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== सिद्धांतकोष से ==
   <li><span class="HindiText"><strong name="1" id="1"> नाम का लक्षण</strong></span> <br>रा.वा./१/५/–/२८/८<span class="SanskritText"> नीयते  गम्‍यतेऽनेनार्थ: नमति वार्थमभिमुखीकरोतीति नाम। </span>=<span class="HindiText">जिसके द्वारा अर्थ जाना जाये  अथवा अर्थ को अभिमुख करे वह नाम कहलाता है। </span><br>
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ध.१५/२/२ <span class="PrakritText">जस्‍स णामस्‍स वाचगभावेण पवुत्तीए जो अत्‍थो आलंवणं होदि सो णामणिबंधणं णाम, तेण विणा  णामपवुत्तीए अभावादो।</span> =<span class="HindiText">जिस नाम की वाचकरूप से प्रवृत्ति में जो अर्थ अवलम्‍बन होता  है वह नाम निबन्‍धन है; क्‍योंकि, उसके बिना नाम की प्रवृत्ति सम्‍भव नहीं है।</span> ध.९/४१/५४/२ <span class="SanskritText">नाना मिनो‍तीति नाम।</span> =<span class="HindiText">नानारूप से जो जानता है, उसे नाम कहते हैं। </span><br>त.अनु./१०० <span class="SanskritText">वाच्‍यवाचकं नाम। </span>=<span class="HindiText">वाच्‍य के वाचक शब्‍द को नाम कहते हैं– देखें - [[ आगम#4 | आगम / ४ ]]। </span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong name="1" id="1"> नाम का लक्षण</strong></span> <br>रा.वा./1/5/–/28/8<span class="SanskritText"> नीयते  गम्यतेऽनेनार्थ: नमति वार्थमभिमुखीकरोतीति नाम। </span>=<span class="HindiText">जिसके द्वारा अर्थ जाना जाये  अथवा अर्थ को अभिमुख करे वह नाम कहलाता है। </span><br>
ध.15/2/2 <span class="PrakritText">जस्स णामस्स वाचगभावेण पवुत्तीए जो अत्थो आलंवणं होदि सो णामणिबंधणं णाम, तेण विणा  णामपवुत्तीए अभावादो।</span> =<span class="HindiText">जिस नाम की वाचकरूप से प्रवृत्ति में जो अर्थ अवलम्बन होता  है वह नाम निबन्धन है; क्योंकि, उसके बिना नाम की प्रवृत्ति सम्भव नहीं है।</span> ध.9/41/54/2 <span class="SanskritText">नाना मिनोतीति नाम।</span> =<span class="HindiText">नानारूप से जो जानता है, उसे नाम कहते हैं। </span><br>त.अनु./100 <span class="SanskritText">वाच्यवाचकं नाम। </span>=<span class="HindiText">वाच्य के वाचक शब्द को नाम कहते हैं–देखें [[ आगम#4 | आगम - 4]]। </span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong name="2" id="2"> नाम के भेद</strong></span><br>
   <li><span class="HindiText"><strong name="2" id="2"> नाम के भेद</strong></span><br>
   ध.१/१,१,१/१७/५ <span class="PrakritText">तत्‍थ णिमित्तं चउव्विहं, जाइ-दव्‍व–गुण-किरिया चेदि। ...दव्‍वं दुविहं, संयोगदव्‍वं समवायदव्‍वं चेदि। ...ण च ...अण्‍ण णिमित्तंतरमत्थि।</span> =<span class="HindiText">नाम या संज्ञा के चार  निमित्त होते हैं–जाति, द्रव्‍य, गुण और क्रिया। (उसमें भी) द्रव्‍य निमित्त के दो  भेद हैं–संयोग द्रव्‍य और समवाय द्रव्‍य। (अर्थात् नाम या शब्‍द चार प्रकार के  हैं–जातिवाचक, द्रव्‍यवाचक, गुणवाचक और क्रियावाचक) इन चार के अतिरिक्त अन्‍य कोई  निमित्त नहीं है। (श्‍लो.वा.२/१/५/श्‍लो.२-१०/१६९)        ध.१५/२/३ तं च णाम  णिबंधणमत्‍थाहिंहाणपच्‍चयभेएण तिविहं। =वह नाम निबन्‍धन अर्थ, अभिधान और प्रत्‍यय के भेद से तीन प्रकार का है। </span></li>
   ध.1/1,1,1/17/5 <span class="PrakritText">तत्थ णिमित्तं चउव्विहं, जाइ-दव्व–गुण-किरिया चेदि। ...दव्वं दुविहं, संयोगदव्वं समवायदव्वं चेदि। ...ण च ...अण्ण णिमित्तंतरमत्थि।</span> =<span class="HindiText">नाम या संज्ञा के चार  निमित्त होते हैं–जाति, द्रव्य, गुण और क्रिया। (उसमें भी) द्रव्य निमित्त के दो  भेद हैं–संयोग द्रव्य और समवाय द्रव्य। (अर्थात् नाम या शब्द चार प्रकार के  हैं–जातिवाचक, द्रव्यवाचक, गुणवाचक और क्रियावाचक) इन चार के अतिरिक्त अन्य कोई  निमित्त नहीं है। (श्लो.वा.2/1/5/श्लो.2-10/169)        ध.15/2/3 तं च णाम  णिबंधणमत्थाहिंहाणपच्चयभेएण तिविहं। =वह नाम निबन्धन अर्थ, अभिधान और प्रत्यय के भेद से तीन प्रकार का है। </span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong name="3" id="3"> नाम के भेदों के लक्षण</strong> <br>देखें - [[ जाति | जाति  ]](सामान्‍य) (गौ  मनुष्‍य आदि जाति वाचक नाम हैं)।<br>
   <li><span class="HindiText"><strong name="3" id="3"> नाम के भेदों के लक्षण</strong> <br>देखें [[ जाति ]](सामान्य) (गौ  मनुष्य आदि जाति वाचक नाम हैं)।<br>
    देखें - [[ द्रव्‍य#1.10 | द्रव्‍य / १ / १० ]](दण्‍डी छत्री आदि संयोग द्रव्‍य निमित्तक नाम हैं और गलगण्‍ड काना आदि समवाय द्रव्‍य निमित्तक नाम हैं।)</span> ध.१/१,१,१/१८/२,५ <span class="PrakritText">गुणो  णाम पज्‍जायादिपरोप्‍परविरुद्धो अविरुद्धो वा। किरिया णाम परिप्‍फंदणरूवा। तत्‍थ ...गुणणिमित्तं  णाम किण्‍हो रुहिरो इच्‍चेवमाइ। किरियाणिमित्तं णाम गायणो णच्चणो इच्‍चेवमाइ। </span>=<span class="HindiText">जो  पर्याय आदिक से परस्‍पर विरुद्ध हो अथवा अविरुद्ध हो उसे गुण कहते हैं। परिस्‍पन्‍दन अर्थात् हलनचलन रूप अवस्‍था को क्रिया कहते हैं। तहाँ कृष्‍ण, रुधिर इत्‍यादि गुणनिमित्तक नाम हैं, क्‍योंकि, कृष्‍ण आदि गुणों के निमित्त से उन गुण वाले द्रव्‍यों में ये नाम व्‍यवहार में आते हैं। गायक, नर्तक आदि क्रिया निमित्तक नाम है; क्‍योंकि,  गाना नाचना आदि क्रियाओं के निमित्त से वे नाम व्‍यवहार में आते हैं।</span><br>
    देखें [[ द्रव्य#1.10 | द्रव्य - 1.10 ]](दण्डी छत्री आदि संयोग द्रव्य निमित्तक नाम हैं और गलगण्ड काना आदि समवाय द्रव्य निमित्तक नाम हैं।)</span> ध.1/1,1,1/18/2,5 <span class="PrakritText">गुणो  णाम पज्जायादिपरोप्परविरुद्धो अविरुद्धो वा। किरिया णाम परिप्फंदणरूवा। तत्थ ...गुणणिमित्तं  णाम किण्हो रुहिरो इच्चेवमाइ। किरियाणिमित्तं णाम गायणो णच्चणो इच्चेवमाइ। </span>=<span class="HindiText">जो  पर्याय आदिक से परस्पर विरुद्ध हो अथवा अविरुद्ध हो उसे गुण कहते हैं। परिस्पन्दन अर्थात् हलनचलन रूप अवस्था को क्रिया कहते हैं। तहां कृष्ण, रुधिर इत्यादि गुणनिमित्तक नाम हैं, क्योंकि, कृष्ण आदि गुणों के निमित्त से उन गुण वाले द्रव्यों में ये नाम व्यवहार में आते हैं। गायक, नर्तक आदि क्रिया निमित्तक नाम है; क्योंकि,  गाना नाचना आदि क्रियाओं के निमित्त से वे नाम व्यवहार में आते हैं।</span><br>
     ध.१५/२/४<span class="PrakritText"> तत्‍थ अत्‍थो अट्ठविहो एगबहुजीवाजीवजणिदपादेक्‍कसंजोगभंगभेएण। एदेसु अट्ठसु अत्‍थेसुप्‍पण्‍णणाणं पच्चणिबंधणं। जो णामसद्दो पवुत्तो संतो अप्‍पाणं चेव जाणावेदि तमभिहाणणामणिबंधणं  णाम। </span>=<span class="HindiText">एक व बहुत जीव तथा अजीव से उत्‍पन्न प्रत्‍येक व संयोगी भंगों के भेद से  अर्थ निबन्‍धन नाम आठ प्रकार का है (विशेष देखो आगे नाम निक्षेप) इन आठ अर्थों में  उत्‍पन्न हुआ ज्ञान प्रत्‍यय निबन्‍धन नाम कहलाता है। जो संज्ञा शब्‍द प्रवृत्त  होकर अपने आपको जतलाता है, वह अभिधान निबन्‍धन कहा जाता है।</span></li>
     ध.15/2/4<span class="PrakritText"> तत्थ अत्थो अट्ठविहो एगबहुजीवाजीवजणिदपादेक्कसंजोगभंगभेएण। एदेसु अट्ठसु अत्थेसुप्पण्णणाणं पच्चणिबंधणं। जो णामसद्दो पवुत्तो संतो अप्पाणं चेव जाणावेदि तमभिहाणणामणिबंधणं  णाम। </span>=<span class="HindiText">एक व बहुत जीव तथा अजीव से उत्पन्न प्रत्येक व संयोगी भंगों के भेद से  अर्थ निबन्धन नाम आठ प्रकार का है (विशेष देखो आगे नाम निक्षेप) इन आठ अर्थों में  उत्पन्न हुआ ज्ञान प्रत्यय निबन्धन नाम कहलाता है। जो संज्ञा शब्द प्रवृत्त  होकर अपने आपको जतलाता है, वह अभिधान निबन्धन कहा जाता है।</span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong name="4" id="4">सर्व शब्‍द वास्‍तव में क्रियावाची हैं</strong> </span><br>श्‍लो.वा./४/१/३३/;९/२६७/६<span class="SanskritText"> न हि कश्चिदक्रियाशब्‍दोऽस्‍यास्ति गौरश्‍व इति जातिशब्‍दाभिमतानामपि क्रियाशब्‍दत्‍वात् आशुगाम्‍यश्‍व इति, शुक्‍लो नील इति गुणशब्‍दाभिमता अपि क्रियाशब्‍द एव। शुचिभवना  च्‍छुक्‍ल: नीलान्नील इति। देवदत्त इति यदृच्‍छा शब्‍दाभिमता अपि क्रियाशब्‍दा एव  देव एव (एनं) देयादिति देवदत्त: यज्ञदत्त इति। संयोगिद्रव्‍यशब्‍दा: समवायिद्रव्‍यशब्‍दाभिमता:  क्रियाशब्‍द एव। दण्‍डोऽस्‍यास्‍तीति दण्‍डी विषाणमस्‍यास्‍तीति विषाणीत्‍यादि। पञ्चतयो तु शब्‍दानां प्रवृत्ति: व्‍यवहारमात्रान्न न निश्‍चयादित्‍ययं मनयेते।</span> =<span class="HindiText">जगत्  में कोई भी शब्‍द ऐसा नहीं है जो कि क्रिया का वाचक न हो। जातिवाचक अश्‍वादि शब्‍द भी क्रियावाचक हैं; क्‍योंकि, आशु अर्थात् शीघ्र गमन करने वाला अश्‍व कहा जाता  है। गुणवाचक शुक्‍ल नील आदि शब्‍द भी क्रियावाचक हैं; क्‍योंकि, शुचि अर्थात्  पवित्र होना रूप क्रिया से शुक्‍ल तथा नील रंगने रूप क्रिया से नील कहा जाता है।  