• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

तम: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 15:17, 25 December 2013 (view source)
Vikasnd (talk | contribs)
No edit summary
← Older edit
Revision as of 21:41, 5 July 2020 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
Newer edit →
Line 1: Line 1:
स.सि./५/२४/२९६/८ <span class="SanskritText">तमो दृष्टिप्रतिबन्‍धकारणं प्रकाशविरोधि।</span> =<span class="HindiText">जिससे दृष्टि में  प्रतिबन्‍ध होता और जो प्रकाश का विरोधी है वह तम कहलाता है।</span> (रा.वा./५/२४/१५/४८९/७);  (त.सा./३/६८/१६१); (द्र.सं./१६/५३/११)।        रा.वा./५/२४/१/४८५/१४ <span class="SanskritText">पूर्वोपात्ताशुभकर्मोदयात्  ताम्‍यति आत्‍मा, तभ्‍यतेऽनेन, तमनमात्रं वा तम:। </span><span class="HindiText">पूर्वोपात्त अशुभकर्म के उदय से  जो स्‍वरूप को अन्‍धकारवृत करता है या जिसके द्वारा किया जाता है, या तमन मात्र को  तम कहते हैं।</span>
== सिद्धांतकोष से ==
स.सि./5/24/296/8 <span class="SanskritText">तमो दृष्टिप्रतिबन्धकारणं प्रकाशविरोधि।</span> =<span class="HindiText">जिससे दृष्टि में  प्रतिबन्ध होता और जो प्रकाश का विरोधी है वह तम कहलाता है।</span> (रा.वा./5/24/15/489/7);  (त.सा./3/68/161); (द्र.सं./16/53/11)।        रा.वा./5/24/1/485/14 <span class="SanskritText">पूर्वोपात्ताशुभकर्मोदयात्  ताम्यति आत्मा, तभ्यतेऽनेन, तमनमात्रं वा तम:। </span><span class="HindiText">पूर्वोपात्त अशुभकर्म के उदय से  जो स्वरूप को अन्धकारवृत करता है या जिसके द्वारा किया जाता है, या तमन मात्र को  तम कहते हैं।</span>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>


[[तप्ततप्त ऋद्धि | Previous Page]]
<noinclude>
[[तम:प्रभा | Next Page]]
[[ तप्ततप्त ऋद्धि | पूर्व पृष्ठ ]]


[[Category:त]]
[[ तम,प्रभा | अगला पृष्ठ ]]
 
</noinclude>
[[Category: त]]
 
 
== पुराणकोष से ==
<p> पाँचवीं धूमप्रभा नरकभूमि के प्रथम प्रस्तार का इन्द्रक बिल । इसकी चारों दिशाओं में छत्तीस और विदिशाओं में बत्तीस श्रेणीबद्ध बिल है । इसकी पूर्व दिशा में निरुद्ध, पश्चिम में अतिनिरुद्ध, दक्षिण में विमर्दन और उत्तर में महाविमर्दन नाम के चार महानरक है । इसका विस्तार आठ लाख तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीस योजन और एक योजन के तीन भागों में एक भाग प्रमाण है । इसकी जघन्य स्थिति दस सागर तथा उत्कृष्ट स्थिति ग्यारह सागर और एक सागर के पाँच भागों में दो भाग प्रमाण है । यहाँ नारकियों को अवगाहना पचहत्तर धनुष होती है । <span class="GRef"> महापुराण 10.31,  </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 4.83, 130, 156, 209, 265-286, 333 </span></p>
 
<noinclude>
[[ तप्ततप्त ऋद्धि | पूर्व पृष्ठ ]]
 
[[ तम,प्रभा | अगला पृष्ठ ]]
 
</noinclude>
[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: त]]

Revision as of 21:41, 5 July 2020

== सिद्धांतकोष से == स.सि./5/24/296/8 तमो दृष्टिप्रतिबन्धकारणं प्रकाशविरोधि। =जिससे दृष्टि में प्रतिबन्ध होता और जो प्रकाश का विरोधी है वह तम कहलाता है। (रा.वा./5/24/15/489/7); (त.सा./3/68/161); (द्र.सं./16/53/11)। रा.वा./5/24/1/485/14 पूर्वोपात्ताशुभकर्मोदयात् ताम्यति आत्मा, तभ्यतेऽनेन, तमनमात्रं वा तम:। पूर्वोपात्त अशुभकर्म के उदय से जो स्वरूप को अन्धकारवृत करता है या जिसके द्वारा किया जाता है, या तमन मात्र को तम कहते हैं।

 


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

पाँचवीं धूमप्रभा नरकभूमि के प्रथम प्रस्तार का इन्द्रक बिल । इसकी चारों दिशाओं में छत्तीस और विदिशाओं में बत्तीस श्रेणीबद्ध बिल है । इसकी पूर्व दिशा में निरुद्ध, पश्चिम में अतिनिरुद्ध, दक्षिण में विमर्दन और उत्तर में महाविमर्दन नाम के चार महानरक है । इसका विस्तार आठ लाख तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीस योजन और एक योजन के तीन भागों में एक भाग प्रमाण है । इसकी जघन्य स्थिति दस सागर तथा उत्कृष्ट स्थिति ग्यारह सागर और एक सागर के पाँच भागों में दो भाग प्रमाण है । यहाँ नारकियों को अवगाहना पचहत्तर धनुष होती है । महापुराण 10.31, हरिवंशपुराण 4.83, 130, 156, 209, 265-286, 333


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=तम&oldid=37767"
Categories:
  • त
  • पुराण-कोष
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 5 July 2020, at 21:41.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki