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ऐसी समझके सिर धूल

From जैनकोष

ऐसी समझके सिर धूल ।।टेक ।।
धरम उपजन हेत हिंसा, आचरैं अघमूल ।।
छके मत-मद पान पीके रहे मनमें फूल ।
आम चाखन चहैं भोंदू, बोय पेड़ बबूल ।।१ ।।ऐसी. ।।
देव रागी लालची गुरु, सेय सुखहित भूल ।
धर्म नगकी परख नाहीं, भ्रम हिंडोले झूल ।।२ ।।ऐसी. ।।
लाभ कारन रतन विणजै, परखको नहिं सूल ।
करत इहि विधि वणिज `भूधर', विनस जै है मूल ।।३ ।।ऐसी. ।।