देवदत्त आदि यदृच्‍छा शब्‍द भी क्रियावाची हैं; क्‍योंकि, देव ही जिस पुरुष को  देवे; ऐसे क्रियारूप अर्थ को धारता हुआ देवदत्त है। इसी प्रकार यज्ञदत्त भी  क्रियावाची है। दण्‍डी विषाणी आदि संयोगद्रव्‍यवाची या समवायद्रव्‍यवाची शब्‍द भी  क्रियावाची ही है, क्‍योंकि, दण्‍ड जिसके पास वर्त रहा है वह दण्‍डी और सींग जिसके  वर्त रहे हैं वह विषाणी कहा जाता है। जातिशब्‍द आदि रूप पाँच प्रकार के शब्‍दों की  प्रवृत्ति तो व्‍यवहार मात्र से होती है। निश्‍चय से नहीं है। ऐसा एवंभूत नय मानता  है। </span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong> सर्व शब्द वास्तव में क्रियावाची हैं</strong> </span><br>श्लो.वा./4/1/33/;9/267/6<span class="SanskritText"> न हि कश्चिदक्रियाशब्दोऽस्यास्ति गौरश्व इति जातिशब्दाभिमतानामपि क्रियाशब्दत्वात् आशुगाम्यश्व इति, शुक्लो नील इति गुणशब्दाभिमता अपि क्रियाशब्द एव। शुचिभवना  च्छुक्ल: नीलान्नील इति। देवदत्त इति यदृच्छा शब्दाभिमता अपि क्रियाशब्दा एव  देव एव (एनं) देयादिति देवदत्त: यज्ञदत्त इति। संयोगिद्रव्यशब्दा: समवायिद्रव्यशब्दाभिमता:  क्रियाशब्द एव। दण्डोऽस्यास्तीति दण्डी विषाणमस्यास्तीति विषाणीत्यादि। पञ्चतयो तु शब्दानां प्रवृत्ति: व्यवहारमात्रान्न न निश्चयादित्ययं मनयेते।</span> =<span class="HindiText">जगत्  में कोई भी शब्द ऐसा नहीं है जो कि क्रिया का वाचक न हो। जातिवाचक अश्वादि शब्द भी क्रियावाचक हैं; क्योंकि, आशु अर्थात् शीघ्र गमन करने वाला अश्व कहा जाता  है। गुणवाचक शुक्ल नील आदि शब्द भी क्रियावाचक हैं; क्योंकि, शुचि अर्थात्  पवित्र होना रूप क्रिया से शुक्ल तथा नील रंगने रूप क्रिया से नील कहा जाता है।  देवदत्त आदि यदृच्छा शब्द भी क्रियावाची हैं; क्योंकि, देव ही जिस पुरुष को  देवे; ऐसे क्रियारूप अर्थ को धारता हुआ देवदत्त है। इसी प्रकार यज्ञदत्त भी  क्रियावाची है। दण्डी विषाणी आदि संयोगद्रव्यवाची या समवायद्रव्यवाची शब्द भी  क्रियावाची ही है, क्योंकि, दण्ड जिसके पास वर्त रहा है वह दण्डी और सींग जिसके  वर्त रहे हैं वह विषाणी कहा जाता है। जातिशब्द आदि रूप पांच प्रकार के शब्दों की  प्रवृत्ति तो व्यवहार मात्र से होती है। निश्चय से नहीं है। ऐसा एवंभूत नय मानता  है। </span></li>
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   <li><span class="HindiText"><strong> गौण्‍यपद आदि नाम―देखें - [[ पद | पद। ]]</strong></span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong> गौण्यपद आदि नाम―देखें [[ पद ]]।</strong></span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong> भगवान् के १०००८ नाम―देखें - [[ म | म ]].पु.२५/१००-२१७।</strong> </span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong> भगवान् के 10008 नाम―देखें [[ म ]]पु.25/100-217।</strong> </span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong> नाम निक्षेप</strong>―देखें - [[ आगे पृथक् शब्‍द | आगे पृथक् शब्‍द। ]]</span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong> नाम निक्षेप</strong>―देखें [[ आगे पृथक् शब्द ]]।</span></li>
</ul>
</ul>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>


