• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

वैश्य: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 13:02, 14 October 2020 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
← Older edit
Revision as of 16:58, 14 November 2020 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
Newer edit →
Line 1: Line 1:
== सिद्धांतकोष से ==

== सिद्धांतकोष से ==
<p><span class="GRef"> महापुराण / </span>सर्ग/श्लोक-<span class="SanskritText">‘‘वैश्याश्च  कृषिवाणिज्यपाशुपाल्योपजीविताः । (16/104) । ऊरुभ्यां दर्शयन् यात्राम्  अस्राक्षीद् वणिजः प्रभुः । जलस्थलादियात्राभिः तद्वृत्तिर्वार्त्तया यतः ।  (16/244) । वणिजोऽर्थार्जनान्न्याय्यात् । (38/46) । </span>= <span class="HindiText">जो खेती, व्यापार तथा पशुपालन आदि के द्वारा जीविका करते थे वे वैश्य  कहलाते थे । (16/184) । भगवान् ने अपने ऊरुओं से यात्रा दिखलाकर अर्थात् परदेश  जाना सिखलाकार वैश्यों की रचना की सो ठीक ही है, क्योंकि जल, स्थल आदि प्रदेशों  में यात्रा कर व्यापार करना ही उनकी मुख्य आजीविका है । (16/244) । न्यायापूर्वक  धन कमाने से वैश्य होता है । (38/46) । </span></p>
<p><span class="GRef"> महापुराण / </span>सर्ग/श्लोक-<span class="SanskritText">‘‘वैश्याश्च  कृषिवाणिज्यपाशुपाल्योपजीविताः । (16/104) । ऊरुभ्यां दर्शयन् यात्राम्  अस्राक्षीद् वणिजः प्रभुः । जलस्थलादियात्राभिः तद्वृत्तिर्वार्त्तया यतः ।  (16/244) । वणिजोऽर्थार्जनान्न्याय्यात् । (38/46) । </span>= <span class="HindiText">जो खेती, व्यापार तथा पशुपालन आदि के द्वारा जीविका करते थे वे वैश्य  कहलाते थे । (16/184) । भगवान् ने अपने ऊरुओं से यात्रा दिखलाकर अर्थात् परदेश  जाना सिखलाकार वैश्यों की रचना की सो ठीक ही है, क्योंकि जल, स्थल आदि प्रदेशों  में यात्रा कर व्यापार करना ही उनकी मुख्य आजीविका है । (16/244) । न्यायापूर्वक  धन कमाने से वैश्य होता है । (38/46) । </span></p>


Line 12: Line 13:


== पुराणकोष से ==
== पुराणकोष से ==
  <p> चार वर्णों में एक वर्ण । ये न्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करते हैं । वृषभदेव ने यात्रा करना सिखाकर इस वर्ण की रचना की थी । जल, स्थल आदि प्रदेशों में व्यापार और पशुपालन करना इस वर्ण की आजीविका के साधन है । <span class="GRef"> महापुराण 16. 104, 244, 38.46,  </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 9. 39, 17.84,  </span><span class="GRef"> पांडवपुराण 2.161 </span></p>
<div class="HindiText"> <p> चार वर्णों में एक वर्ण । ये न्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करते हैं । वृषभदेव ने यात्रा करना सिखाकर इस वर्ण की रचना की थी । जल, स्थल आदि प्रदेशों में व्यापार और पशुपालन करना इस वर्ण की आजीविका के साधन है । <span class="GRef"> महापुराण 16. 104, 244, 38.46,  </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 9. 39, 17.84,  </span><span class="GRef"> पांडवपुराण 2.161 </span></p>
  </div>


<noinclude>
<noinclude>

Revision as of 16:58, 14 November 2020



सिद्धांतकोष से

महापुराण / सर्ग/श्लोक-‘‘वैश्याश्च कृषिवाणिज्यपाशुपाल्योपजीविताः । (16/104) । ऊरुभ्यां दर्शयन् यात्राम् अस्राक्षीद् वणिजः प्रभुः । जलस्थलादियात्राभिः तद्वृत्तिर्वार्त्तया यतः । (16/244) । वणिजोऽर्थार्जनान्न्याय्यात् । (38/46) । = जो खेती, व्यापार तथा पशुपालन आदि के द्वारा जीविका करते थे वे वैश्य कहलाते थे । (16/184) । भगवान् ने अपने ऊरुओं से यात्रा दिखलाकर अर्थात् परदेश जाना सिखलाकार वैश्यों की रचना की सो ठीक ही है, क्योंकि जल, स्थल आदि प्रदेशों में यात्रा कर व्यापार करना ही उनकी मुख्य आजीविका है । (16/244) । न्यायापूर्वक धन कमाने से वैश्य होता है । (38/46) ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

चार वर्णों में एक वर्ण । ये न्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करते हैं । वृषभदेव ने यात्रा करना सिखाकर इस वर्ण की रचना की थी । जल, स्थल आदि प्रदेशों में व्यापार और पशुपालन करना इस वर्ण की आजीविका के साधन है । महापुराण 16. 104, 244, 38.46, हरिवंशपुराण 9. 39, 17.84, पांडवपुराण 2.161


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वैश्य&oldid=77861"
Categories:
  • व
  • पुराण-कोष
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 14 November 2020, at 16:58.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki