• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

अगारी

From जैनकोष

Revision as of 22:35, 22 July 2020 by Maintenance script (talk | contribs) (Imported from text file)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)



तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 7/20 अणुव्रतोऽगारी ॥20॥

= अणुव्रती श्रावकअगारी है।

सर्वार्थसिद्धि अध्याय /7/19/357 प्रतिश्रयार्थिभिः अङ्ग्यते, इति अगारं वेश्म, तद्वानगारी। ...ननु चात्र विपर्ययोऽपि प्राप्नोति शून्यागारदेवकुलाद्यावासस्य मुनेरगारित्वम् अनिवृत्तविषयतृष्णस्य कुतश्चित्कारणाद् गृहं विमुच्य वने वसतोऽनगारत्वं च प्राप्नोति इति। नैष दोषः भावागारस्य विवक्षितत्वात्। चारित्रमोहोदये सत्यगारसम्बन्धं प्रत्यनिवृत्तः परिणामो भावागारमित्युच्यते। स यस्यास्त्यसावगारी वने वसन्नपि। गृहे वसन्नपि तदभावादनगार इति च भवति।

= आश्रय चाहनेवाले जिसे अंगीकार करते हैं वह अगार है। अगार का अर्थ वेश्म अर्थात् घर है, जिसके घर है वह अगारी है। शंका-उपरोक्त लक्षण से विपरीत अर्थ भी प्राप्त होता है, क्योंकि शून्य घर व देव मन्दिर आदि में वास करनेवाले मुनि के अगारपना प्राप्त हो जायेगा? और जिसकी विषय-तृष्णा अभी निवृत्त नहीं हुई है ऐसे किसी व्यक्ति को किसी कारणवश घर छोड़कर वनमें बसने से अनगारपना प्राप्त हो जायेगा? उत्तर - यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यहाँपर भावागार विवक्षित है। चारित्र मोहनीय का उदय होनेपर जो परिणाम घर से निवृत्त नहीं है वह भावागार कहा जाता है। वह जिसके है वह वनमें निवास करते हुए भी अगारी है और जिसके इस प्रकार का परिणाम नहीं है वह घरमें बसते हुए भी अनगार है।

(राजवार्तिक अध्याय 7/19,1/546/24) ( तत्त्वार्थसार अधिकार 4/79) (विषय विस्तार देखें श्रावक )



पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=अगारी&oldid=50954"
Category:
  • अ
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 22 July 2020, at 22:35.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki