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| 01-05-2009 8:19:49 अपराह्न
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| ४. कल्की के अत्याचार
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| [[तिलोयपण्णत्ती गाथा १५११|तिलोयपण्णत्ती / अधिकार ४ / गाथा १५११]] अह सहियाण कक्की णियजोग्गे जणपदे पयत्तेण। सुक्कं जाचादि लुद्धो पिंडग्गं जाव ताव समणाओ।१५११।=तदनन्तर वह कल्की प्रयत्नपूर्वक अपने योग्य जनपदों को सिद्ध करके लोभ को प्राप्त होता हुआ मुनियों के आहार में से भी प्रथम ग्रास को शुल्क के रूप में माँगने लगा।१५११। ( ति. प./१५२३-१५२९) (म.पु./७६/४१०) (त्रि.सा./८५३, ८५९)।
| | निर्ग्रन्थे जिनमार्गे सङ्क्षेपेण यथाख्यातम् ॥५९॥ |
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| ५. कल्की की मृत्यु
| | <font face="mykokila"> vikas </font> |
| [[तिलोयपण्णत्ती गाथा १५१२|तिलोयपण्णत्ती / अधिकार ४ / गाथा १५१२]]-१५१३ दादूणं पिंडग्गं समणा कालो य अंतराणं पि। गच्छंति आहिणाणं अप्पजइ तेसु एक्कम्मि।१५१२। अह को वि असुरदेवो ओहीदी मुणिगणाण उवसग्गं। णादूणं तं कक्किं मारेदि हु धम्मदोहि त्ति।१५१३।=तब श्रमण अग्रपिण्ड को शुल्क के रूप में देकर और ‘यह अन्तरायों का काल है’ ऐसा समझकर (निराहार) चले जाते हैं। उस समय उनमें से किसी एक को अवधिज्ञान उत्पन्न हो जाता है।१५१२। इसके पश्चात् कोई असुरदेव अवधिज्ञान से मुनिगण के उपसर्ग को जानकर और धर्म का द्रोही मानकर उस कल्की को मार डालता है।१५१३। ([[तिलोयपण्णत्ती गाथा १५२६|तिलोयपण्णत्ती / अधिकार ४ / गाथा १५२६]]-१५३३) (म.पु./७६/४११-४१४) (त्रि.सा./८५४)।
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| ६. कल्की के पश्चात् पुन: धर्म की स्थापना
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| [[तिलोयपण्णत्ती गाथा १५१४|तिलोयपण्णत्ती / अधिकार ४ / गाथा १५१४]]-१५१५ कक्किसुदो अजिदंजय णामो रक्खत्ति णमदि तच्चरणे। तं रक्खदि असुरदेओ धम्मे रज्जं करेज्ज त्ति।१५१४। तत्तो दोवे वासा सम्मद्धम्मो पयट्टदि जणाणं। कमसो दिवसे दिवसे कालमहप्पेण हाएदे।१५१५।=तब अजितंजय नाम का उस कल्की का पुत्र ‘रक्षा करो’ इस प्रकार कहकर उस देव के चरणों में नमस्कार करता है। तब वह देव ‘धर्मपूर्वक राज्य करो’ इस प्रकार कहकर उसकी रक्षा करता है।१५१४। इसके पश्चात् दो वर्ष तक लोगों में समीचीन धर्मप्रवृत्ति रहती है, फिर क्रमश: काल के माहात्म्य से वह प्रतिदिन हीन होती जाती है।१५१५। (म.पु./७६/४२८-४३०) (त्रि.सा./८५५-८५६)।
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| ७. पंचम काल में कल्कियों व उपकल्कियों का प्रमाण
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| [[तिलोयपण्णत्ती गाथा १५१६|तिलोयपण्णत्ती / अधिकार ४ / गाथा १५१६]], १५३४, १५३५ एवं वस्ससहस्से पुह पुह कक्की हवइ एक्केक्को। पंचसयवचछरयसुं एक्केक्को तह य उवकक्की।१५१६। एवमिगवीस कक्की उवकक्की तेत्तिया य घम्माए। जम्मंति धम्मदोहा जलणिहिउवमाणआउजुदो।१५३४। वासतए अइमासे पक्खे गलिदम्मि पविसदे तत्तो। सो अदिदुस्समणामो छट्टो कालो महाविसमो।१५३५।=इस प्रकार १००० वर्षों के पश्चात् पृथक्-पृथक् एक-एक कल्की तथा ५०० वर्षों के पश्चात् एक-एक उपकल्की होता है।१५१६। इस प्रकार २१ कल्की और इतने ही उपकल्की धर्म के द्रोह से एक सागरोपम आयु से युक्त होकर धर्मा पृथिवी (प्रथम नरक) में जन्म लेते हैं।१५३४। इसके पश्चात् ३ वर्ष ८ मास और एक पक्ष के बीतने पर महाविषम वह अतिदुषमा नाम का छठा काल प्रविष्ट होता है।१५३५। (म.पु./७६/४३१-४४१) (त्रि.सा./८५७-८५९)।
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| ८. कल्की के समय चतु:संघ की स्थिति
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| [[तिलोयपण्णत्ती गाथा १५२१|तिलोयपण्णत्ती / अधिकार ४ / गाथा १५२१]], १५३० वीरांगजाभिधाणो तक्काले मुणिवरो भवे एक्को। सव्वसिरी तह विरदी सावयजुगमग्गिदत्तपंगुसिरी।१५२१। ताहे चत्तारि जणा चउविहआहारसंगपहुदीणं। जावज्जीवं छंडिय सण्णासं ते करंति य।१५३०।=उस समय वीरांगज नामक एक मुनि, सर्वश्री नामक आर्यिका तथा अग्निदत्त (अग्निल और पंगुश्री नाम श्रावक युगल (श्रावक-श्राविका) होते हैं।१५२१। तब वे चारों जन चार प्रकार के आहार और परिग्रह को जन्म पर्यन्त छोड़कर संन्यास (समाधिमरण) को ग्रहण करते हैं।१५३०। (म.पु./७६/४३२-४३६) (त्रि.सा./८५८-८५९)।
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| ९. प्रत्येक कल्की के काल में एक अवधिज्ञानी मुनि
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| [[तिलोयपण्णत्ती गाथा १५१७|तिलोयपण्णत्ती / अधिकार ४ / गाथा १५१७]] कक्की पडि एक्केक्कं दुस्समसाहुस्स ओहिणाणं पि संघा य चादुवण्णा थोवा जायंति तक्काले।१५१७।=प्रत्येक कल्की के प्रति एक-एक दुष्षमाकालवर्ती साधु को अवधिज्ञान प्राप्त होता है और उसके समय में चातर्वर्ण्य संघ भी अल्प हो जाता है।१५१७।
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| कल्प–१. साधु चर्या के १० कल्पों के निर्देश
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| १.–दे०साधु/२। २. इन दसों कल्पों के लक्षण–दे० वह वह नाम। ३. जिनकल्प–दे० जिन कल्प। ४. महाकल्प–श्रुतज्ञान का ११ वाँ अंगबाह्य है–दे० श्रुतज्ञान/III। ५. स्वर्ग विभाग–दे० स्वर्ग १/२। कल्प काल—दे० काल/४।
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Revision as of 19:02, 25 January 2013
निर्ग्रन्थे जिनमार्गे सङ्क्षेपेण यथाख्यातम् ॥५९॥
vikas