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अज्ञानी पाप धतूरा न बोय

From जैनकोष

(राग सोरठ)
अज्ञानी पाप धतूरा न बोय ।।टेक ।।
फल चाखन की बार भरै दृग, मरि है मूरख रोय ।।
किंचित् विषयनि सुख के कारण, दुर्लभ देह न खोय ।
ऐसा अवसर फिर न मिलैगा, इस नींदड़ी न सोय ।।१ ।।अज्ञानी. ।।
इस विरियां मैं धर्म-कल्प-तरु, सींचत स्याने लोय ।
तू विष बोवन लागत तो सम, और अभागा कोय ।।२ ।।अज्ञानी. ।।
जो जग में दुखदायक बेरस, इसही के फल सोय ।
यों मन `भूधर' जानिकै भाई, फिर क्यों भोंदू होय ।।३ ।।अज्ञानी. ।।