सकता है। ‘‘कोटि जन्म तप तपै ज्ञान बिन कर्म झरैं जे! ज्ञानी के छिनमाहि त्रिगुप्ति हैं सहज टरेंते।’’ अज्ञानी पुरुष बड़ी-बड़ी तपस्या करके करोड़ों भवों में जितने कर्म जला सकते हैं उतने कर्मों को ज्ञानी एक क्षण में ज्ञानबल से नष्ट कर देता है। इस मनुष्य-जीवन का सुन्दर फल प्राप्त करना हो तो एक निर्णय बना लो कि हमें ज्ञानप्रकाश का आनन्द लूटना है। घर में चार छः जन है ना, सो उनका कुछ ख्याल रहता है, तो उनको भी धर्म के रंग मे ऐसा रंग दो कि वे सब भी धर्मी बन जायें मोह रागद्वेष की फिर पद्धति न रहेगी। उनका भी भला करवा दो और अपना भी भला कर लो। दूसरे का भला करना अपने आधीन तो है नही लेकिन सम्बंध है तो व्यवहार ऐसा करो कि उनमें भी धर्मभावना जाग्रत हो, और एक ज्ञानप्रकाश के लिए ही मनुष्य जीवन समझो।
धर्मपथ—भैया! आत्मा के हित का पंथ निराला है और दुनियादारी का पंथ निराला है। कोई मनुष्य चाहे कि मैं दुनिया का आनन्द भी लूट लूँ और साथ ही आत्मा का हित भी कर लूँ तो ये दोनों बातें एक साथ नही मिलती है। निर्णय कर लो कि तुम्हें क्या प्यारा है? देखो दुनिया में अपना नाम कर जाने की धुन बनाना, धनसंचय की भावना बनाना, देश के लिए मर जाना, इनसे भी ज्ञानभावना प्रकट नही होती है। इस धर्मी को समूचे देश से अथवा धन वैभव से क्या मिलेगा? कुछ भी तो न मिलेगा। यह परोपकार के लिए नही है, किन्तु ज्ञानी पुरुष अपने को ज्ञान में, ध्यान में लीन होने में असमर्थ समझ रहा है जब तक तब तक विषय किन्तु ज्ञानी पुरुष अपने को ज्ञान, ध्यान में लीन होने में असमर्थ समझ रहा है जब तक तब तक विषय कषाय जैसे गंदे परिणाम मेरे मे घर न कर पायें उनसे बचने के लिए परका उपकार है। जो केवल पर के लिए ही परका उपकार समझते हैं वे धर्म से भी गये और धन से भी गए, और श्रम कर करके तकलीफ भी भोगी, और जो परोपकार का अंतः मर्म समझते हैं उनसे परोपकार भी वास्तविक मायने में हुआ, स्वयं भी प्रसन्न रह गया। मोक्षमार्ग भी, धर्मपालन भी साथ-साथ चला।
अध्यात्मयोगी के संकटों मे खेद का अभाव—वह योगी पुरुष अपनी ध्यानसाधना में रहकर जिन संकटों को सामना कर रहा है उन्हे यह कष्ट नही समझता। लोग समझते हैं कि संकट आ रहे हैं लेकिन वह उन दुःखों को दुख नही समझ रहा है। वह तो अपने अनादिकाल से बिछुड़े हुए परमपिता, परमशराण चिदानन्दात्मक प्रभुता का दर्शन मिला, उस आनन्द में यह मग्न हो रहा है, और इस शुद्व आनन्द का ही प्रताप है कि भव-भव के संचित कर्म उसके क्षण मात्र में नष्ट हो जाते हैं,उसे खेद नही होता। खेद करने से खोटे कर्मों का बंध होता है। प्रसन्नता तो तब मिल सकती है जब इन बाह्यपदार्थों मे मोह ममता का सम्पर्क न बढाये, ज्ञाताद्रष्टा रहे, जो कुछ बाह्य में होता है उसके जाननहार रहे।
दुनिया के अजायबघर में निःसंकट रहने का उपाय—यह दुनिया अजायबघर है, अजायबघर मेंदर्शकों को केवल देखने की इजाजत है, छूने की या कुछ जेब में धरने की इजाजत नही है। यदि कोई आज्ञा विरुद्ध काम करेगा तो वह गिरफ्तार हो जायगा, ऐसे ही ये सर्वसमागम अजायबघर है, परमार्थ नही है, इनको देखने की इजाजत है ईमानदारी से। छूने की इजाजत, अपनाने की इजाजत नही है। जो किसी भी अनात्मतत्त्व को अपनायेगा वह बंधन में पड़ेगा और अनेक भवों तक उसे कष्ट भोगना होगा। सब जीव है, एक समान है, उनमें से किसी एक दो को ही अंतरंग में पकड़कर रह जाना है, इसका क्या फल मिलेगा? सो यह बिलबिलाता दृश्यमान जीवलोक ही प्रमाण है। अब तो ऐसा अंतः पुरुषार्थ बनायें और अपने आपके स्वरूप में रमने का यत्न करें जिससे संकटों का समूल विनाश है। इसके लिए सत्संगति, ज्ञानार्जन, परोपकार सब कुछ उपाय करे। आत्मदृष्टि से ही हमारे संकट दूर हो सकेंगे।