• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

संस्तर

From जैनकोष

Revision as of 15:15, 25 April 2016 by Vikasnd (talk | contribs)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)

भ.आ./मू./६४०-६४५/८४०-८४५ पुढविसिलामओ वा फलमओ तणमओ य संथारो। होदि समाधिणिमित्तं उत्तरसिर अहव पुव्वसिरो।६४०। अघसे समे असुसिरे अहिसुयअविले य अप्पपाणे य। असिणिद्धे घणगुत्ते उज्जोवे भूमिसंथारो।६४१। विद्धत्थो य अफुडिदो णिक्कंपो सव्वदो असंसत्तो। समपट्ठो उज्जोवे सिलामओ होदि संथारो।६४२। भूमि समरुंदलओ अकुडिल एगंगि अप्पमाणो य। अच्छिदो य अफुडिदो तण्हो वि य फलय संथारो।६४३। णिस्संधी य अपोल्लो णिरुवहदो समधि वास्सणिज्जंतु। सुहपडिलेहो मउओतणसंथारो हवे चरिमो।६४४। जुत्तो पमाणरइयो उभयकालपडिलेहणासुद्धो। विधिविहिदो संथारो आरोहव्वो तिगुत्तेण।६४५। = पृथिवी, शिलामय, फलकमय, और तृणमय ऐसे चार प्रकार के संस्तर हैं। समाधि के निमित्त इनकी आवश्कता पड़ती है। इन संस्तरों के मस्तक का भाग पूर्व व उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए।६४०। भूमिसंस्तर - जो जमीन मृदु नहीं है, जो छिद्र रहित, सम, सूखी, प्राणिरहित, प्रकाशयुक्त, क्षपक के देहप्रमाण के अनुसार और गुप्त, और सुरक्षित है ऐसी जमीन संस्तररूप होगी अन्यथा नहीं।६४१। शिलामय संस्तर - शिलामय संस्तर अग्निज्वाल से दग्ध, टाँकी के द्वारा उकेरा गया, वा घिसा हुआ, होना चाहिए। यह संस्तर टूटा-फूटा न हो निश्चल हो, सर्वत: जीवों से रहित हो, खटमल आदि दोषों से रहित, समतल और प्रकाशयुक्त होना चाहिए।६४२। फलकमय संस्तर - चारों तरफ से जो भूमि से संलग्न है, रुन्द और हलका, उठाने रखने में अनायास कारक, सरल, अखण्ड, स्निग्ध, मृदु, अफूट ऐसा फलक संस्तर के लिए योग्य है।६४३। तृणसंस्तर - तृणसंस्तर गाँठ रहित तृण से बना हुआ, छिद्र रहित, न टूटे हुए तृण से बना हुआ, जिस पर सोने व बैठने से खुजली न होगी ऐसे तृण से बना हुआ, मृदुस्पर्श वाला, जन्तु रहित, जो सुख से सोधा जाता है, ऐसा होना चाहिए।६४४। संस्तर के सामान्य लक्षण - चारों प्रकार के संस्तरों में ये गुण होने चाहिए। योग्य, प्रमाणयुक्त हो। तथा सूर्योदय व सूर्यास्तकाल में शोधन करने से शुद्ध होता है। शास्त्रोक्त विधि से जिसकी रचना हुई है, ऐसे संस्तर पर मन वचन काय को शुद्धकर आरोहण करना चाहिए।६४५।

Previous Page Next Page

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=संस्तर&oldid=17267"
Category:
  • स
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 25 April 2016, at 15:15.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki