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अहो दोऊ रंग भरे खेलत होरी

From जैनकोष

(राग सोरठ)
अहो दोऊ रंग भरे खेलत होरी । अलख अमूरति की जोरी ।।अहो. ।।
इतमैं आतम राम रंगीले, उतमैं सुबुद्धि किसोरी ।
या कै ज्ञान सखा संग सुन्दर, वाकै संग समता गोरी ।।१ ।।अहो. ।।
सुचि मन सलिल दया रस केसरि, उदै कलश में घोरी ।
सुधी समझि सरल पिचकारी, सखिय प्यारी भरि भरि छोरी ।।२ ।।अहो. ।।
सत गुरु सीख तान धुरपद की, गावत होरा होरी ।
पूरब बंध अबीर उड़ावत, दान गुलाल भर झोरी ।।३ ।।अहो. ।।
`भूधर' आजि बड़े भागिन, सुमति सुहागिन मोरी ।
सो ही नारि सुलक्षिनी जगमैं, जासौं पतिनै रति जोरी ।।४ ।।अहो. ।।