[[नाभिराज | Previous Page]]
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[[नामकर्म | Next Page]]
[[ नाभेय | पूर्व पृष्ठ ]]


[[Category:न]]
[[ नाम नय | अगला पृष्ठ ]]
 
</noinclude>
[[Category: न]]
 
 
== पुराणकोष से ==
<p id="1">(1) जीवादि तत्त्वों के निरूपण के लिए अभिहित नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव रूप चतुर्विध निक्षेपों में प्रथम निक्षेप । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 2. 108, 17.135 </span></p>
<p id="2">(2) पदगत गान्धर्व की एक विधि । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 19.5149 </span></p>
 
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[[ नाम नय | अगला पृष्ठ ]]
 
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[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: न]]

Revision as of 21:42, 5 July 2020

== सिद्धांतकोष से ==

  1. नाम का लक्षण
    रा.वा./1/5/–/28/8 नीयते गम्यतेऽनेनार्थ: नमति वार्थमभिमुखीकरोतीति नाम। =जिसके द्वारा अर्थ जाना जाये अथवा अर्थ को अभिमुख करे वह नाम कहलाता है।
    ध.15/2/2 जस्स णामस्स वाचगभावेण पवुत्तीए जो अत्थो आलंवणं होदि सो णामणिबंधणं णाम, तेण विणा णामपवुत्तीए अभावादो। =जिस नाम की वाचकरूप से प्रवृत्ति में जो अर्थ अवलम्बन होता है वह नाम निबन्धन है; क्योंकि, उसके बिना नाम की प्रवृत्ति सम्भव नहीं है। ध.9/41/54/2 नाना मिनोतीति नाम। =नानारूप से जो जानता है, उसे नाम कहते हैं।
    त.अनु./100 वाच्यवाचकं नाम। =वाच्य के वाचक शब्द को नाम कहते हैं–देखें आगम - 4।
  2. नाम के भेद
    ध.1/1,1,1/17/5 तत्थ णिमित्तं चउव्विहं, जाइ-दव्व–गुण-किरिया चेदि। ...दव्वं दुविहं, संयोगदव्वं समवायदव्वं चेदि। ...ण च ...अण्ण णिमित्तंतरमत्थि। =नाम या संज्ञा के चार निमित्त होते हैं–जाति, द्रव्य, गुण और क्रिया। (उसमें भी) द्रव्य निमित्त के दो भेद हैं–संयोग द्रव्य और समवाय द्रव्य। (अर्थात् नाम या शब्द चार प्रकार के हैं–जातिवाचक, द्रव्यवाचक, गुणवाचक और क्रियावाचक) इन चार के अतिरिक्त अन्य कोई निमित्त नहीं है। (श्लो.वा.2/1/5/श्लो.2-10/169) ध.15/2/3 तं च णाम णिबंधणमत्थाहिंहाणपच्चयभेएण तिविहं। =वह नाम निबन्धन अर्थ, अभिधान और प्रत्यय के भेद से तीन प्रकार का है।
  3. नाम के भेदों के लक्षण
    देखें जाति (सामान्य) (गौ मनुष्य आदि जाति वाचक नाम हैं)।
    देखें द्रव्य - 1.10 (दण्डी छत्री आदि संयोग द्रव्य निमित्तक नाम हैं और गलगण्ड काना आदि समवाय द्रव्य निमित्तक नाम हैं।)
    ध.1/1,1,1/18/2,5 गुणो णाम पज्जायादिपरोप्परविरुद्धो अविरुद्धो वा। किरिया णाम परिप्फंदणरूवा। तत्थ ...गुणणिमित्तं णाम किण्हो रुहिरो इच्चेवमाइ। किरियाणिमित्तं णाम गायणो णच्चणो इच्चेवमाइ। =जो पर्याय आदिक से परस्पर विरुद्ध हो अथवा अविरुद्ध हो उसे गुण कहते हैं। परिस्पन्दन अर्थात् हलनचलन रूप अवस्था को क्रिया कहते हैं। तहां कृष्ण, रुधिर इत्यादि गुणनिमित्तक नाम हैं, क्योंकि, कृष्ण आदि गुणों के निमित्त से उन गुण वाले द्रव्यों में ये नाम व्यवहार में आते हैं। गायक, नर्तक आदि क्रिया निमित्तक नाम है; क्योंकि, गाना नाचना आदि क्रियाओं के निमित्त से वे नाम व्यवहार में आते हैं।
    ध.15/2/4 तत्थ अत्थो अट्ठविहो एगबहुजीवाजीवजणिदपादेक्कसंजोगभंगभेएण। एदेसु अट्ठसु अत्थेसुप्पण्णणाणं पच्चणिबंधणं। जो णामसद्दो पवुत्तो संतो अप्पाणं चेव जाणावेदि तमभिहाणणामणिबंधणं णाम। =एक व बहुत जीव तथा अजीव से उत्पन्न प्रत्येक व संयोगी भंगों के भेद से अर्थ निबन्धन नाम आठ प्रकार का है (विशेष देखो आगे नाम निक्षेप) इन आठ अर्थों में उत्पन्न हुआ ज्ञान प्रत्यय निबन्धन नाम कहलाता है। जो संज्ञा शब्द प्रवृत्त होकर अपने आपको जतलाता है, वह अभिधान निबन्धन कहा जाता है।
  4. सर्व शब्द वास्तव में क्रियावाची हैं
    श्लो.वा./4/1/33/;9/267/6 न हि कश्चिदक्रियाशब्दोऽस्यास्ति गौरश्व इति जातिशब्दाभिमतानामपि क्रियाशब्दत्वात् आशुगाम्यश्व इति, शुक्लो नील इति गुणशब्दाभिमता अपि क्रियाशब्द एव। शुचिभवना च्छुक्ल: नीलान्नील इति। देवदत्त इति यदृच्छा शब्दाभिमता अपि क्रियाशब्दा एव देव एव (एनं) देयादिति देवदत्त: यज्ञदत्त इति। संयोगिद्रव्यशब्दा: समवायिद्रव्यशब्दाभिमता: क्रियाशब्द एव। दण्डोऽस्यास्तीति दण्डी विषाणमस्यास्तीति विषाणीत्यादि। पञ्चतयो तु शब्दानां प्रवृत्ति: व्यवहारमात्रान्न न निश्चयादित्ययं मनयेते। =जगत् में कोई भी शब्द ऐसा नहीं है जो कि क्रिया का वाचक न हो। जातिवाचक अश्वादि शब्द भी क्रियावाचक हैं; क्योंकि, आशु अर्थात् शीघ्र गमन करने वाला अश्व कहा जाता है। गुणवाचक शुक्ल नील आदि शब्द भी क्रियावाचक हैं; क्योंकि, शुचि अर्थात् पवित्र होना रूप क्रिया से शुक्ल तथा नील रंगने रूप क्रिया से नील कहा जाता है। देवदत्त आदि यदृच्छा शब्द भी क्रियावाची हैं; क्योंकि, देव ही जिस पुरुष को देवे; ऐसे क्रियारूप अर्थ को धारता हुआ देवदत्त है। इसी प्रकार यज्ञदत्त भी क्रियावाची है। दण्डी विषाणी आदि संयोगद्रव्यवाची या समवायद्रव्यवाची शब्द भी क्रियावाची ही है, क्योंकि, दण्ड जिसके पास वर्त रहा है वह दण्डी और सींग जिसके वर्त रहे हैं वह विषाणी कहा जाता है। जातिशब्द आदि रूप पांच प्रकार के शब्दों की प्रवृत्ति तो व्यवहार मात्र से होती है। निश्चय से नहीं है। ऐसा एवंभूत नय मानता है।
  • गौण्यपद आदि नाम―देखें पद ।
  • भगवान् के 10008 नाम―देखें म पु.25/100-217।
  • नाम निक्षेप―देखें आगे पृथक् शब्द ।

 


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पुराणकोष से

(1) जीवादि तत्त्वों के निरूपण के लिए अभिहित नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव रूप चतुर्विध निक्षेपों में प्रथम निक्षेप । हरिवंशपुराण 2. 108, 17.135

(2) पदगत गान्धर्व की एक विधि । हरिवंशपुराण 19.5149


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